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भ्रष्टाचार की दलदल और भाजपा

एक जमाना था जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता सीना ठोक कर अपना चाल, चरित्र और चेहरा अलग होने का दावा करते थे। राजनीति में शुचिता के झंडाबरदार होने का दम भरते थे और कांग्रेस को भ्रष्टाचार की ‘गंगोत्री’ बताते थे। लेकिन केंद्र में इसके शासन का एक साल पूरा होते-होते स्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं।

Author July 20, 2015 8:00 AM
राजनीति में शुचिता के झंडाबरदार होने का दम भरते थे और कांग्रेस को भ्रष्टाचार की ‘गंगोत्री’ बताते थे।

एक जमाना था जब भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता सीना ठोक कर अपना चाल, चरित्र और चेहरा अलग होने का दावा करते थे। राजनीति में शुचिता के झंडाबरदार होने का दम भरते थे और कांग्रेस को भ्रष्टाचार की ‘गंगोत्री’ बताते थे। लेकिन केंद्र में इसके शासन का एक साल पूरा होते-होते स्थितियां बिल्कुल बदल गई हैं।

अब भाजपा भ्रष्टाचार के आरोपों में सने अपने नेताओं के बचाव में कांग्रेस से ज्यादा फूहड़ तर्क दे रही है। कानूनी कमजोरियों की आड़ ली जा रही है, सबूत की खामी को बचाव की ढाल बनाया जा रहा है। इसीलिए भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी को याद दिलाना पड़ा कि राजनीति तर्क नहीं, विश्वसनीयता से चलती है। जो जनता नेताओं को चुनती है, उसके भरोसे पर खरा उतरना सबसे जरूरी है। जन-विश्वास की कसौटी पर कसें तो मोदी सरकार और भाजपा की राज्य सरकारें साफ संकट में घिरी दिखती हैं।

औरों की छोड़ दें, संघ से जुड़े गोविंदाचार्य ने भी भाजपा को चेतावनी दी है कि ‘ललितगेट’ मोदी सरकार के लिए बोफर्स सौदे की भांति घातक सिद्ध हो सकता है। गौरतलब है कि बोफर्स तोप घोटाले की वजह से राजीव गांधी चुनाव हार गए थे। मौजूदा सरकार के कार्यकाल के चार साल शेष हैं। ‘न खाऊंगा न खाने दूंगा’ नारे के साथ सत्ता की कमान संभालने वाले नरेंद्र मोदी के कई सिपहसालार आज भ्रष्टाचार के गंभीर आरोपों से घिरे हैं।

सुषमा स्वराज और वसुंधरा राजे ‘ललितगेट’ में फंसी हैं, जबकि मानव संसाधन विकास मंत्री स्मृति ईरानी के विरुद्ध उनकी डिग्री का मामला अदालत में चल रहा है। मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान व्यापमं घोटाले में धंसते जा रहे हैं। महाराष्ट्र सरकार में मंत्री पंकजा मुंडे पर करोड़ों रुपए के ठेकों में हेराफेरी का आरोप है। हर दिन गुजरने के साथ भाजपा सरकारों से जुड़े विवादों की आग भड़कती जा रही है। विवश होकर भगवा दल ने नैतिक आचरण का चोला उतार कर फेंक दिया है। उसके प्रवक्ता साफ-साफ कह रहे हैं कि केवल नैतिकता के आधार पर कोई नेता इस्तीफा नहीं देगा। उन्हें गलतफहमी है कि अगर सरकार ने पांच साल अच्छा काम किया, तब लोग काम देख कर ही वोट देंगे। बेईमानी और अनैतिक आचरण को भुला दिया जाएगा।

मजे की बात है कि विदेशमंत्री सुषमा स्वराज और राजस्थान की मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे सिंधिया को ललित मोदी कांड में घिरे अरसा बीत चुका है, फिर भी प्रधानमंत्री ने इस मुद्दे पर मौन धारण कर रखा है। छोटी-छोटी बात पर ट्वीट करने वाले नरेंद्र मोदी की खामोशी जनता को चुभने लगी है। ताजा ‘मन की बात’ कार्यक्रम में भी उन्होंने अपनी पार्टी और सरकार से जुड़े तमाम विवादास्पद मुद्दों का जिक्र तक नहीं किया, इसीलिए खीझ कर कांग्रेसी नेताओं को कहना पड़ा कि मोदी को कोरे सपने बेचने का कारोबार बंद करना चाहिए।

अगर ‘ललितगेट’ में फंसे नेताओं के खिलाफ कार्रवाई नहीं की गई तब उनसे भी इस्तीफा मांगा जाएगा। संसद का मानसून सत्र शुरू हो रहा है। कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल सरकार को घेरने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। ऐसे में मोदी के लिए अटके पड़े जरूरी विधेयक पास कराना कठिन होगा।

आडवाणीजी की बात पर लौटते हैं। जब 1996 में जैन हवाला कांड में उनका नाम आया तो नैतिकता के आधार पर उन्होंने संसद की सदस्यता छोड़ दी थी। आडवाणी पर केवल आरोप था, किसी अदालत ने उन्हें दोषी नहीं ठहराया था। अदालत ने जब उन्हें निर्दोष करार दे दिया तभी 1998 में वे फिर संसद में लौटे। अब उनकी पार्टी में गंगा उल्टी बहती है। गंभीर से गंभीर आरोप लगने पर भाजपा सबूत मांगती है।

सबूत देने पर अदालत जाकर गुनाह साबित करने की चुनौती देती है। खुलेआम कहती है कि जब तक न्यायालय प्रमाण की पुष्टि न कर दे, तब तक किसी को अपराधी नहीं माना जा सकता। इसी तर्क का सहारा लेकर कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री येदियुरप्पा की भाजपा में वापसी हुई थी और इसी तर्क की आड़ में अब सुषमा, राजे और अन्य मंत्रियों का बचाव किया जा रहा है।

लगभग एक बरस पहले जब भाजपा विपक्ष में थी तब राष्ट्रमंडल खेल, 2-जी और कोयला घोटाले में आरोप सामने आते ही उसके नेता कांग्रेस के मंत्रियों के इस्तीफे के लिए आसमान सिर पर उठा लेते थे और जब तक उनकी मांग पूरी नहीं होती थी, संसद ठप कर देते थे। अब पुराने तर्क भुला दिए गए हैं। वही लचर दलील दी जा रही है, जो कभी कांग्रेस के नेता देते थे। जन-प्रतिनिधियों से जनता नैतिक आचरण की अपेक्षा रखती है। आज भी लोगों को याद है कि इसी देश में एक रेल दुर्घटना होने पर लालबहादुर शास्त्री ने नेहरू मंत्रिमंडल से इस्तीफा दे दिया था। अब किसी आरोपी या अपराधी की सहायता करने और उससे पैसों का लेन-देन करने का पक्का सबूत मिल जाने पर भी हमारे नेता कुर्सी से चिपके रहते हैं। जमाना बदल गया है। राजनीति में सदैव नैतिकता की दुहाई देने वाला दल (भाजपा) और उसका मार्गदर्शक संगठन (आरएसएस) नफे-नुकसान का हिसाब कर कदम उठा रहा है।
नफे-नुकसान के गणित से मौजूदा भाजपा नेतृत्व को लगता है कि सुषमा स्वराज, वसुंधरा राजे और अन्य नेताओं का इस्तीफा लेना भारी पड़ सकता है। इसीलिए आडवाणी और गोविंदाचार्य की सलाह पर कोई कान देने को राजी नहीं है। इन कांडों के पीछे भगवा दल की आंतरिक कलह भी एक बड़ा कारण है। पार्टी के सांसद कीर्ति आजाद ने तो साफ कहा था कि आस्तीन के सांपों की वजह से सुषमा स्वराज का नाम घसीटा गया है। यह सच है कि विदेशमंत्री और राजस्थान की मुख्यमंत्री सदैव प्रधानमंत्री मोदी की ‘किचन कैबिनेट’ की आंखों की किरकिरी रही हैं।

उनके पर कतरने की कोशिश काफी समय से की जा रही थी। शिवराज सिंह चौहान और राजे अपने-अपने सूबों के लोकप्रिय नेता हैं। उनका अपना वजूद है। पंकजा महाराष्ट्र के जनप्रिय नेता गोपीनाथ मुंडे की पुत्री हैं और पिछला चुनाव जीतने पर मुख्यमंत्री पद की दावेदार थीं। आज भाजपा में नरेंद्र मोदी की आंख में आंख डाल कर देखने वाले नेताओं को किनारे लगाने का काम योजनाबद्ध तरीके से किया जा रहा है। प्रधानमंत्री के करीबियों को मौका मिल गया है, पर इससे पार्टी में गुटबाजी भी तेज हो गई है।

भाजपा के असंतुष्ट खेमे को लगता है कि अगर आज सुषमा, राजे, मुंडे और चौहान की बलि चढ़ गई तो कल उनकी बारी भी आ सकती है। इसी कारण नरेंद्र मोदी, अमित शाह और अरुण जेटली विरोधी धड़ा एकजुट हो गया है। कहा जा रहा है कि अगर बात बढ़ी तो प्रधानमंत्री की नाक के बाल कई लोग ‘ललितगेट’ के लपेटे में आ सकते हैं। खुद नरेंद्र मोदी गुजरात क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष रहे हैं। आजकल यह पद अमित शाह के पास है। अरुण जेटली भी लंबे समय तक डीडीसीए के अध्यक्ष और भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड (बीसीसीआइ) के प्रभावशाली पदाधिकारी थे। तीनों परदे के पीछे चलने वाली बोर्ड की राजनीति के राजदार हैं। कीचड़ में पत्थर फेंकने पर छींटे किसी पर भी पड़ सकते हैं।

तीन-चार माह से भाजपा में बागी स्वर साफ सुनाई पड़ रहे हैं। कुछ दिन पूर्व अरुण शौरी ने एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में नरेंद्र मोदी सरकार के बारे में अपनी बेबाक राय क्या रखी, पार्टी में हंगामा खड़ा हो गया। प्रधानमंत्री की गणेश परिक्रमा करने वाले मंत्री और नेता बिफर पड़े। शौरी का मत है कि विदेश नीति के मोर्चे पर तो मौजूदा सरकार का प्रदर्शन ठीक-ठाक है, पर अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने में वह पूरी तरह विफल रही है।

निश्चय ही विकास दर दस फीसद पर पहुंचाने का सरकारी दावा अतिशयोक्तिपूर्ण है। इस तरह की बातें सुर्खियां बटोरने के लिए की जा रही हैं। बकौल शौरी पार्टी और संघ से जुड़े कुछ संगठनों के नेताओं के लव-जिहाद और घर वापसी जैसे नारों से अल्पसंख्यक समुदाय में असुरक्षा का भाव बढ़ता जा रहा है। प्रधानमंत्री मोदी की इस मामले पर खामोशी बेहद खटकती है। शौरी ने दस लाख रुपए का सूट पहनने के लिए मोदी पर कड़ा हमला करते हुए कहा कि महात्मा गांधी का नाम लेकर आप ऐसा नहीं कर सकते। पार्टी में आंतरिक लोकतंत्र के अभाव की तरफ इशारा करते हुए उन्होंने कहा कि नरेंद्र मोदी, भाजपा अध्यक्ष अमित शाह और वित्तमंत्री अरुण जेटली- केवल तीन लोग ही सरकार और पार्टी चला रहे हैं। इनके अलावा किसी चौथे व्यक्ति को पता नहीं होता कि क्या हो रहा है और क्यों हो रहा है।

जिस हिसाब से हर दिन कोई न कोई नया खुलासा हो रहा है, उसे देखते हुए कहा जा सकता है कि अभी कुछ और बड़े नाम सामने आएंगे। जनता अब पूरी राजनीतिक व्यवस्था को शक की नजर से देख रही है। उसकी समझ में नहीं आता कि किस पर विश्वास किया जाए और किस पर अविश्वास। मौजूदा घटाटोप छांटने के लिए समस्त घोटालों की निष्पक्ष जांच होनी जरूरी है। यह काम सर्वोच्च न्यायालय की निगरानी में एक विशेष जांच समिति गठित कर होना चाहिए। दोषी लोगों को चाहे वे कितने ही बड़े या प्रभावशाली क्यों न हों, किसी भी सूरत में बख्शा नहीं जाना चाहिए। तभी लोकतंत्र पर आया यह संकट दूर हो सकता है।

धर्मेंद्रपाल सिंह

 

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