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बेबाक बोलः धर्म भूमि- विकल्प बिना संकल्प!

गोरखपुर के गोरक्षनाथ मंदिर के महंत ने मुख्यमंत्री बनने के बाद एक सांसद के रूप में अपने आखिरी भाषण में संसद में कहा था कि गोरखपुर में दिमागी बुखार से सबसे ज्यादा मरने वाले दलितों और मुसलमानों के बच्चे हैं।

उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्य नाथ लखनऊ में योग करते हुए। (फोटो- पीटीआई)

जब पूरे विपक्ष से लेकर नागरिकों का बड़ा तबका नोटबंदी पर सवाल उठा रहा था, तो प्राण जाई पर वचन न जाई के तर्ज पर सरकार की तरफ से कहा गया कि फैसले वापस लेना उसके खून में नहीं। देश की 86 फीसद मुद्रा का विकल्प दिए बिना आपने उस यज्ञ का संकल्प लिया जिसके मंत्रोच्चार में सेना, सरहद, कश्मीर और पाकिस्तान था। लेकिन नोटबंदी से लेकर मांसबंदी तक के विकल्प मुहैया कराए बिना संकल्प का हासिल यह है कि दलित और अन्य कमजोर तबकों का विद्रोह सामने आ चुका है। सहारनपुर की घटना के बाद भाजपा के कई नेता दलितों के घर सामूहिक भोज में जुट जाते हैं और मंदसौर में जब मारे जा रहे किसान पूछते हैं कि हम क्या खाएं तो राज्य के अगुआ ही खाना छोड़ उपवास पर बैठ जाते हैं। जब आप दलितों को गले लगाने से पहले साबुन और शैंपू पहुंचाते हैं तो आपकी ‘धर्मभूमि’ और वर्गीय विभेद की ‘कर्मभूमि’ पर सवाल उठेंगे ही। इन्हीं सवालों के साथ इस बार का बेबाक बोल।

गोरखपुर के गोरक्षनाथ मंदिर के महंत ने मुख्यमंत्री बनने के बाद एक सांसद के रूप में अपने आखिरी भाषण में संसद में कहा था कि गोरखपुर में दिमागी बुखार से सबसे ज्यादा मरने वाले दलितों और मुसलमानों के बच्चे हैं। पिछली सरकारों ने उनके लिए कुछ नहीं किया। ढाई साल पहले मोदी जी आए और उन्हें दवा दी और इलाज दिया। लेकिन संसद में ये बातें कहने वाले उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री दलितों से मिलने के पहले शैंपू और साबुन भिजवाते हैं। योगी आदित्यनाथ जिस नाथ परंपरा से आते हैं अगर उसका इतिहास देखें तो यह कट्टर ब्राह्मणवाद के खिलाफ ही खड़ा हुआ था। हिंदू जाति व्यवस्था से बेदखल जातियों को इसने समर्थन दिया, और ब्राह्मणवादी परंपरा के समांतर पंथ चलाया। गोरखपुर में दलित और कमजोर कही जाने वाली जातियों का भरपूर समर्थन योगी को मिलता रहा है। तो, एक समय ब्राह्मणवाद के खिलाफ खड़े हुए पंथ का वर्तमान चेहरा आज दलितों के खिलाफ क्यों दिखने लगा? सहारनपुर हिंसा के बाद दलितों के मसले पर घिरे योगी की छवि साबुन और शैंपू ने और मैली क्यों कर दी?

दलितों को गले लगाने के लिए योगी के पहले साबुन और शैंपू पहुंचने के वर्गीय संदर्भ को भी देखा जाना चाहिए। जब वे शहीद के परिजनों से मिलने उनके घर जाते हैं तो सोफे से लेकर कुर्सी पर डाले गए भगवा तौलिए का एक स्वच्छतावादी पाठ भी तैयार होता है। नाथ पीठ के महंत के लिए यह जाति-आधारित छुआछूत वाला मसला नहीं है। यह तो गांधी की ऐनक भर रह गया स्वच्छता का मामला है। दलितों की बस्ती गंदी है, वे अपनी वर्गीय स्थिति के कारण गंदगी में रहने के लिए मजबूर हैं। और, आप जब उनसे मिलने जाते हैं तो आपकी चिंता आपकी ऊंची जाति नहीं, आपकी सेहत होती है। योगी संसद तक में स्वीकार चुके हैं कि दिमागी बुखार के सबसे ज्यादा पीड़ित दलित और मुसलिम बच्चे हैं। आप हिंदूवादी जाति-व्यवस्था के समांतर अपना पीठ खड़ा कर कमजोर कही जाने वाली जातियों को हिंदू धर्म के कर्मकांड से जोड़ते हैं। जातिवादी दूरी हटने के बाद भी आपके और उनके बीच जो खाई बनी रहती है वह क्या है? आखिर वह क्या है जो आपको उनके गले लगने से और उनका खाना खाने से डराता है? यह वही वर्गीय खाई है, जिस पर फिलहाल बोलने से परहेज किया जा रहा है।

विडंबना यह है कि जिन लोगों से आप सफाई के डर से गले मिलने में हिचक रहे हैं, उत्तर प्रदेश से लेकर देश के कई हिस्सों में वही तबका सफाई के काम से जुड़ा हुआ है। लेकिन हमारे देश में अभी भी सफाई को रोजगार से जोड़ने की कोई ठोस पहल नहीं हुई है। यह लोकाचार पर आधारित एक असगंठित काम है जो अभी तक जाति व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। शहरों या महानगरों में जहां सफाई के नाम पर रोजगार उपलब्ध करवाए गए हैं कायदे से उसे तो चतुर्थ वर्ग में भी शामिल नहीं किया जा सकता है। पिछले दो सालों से दिल्ली नगर निगम के सफाई कर्मचारियों की हड़ताल से लेकर वेतन तक का मुद्दा सुर्खियों में रहा। लेकिन सफाई का ढोल पीटने वाली केंद्र से लेकर दिल्ली सरकार तक ने इसे हाशिये पर रखा।
प्रचंड बहुमत से सत्ता में आई केंद्र की मोदी सरकार ने गांधी के चेहरे को हटा सिर्फ उनका चश्मा चुना और स्वच्छ भारत अभियान को अपनी सबसे बड़ी झंडाबरदार योजना घोषित कर दिया। सरकार के एक साल से लेकर तीन साल के उपलब्धि समारोह में स्वच्छता का ही गाना गाया। लेकिन गांधी को अलग चश्मे से देख रही सरकार सफाई और इससे जुड़े वर्ग के लोगों को आधुनिक चश्मे से देख पाने में नाकाम रही।

नवउदारवादी दौर के केंद्र में मध्यम वर्ग ही रहा। सरकार और बाजार ने सारे संसाधन सेवा क्षेत्र के लिए झोंक दिए। लेकिन सेवा क्षेत्र के लिए जो कामगार चाहिए उसकी जरूरतों से आंखें मूंद ली गर्इं। दलित और कमजोर कही जाने वाली जातियां खेती से मिलने वाले रोजगार पर ही निर्भर रह गर्इं और अब कृषि क्षेत्र सबसे ज्यादा बदहाली का शिकार है। टूटी कमर वाले कृषि पर निर्भर कमजोर तबके के किसानों और मजदूरों के लिए रोजगार के विकल्प नहीं मुहैया कराए गए। आज भी जब मध्य प्रदेश से लेकर उत्तर प्रदेश और पंजाब के क्षेत्रों तक में किसान आंदोलित हो चुके हैं, उनके लिए कर्जमाफी और अधिकतम खरीद मूल्य की बात कही जा रही है। तब भी इस कट्टर सच को नकारा जा रहा है कि समस्या की जड़ बेरोजगारी है। कृषि क्षेत्र इन्हें रोजगार देने में कामयाब नहीं हो रहा है।

मध्यवर्ग के केंद्र वाली अर्थव्यवस्था में कमजोर तबकों को रोजगार के विकल्प तो मुहैया नहीं करवाए गए और तिसपर नोटबंदी से लेकर मांसबंदी का फरमान जारी कर उनके रोजगार के पारंपरिक साधन छीन लिए गए। इसके साथ ही कमजोर तबके के खानपान की पसंद पर भी पहरा लगा दिया। योगी सरकार ने स्वास्थ्य के नाम पर अवैध कत्लगाहों की बंदी तो करवा दी लेकिन उसका कोई विकल्प मुहैया नहीं करवाया। इसके उलट अदूरदर्शी कदम उठाते हुए गोरक्षकों को रोजगार मुहैया करवा दिया जिसकी मार दलित और अन्य कमजोर तबके पर पड़ी। आपके नुमाइंदे मुस्कुराते हुए कहने लगे कि जो पहले जानवरों का कत्ल कर रहे थे, वे अब चाय बेच रहे हैं। लेकिन यह सत्ता के शीर्ष को भी पता है कि नोटबंदी और मांसबंदी से कमजोर तबकों पर जो मंदी की मार पड़ी है उसका विकल्प चाय बेचना नहीं हो सकता है। चाय बागान के मजदूर, चाय बेचने वाले और चाय पीने वाले के बीच जो वर्गीय विरोधाभास हैं, उन पर बात करने से आप कब तक कतराएंगे?

पशुवध और गोमांस बंदी वाली सरकार कुछ नहीं तो प्रेमचंद की ‘कर्मभूमि’ से ही सबक ले। प्रेमचंद की ‘कर्मभूमि’ उन कमजोर जातियों पर आधारित है जो अपने पेट के पोषण के लिए मरे हुए पशुओं का मांस खाती थी। मरे हुए मवेशी के उच्च तबके की उपयोगिताओं के लायक पदार्थों का अलगाव करने के बाद वे उन मुर्दा मवेशियों के मांस से अपनी भूख मिटाते थे। ‘कर्मभूमि’ का नायक अमरकांत इसी अमानवीय स्थिति के खिलाफ खड़ा होता है कि हाशिए पर पड़े लोग मृत जानवरों को खाने के लिए मजबूर न हों, क्योंकि यह उनके जीवन के लिए खतरा लेकर आता है, उन्हें इससे कई तरह की बीमारियां हो सकती हैं। मुर्दा मवेशी के खाने को लेकर उपन्यास की एक पात्र मुन्नी कहती है ‘जो चीज और किसी ऊंची जात वाले नहीं खाते, उसे हम क्यों खाएं’। लेकिन वर्तमान सरकार की ‘कर्मभूमि’ का एजंडा दूसरा है और उसका लक्ष्य ‘धर्मभूमि’ है।

‘कर्मभूमि’ की लड़ाई है कि जो ऊंचे तबके के नहीं खाते हम क्यों खाएं और आज की सरकार कमजोर तबकों पर खान-पान की अपनी मान्यताएं थोप रही है। वह कहती है कि जो हम कहें वही खाओ। सरकार ऊपर से आदेश पारित कर देती है कि फलां मांस मत खाओ, लेकिन क्या खाओ, यह विकल्प नहीं बताती है। पशुवध के लिए मवेशियों पर बिक्री पर रोक लगाने का सबसे बुरा असर पशुपालकों और उससे जुड़े लोगों पर पड़ा है। आमतौर पर जब मवेशी दूध देने लायक नहीं रहते हैं तो उन्हें बेच दिया जाता है। लेकिन जब पुराने मवेशी बिकेंगे ही नहीं तो नए मवेशी खरीदे कैसे जाएंगे? सरकार इस समस्या का विकल्प बताए बिना गोवंश रक्षा के अपने संकल्प पर आगे बढ़ रही है।
सरकार के इस संकल्प के बाद, छोटे मांस विक्रय केंद्र जिनसे सबसे ज्यादा कमजोर तबके के लोग जुड़े थे, उन पर हमले होते हैं कि यह फलां मांस बेच रहा है। लेकिन सरकार से लेकर नए रोजगारशुदा गोरक्षक तक यह बताने में नाकाम हैं कि वे क्या बेचें ताकि जिंदा रह सकें।

स्वच्छता का सामूहिक गान गाने वाली सरकार के नुमाइंदे यह नहीं समझ पा रहे हैं कि स्वच्छता का संबंध जीवनशैली और जीविकोपार्जन से है। जीविकोपार्जन बेहतर होगा तो जीवनशैली बेहतर होगी और धीरे-धीरे सभी स्तरों पर सुधार आएगा। आप उस वर्ग से खान-पान का आधार छीन रहे हैं जिन्हें सामाजिक उत्पादन प्रक्रिया में हिस्सेदारी दी ही नहीं गई है।
दलितों को साबुन और शैंपू पहुंचाने वाले योगी जी हों, या दलितों के घर में जाकर रेस्त्रां से मंगाया भोजन ग्रहण करने वाले दक्षिण भारत के नेता, आपके मेजबान तो आपसे पूछेंगे ही कि श्रीमान, नोटबंदी से लेकर मांसबंदी तक का आइडिया तो अच्छा है, पर हमसे जो छीना उसका विकल्प तो दें। क्या विकल्प के इस संकट पर कोई ‘आइडिया’ है? विकल्पहीनता के इस दौर में संकल्प की आकांक्षा बहुत ज्यादा तो नहीं है श्रीमान?

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