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बुलेट ट्रेन से पहले

लगभग पांच सौ किलोमीटर लंबे मुंबई-अहमदाबाद मार्ग पर उच्च गति वाली रेल परियोजना तैयार करने में लगभग एक लाख करोड़ रुपए की लागत आने की संभावना है।

Author नई दिल्ली | January 9, 2016 12:03 AM
बुलेट ट्रेन (फाइल फोटो)

भारत में लगभग एक दशक से चर्चा का विषय बनी बुलेट ट्रेन अर्थात बहुत तीव्र गति से चलने वाली ट्रेन का सपना लगता है अब पूरा होने के करीब है। पूर्व रेलमंत्री लालू प्रसाद यादव ने अपनी जापान यात्रा के दौरान जिस तीव्र गति से चलने वाली ट्रेन को भारत में लाए जाने पर चर्चा छेड़ी थी, पिछले दिनों जापान के प्रधानमंत्री के भारत दौरे के बाद संभवत: वह परियोजना अब आकार लेती दिखाई दे रही है। योजना के अनुसार बुलेट ट्रेन की शुरुआत अमदाबाद व मुंबई जैसे देश के दो पश्चिमी महानगरों के मध्य की जानी है। लगभग पांच सौ किलोमीटर लंबे इस मार्ग पर उच्च गति वाली रेल परियोजना तैयार करने में लगभग एक लाख करोड़ रुपए की लागत आने की संभावना है। यह धनराशि भी जापान द्वारा ही भारत को कर्ज के रूप में दी जाएगी।

इसमें कोई संदेह नहीं कि उच्च गति से चलने वाली यह ट्रेन परियोजना पूरा होने के बाद भारत को उन चंद देशों की श्रेणी में ला खड़ा करेगी जहां बुलेट ट्रेन संचालित हो रही है। इस समय विश्व के जिन देशों में तीव्र गति की ट्रेन चलाई जा रही है उनमें चीन, जापान, फ्रांस, जर्मनी, रूस, इटली, पोलैंड, दक्षिण कोरिया, ताईवान, तुर्की, अमेरिका, ब्रिटेन, स्पेन, पुर्तगाल, उजबेकिस्तान, स्वीडन, आस्ट्रिया तथा बेल्जियम आदि के नाम उल्लेखनीय हैं। इन देशों में सबसे ताजातरीन परियोजना चीन ने शुरू की है जो इस परियोजना को शुरू करने के साथ ही विश्व में सबसे अधिक दूरी तक की बुलेट ट्रेन रेल लाइन बिछाने वाले देशों में भी शामिल हो गया है। चीन ने अब तक लगभग बीस हजार किलोमीटर तक की रेल लाइन बिछाने में सफलता हासिल की है। आमतौर पर तीव्र गति वाली ये रेलगाड़ियां दो सौ किलोमीटर प्रति घंटा से लेकर तीन सौ साठ किलोमीटर प्रति घंटा तक की गति से चलाई जाती हैं।

गौरतलब है कि बुलेट ट्रेन का संचालन सामान्य रेल व्यवस्था से अलग किस्म का होता है। लिहाजा, इसके लिए रेल लाइन से लेकर रेलवे स्टेशन, नियंत्रण कक्ष, स्टाफ तथा इससे संबंधित सभी तकनीकी व्यवस्थाएं अलग से करनी पड़ती हैं। अर्थात यदि भारत में बहुत तीव्र गति से चलने वाली बुलेट ट्रेन ने अपने पांव पसारे तो इसकी खातिर नई रेल लाइन बिछाने के लिए भूमि अधिग्रहण किया जाएगा। इसके अतिरिक्त स्टेशन, स्टॉफ से लेकर नियंत्रण केंद्र तक का पूरा ढांचा नए सिरे से तैयार किया जाएगा। जाहिर है, एक लाख करोड़ रुपए जैसी भारी-भरकम रकम जो मुंबई-अमदाबाद जैसे छोटे रूट के लिए निर्धारित की गई है वह इन्हीं बातों के मद्देनजर है। यहां यह सोचना भी गलत नहीं होगा कि इतने भारी-भरकम खर्च के बाद शुरू की जाने वाली इस ट्रेन का किराया भी विमान के किराए से कम तो बिल्कुल नहीं होगा, ज्यादा जरूर हो सकता है।

पिछले दिनों जापान के प्रधानमंत्री शिंजो आबे के भारत के दौरे के बाद जब से इस परियोजना पर सहमति हुई उसी समय से इस परियोजना के पक्ष और विपक्ष में तरह-तरह की चर्चा चल रही है। जहां देश का एक वर्ग बुलेट ट्रेन के भारत में आगमन की संभावनाओं पर संतोष जता रहा है और इसके पक्ष में कई दलीलें पेश कर रहा है, वहीं इस परियोजना को लेकर आलोचना के स्वर भी अत्यंत तार्किक व मुखर हैं। समर्थन में दिया जाने वाला तर्क खासतौर पर भविष्य में र्इंधन की कमी तथा वर्तमान जलवायु संकट से निपटने के उपाय का है।

इस परियोजना के आलोचकों के तर्कों को भी नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। सबसे पहली आलोचना तो इस परियोजना पर आने वाली भारी-भरकम लागत को लेकर है। सवाल यह किया जा रहा है कि एक लाख करोड़ की रकम जापान से उधार लेकर देश में तीव्र गति की रेल चलाया जाना ज्यादा जरूरी है या बुलेट ट्रेन के संचालन से पहले देश की वर्तमान रेल व्यवस्था तथा मौजूदा रेल ढांचे में सुधार जरूरी है? हालांकि भारतीय रेल निरंतर सुधार की प्रक्रिया के दौर से गुजर रही है। पर इसके बावजूद अब भी इससे जुड़ी अनेक ऐसी बुनियादी बातें हैं जो वर्तमान भारतीय रेल व्यवस्था की संपूर्णता पर सवाल खड़ा करती हैं। उदाहरण के तौर पर भारतीय रेल को लेट-लतीफी से निजात नहीं मिल पा रही है। खासतौर पर सर्दियों में कोहरा पड़ने के दिनों में रेलगाड़ियां घंटों देरी से चलती हैं। यह देरी बारह, चौदह और सोलह घंटे तक खिंच जाती है।

निश्चित रूप से कोहरे में सिग्नल नजर आने में दिक्कतें होती हैं, जिसकी वजह से रेलगाड़ियों की गति कम होने से विलंब होना स्वाभाविक है। पर ऐसे समय जबकि भारत बुलेट ट्रेन को आमंत्रित करने जा रहा हो, सर्वप्रथम वर्तमान रेल व्यवस्था में ऐसी तकनीकी प्रणाली का होना बहुत जरूरी है जो धुंध के बावजूद ड्राइवर को सिग्नल होने या न होने की जानकारी स्वत: दे सके। अन्यथा यदि वर्तमान लाल व हरे सिग्नल को देखने के भरोसे पर ही रेलगाड़ियां चलती रहीं तो क्या बुलेट ट्रेन का संचालन भी इस दुर्व्यवस्था का शिकार नहीं होगा?

दूसरा सबसे बड़ा प्रश्न भारतीय रेल यात्रियों की सुरक्षा को लेकर है। हमारे यहां लगभग पूरे देश में मात्र राजधानी व शताब्दी जैसी चंद रेलगाड़ियों को छोड़ कर, प्राय: अन्य सभी एक्सप्रेस व पैसेंजर रेलगाड़ियों के किसी भी डिब्बे में आसामाजिक तत्त्व, चोर-लुटेरे या अनधिकृत वैंडर, भिखारी प्रवेश कर सकते हैं। यात्री स्वयं उससे बाहर निकलने के लिए इसलिए नहीं कहता कि वह किसी विवाद या झगड़े में पड़ना नहीं चाहता। यदि हम चीन जैसे देशों से बराबरी करते हुए बुलेट ट्रेन की दौड़ में शामिल होना चाह रहे हैं तो हमें चीन की सामान्य रेल व्यवस्था से सबक लेने की भी जरूरत है। चीन में बुलेट ट्रेन अथवा सामान्य ट्रेन तो क्या सामान्य रेलस्टेशन के प्लेटफार्म पर भी कोई व्यक्ति बिना टिकट के प्रवेश नहीं पा सकता। और वहां बिना निजी पहचान पत्र के किसी भी व्यक्ति को टिकट नहीं दिया जाता। फिर आखिर कोई चोर-लुटेरा ट्रेन के डिब्बे में कैसे प्रवेश कर सकेगा? यही व्यवस्था हमारे देश में भी लागू की जानी चाहिए।

लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि भारतीय रेल इन दुर्व्यवस्थाओं से मुक्ति पाने का रास्ता ढूंढे बिना अत्यंत खर्चीली बुलेट ट्रेन की ओर देख रही है। हमारे देश में कई घटनाएं ऐसी हुई हैं जिनसे साबित हो चुका है कि भारतीय रेल में पुलिस की मिलीभगत से यात्रियों को लूटा जाता है। इतना ही नहीं, कई बार पुलिस वाले स्वयं यात्रियों को उनकी तलाशी के बहाने लूट लेते हैं। ऐसे कई मामले जीआरपी में दर्ज भी हैं। देश में कई स्थानों पर जीआरपी, आरपीएफ और टिकट निरीक्षक की मिलीभगत से व्यापारियों द्वारा अपना माल बिना किसी रेलवे भुगतान के मंगाया या ले जाया जाता है। टिकट-निरीक्षक बेटिकट यात्रियों से पैसा लेकर यात्रा करने की छूट दे देते हैं। टिकट निरीक्षक आरक्षण के हकदार आरएसी या वेटिंग के यात्रियों को बर्थ देने के बजाय उन यात्रियों को पहले बर्थ दे देते हैं जो उनकी मुट्ठी गरम करते हैं।

रेलवे स्टेशनों पर भिखारियों के रूप में नशेड़ियों और नशे का कारोबार करने वालों की भीड़ देखी जा सकती है। इनमें भी चोर व लुटेरे इसी वेश में पनाह लेते हैं। जो पुलिस रेल की सुरक्षा के लिए रेलवे प्लेटफार्म पर तैनात की जाती है वह अपनी नाजायज ढंग से होने वाली कमाई के प्रति इतनी चौकस रहती है कि सुबह चार बजे से ही उन व्यापारियों पर नजर रखने लगती है जो बिना बुकिंग के अपना सामान ट्रेन पर रख कर ले जाना चाहते हैं। पर चौबीस घंटे प्लेटफार्म पर रह कर नशा करने वाले तथा शराब पीकर नग्नावस्था में पड़े रहने वाले व जुर्म को संरक्षण देने वाले भिखारी रूपी लोगों को प्लेटफार्म से भगाने का कष्ट यही पुलिस गवारा नहीं करती। बजाय इसके , कभी उनसे चाय-सिगरेट मंगवाती है तो कभी अपना स्कूटर या मोटरसाइकल साफ करवाती है।

देश में प्लेटफार्म की कमी एक और बड़ी समस्या है। उदाहरण के तौर पर, बिहार के दरभंगा जिले का लहेरिया सराय रेलवे स्टेशन प्रारंभ से ही केवल एक प्लेटफार्म पर आश्रित है। जबकि दरभंगा के अधिकतर सरकारी कार्यालयों के जिला मुख्यालय लहेरिया सराय रेलवे स्टेशन के आसपास ही हैं। इसके बावजूद इस स्टेशन पर एक ही प्लेटफार्म है, जबकि अक्सर यहां एक साथ कई रेलगाड़ियां आती-जाती रहती हैं। यहां प्लेटफार्म नंबर एक के यात्री ही सुरक्षित तरीके से प्लेटफार्म पर चढ़-उतर पाते हैं। दूसरी व तीसरी लाइन पर आने वाली गाड़ियों और अपने निर्धारित डिब्बे तक पहुंचना यात्रियों के लिए बेहद खतरनाक होता है। इस स्टेशन पर कई बार लाइन नंबर दो व तीन पर पत्थरों पर दौड़ते हुए यात्री दुर्घटना के शिकार हो चुके हैं। वहां कई लोगों का ट्रेन में चढ़ने से रह जाना तो आम बात है। खासतौर पर वृद्धों और महिलाओं को काफी दिक्कतें उठानी पड़ती हैं। इस प्रकार के देश में सैकड़ों रेलवे स्टेशन हैं जहां यात्रियों की सुविधाओं और उनकी सुरक्षा के लिए प्लेटफार्म नंबर दो-तीन या चार के निर्माण की आवश्यकता है। जाहिर है, पहले इन बुनियादी जरूरतों को पूरा किए जाने की जरूरत है, न कि इन तकाजों और प्राथमिकताओं को नजरअंदाज करते हुए सीधे बुलेट ट्रेन दौड़ाने का सपना पूरा करने की।

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