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खतरे में जैव विविधता

अब तक के शोधों से यह सामने आ चुका है कि धरती का पारिस्थितिकी तंत्र बेहद खराब हो चुका है।

योगेश कुमार गोयल

विकास के नाम पर यदि वनों की कटाई जारी रही और जीव-जंतुओं और पक्षियों से उनके आवास छीने जाते रहे तो ये प्रजातियां धरती से एक-एक कर लुप्त होती जाएंगी और भविष्य में इससे पैदा होने वाली भयावह समस्याओं और खतरों का सामना समस्त मानव जाति को ही करना होगा।

बड़े पैमाने पर प्राकृतिक संसाधनों के दोहन, शहरीकरण, औद्योगिकीकरण, शिकार और वृक्षों की कटाई जैसी गतिविधियों से धरती पर बड़े बदलाव हो रहे हैं। प्रदूषित वातावरण और प्रकृति के बदलते मिजाज के कारण जीव-जंतुओं और वनस्पतियों की अनेक प्रजातियों का अस्तित्व संकट में पड़ गया है। कई प्रजातियां तेजी से लुप्त होती जा रही हैं। वनस्पति और जीव-जंतु ही धरती पर बेहतर और जरूरी पारिस्थितिकी तंत्र प्रदान करते हैं। वन्य जीव चूंकि हमारे मित्र भी हैं, इसलिए उनका संरक्षण किया जाना बेहद जरूरी है।

अब तक के शोधों से यह सामने आ चुका है कि धरती का पारिस्थितिकी तंत्र बेहद खराब हो चुका है। मानवीय दखल से दूर रहने के कारण और स्थानीय जनजातीय लोगों की भूमिका की वजह से सिर्फ तीन फीसद हिस्सा ही पारिस्थितिक रूप से सुरक्षित रह गया है। ब्रिटेन स्थित स्मिथसोनियन एनवायरनमेंटल रिसर्च सेंटर के मुताबिक विश्व के केवल 2.7 फीसद हिस्से में ही अप्रभावित जैव विविधता बची है, जो बिल्कुल वैसी ही है जैसी पांच सौ वर्ष पूर्व हुआ करती थी। इन क्षेत्रों में सदियों पहले जो पेड़-पौधे और जीव पाए जाते थे, वे प्रजातियां आज भी मौजूद हैं। जो अप्रभावित जैव विविधता वाला क्षेत्र बचा है, वह भी जिन-जिन देशों की सीमाओं के अंतर्गत आता है, उनमें से केवल ग्यारह फीसद क्षेत्र को ही संरक्षित क्षेत्र घोषित किया गया है।

अप्रभावित जैव विविधता वाले क्षेत्रों में से अधिकांश इलाके उत्तरी गोलार्ध में आते हैं, जहां मानव उपस्थिति कम रही है, लेकिन अन्य क्षेत्रों के मुकाबले ये जैव विविधता से समृद्ध नहीं थे। धरती पर जैव विविधता के अस्तित्व पर मंडराते संकट को लेकर शोधकर्ताओं का कहना है कि अधिकांश प्रजातियां मानव शिकार के कारण लुप्त हुई हैं, जबकि कुछ अन्य कारणों में दूसरे जानवरों का हमला और बीमारियां शामिल हैं। हालांकि उपग्रह से मिली तस्वीरों के आधार पर शोधकर्ताओं का मानना है कि धरती के ऐसे बीस फीसद हिस्से की जैव विविधता को बचाया जा सकता है जहां अभी पांच या उससे कम बड़े जानवर ही गायब हुए हैं। लेकिन इसके लिए मानव प्रभाव से अछूते क्षेत्रों में कुछ प्रजातियों की बसावट बढ़ानी होगी, ताकि पारिस्थितिकीय तंत्र में असंतुलन पैदा न हो।

जलवायु परिवर्तन के कारण बढ़ रही गर्मी से भी जैव विविधता खतरे में पड़ी है। अमेरिका की यूनिवर्सिटी आफ एरिजोना के शोधकर्ताओं का मानना है कि अगले पचास वर्षों में वनस्पतियों और जीव-जंतुओं की प्रत्येक तीन में से एक यानी एक तिहाई प्रजातियां विलुप्त हो जाएंगी। शोधकर्ताओं ने दुनियाभर के छह सौ स्थानों पर पांच सौ से ज्यादा प्रजातियों पर एक दशक तक अध्ययन करने के बाद पाया कि अधिकांश स्थानों पर चौवालीस फीसद प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं। इस अध्ययन में विभिन्न मौसमी कारकों का अध्ययन करने के बाद शोधकर्ताओं इस नतीजे पर पहुंचे कि यदि गर्मी ऐसे ही बढ़ती रही तो 2070 तक दुनियाभर में कई प्रजातियां खत्म हो जाएंगी।

वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ क्राइम रिपोर्ट 2020 के मुताबिक वन्यजीवों की तस्करी भी दुनिया के पारिस्थितिकी तंत्र के लिए बड़ा खतरा बन कर उभरी है। रिपोर्ट के मुताबिक सर्वाधिक तस्करी स्तनधारी जीवों की होती है। वन्यजीव तस्करी में बाईस फीसद तस्करी के मामले रेंगने वाले जीवों के और दस फीसद पक्षियों के होते हैं। जबकि पेड़-पौधों की तस्करी का हिस्सा 14.3 फीसद है।

इंटरनेशनल यूनियन फार कंजर्वेशन आफ नेचर (आइयूसीएन)की वर्ष 2021 की रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में वन्यजीवों और वनस्पतियों की हजारों प्रजातियां संकट में हैं और आने वाले वक्त में इनके विलुप्त होने की संख्या और दर अप्रत्याशित वृद्धि हो सकती है। आइयूसीएन ने करीब एक लाख पैंतीस हजार प्रजातियों का आकलन करने के बाद इनमें से सैंतीस हजार चार सौ प्रजातियों को विलुप्ति के कगार पर मानते हुए खतरे की सूची में शामिल किया है। करीब नौ सौ जैव प्रजातियां विलुप्त हो चुकी हैं और सैंतीस हजार से ज्यादा प्रजातियों पर विलुप्त होने का संकट मंडरा रहा है। यदि जैव विविधता पर संकट इसी प्रकार मंडराता रहा तो धरती पर से प्राणी जगत का खात्मा होने में सैकड़ों साल नहीं लगने वाले।

दुनिया के सबसे वजनदार पक्षी के रूप में जाने जाते रहे एलिफेंट बर्ड का अस्तित्व खत्म हो चुका है। इसी प्रकार एशिया तथा यूरोप में मिलने वाले रोएंदार गैंडे की प्रजाति भी अब इतिहास के पन्नों का हिस्सा बन चुकी है। द्वीपीय देशों में पाए जाने वाले डोडो पक्षी का अस्तित्व मिटने के बाद अब कुछ खास प्रजाति के पौधों के अस्तित्व पर भी संकट मंडरा रहा है।

पश्चिमी तथा मध्य अफ्रीका के भारी बारिश वाले जंगलों में रहने वाले जंगली अफ्रीकी हाथी, अफ्रीकी जंगलों में रहने वाले काले गैंडे, पूर्वी रूस के जंगलों में पाए जाने वाले तेंदुए, इंडोनेशिया के सुमात्रा द्वीप पर पाए जाने वाला बाघ जैसा विशाल जानवर भी अब अस्तित्व के खतरे से जूझ रहा है। हाल में ‘स्टेट आॅफ वर्ल्ड बर्ड्स’ नामक रिपोर्ट में यह तथ्य सामने आया है कि दुनिया में पक्षियों की करीब उनतालीस फीसद प्रजातियों की संख्या स्थायी है और मात्र छह फीसद प्रजातियां ही ऐसी हैं, जिनकी संख्या बढ़ रही है, जबकि अड़तालीस फीसद प्रजातियों की संख्या में गिरावट दर्ज की गई है।

पक्षियों की प्रजातियों की संख्या में गिरावट को भारत के संदर्भ में देखें तो भारत में जहां चौदह फीसद प्रजातियों की संख्या में वृद्धि हुई है, वहीं केवल छह फीसद प्रजातियों की संख्या ही स्थिर है, जबकि अस्सी फीसद प्रजातियां कम हुई हैं। इनमें से पचास फीसद प्रजातियों की संख्या में भारी गिरावट और तीस फीसद प्रजातियों में कम गिरावट दर्ज की गई है।

सालाना पक्षी गणना में अब प्रतिवर्ष पक्षियों की संख्या और विविधता में गिरावट आ रही है, जिसका बड़ा कारण जलवायु परिवर्तन और जंगलों का कटना है। उत्तराखंड के हिमालयी क्षेत्र में पक्षियों पर हुए शोध के नतीजे भी चौंकाने वाले हैं। वहां वन क्षेत्रों में मानवीय दखल, वनों की कटाई और तेजी से बढ़ते प्रदूषण के कारण पक्षियों की संख्या में साठ से अस्सी फीसद तक की कमी आई है। देहरादून स्थित सेंटर फार इकोलाजी, डवलपमेंट एंड रिसर्च (सेडार) और हैदराबाद स्थित सेंटर फार सेल्युलर एंड मालिक्यूलर बायोलाजी (सीसीएमबी) के शोधकर्ता यह साझा शोध वर्ष 2016 से हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में कर रहे हैं।

बहरहाल, पर्यावरण वैज्ञानिकों का कहना है कि जिस प्रकार जंगलों में अतिक्रमण, कटाई, बढ़ता प्रदूषण और पर्यटन के नाम पर गैर जरूरी गतिविधयों के कारण पूरी दुनिया में जैव विविधता पर संकट मंडरा रहा है, वह पर्यावरण संतुलन बिगड़ने का साफ संकेत है। यदि इसमें सुधार के लिए शीघ्र ही ठोस कदम नहीं उठाए गए तो आने वाले समय में बड़े नुकसान के तौर पर इसका खमियाजा भुगतना पड़ेगा।

विकास के नाम पर यदि वनों की कटाई जारी रही और जीव-जंतुओं और पक्षियों से उनके आवास छीने जाते रहे तो ये प्रजातियां धरती से एक-एक कर लुप्त होती जाएंगी और भविष्य में इससे पैदा होने वाली भयावह समस्याओं और खतरों का सामना समस्त मानव जाति को ही करना होगा। वैज्ञानिकों का मानना है कि जैव विविधता के क्षरण का सीधा असर भविष्य में कृषि और खाद्य पैदावार इत्यादि पर पड़ेगा। इसलिए पृथ्वी पर जैव विविधता को बनाए रखने के लिए सबसे जरूरी है कि हम पर्यावरणीय संतुलन को बिगड़ने न दें।

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