मुफलिसी में जिंदगी बसर करते लोग

‘गरीबी रेखा’ के लिए औसतन कम से कम चौबीस सौ कैलोरी प्रतिदिन प्रति व्यक्ति का जो मानक भारतीय योजना आयोग द्वारा कभी निर्धारित किया गया था, क्या इतनी कैलोरी के उपभोग की आत्मनिर्भरता बंगाल की दीनता के अंधेरे खोखल में बैठे समाज में मौजूद है? गांवों के स्थानीय संसाधनों के समुचित उपभोग, जहरीली खेती से मुक्ति से लेकर बंगाल की परंपरागत खाद्य-संस्कृति की पुनर्स्थापना के अलावा गैर-परंपरागत खेती और उपज के मूल्य संवर्धन समय की जरूरत हैं, क्या बंगाल में ऐसी पहल की गई है?

poorरोटी के लिए जद्दोजहद करते बच्‍चेे। फाइल फोटो।

अमरेंद्र किशोर

बंगाल का लोकजीवन जैसे अपनी बदहाली को पुश्तैनी विरासत और आकस्मिक घटनाओं को ‘पूर्वजन्म के कर्म’ तथा ‘दैविक प्रकोप’ मानने को मजबूर है। राज्य में विधानसभा चुनाव प्रचार कई रंग और रूपों में दिख रहा है। अब सवाल उस वास्तविकता का है, जिसे पुरुलिया के नौ, बांकुड़ा और मालदा के बारह-बारह, बीरभूम के ग्यारह और जलपाईगुड़ी के आठ विधानसभा क्षेत्रों में महसूस किया जा सकता है। वहां आज भी स्थितियां वैसी ही हैं, जिसके लिए करीब ढाई सौ साल पहले स्थानीय जमींदारों की मनमानी के खिलाफ मालदा के जीतू संथाल का विद्रोह इतिहास में चिह्नित हो गया। यह धारणा गहरा-सी गई कि देश से जमींदारी गई, तो शोषण के तमाम रूप खत्म हो गए- यही गलतफहमी है।

जमाना बीत गया, सदियां गुजर गर्इं, पर बंग-भूमि की चिरकालिक दरिद्रता एक कड़वी सच्चाई है। उस युगीन गरीबी और रेंगती जिंदगी को भले दरकिनार कर दिया गया, लेकिन धार्मिक हठ, कठमुल्लापन, सांप्रदायिकता और माटी-मानुष जैसे शब्दों और जुमलों से भरी राजनीति उस पारदर्शी सच को कितना जानती है? किस हद तक उन बुनियादी जरूरतों और सुसंगत विकास के यथार्थ को समझने की कोशिश राजनीतिक मोर्चों द्वारा की गई है? खासकर जब मुर्शिदाबाद में बुनियादी जरूरतों की कमी के बीच खूंखार बाघों के आतंक में डूबे सुंदरबन से लेकर भूटान सीमा पर बसे आदिवासी बहुल टोटापाड़ा तक दो रुपए किलो चावल वाले लोकतंत्र की मौजूदगी दिखती है, तो उन वास्तविकताओं को नीतियों से जोड़े जाने की जरूरत महसूस होती है, जिनका सीधा नाता तमाम अभावग्रस्त समाज से रहता है।

क्या सब्सिडी के अनाज को अजीबो-गरीब तरीके से सूबे के आकाओं के नाम की वाहवाहियों के बीच बंदरबांट किया जाना स्थानीय लोकतंत्र की सबसे बड़ी सफलता है? क्या हमने बंगाल में 1954 के भयावह अकाल से हुई असंख्य मौतों को कभी सामने रख कर देखने की कोशिश की है? क्या सालों-साल तक मुफ्त के अनाज बांट कर, दिल्ली या कोलकाता के सरकारी खजाने खोल कर, चुनाव के सालों में सुविधाओं की बहार लुटा कर अवाम की मुफलिसी दूर करने में आज तक कोई भी सरकार वहां सफल हुई है?

चुनावी दौर में विपक्षी पार्टियां जनता को सुविधा-सुरक्षा मुहैया करवाने में सरकार की विफलता को लेकर हल्ला-बोल करती हैं। चुनावी मौसम में प्रतिश्रुतियां गढ़ी जाती हैं। इसी प्रक्रिया में भयमुक्त समाज- सुरक्षित नारी और पढ़ती लड़कियों की तस्वीरें घोषणा-पत्रों में चमकने लगती हैं। फिर राजनीतिक पार्टियां सत्ता में आते ही अमानत में खयानत करने से नहीं चूकतीं। ऋण माफ करने के वादे और बिजली बिल माफी के इकरार करती हैं।

क्या एक सफल लोकतंत्र- टिकाऊ और समुन्नत विकास और कल्याण का यही पैमाना है? क्या इस बार भी बंगाल में यही होने जा रहा है? क्या अपराध मुक्त समाज के पर्चे फिजाओं में फिर से लुटाने की मंशा है? वैसे तो भारत के न्यूनतम लिंगानुपात वाले प्रथम सौ जिलों में बंगाल का एक भी जिला नहीं है। उसी तरह देश के चुनिंदा प्रथम एक सौ जिलों में, जहां शिशु मृत्यु दर ज्यादा है, उनमें बंगाल का एक भी जिला शुमार नहीं है। लेकिन स्थितियां उतनी भी रूमानी नहीं हैं, जो आंकड़ों में सजी-सजाई दिखती हैं। तो नियति और नीयत के उलझाव से अलग हट कर बंगाल की गरीबी को लेकर क्या होना चाहिए।

बंगाल ही नहीं, देश के विकास के नक्शे पर पुरुलिया, बांकुरा, बीरभूम, जलपाईगुड़ी और मालदह की उपस्थिति मायने रखती है। मगर व्यवस्था न तो ओडिशा के मलकानगिरी की ओर झांकती है और न ही कर्नाटक के रायचुर की सच्चाई जानने की कोशिश करती है। लिहाजा, पूरे देश में गरीबी को लेकर कोई सुसंगत योजना या ठोस रणनीति तय करने का मन-मिजाज नहीं बन सका है। ऐसे में पश्चिम बंगाल के ये तमाम जिले देश की गरीबी के मानचित्र में उभरे ऐसे द्वीप हैं, जहां समृद्धि लाने के मंसूबे से न जाने कितने हजार करोड़ रुपए स्वाहा किए जा चुके हैं।

राज्य को लेकर उपलब्ध सरकारी आंकड़े और उनमें समाहित इन जिलों की स्थिति विकास के नारों की खिल्ली उड़ाती है। राज्य की कुल गरीबों की आबादी एक करोड़ अस्सी लाख (सुरेश तेंदुलकर कार्य पद्धति के आधार पर निर्धारित) की सैंतीस फीसद हिस्सेदारी इन्हीं जिलों की है। किस शासनकाल में कितना विकास जैसे सवाल चुनावी दिनों के प्रासंगिक होते हैं, लेकिन आज राज्य की हकीकत कुछ ऐसी है कि जब तक पुरुलिया, बांकुरा, बीरभूम, जलपाईगुड़ी और मालदह जैसे जख्म रहेंगे, विकास में कई साल लगेंगे।

राज्य के इन जिलों के अड़तालीस फीसद घरों में बिजली नहीं है। तकरीबन आठ प्रतिशत घरों में पेयजल और 62.4 प्रतिशत घरों में फ्लश शौचालय की सुविधा नहीं मिल पाई है। इसी तरह 87.4 फीसद घरों में उज्ज्वला योजना की मौजूदगी नहीं दिखती। राज्य के 73.6 प्रतिशत घर पक्के नहीं हैं। गरीबी रेखा से नीचे (बीपीएल) गुजर-बसर करने वाले बहत्तर फीसद घरों को बीपीएल कार्ड नहीं मिला है। राज्य में अकुशल मजदूरों, कारीगरों की संख्या में बढ़ोत्तरी हुई है और रोजगार के अवसरों पर सरकार चुप रही, तो जरूरतमंद रोटी की तलाश में पलायन को मजबूर हुए। राज्य में किसानों की संख्या में तेजी से गिरावट आई है।

टीकाकरण, गर्भवती महिलाओं, जच्चा-बच्चा की देखभाल से जुड़ी सेवाओं के मामले में बंगाल में बुरे हालत हैं। आयुष स्वास्थ्य सुविधा छब्बीस प्रतिशत गांवों में दस से अठारह किमी की दूरी पर है। इसके आगे तकरीबन चालीस प्रतिशत गांवों से सरकारी डिस्पेंसरी की दूरी दस किमी से ज्यादा है। बंगाल के पुरुलिया और मुर्शिदाबाद के निर्जन इलाकों में गांवों से प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की दूरी पचास किमी है।

सबसे बुरे हालात चौबीस परगना जिले के डेल्टा का है, जहां मानव जीवन में सुविधाओं के दयनीय हालात हैं और रोजगार के अवसरों में लगातार कमी आ रही है। मौसम की मार और उसकी मेहरबानी के बीच डोलती जिंदगी और धुलते तथा डूबते द्वीपों के बीच लोकतंत्र की निशानियां महज सब्सिडी के चावल और किरोसिन तेल तक सीमित होकर रह गई हैं।

सड़क, पानी, मकान और घरेलू उपभोग तक विकास मान कर हंगामा मचाती राजनीतिक पार्टियां सुविधाओं की रेवड़ियां बांट कर सत्ता हासिल करने की बेचैनी जरूर दिखा रही हैं, लेकिन मूल मुद्दों की ओर किसी का ध्यान नहीं जा रहा है। जैसे कैलोरी के उपभोग, जो जीवन की भौतिक गुणवत्ता का सर्वाधिक उपयुक्त आकलन है, इस संबंध में राष्ट्रीय राजनेताओं के विचार स्थिर नहीं हो सके हैं।

‘गरीबी रेखा’ के लिए औसतन कम से कम चौबीस सौ कैलोरी प्रतिदिन प्रति व्यक्ति का जो मानक भारतीय योजना आयोग द्वारा कभी निर्धारित किया गया था, क्या इतनी कैलोरी के उपभोग की आत्मनिर्भरता बंगाल की दीनता के अंधेरे खोखल में बैठे समाज में मौजूद है? गांवों के स्थानीय संसाधनों के समुचित उपभोग, जहरीली खेती से मुक्ति से लेकर बंगाल की परंपरागत खाद्य-संस्कृति की पुनर्स्थापना के अलावा गैर-परंपरागत खेती और उपज के मूल्य संवर्धन समय की जरूरत हैं, क्या बंगाल में ऐसी पहल की गई है?

आर्सेनिक जैसे जलजनित रोगों से मौत के मुहाने पर खड़ी लाखों की आबादी की चिंता कौन करे? महज भयमुक्त समाज, रोजगार के अवसरों की बहाली, घुसपैठ में रोक जैसे परंपरागत जुमलों से बंगाल का भला होगा, ऐसा नहीं लगता।

अब लगातार खेती छोड़ती आबादी को कौन मनाए और समझाए? बंगाल की मूल आबादी में विदेशी घुसपैठियों के समायोजन से उपजे भय का निवारण क्या हो? बंद पड़े और बंद होते उद्योगों को आखिर किन माध्यमों और उपायों से फिर से संचालित किया जा सकेगा, ताकि इस राज्य का फिर से ‘शोनार बांग्ला’ का रुतबा लौट सके- यह आज के बंगाल का यक्ष प्रश्न है।

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