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राजनीतिः कैसे घटे बस्ते का बोझ

बच्चों में सीखने की क्षमता के सहज विकास के लिए उनके साथ बहुत संवेदनशील तरीके से पेश आने की जरूरत है। पर यह तभी संभव है जब शुरुआती कक्षाओं में पढ़ाई-लिखाई को बहुत हल्का, रोचक और जहां तक संभव हो खेल-आधारित बनाया जाए। आशा है ई-बस्ते की पहल कारगर होगी और बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्ति मिलेगी।

Author December 8, 2017 2:24 AM

विशेष गुप्ता

मासूमों बच्चों के कधों पर बस्ते का बोझ लगातार बढ़ते जाना पूरे देश के लिए एक परेशानी का विषय है। शिक्षाविद इसके खिलाफ बराबर आगाह करते रहे हैं। शायद इसीलिए भारत सरकार स्कूली बच्चों के बस्तों का बोझ कम करने के लिए ई-बस्ता कार्यक्रम शुरू करने जा रही है। इस कार्यक्रम के तहत स्कूली बच्चे अब अपनी रुचि के अनुसार पाठ्यसामग्री डाउनलोड कर सकेंगे। गौरतलब है कि मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने हाल ही में पच्चीस केंद्रीय विद्यालयों में प्रायोगिक तौर पर बस्तों का बोझ कम करने के लिए एक कार्यक्रम शुरू किया था। उसमें छात्रों और शिक्षकों ने काफी रुचि दिखाई थी। तभी केंद्र सरकार ने इस परियोजना को आगे बढ़ाने का मन बनाया है। उसी के तहत ई-बस्ता और ई-पाठशाला कार्यक्रम को आगे बढ़ाया जा रहा है। एनसीईआरटी भी स्कूलों में कक्षा एक से लेकर बारहवीं तक के लिए ई-सामग्री तैयार कर रहा है।

ज्ञात हुआ है कि एनसीईआरटी के द्वारा अब तक 2350 ई-सामग्री तैयार की जा चुकी है। साथ ही पचास से अधिक तरह के ई-बस्ते भी तैयार किए जा चुके हैं। तथ्य बताते हैं कि अब तक 3294 ई-बस्तों के साथ में 43801 ई-सामग्री को डाउनलोड भी कर लिया गया है। इतना ही नहीं, मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने एक ऐप भी तैयार कर लिया है। इसके जरिए छात्र एड्रायड फोन व टैबलेट के जरिए भी संबंधित सामग्री को डाउनलोड कर सकते हैं। कहना न होगा कि पहली यूपीए सरकार ने भी इसी संबध में आकाश टैबलेट योजना शुरू की थी। टैबलेट तैयार भी किए गए थे। पर यह परियोजना शुरू नहीं की जा सकी। अब भारत सरकार ने ई-बस्ता के रूप में देश के छात्रों की मदद के लिएतेजी से अपना हाथ बढ़ाया है।
शिक्षा क्षेत्र से जुड़े कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि यह योजना तब तक सफल नहीं हो सकती जब तक कि देश में छात्रों के लिए सस्ते टैबलेट और स्कूलों को मुफ्त इंटरनेट की सुविधा प्रदान नहीं की जाती। उल्लेखनीय है कि सरकार ने इसे अभी पायलट प्रोजेक्ट के रूप में शुरू किया है। उम्मीद है बहुत जल्द सरकार कुछ सुधार के बाद इसे पूरी तरह लागू कर देगी।

कहने की जरूरत नहीं कि आज तकरीबन सभी स्कूल पाठ्यक्रम की पढ़ाई, होमवर्क व पाठों को रटने को बालक के शैक्षिक विकास के लिए जरूरी मान रहे हैं। अन्य शिक्षाविदों के साथ-साथ, प्रोफेसर यशपाल की अध्यक्षता में शिक्षा में सुधार के लिए बनी समिति ने शुरुआती कक्षाओं में बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्त करने की सलाह दी थी। इससे जुड़े तमाम अध्ययन भी बताते हैं कि बच्चों के कंधों पर लादे जाने वाले बस्तों के भारी बोझ का उनकी पढ़ाई-लिखाई की गुणवत्ता से कोई सीधा संबंध नहीं है। शायद यही वजह है कि बस्ते का यह बोझ अब बच्चों की शिक्षा, समझ और उनके स्वास्थ्य पर बुरा प्रभाव डाल रहा है। उदाहरण बताते हैं कि बस्तों के भारी वजन और ढेर सारे होमवर्क के चलते बहुत-से बच्चों की आंखें कमजोर हो गई हैं, सिर में दर्द रहने लगा है तथा उनकी अंगुलियां टेढ़ी होनी शुरू हो गई हैं। बच्चे स्वप्नों में अब परियों के दृश्य न देख कर होमवर्क को लेकर बुदबुदाते हैं। बाल मनोविज्ञान से जुड़े अध्ययन भी बताते हैं कि चार साल से लेकर बारह साल तक की उम्र के बच्चों के व्यक्तित्व का स्वाभाविक विकास होता है।

ऐसे में बच्चों के विकास के लिए किताबी ज्ञान की तुलना में भावनात्मक सहारे की ज्यादा जरूरत होती है। साथ ही ‘प्ले-वे लर्निंग’ यानी खेल-खेल में सीखने की विधि से बच्चों को पढ़ाने से उनकी प्रतिभा अधिक मुखरित होती है। पिछले दिनों देश के कई बड़े शहरों में ऐसोचैम की तरफ से दो हजार बच्चों पर किए गए सर्वे में साफ कहा गया था कि यहां पांच से बारह वर्ष के आयुवर्ग के बयासी फीसद बच्चे बहुत भारी स्कूल-बैग ढोते हैं। इस सर्वे ने यह भी साफ किया कि दस साल से कम उम्र के लगभग अट्ठावन फीसद बच्चे हल्के कमर दर्द के शिकार हैं। हड्डी रोग विशेषज्ञ भी मानते हैं कि बच्चों के लगातार बस्तों के बोझ को सहन करने से उनकी कमर की हड््डी टेढ़ी होने की आशंका प्रबल हो जाती है।

कहना न होगा कि देश में कुछ समय पहले बच्चों के पीठ दर्द और कंधों की जकड़न की समस्या से निजात दिलाने के लिए मानवाधिकार आयोग ने दखल देते हुए अपना फैसला सुनाया था। आयोग का कहना था कि निचली कक्षाओं के बच्चों के बस्ते का वजन पौने दो किलो और ऊंची कक्षाओं के बच्चों के बस्ते का वजन साढ़े तीन किलो से अधिक नहीं होना चाहिए। स्कूली बच्चों की इसी समस्या को ध्यान में रखते हुए महाराष्ट्र सरकार ने बस्तों का बोझ कम करने की एक पहल की थी। इसी के तहत ठाणे नगर निगम ने अपने अधीन चलने वाले तकरीबन ड़ेढ सौ प्राथमिक और माध्यमिक विद्यालयों में पहली और दूसरी कक्षा में पढ़ने वाले बच्चों के लिए सभी की डेस्क में एक लॉकर की व्यवस्था की थी। वह इसलिए ताकि बच्चों को कंधे पर घर से स्कूल तक बस्ता ढोकर ले जाने और वापस ढोकर लाने से छुटकारा मिल जाए। इस फैसले के तहत ही स्कूल की छुट्टी के बाद बच्चा अपना बस्ता स्कूल में ही रख कर घर खाली हाथ जाने लगा था। इसमें एक अहम बात यह भी रही कि वहां कक्षाओं में पढ़ाई और सीखने की गतिविधियों को आपसी बातचीत पर आधारित बनाए जाने की तैयारी भी की गई थी। पता लगा है कि ठाणे के इस प्रयोग के सुखद परिणाम रहे हैं। इसलिए यह एक अनुकरणीय प्रयोग बन गया है।

दरअसल, ठाणे नगर निगम ने बच्चों के कंधों से बस्तों का बोझ कम करने की जो पहल की, उसकी जरूरत पूरे देश में लंबे समय से महसूस की जा रही थी। शिक्षाविद तो जाने कब से इसकी वकालत कर रहे थे। यह सच किसी से छिपा नहीं है कि नर्सरी, केजी, पहली या दूसरी कक्षा के बच्चों के स्वभाव को समझे बिना अगर उन पर पढ़ाई का बोझ डाल दिया जाता है तो उनके विकास की स्वाभाविक प्रक्रिया बाधित हो जाती है। बच्चों पर किताबों का यह भार केवल भौतिक नहीं होता, बल्कि यह उनके मानसिक विकास को भी अवरुद्ध करता है। यही वजह है कि पाठ्यक्रम का यह बोझ सहजता से कुछ नया सीखने अथवा ग्रहण करने की बच्चों की नैसर्गिक क्षमता को भी कुंठित कर देता है। पर स्कूल संचालकों व नीति निर्धारकों के द्वारा पाठ्यक्रम की नित नई पुस्तकें लागू करने के फरमान के आगे बच्चे उन पुस्तकों को पढ़ने को बाध्य हैं और अभिभावक खरीदने को मजबूर हैं। इसी कारण कभी-कभी स्कूल संचालकों और अभिभावकों के बीच टकराव भी देखने को मिलता है।

बच्चों में सीखने की क्षमता के सहज विकास के लिए उनके साथ बहुत संवेदनशील तरीके से पेश आने की जरूरत है। पर यह तभी संभव है जब शुरुआती कक्षाओं में पढ़ाई-लिखाई को बहुत हल्का, रोचक और जहां तक संभव हो खेल-आधारित बनाया जाए। ऐसा न होने पर, बच्चों पर अधिक किताबों का बोझ उन्हें निश्चित रूप कई तरह की शारीरिक और मानसिक समस्याओं की ओर ले जाएगा। आशा है ई-बस्ते के रूप में जो पहल होने जा रही है वह कारगर साबित होगी और बच्चों को बस्ते के बोझ से मुक्ति मिलेगी।

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