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राजनीति: अवसाद की चुनौती

लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में किए गए लगातार प्रयास भी हमें उस अकेलेपन से मुक्त कर सकते हैं, जो अकेलापन व्यक्ति को अवसाद की ओर धकेलता है क्योंकि प्रयासों की निरंतरता किसी को अवसादग्रस्त होने की फुर्सत ही नहीं देती। सूरज रोज उगता है और समय रोज उसे ढलने पर विवश कर देता है। लेकिन इससे हमारी किसी सुबह का उत्साह धुंधला नहीं होता।

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अतुल कनक
पिछले दिनों एक चर्चित सितारे ने खुदकुशी कर ली। खबरों के अनुसार कुछ समय से वह मानसिक अवसाद का शिकार था और इस व्याधि से उबरने के लिए चिकित्सकीय उपचार भी ले रहा था। किसी सफल व्यक्तित्व के साथ अवसाद की स्थिति का जोड़ा जाना सामान्य आदमी को थोड़ा हैरत में डाल सकता है। आखिर प्रसिद्धी, समृद्धि, सुंदरता और शारीरिक सौष्ठव के बावजूद कोई व्यक्ति अवसादग्रस्त कैसे हो सकता है? जिस आदमी की संवेदनाएं इतनी प्रबल हों कि वह एक प्रशंसक के आह्वान पर बाढ़ पीड़ितों की मदद के लिए एक करोड़ रुपए का दान देने की घोषणा कर दे, वह अपने और अपनों के प्रति सहजता से इतना संवेदनहीन नहीं हो सकता कि सबके सपनों को अनदेखा करके अपने ही जीवन का अंत कर ले।

जीवन की तीन मूलभूत आवश्यकताएं मानी गई हैं- रोटी, कपड़ा और मकान। आम आदमी की जिंदगी इन्हीं के बंदोबस्त के इर्द-गिर्द परिक्रमा करती है। उसकी नजर में जो लोग प्रसिद्धि और समृद्धि के सोपानों का स्पर्श करते हैं, उनका जीवन विलक्षण सुखों से पूर्ण होता है। फिर प्रसिद्धि और समृद्धि के ये द्वार भी यदि किसी सर्जनात्मक उपलब्धि के कारण खुलें तो इसे दैवीय वरदान माना जाता है।

आपको अपनी पसंद का काम करने को मिले और उसमें भी आप सफलता के नव आयाम स्पर्श कर लें, तो इससे अधिक सौभाग्य की कल्पना की भी कहां जा सकती है। मनोविज्ञान भी मानता है कि अवसाद का सर्वश्रेष्ठ उपचार सृजन ही है। चाहे वो संगीत हो, नृत्य हो, कला हो, कविताई हो या अभिनय हो। ऐसे में किसी सफल और सक्रिय कलाकार का निरंतर ग्लैमर की दुनिया में मुस्कुराते हुए रहने के बावजूद अवसादग्रस्त रहना यकायक अचंभित तो करता है।

लेकिन जिन लोगों ने चकाचौंध की दुनिया को निकट से देखा है, वे इस अवसाद को समझ सकते हैं। सफलता अनेक शत्रु साथ लेकर आती है। हर किसी की अपेक्षाएं आपसे बढ़ जाती हैं और यदि आप तनिक भी अपनी शर्तों पर जीने या अपनी शर्तों पर काम करने की जिद दिखाते हैं तो अनेक अपवाद आपका पीछा करने लगते हैं। फिर ग्लैमर की दुनिया का रहन सहन आज भी सामान्यजीवन की प्राथमिकताओं से अलग है।

यह जो आभिजात्यवर्गीय जीवनशैली और महानगरीय जिजीविष हैं, ये व्यक्ति को जीवन के सपने तो बहुत दिखाती हैं, लेकिन वैयक्तिक मसलों पर नितांत अकेला छोड़ देती हैं और यही अकेलापन कई बार हमारी उमंगों का हत्यारा हो जाता है। सृजनशील व्यक्तियों में ऊर्जा का अपार संचय होता है। जब उस ऊर्जा को सकारात्मक नि:सरण की अपेक्षित सुविधाएं नहीं मिल पातीं, अथवा समाज से अपेक्षित स्वीकृति नहीं मिल पातीं, तो भी जीवन की नकारात्मक दिशा में एक ऐसी यात्रा शुरू होती है जिसके परिणाम कभी सुखद नहीं होते।

जब व्यक्ति अपार धन या लोकप्रियता कमा लेता है तो उसके जीवन में बहुधा अनायास ही कुछ ऐसे तत्त्वों का प्रवेश भी होता है, जिन्हें वह बदली हुई जीवनशैली की अनिवार्यता मान कर स्वीकार कर लेता है और फिर उनके सम्मोहन में इस तरह डूबता चला जाता है कि उनसे उबरना मुश्किल हो जाता है। किसी के जीवन में ये समाविष्टी स्त्रियों के रूप में होती है, किसी के जीवन में यह नशे के रूप में होती है, तो किसी अन्य के जीवन में अहंकार के रूप में।

ऐसा नहीं है कि सभी सफल व्यक्ति इन अवांछित तत्त्वों के मकड़जाल में उलझ कर अपनी संभावनाओं को खत्म कर लेते हैं, लेकिन अधिकांश सफल व्यक्तियों के जीवन को ऐसे सम्मोहनों की चुनौतियों का सामना अवश्य करना पड़ता है। जिनकी नजर केवल अपने कर्म रूपी चिड़िया की आंख पर होती है, वे जीवन के झंझावातों से गुजर जाते हैं। जो भटकाव के क्षणों में खुद को संभाल नहीं पाते, ले फिसलन के शिकार हो जाते हैं।

टीवी या फिल्मों की दुनिया में अपार शोहरत और कमाई के बावजूद मानसिक अवसाद की यह पहली घटना नहीं है। महानगरीय जीवन में रिश्तों की टूटन से लेकर आर्थिक असुरक्षा तक बहुत सारे कारण हैं, जो मनुष्य को अवसाद की ओर ढकेलते हैं। हमेशा एक चमकदार मुखौटा ओढ़े रहना ही कम त्रासद नहीं होता। शायद इसीलिए कहते हैं कि मनुष्य के पास कोई एक ऐसा व्यक्ति अवश्य होना चाहिए, जिसके कंधे पर सिर रख कर वह अपने कठिन क्षणों में आंसू बहा सके।

मुसीबत यह है कि चकाचौंध की दुनिया सोशल साइटों पर लाखों मित्र तो दे देती है, लेकिन ऐसे लोग सौभाग्यशाली ही होते हैं जिन्हें ऐसे सच्चे दोस्त मिल सकें जिन पर हर हाल में भरोसा किया जा सके। चकाचौंध की इस दुनिया में तो दोस्तों की शक्ल में भी ऐसे लोग मिलते हैं जिनसे साझा की गई कोई भी बात रातोंरात सनसनीखेज खबर बन सकती हैं। ऐसे में सितारे आसानी से किसी अपना दर्द साझा नहीं कर पाते।

मनोविज्ञान कहता है कि मन का दुख यदि आईने के सामने भी कह दिया जाए तो एक तसल्ली-सी मिलती है। अपने हाथों अपनी ही संभावनाओं का अंत कर लेना किसी परेशानी का समाधान नहीं हो सकता। विवेक और विनम्रता से जीवन की व्याधियों के व्यूह का सामना किया जाए तो किसी भी परेशानी का समाधान निकल सकता है।

ऐसे एक नहीं सैकड़ों उदाहरण मिलेंगे जिनमें लोग तमाम मुशिकलों में फंसे हैं और फिर से उस संकट से निकल कर अपने नए जीवन की शुरुआत की है। चाहे पारिवारिक संकट हों, या व्यापार से जुड़ी मुश्किलें या कर्ज जैसे संकट, या फिर जीवन से जुड़ी असफलताओं के अन्य मामले, हर जगह संकट और संकट से उबरने के ये प्रसंग हमें एक सकारात्मक सीख देते हैं कि मुश्किलें कैसी भी हों, अगर हम उनसे निपटने की हिम्मत पैदा कर लें, उनका सामना करने की शक्ति पैदा कर लें तो नया जीवन हासिल कर पाना कोई कठिन नहीं है। अच्छे-बुरे दिन सबके जीवन में आते हैं। अच्छे बुरे क्षणों का सामना सबको करना होता है।

अवसाद, उन्माद या उमंग से कोई जीवन अछूता नहीं रहता। बस, जो लोग कठिन क्षणों में भी धैर्य और विवेक का परिचय दे देते हैं, उन लोगों को जीवन हताशा में नहीं गिरने देता। गीता में इसी स्थिति की आवश्यकता पर बल देते हुए कहा गया है कि न तो हम उपलब्धियों में उन्मादित हों और न ही अपनी असफलताओं या जीवन की किसी अन्य चुनौती पर हताशा के गर्त में गिरें।

लक्ष्य की प्राप्ति की दिशा में किए गए लगातार प्रयास भी हमें उस अकेलेपन से मुक्त कर सकते हैं, जो अकेलापन व्यक्ति को अवसाद की ओर धकेलता है क्योंकि प्रयासों की निरंतरता किसी को अवसादग्रस्त होने की फुर्सत ही नहीं देती। सूरज रोज उगता है और समय रोज उसे ढलने पर विवश कर देता है। लेकिन इससे हमारी किसी सुबह का उत्साह धुंधला नहीं होता। नदी जब शहर के पास से गुजरती है तो शहर उसमें बेशुमार गंदगी उड़ेल देता है, लेकिन इससे नदी के प्रवाह का उत्साह कम नहीं होता।

चिड़िया को आसमान में उड़ते ही शिकारी के निशाने पर आने का खतरा होता है, लेकिन इस डर से चिड़िया उड़ना नहीं छोड़ देता। जब सूरज, नदी और चिड़िया अपने स्वभाग के उत्साह को नहीं त्याग पाते, तो मनुष्य परिस्थितियों के सम्मुख कैसे समर्पण कर सकता है, जबकि प्रकृति ने उसे विवेक, धैर्य, संयम, संकल्प और समझ की शक्ति का वरदान भी दिया है।

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