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राजनीति: निजता की सुरक्षा को चुनौती

भारत सरकार को भी यूरोपीय संघ की तरह ‘जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन’ जैसे सख्त कानूनों का रुख करना चाहिए, ताकि नागरिकों की निजता को सुरक्षित रखा जा सके। जहां नागरिक खुद जागरूक नहीं हैं वहां सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। साथ ही बाजार में बड़ी कंपनियां जिस तरह का एकाधिकार चाहती हैं, उस पर भी नियंत्रण लगाया जाए।

Whatsapp policyव्हट्सएप ने किया टर्म और कंडीशन में बदलाव। (फाइल फोटो)

अनुराग सिंह

निश्चित रूप से सूचना तकनीक ने बहुत-सी चीजों को न केवल सरल बना दिया है, बल्कि कई चीजें संभव भी हो सकी हैं। वर्तमान दौर में सूचनाओं के आदान-प्रदान के अनेक विकल्प मौजूद हैं। तकनीकी के इस समय में सूचना प्रदाता और प्रसारण की बड़ी-बड़ी कंपनियां अपनी विस्तारवादी नीतियों के साथ मौजूद हैं। यह सब कुछ बहुत बड़े स्तर पर संचालित हो रहा है। ताजा मामला वाट्स ऐप्प का है, जिसने अपनी नई शर्तों के अनुसार सेवा जारी रखने को कहा है। अगर आप उन नियमों से सहमत नहीं हैं, तो आपकी सेवाएं बंद कर दी जाएंगी। इसकी नई सेवा शर्तें विवादास्पद हैं, जो निजता की सुरक्षा की गारंटी नहीं देतीं।

मैसेजिंग ऐप्प वाट्स ऐप्प की शर्तों में कुछ विवरण दिए गए हैं, जिसमें कहा गया है कि अब वाट्स ऐप्प, उसके उपयोगकर्ता की कई जानकारियां, जैसे इस्तेमाल की जाने वाली भाषा, देश और शहर का विवरण, टाइम जोन, वित्तीय लेन-देन का प्रकार, उसकी विधि, मोबाइल नंबर, आईपी एड्रेस, सेवा प्रदाता कंपनी का नाम आदि शामिल है, यह सब कुछ वह फेसबुक, इंस्टाग्राम या किसी तीसरे पक्ष के साथ साझा कर सकता है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि इसके लिए वह आपसे सहमति मांग चुका होगा और इसके बाद किसी तरह की वैधानिक लड़ाई में आप कुछ भी नहीं कर सकते। लोगों के बीच यह अफवाह थी कि वाट्स ऐप्प आपके द्वारा भेजे जा रहे निजी संदेशों को भी पढ़ सकता है, लेकिन वाट्स ऐप्प का स्पष्टीकरण है कि संदेश अब भी ‘एंड टू ऐंड एनक्रिप्टेड’ यानी दो लोंगों के बीच रहेंगे। इसमें किसी तीसरे पक्ष का हस्तक्षेप नहीं होगा। वह समूह की निजता का भी खयाल रखेगा और आपकी संपर्क सूची किसी के साथ साझा नहीं करेगा। बहुत से लोग सिर्फ इसी बात से खुश हैं और इसके इस्तेमाल पर अपनी सहमति दर्ज करा रहे हैं कि वह हमारे निजी संदेशों को नहीं पढ़ सकता।

पर यह मामला गंभीर है और यहीं तक सीमित नहीं है कि वह आपके संदेशों को पढ़ नहीं सकता। आपके लेन-देन की प्रक्रिया और विधि, मोबाइल नंबर, स्थान, आईपी एड्रेस आदि काफी निजी किस्म की जानकारी है। इसको किसी के साथ साझा करके सीधे तौर पर आपकी निजता पर हमला किया जा रहा है। पर भारत के संदर्भ में यह मामला और अधिक गंभीर इसलिए है कि लोगों को इस बात की जानकारी ही नहीं है कि यह उनके साथ क्या हो रहा है? बड़ी-बड़ी तकनीकी कंपनियां लोगों का निजी डाटा इकट्ठा कर बाजार को नियंत्रित करने हेतु भविष्य की कैसी योजना बना सकती हैं, इस बात की भनक तक इन लोगों को नहीं है। यह सीधे तौर पर निजता का हनन है।

भारत में ऐसा इसलिए संभव हो पा रहा है, क्योंकि इससे संबंधित कानून यहां अपेक्षाकृत लचीले हैं, जिनका लाभ लेकर इस तरह की शर्तों को अनिवार्य बनाया जा रहा है। गौरतलब है कि यही वाट्स ऐप्प जब यूरोपीय देशों में अपनी इन्हीं सेवाओं को जारी रखने की बात कर रहा है तो इन शर्तों को ऐच्छिक रख रहा है। एक ही सेवा प्रदाता कंपनी द्वारा, एक ही तरह के मामले में विश्व के अलग-अलग क्षेत्रों में निजता संबंधी नियमों को अलग रखने से क्या प्रतीत होता है? यूरोपीय देशों में इससे संबंधित कानूनों का कठोर होना, निजता को गंभीरता से लिया जाना ही वे वजहें हैं जिनके कारण वाट्स ऐप्प को अपनी नई शर्तों को वहां ऐच्छिक रखना पड़ा। वहां की जनता में भी इस संदर्भ में पर्याप्त जागरूकता है।

उन देशों में कार्य करने के लिए उन्हें उन सख्त कानूनों का पालन करना पड़ता है। वहां अगर निजी जानकारी लीक होने, दुरुपयोग होने की खबरें आती हैं तो वहां के आईटी कानून के तहत आप उन पर मुकदमा भी कर सकते हैं। इसलिए वहां इस तरह की छूट का लाभ नहीं लिया जा सकता। विकसित देशों की बड़ी-बड़ी तकनीकी कंपनियां अपने को या अपने जैसी किसी बड़ी कंपनी को लाभ पहुंचाने के उद्देश्य से इस तरह के कार्य में संलिप्त होती रही हैं। तीसरी दुनिया के देश, जो अभी सूचना तकनीकी और प्रसारण में वैसी भूमिका नहीं निभा पाए हैं और अब भी उनकी निर्भरता विकसित देशों पर बनी हुई है, उन्हें निर्भर बनाए रखने की साजिशें लगातार जारी हैं।

वाट्स ऐप्प के पूरी दुनिया के एक सौ अस्सी से भी अधिक देशों में, साठ से अधिक भाषाओं में, दो अरब से अधिक उपयोगकर्ता हैं। अकेले भारत में इसके लगभग चालीस करोड़ उपयोगकर्ता हैं। हालांकि इस घटनाक्रम के बाद वाट्स ऐप्प इंस्टाल करने की दर में तेजी से गिरावट और दूसरे ऐप्प इंस्टाल करने में तेजी देखी जा रही है। सवाल है कि अगर भारत जैसे देशों में कठोर कानूनों को लागू न किया गया, तो इस बात की कितनी आशा की जा सकती है कि ये नए ऐप्प भविष्य में ऐसा कुछ नहीं करेंगे। समस्या के मूल में यहां का लचीला कानून है, जिस पर सरकार को तुरंत मंथन कर उसमें परिवर्तन करना चाहिए और उसको और सख्त बनाना चाहिए।

दरअसल साम्राज्यवादी विस्तार का यह नया दौर है, जहां सब कुछ पहले जैसा ही है, लेकिन उसका तरीका बदल चुका है। पहले दशों पर सीधे कब्जा किया जाता था, फिर सब कुछ बाजार की ताकतों से संचालित होता था। अब एक कदम और आगे बढ़ कर सूचना तकनीकी की सहायता से आपकी निजी जानकारियों, आदतों, आपके रहने का ढंग, तौर-तरीकों, खानपान, आपके वित्तीय लेन-देन से आपकी क्षमताओं आदि को बड़ी आसानी से परखा जा रहा है।

हर क्षेत्र की बड़ी-बड़ी दुकानों पर नाममात्र की छूट या कुछ प्वाइंट्स इकट्ठा हो जाने का लालच देकर आपसे कार्ड बनवाया जाता है, उन दुकानों से हर बार खरीदारी करने पर उसमें एंट्री की जाती है, फलस्वरूप उपभोक्ता कुछ प्वाइंट अर्जित करता है और उसके माध्यम से वे आपकी खरीदारी संबंधी गतिविधियों पर नजर रखते और उस डाटा को वर्गीकृत कर आपके अनुरूप उत्पाद को खरीदने के संदेश भेजे जाते हैं।

हमें सभी ओर से विभिन्न सूचना स्रोतों के माध्यम से घेरने की जो कोशिश हो रही है वास्तव में वही सबसे खतरनाक है। हम क्या हैं, क्या करते हैं, कैसे रहते हैं या कहां जाते हैं? हमारे वित्तीय लेन-देन के लिए बने कार्ड के माध्यम से भी हम निगरानी में हैं। ऐसे में वाट्स ऐप्प की नई शर्तें निजता के हनन की ओर बढ़ने वाला एक और कदम होगा, जिससे हम पहले से ज्यादा निगरानी में आने वाले हैं। भारत सरकार फिलहाल इस मुद्दे पर विचार कर रही है। लोगों द्वारा लगातार इस पर प्रतिक्रिया दिए जाने से वाट्स ऐप्प के अधिकारियों ने कहा है कि वे हर सवाल का जवाब देने को तैयार हैं।

भारत सरकार को भी यूरोपीय संघ की तरह ‘जनरल डाटा प्रोटेक्शन रेगुलेशन’ जैसे सख्त कानूनों का रुख करना चाहिए, ताकि नागरिकों की निजता को सुरक्षित रखा जा सके। जहां नागरिक खुद जागरूक नहीं हैं वहां सरकार की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। साथ ही बाजार में बड़ी कंपनियां जिस तरह का एकाधिकार चाहती हैं, उस पर भी नियंत्रण लगाया जाए।

एप्पल और गूगल पर एक दूसरे की मदद कर छोटी कंपनियों को प्रतिस्पर्धा से बाहर करने के आरोप लगे हुए हैं, ट्विटर और फेसबुक पर चुनावी समय में लगे आरोपों से विवाद हुआ ही था। इन सबसे निजता के हनन के साथ ही बड़ी कंपनियों का एकाधिकार स्थापित होगा, परिणामस्वरूप स्वस्थ प्रतिस्पर्धा का ह्रास होगा और बाजार के नियमों के मुताबिक यह अंतत: सामान्य उपभोक्ता का नुकसान है।

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