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बेबाक बोलः सत्ता का संदेश- जय किसान जवान

वित्तीय और आर्थिक संकट जब सामाजिक संघर्ष में बदल रहा हो तो ऐसे दौर में डिजिटल नायक की भूमिका पर इस बार का बेबाक बोल।

मध्यवर्गीय संगठन तो सत्ता के साथ गुणा-भाग में व्यस्त हो गए, लेकिन दलित और किसान नोटबंदी और राष्टÑवादी बुखार के पहले पीड़ित वर्ग के रूप में सामने आए हैं।

आजादी के बाद भूमि सुधार की बात तो हुई लेकिन यह किसी पार्टी के एजंडे में नहीं रहा। विषमताओं और गैरबराबरी वाले भारत में इस बुनियादी मुद्दे को भुला महाजनों और मानसून पर निर्भर किसानों को विश्व बाजार के मंच पर अकेला छोड़ दिया गया। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर सभी सरकारें चुप हैं। जब लोगों के जीने-मरने का सवाल पैदा हो रहा हो तो उनके सामने नोटबंदी और डिजिटल का ब्रह्मास्त्र फेंक कर सेना और सरहद के अलावा कुछ भी सुनने और बोलने से इनकार कर दिया। मध्यवर्गीय संगठन तो सत्ता के साथ गुणा-भाग में व्यस्त हो गए, लेकिन दलित और किसान नोटबंदी और राष्टÑवादी बुखार के पहले पीड़ित वर्ग के रूप में सामने आए हैं। किसानों पर जवानों की गोलियां चली हैं। वित्तीय और आर्थिक संकट जब सामाजिक संघर्ष में बदल रहा हो तो ऐसे दौर में डिजिटल नायक की भूमिका पर इस बार का बेबाक बोल।

हिंदुत्व के परिचय से सरकार ने खाता खोल कूटशब्द गीता और गाय कर दिया था। इससे उसे 2014 के बाद से जिस तरह अनुगामी मिल रहे थे, उत्तर प्रदेश के नतीजों ने उसे अति भरोसे में ला दिया। जब हम कह रहे थे कि नोटबंदी ने किसानों और कामगारों की कमर तोड़ दी है, तो आप कह रहे थे कि उत्तर प्रदेश में हम क्यों जीते। हर समस्या का समाधान आप डिजिटल को बता रहे थे। महाराष्ट्र और मध्य प्रदेश की भाजपा सरकारें कह रही थीं कि नोटबंदी का कोई बुरा असर नहीं है, हमारे यहां विरोध नहीं है। हम भाजपाशासित राज्यों की खुशहाली के ब्रांड अंबेसडर हैं। आपके अतिविश्वास का नतीजा था कि आपने कश्मीर में अपने खिलाफ उठी आवाज से बात करने से इनकार कर दिया। जीप की बोनट पर मानव ढाल बनाने वाले मेजर को पुरस्कृत कर गेंद सेना के पाले में डाल दी। सत्ता के इस संदेश का असर हुआ कि सेना प्रमुख बार-बार सार्वजनिक मंचों पर इसे नजीर मानने का संदेश देने लगे। हम कह रहे थे कि सेना को पुलिस मत बनाइए तभी मंदसौर में आंदोलन कर रहे किसानों पर पुलिस गोलीबारी होती है और छह किसान मारे जाते हैं।

आजादी के बाद भूमि सुधार की बात तो हुई लेकिन यह किसी पार्टी के एजंडे में नहीं रहा। विषमताओं और गैरबराबरी वाले भारत में इस बुनियादी मुद्दे को भुला महाजनों और मानसून पर निर्भर किसानों को विश्व बाजार के मंच पर अकेला छोड़ दिया गया। स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशों पर सभी सरकारें चुप हैं। जब लोगों के जीने-मरने का सवाल पैदा हो रहा हो तो उनके सामने नोटबंदी और डिजिटल का ब्रह्मास्त्र फेंक कर सेना और सरहद के अलावा कुछ भी सुनने और बोलने से इनकार कर दिया। मध्यवर्गीय संगठन तो सत्ता के साथ गुणा-भाग में व्यस्त हो गए, लेकिन दलित और किसान नोटबंदी और राष्टÑवादी बुखार के पहले पीड़ित वर्ग के रूप में सामने आए हैं। किसानों पर जवानों की गोलियां चली हैं। वित्तीय और आर्थिक संकट जब सामाजिक संघर्ष में बदल रहा हो तो ऐसे दौर में डिजिटल नायक की भूमिका पर इस बार का बेबाक बोल।सारी समस्याओं से आंखें मूंद सरकार ने अपने कार्यकाल के मध्यकाल में नोटबंदी कर डिजिटल गान शुरू कर दिया। लेकिन आपके कार्यकाल के तीसरे साल में कश्मीर से लेकर सहारनपुर और अब मंदसौर में आपको इंटरनेट सेवाओं पर प्रतिबंध लगाना पड़ता है। जय जवान और जय किसान कांग्रेस काल का नारा था। आपने सत्ता में आने के बाद हर समस्या का मोड़ सरहद और जवान की तरफ कर दिया। किसानों की ऐसी अनेदखी कर दी कि आज किसान और जवान आमने-सामने आ गए हैं।

रूसी क्रांति के सौ साल, चंपारण सत्याग्रह के सौ साल। इन सौ साला क्रांति और सत्याग्रहों के केंद्र में किसान ही रहे हैं। यह समय नक्सलबाड़ी आंदोलन शुरू होने के अर्द्धशतक का भी है। और ऐसे समय में संघ समर्थित संगठन भारतीय किसान संघ ने आंदोलनरत किसानों की समस्या को कमतर कर आंदोलन स्थगित करवाने की कोशिश की। भारतीय मजदूर संघ के समझौता करवाने के एक दिन बाद मंदसौर में छह किसानों की लाशें गिर जाती हैं। जब शिवराज सिंह चौहान का प्रताप चरम पर था। नर्मदा यात्रा को दुनिया का सबसे बड़ा जनांदोलन बताकर सड़कों से लेकर मुद्रित और दृश्य साधनों को विज्ञापनों से पाट दिया गया था।

वहीं ‘हैपीनेस मंत्रालय’ का सूत्र देनेवाली संघ की जमीन, ‘धरापुत्र’ के मध्य प्रदेश में संघ समर्थित आंदोलन का यह हश्र होता है। तो क्या यह गुस्सा अचानक से था, जिसे भारतीय किसान संघ भांप नहीं पाया? पुलिस की गोलियों से किसानों की मौत। कश्मीर से संदेश दे रही सत्ता को मंदसौर से जो संदेश मिला है, अब उससे सबक लेने का वक्त है। जो शिवराज सिंह चौहान सरकार पहले एक किसान की मौत पर पांच लाख के मुआवजे का एलान करती है, वह एक करोड़ तक पहुंच जाती है। पांच लाख से एक करोड़ तक का अंतर ही यह समझाने के लिए काफी है कि मध्य प्रदेश सरकार के दावों और जमीनी हकीकत के बीच का अंतर कितना बड़ा है। शायद यह मध्य प्रदेश के इतिहास में सबसे बड़ा मुआवजा है, और अपने हर काम को ‘ऐतिहासिक’ बताने वाले भाजपा के झंडाबरदारों को ऐसा तारीखी दिन बनाने के बाद एकबार ठिठक कर सोच लेना चाहिए।

प्रचंड बहुमत से आई केंद्र सरकार अभी तक भावनात्मक मुद्दों के धु्रवीकरण की राह पर ही आगे चल रही है। संघ समर्थित संगठन असल समस्याओं के गड्ढे पर सरकार के सामने गीता, गाय और राष्ट्रवाद का ढक्कन रख रहे हैं। लोगों की समस्याओं से ये जुड़ते हैं, ट्रेड यूनियन आंदोलनों की अगुआई भी कर रहे हैं। फिलहाल ये असंतोष को दबाने और मुद्दों को भटकाने की रणनीति पर ही काम कर रहे हैं। और, अगर मध्य प्रदेश सरकार के जिम्मेदार चेहरे किसानों के आंदोलन को ड्रग माफिया से जोड़ देते हैं तो यह उस चेहरे को दाग-दाग कर देता है जो बेदाग रहते हुए मध्य प्रदेश में तिहरे शासन के बाद दिल्ली के दावेदार बनने की ओर अग्रसर थे। संघ के स्वयंसेवक जिनकी जमीन को सबसे मजबूत कर रहे थे, सबसे बड़ी दरार वहीं से दिखी।

उग्र बाजारीकरण से जो सामूहिक असंतोष उभरा है संघ उसकी काट दे पाने में नाकाम है। जो समस्या लोगों की रोजमर्रा की जिंदगी से जुड़ी है, भूख से जुड़ी है, जिंदगी से जुड़ी है आप उस पर बात करने के लिए तैयार नहीं हैं। नोटबंदी के बाद विनिर्माण और औद्योगिक क्षेत्र में बड़ी गिरावट आई, बड़े पैमाने पर बेरोजगारी बढ़ी और अर्थव्यवस्था में गिरावट आई। यह गिरावट साधारण नहीं थी। लेकिन इसके जवाब में सिर्फ सेना थी। नोटबंदी, महंगाई और बेरोजगारी के मुद्दे को संघ ने कश्मीर और राष्टÑवाद की तरफ मोड़ दिया। ओड़ीशा में एक रुपए किलो बिक रहे टमाटरों, महाराष्टÑ में सड़कों पर फेंकी जा रही सब्जियों और नदियों में बहाए जा रहे दूध को अनदेखा किया। मेक इन इंडिया के बब्बर शेर की आभासी तस्वीर घुमा रही सरकार यह भूल गई कि 2014 के चुनाव प्रचार में उसने किसानों से स्वामीनाथन आयोग की सिफारिशें लागू करने का वादा किया था। सरकार से इसी वादे के तहत लागत का डेढ़ गुणा न्यूनतम समर्थन मूल्य मांग कर किसान कर्जमाफी की अपील कर रहे हैं। साठ साल से ज्यादा उम्र के किसानों के लिए पेंशन की मांग कर रहे हैं।

किसान से किए वादे को भूल कब्रिस्तान के बराबर श्मशान बनाने का वादा करने वाली भाजपा की अगुआई वाली राजग सरकार को 2002 का वह दौर भी याद करना चाहिए जब किसानों पर गोलीबारी करने वाली ओमप्रकाश चौटाला की सरकार को सत्ता से बेदखल होना पड़ा था। हरियाणा के जींद जिले के कंडेला गांव में 78 साल के घासीराम नैन बिजली बिल में छूट को लेकर प्रदर्शन कर रहे थे। प्रदर्शनकारियों ने डीसीपी को बंधक बना लिया और पुलिस को गोलीबारी करनी पड़ी। सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, उस गोलीबारी में छह किसान मारे गए थे और किसानों पर राजद्रोह का मुकदमा भी दर्ज किया गया था। लेकिन इस गोलीबारी के बाद ओम प्रकाश चौटाला की पार्टी तीन चुनावों के बाद भी सत्ता का मुंह नहीं देख पा रही है। चौटाला के विरोध में गई जनता ने हुड्डा की अगुआई में कांग्रेस को गद्दी सौंपी। वहीं मध्य प्रदेश के मुल्ताई के बैतूल में किसानों पर गोली चलवाने वाली कांग्रेस की दिग्विजय सरकार को सत्ता से हाथ धोना पड़ा था और उसके बाद उसने मध्य प्रदेश में सत्ता का सुख नहीं भोगा है।

भाजपा की सरकारों के लिए वैचारिक, सामाजिक, आर्थिक और सांस्कृतिक क्षेत्र में काम करने वाले संघ को इस बात का अहसास होना चाहिए कि भारत कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक फैला विविधताओं से भरा देश है। और, इतने बड़े भूक्षेत्र को जोड़ने के लिए सौहार्द की भावना बढ़ाने की दरकार है। सरकार ने संघ के जरिए अभी तक तो जमीनी मुद्दों को भटकाने का काम किया है। और इसका नतीजा यह है कि खास किस्म के घरेलू संघर्ष बढ़ गए हैं। सहारनपुर से लेकर मंदसौर तक यह आग दिख रही है। भाजपाशासित सरकारें अब उदारवादी व लोकतांत्रिक मूल्यों पर ध्यान देना शुरू करें नहीं तो सिर्फ धु्रवीकरण की रणनीति का नतीजा सहारनपुर और मंदसौर की तरह का संकट लाएगा। अतिविश्वास में चल रहे भाजपा और संघ को शायद नजर आ रहा हो कि नागपुर के गढ़ वाले राज्य में नाशिक किसान आंदोलन का केंद्र बन गया है। नाशिक का संदेश नागपुर जितना जल्दी ग्रहण कर ले उतना अच्छा है। ऊपर किसानों पर गोलीबारी करने वाली सरकारों के हश्र का उदाहरण दे चुका हूं। किसान खेत छोड़ कर सड़क पर बहुत जल्दी नहीं आते हैं। लेकिन जब भी सड़क पर आते हैं तख्त हिला जाते हैं।

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