ताज़ा खबर
 

तेल संकट और भारत

तेल संकट से निपटने के लिए जरूरी है कि सरकार एकीकृत ऊर्जा नीति तैयार करे। देश में बिजली से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देना होगा। इलेक्ट्रिक कारों पर करों की दर घटानी होगी। बड़ी संख्या में बिजली-वाहनों का उपयोग करने से प्रदूषण भी घटेगा और कार्बन उर्त्जसन में भी कमी लाई जा सकती है। इसके अलावा जैव र्इंधन का उपयोग बढ़ाना होगा।

Author May 20, 2019 1:01 AM
पिछले वित्त वर्ष 2018-19 में भारत का तेल आयात बिल एक सौ पच्चीस अरब डॉलर का था जो वर्ष 2017-18 के मुकाबले बयालीस फीसद ज्यादा था।

जयंतीलाल भंडारी

इस समय अमेरिका और ईरान के बीच तनाव से खाड़ी में गंभीर संकट की स्थिति उत्पन्न हो गई है। पिछले हफ्ते संयुक्त अरब अमीरात की जल सीमा में अमेरिका के लिए कच्चा तेल ले जा रहे चार तेल टैंकरों पर हुए हमले के बाद जहां एक ओर अमेरिका और ईरान में तनाव बढ़ गया है, वहीं दूसरी ओर दुनियाभर में कच्चे तेल की तेजी से कीमत बढ़ने के हालात बनते जा रहे हैं। वस्तुत: वैश्विक तेल व्यापार में कोई भी रुकावट विश्व अर्थव्यवस्था के लिए हानिकारक है। इससे कई देशों में ऊर्जा संकट पैदा होगा। दो मई से ईरान से भारत सहित आठ देशों को कच्चा तेल आयात करने की अमेरिका की छूट खत्म हो जाने के बाद वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में तेजी के आसार बनते जा रहे हैं। ईरान से भारत को सस्ते पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति बंद किए जाने के बाद अमेरिका से सस्ते पेट्रोलियम पदार्थों की आपूर्ति की उम्मीद की जा रही थी। लेकिन सात मई को अमेरिका ने कहा कि वह भारत को सस्ते पेट्रोलियम पदार्थ नहीं दे पाएगा। ऐसे में अगले महीने से भारत के समक्ष कच्चे तेल के संकट का खतरा खड़ा हो सकता है।

अब यदि तेल उत्पादक देशों के संगठन- ओपेक और रूस जैसे देश कच्चे तेल की आपूर्ति नहीं बढ़ाते हैं, तो वैश्विक बाजार में कच्चे तेल के दाम बढ़ेंगे। आर्थिक-वित्तीय शोध संगठन-ऑक्सफोर्ड इकोनॉमिक्स की रिपोर्ट में कहा गया है कि अमेरिका के द्वारा ईरान से कच्चे तेल की आपूर्ति पर प्रतिबंध, ओपेक और सऊदी अरब के द्वारा कच्चे तेल का उत्पादन न बढ़ाने के फैसले से इस साल के आखिर तक कच्चे तेल सौ डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच सकता है। महंगे कच्चे तेल का भारतीय अर्थव्यवस्था पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। चूंकि भारत अपनी जरूरत का करीब अस्सी फीसद कच्चा तेल आयात करता है और भारत अपनी जरूरत का दस फीसद कच्चा तेल ईरान से आयात करता है, इसलिए कच्चे तेल की कीमतों के मामले में भारत की मुश्किलें बढ़ती हुई दिखाई दे रही हैं। ये मुश्किलें भारत में कच्चे तेल के उत्पादन में आ रही गिरावट से और बढ़ने वाली हैं। पिछले वित्त वर्ष 2018-19 में भारत का कच्चा तेल उत्पादन 4.15 फीसद घट कर 3.42 करोड़ टन रह गया, जो वित्त वर्ष 2017-18 के दौरान 3.57 करोड़ टन था। देश में कच्चा तेल के उत्पादन में गिरावट से आयात घटाने की सरकार की योजना पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। वर्ष 2015 में एनडीए सरकार ने कच्चे तेल का घरेलू उत्पादन बढ़ा कर वर्ष 2022 तक कच्चे तेल के आयात में दस फीसद तक की कमी लाने की योजना बनाई थी।

यकीनन इस समय अमेरिका के आर्थिक रवैए ने भारत के समक्ष तेल कीमतों के तेजी से बढ़ने की बड़ी आर्थिक चिंता खड़ी कर दी है। उल्लेखनीय है कि ईरान से कच्चा तेल लेना भारत के लिए फायदेमंद होता है। ईरान भारत को साठ दिन का उधार देता है। सऊदी अरब सहित अन्य देश भारत को यह सुविधा नहीं देते हैं। ईरान तेल के बदले भारत से कई वस्तुएं भी खरीदता है। यदि ईरान की अर्थव्यवस्था लड़खड़ाएगी तो हमारे निर्यात पर भी बुरा असर पड़ेगा।
ईरान से कच्चे तेल की आपूर्ति बंद होने से चालू वित्त वर्ष 2019-20 में भारत का चालू खाते का घाटा बढ़ेगा। रुपया कमजोर होगा। तेल के दाम दस फीसद बढ़े तो खुदरा महंगाई 0.24 फीसद तक बढ़ सकती है। पिछले वित्त वर्ष 2018-19 में भारत का तेल आयात बिल एक सौ पच्चीस अरब डॉलर का था जो वर्ष 2017-18 के मुकाबले बयालीस फीसद ज्यादा था। यदि कच्चा तेल चालू वित्त वर्ष 2019-20 में महंगा हुआ तो तेल आयात बिल और बढ़ जाएगा। एक अनुमान के अनुसार यदि कच्चे तेल के भावों में एक डॉलर प्रति बैरल की बढ़ोत्तरी होती है तो भारत को करीब 10700 करोड़ रुपए की हानि होती है, अर्थात खरीद के लिए इतनी धनराशि और देनी पड़ेगी। ऐसे में भारत को कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और आपूर्ति संबंधी कठिनाई का सामना करने के लिए कई बातों पर ध्यान देना होगा। ऐसे में पूरी दुनिया कच्चे तेल को लेकर भारत और चीन द्वारा संयुक्त रूप से तैयार की जा रही रणनीति के तहत उपयुक्त कीमतों पर कच्चे तेल की उपलब्धता की संभावनाएं देख रही है। पिछले महीने चीन के नेशनल एनर्जी एडमिनिस्ट्रेशन के उच्चस्तरीय प्रतिनिधिमंडल ने भारत आकर कच्चे तेल की कीमतों को लेकर ओपेक की मनमानी पर लगाम लगाने की द्विपक्षीय भारत-चीन वार्ता को अंतिम दौर में पहुंचाया है। यह वार्ता पिछले वर्ष अप्रैल में नई दिल्ली में आयोजित इंटरनेशनल इनर्जी फोरम (आइईएफ) की सोलहवीं मंत्रीस्तरीय बैठक के बाद लगातार सफलतापूर्वक आगे बढ़ रही है।

अर्थविशेषज्ञों का मानना है कि अब चीन और भारत तेल कीमतों को लेकर अपनी नई साझेदारी के कारण कच्चे तेल के खरीदारों का एक समूह (ब्लॉक) बना सकते हैं। इससे वे तेल उत्पादक देशों से मोलभाव करके तेल की कीमत कुछ कम कराने में अवश्य सफल हो सकते हैं। चीन और भारत सबसे पहले एशियाई तेल उत्पादक देशों द्वारा कच्चे तेल की बिक्री पर वसूले जाने वाले एशियाई प्रीमियम को खत्म करने के लिए दबाव बना सकते हैं। एशियाई देशों के लिए तेल आपूर्ति दुबई या ओमान के कच्चे तेल बाजार से जुड़ी है। इसलिए कच्चे तेल के दाम अपेक्षाकृत अधिक वसूले जाते हैं। कच्चे तेल की खरीद में यूरोप व उत्तरी अमेरिका के देशों की तुलना में एशियाई देशों को कुछ अधिक कीमत चुकानी पड़ती है, जिसे एशियाई प्रीमियम नाम दिया गया है। एशियाई प्रीमियम अमेरिका या यूरोपीय देशों की तुलना में प्रति बैरल करीब छह डॉलर अधिक है। चीन और भारत दुनिया में बड़े तेल आयातक देश हैं। चीन की कच्चे तेल की खपत एक करोड़ बीस लाख बैरल सालाना है और कुल वैश्विक खपत में उसकी हिस्सेदारी तेरह फीसद है। जबकि भारत की सालाना खपत चालीस लाख बैरल है जो वैश्विक खपत का करीब चार फीसद है। इस तरह वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल का सत्रह फीसद उपभोग करने वाले चीन और भारत नई रणनीति के जरिए तेल उत्पादक देशों से कह सकते हैं कि वे तेल के सबसे बड़े खरीदार हैं, लिहाजा उनसे एशियाई प्रीमियम वसूल करने की बजाय उन्हें विशेष रियायत दी जानी चाहिए।

तेल संकट से निपटने के लिए जरूरी है कि सरकार एकीकृत ऊर्जा नीति तैयार करे। देश में बिजली से चलने वाले वाहनों को बढ़ावा देना होगा। इलेक्ट्रिक कारों पर करों की दर घटानी होगी। बड़ी संख्या में बिजली-वाहनों का उपयोग करने से प्रदूषण भी घटेगा और कार्बन उर्त्जसन में भी कमी लाई जा सकती है। इसके अलावा जैव र्इंधन का उपयोग बढ़ाना होगा। अभी पेट्रोल और डीजल में दस फीसद एथेनॉल मिलाया जाता है। 2030 तक इसे बढ़ा कर बीस फीसद किए जाने का जो लक्ष्य रखा गया है, उसे हासिल करने के लिए जोरदार प्रयास करने होंगे। इससे पेट्रोल-डीजल की कीमत में चार से पांच रुपए प्रति लीटर की कमी लाई जा सकेगी। इस समय यह भी जरूरी है कि भारत उपयुक्त दरों पर कच्चे तेल की आपूर्ति के लिए नए तेल बाजार खोजे। इस परिप्रेक्ष्य में रूस, मेक्सिको, संयुक्त अरब अमीरात, कुवैत और सऊदी अरब से अधिक कच्चा तेल आयात करने के विकल्पों पर ध्यान देना होगा। लोकसभा चुनाव के बाद गठित होने वाली नई सरकार के लिए सबसे बड़ी चुनौती देश की अर्थव्यवस्था को कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के खतरों से बचाने की होगी।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App

X