bebak bol Opinion on One year of demonetisation - Jansatta
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बेबाक बोलः नकद नारायण कथा- अनर्थ व्यवस्था

प्रचंड बहुमत से आई मोदी सरकार के कार्यकाल में 8 नवंबर मील का पत्थर साबित हो गया है। सरकार इसे कालाधन के खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बता रही है तो विपक्षी दल इसे सनक, मूर्खता और कुप्रबंधन की संज्ञा दे रहे हैं। मोदी सरकार के इस ऐतिहासिक फैसले के एक साल पूरे होने पर इसे किस तरह देखा जाए। अमेरिका में सरकार बनाने के पहले ट्रंप भी मोदी-मोदी कर चुके थे और अभी कातालूनिया ने स्पेन से आजादी का झंडा उठाया। अमेरिकी से लेकर यूरोपीय जनतंत्र आखिर कहां पर जाकर सिकुड़ गया है। नवउदारवादी ठहरी हुई व्यवस्था को आगे ठेलने के लिए मोदी जैसी मजबूत सरकार ही वह कर सकती थी जो गठबंधन की कसमसाहट में कांग्रेस नहीं कर सकी थी। बैंकों के बाजार में पूंजी प्रवाह को नीचे से ऊपर की ओर लाना। जनता का पैसा बैंकों तक पहुंचाना ताकि उद्योगों की कमर सीधी की जा सके। यह न तो मोदी की सनक थी और न मूर्खता। मजबूत सरकार इतने मजबूत फैसले यूं ही नहीं लेती। नोटबंदी के एक साल पर इस बार का बेबाक बोल।

राम-राम करते हुए जब ‘सुखराम’ हो गए तो पार्टी विद अ डिफरेंस (पता नहीं संघ से लेकर भाजपा वाले यह नारा अंग्रेजी में ही क्यों देते हैं) में भ्रष्टाचार और कालाधन को लेकर नया अध्याय जुड़ चुका था। तभी सरकार का संदेश आता है कि वह आठ नवंबर को कालाधन विरोधी दिवस मनाएगी। विरोधी दलों ने काला दिवस मनाने का एलान किया। दिवाली के बाद शादी-ब्याह करवाने के लिए देवउठावन किया गया। हिंदू देवताओं के जागने के पहले ही हिंदूवादी सरकार ने पिछले साल 8 नवंबर को देश से 86 फीसद नकद नारायण को हटा दिया था। प्रधानमंत्री ने सार्वजनिक मंच पर साफ-साफ कह दिया कि शादी के लिए पैसे जमा किए थे, नहीं मिलेंगे…। और हमारे देश के भ्रष्टाचारी मां-बाप की यह हालत थी कि उन्हें हृदयाघात मंजूर था लेकिन वह कालाधन नहीं निकाल रहे थे जिसे गिनने के लिए बैंक के कर्मचारी बेकरार बैठे थे। उन दिहाड़ी मजदूरों ने भी अपना कालाधन नहीं निकाला जो चांदनी चौक की गलियों में भूखे पेट काम की तलाश में भटक रहे थे। उन बिहारी मजदूरों ने भी सरकार की नेक उम्मीदों पर पानी फेर दिया जो ट्रेन की सामान्य श्रेणी के डिब्बे के बाहर कभी न खत्म होने वाली कतार में खड़े थे। दिल्ली-एनसीआर में छोटे कारोबार चौपट हो चुके थे और सारे पैसे दिवाली, छठ और दूसरे त्योहारों में खत्म कर दिए थे। अब तो यहां खाने का भी संकट था।

नोटबंदी का एलान करते वक्त तो आपने इसे भ्रष्टाचार के खिलाफ यज्ञ बताया था लेकिन जल्द ही खराब होते हालात को देख कर जितने मंत्री उतने बयान आने लगे। कालाधन से यह डिजिटल इंडिया और फिर नकदरहित भुगतान की ओर स्थानांतरित हुआ। उसके बाद यह आर्थिक से ज्यादा भावनात्मक मुद्दा बना दिया गया। सरकार के जिम्मेदार हमारे देश को जियो सिम और सिनेमा के टिकटों और मकई के दानों (पॉपकॉर्न)के बरक्स खड़े कर चुके थे। मंदिर में लाइन लग सकते हो, जियो सिम के लिए लाइन लग सकते हो, सिनेमा के टिकट के लिए लाइन लग सकते हो तो फिर देश के लिए कतार में खड़े नहीं हो सकते हो? जी, बिल्कुल खड़े हो सकते हैं और हुए भी। लेकिन यह तो बताते कि देश को क्या फायदा हुआ। न तो कश्मीर में पत्थर बरसने बंद हुए और न ही पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था खस्ताहाल हुई।

छोटे कारोबार का खस्ताहाल और बेरोजगारों की चीख आपको भी परेशान करने लगी। पिछले चुनावों में सूरत से जो साड़ियां जा रही थीं उसके पैकेट पर ‘अबकी बार, मोदी सरकार’ पढ़ा जा सकता था। लेकिन नोटबंदी और जीएसटी के बाद वही कारोबारी अपनी पर्ची पर ‘मेरी भूल, कमल का फूल’ लिख रहे थे। दिल्ली-एनसीआर से लेकर पंजाब और सूरत तक के मजदूरों के हाथ से काम छिन चुका था। भाजपा से जुड़ा व्यापारी संगठन दिवाली के बाद बयान जारी करता है कि पिछले दस सालों में सबसे फीकी दिवाली रही। चालीस फीसद कम कारोबार हुआ।

पिछली तिमाही में ही आंकड़े जारी कर दिए गए थे कि नोटबंदी के बाद 99 फीसद मुद्रा वापस आ चुकी है। बाकी एक फीसद मुद्रा नेपाल और भूटान में आराम फरमा रही है। यानी सरकार की यह कवायद धनबदली तक ही सीमित रह गई। जिन नोटों को नालों और समुद्र में बहाने का दावा किया गया था, वो पाकीजगी की मोहर लगवा कर आरबीआइ को सलाम ठोक चुके थे। अभी भाजपा की सरकार से जुड़े अर्थशास्त्री दावा करते हैं कि हमारे देश में अमीर और गरीब की खाई बहुत चौड़ी है और लोगों ने मोदी को नोटबंदी के लिए माफ कर दिया। अब यह माफी शब्द कहां से आ गया। और यह माफी तो ‘ट्रिकल डाउन थ्योरी’ की तरह ऊपर से नीचे आनी चाहिए थी लेकिन यह नीचे से ऊपर क्यों जा रही है। और, प्रधानमंत्री ने तो जनता से माफी मांगी भी नहीं है।

यही नीचे से ऊपर वाली माफी यानी उलटा ‘ट्रिकल डाउन’ नोटबंदी का मकसद था। वाट्सऐप और सोशल मीडिया पर वायरल चुटकुलों जैसा नहीं था। यह मोदी सरकार की कोई भूल नहीं थी। सोशल मीडिया पर मोदी को भले उस कालिदास की तरह दिखाया जा रहा हो कि जिस डाल पर बैठे हैं उसी पर कुल्हाड़ी चला रहे हैं। कांग्रेस भले ही इसे खराब प्रबंधन कह रही हो लेकिन यह खराब प्रबंधन भर का ही मामला नहीं है। इसे नेक इरादे की नाकामी भी बताया जा रहा है। लेकिन इतने बड़े फैसले को महज अदूरदर्शिता और मूर्खता के विमर्श में नहीं देखा जा सकता है। गठबंधन सरकारों के बाद मोदी सरकार पूर्ण बहुमत लेकर आई है और यह एक मजबूत सरकार का मजबूत फैसला था। वह इसके खतरों को लेकर अनजान भी नहीं थी। और नाकाम होती नवउदारवादी उम्मीदों के सामने ऐसे फैसले उसकी रणनीति का हिस्सा थे।

हमारे सरकारी बैंक लंबे समय से संकट में चल रहे थे। इस संकट का बड़ा कारण था एनपीए। बैंकों को दुरुस्त करने का काम तो कांग्रेस के समय से ही रुका पड़ा था और गठबंधन मजबूरियों के कारण वह इसे अमलीजामा नहीं पहना पा रही थी। भाजपा सरकार कांग्रेस की मजबूरी से पार पा चुकी थी और उसे यह कड़वी दवा पिलानी ही थी क्योंकि आर्थिक नीतियों में दोनों में कोई मतभेद नहीं है। कांग्रेस ने भले ही जीएसटी के ऐतिहासिक मध्यरात्रि सत्र का येन-केन प्रकारेण विरोध किया था लेकिन प्रधानमंत्री ने यूं ही नहीं कहा था कि जीएसटी मेरे अकेले का किया नहीं है। मोदी सरकार के पास भी बैंकों का संकट था। हिसाब लगाया गया कि लगभग तीन लाख करोड़ कालाधन है। अगर नोटबंदी होगी तो लोग इसे जमा नहीं करवा पाएंगे। ऐसी स्थिति में सरकार के गिरवी रखे जाने वाले बांड को फायदा होगा। और इससे एनपीए संकट काबू में आएगा। लेकिन यह हो नहीं पाया और आरबीआइ की नाकामी यहीं पर है।

तो नोटबंदी सिर्फ प्रबंधन की समस्या नहीं थी यह बड़े कारोबारी घरानों की सेहत दुरुस्तगी का ही मामला था। इसलिए इस नोटबंदी की पूरी प्रक्रिया को नाकाम तो कतई नहीं कहा जा सकता है। हां, बैंकों के जरिए बड़े कारोबारी घरानों को फायदा पहुंचाने का जो आकलन था वह उम्मीदों से कहीं ज्यादा पीछे छूट गया। कांग्रेस भी नोटबंदी को लेकर सिर्फ प्रबंधन की बात करती है। भाजपा आरोप लगाती है कि सारा एनपीए तो कांग्रेस के समय का है और कांग्रेस कहती है कि हमारे समय तो सिर्फ इतना था। एक-दूसरे की धुरविरोधी पार्टी एक नीति पर तो समान है कि एक-दूसरे के ऊपर से एनपीए निकाला जाए और जनता के ऊपर कर का बोझ डाल दिया जाए।

नोटबंदी के एक साल पर जिस तरह से अदूरदर्शिता, मूर्खता और माफी की बात की जा रही है वह शायद अभी के माहौल में भारत जैसे लोकतंत्र में ही संभव है। पश्चिम के लोकतांत्रिक देशों में शायद ऐसी नाकामी पर वहां का सुप्रीम कोर्ट जवाब-तलब कर चुका होता। आंकड़े हर तरफ बिखरे हैं। छोटे कारोबारियों से लेकर आम जनता को जितना नुकसान हुआ है वह तो अपराध सरीखा है। इन दिनों हर चीज को राष्ट्रीय  से जोड़ने की प्रवृत्ति चल रही है। खिचड़ी को राष्ट्रीय  भोजन घोषित किया जा रहा है लेकिन नोटबंदी जैसे कड़े फैसले को खिचड़ी की तरह हलके में नहीं टाला जा सकता है। जनता को इस तरह तबाह करने के फैसले को तो राष्ट्रीय अपराध का खिताब दिया जाना चाहिए। इसे काला-सफेद और पाकीजगी से परे रखिए। यह मजबूत सरकार का मजबूत फैसला था, मजबूती से ही बात रखिए।

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