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बीसीसीआइ की बढ़ती मुश्किलें

जिस तरह लॉर्ड्स क्रिकेट मैदान पर हर क्रिकेटर शतक जमाना चाहता है, विंबलडन में हर टेनिस खिलाड़ी खिताब जीतना चाहता है। इसी तरह देश का हर क्रिकेट प्रशासक बीसीसीआइ का अध्यक्ष बनना चाहता है।

बीसीसीआइ के पूर्व अध्यक्ष शशांक मनोहर। (फाइल फोटो)

भारतीय क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड यानी बीसीसीआइ की ग्रहदशा आजकल सही नहीं चल रही है। उसकी मुश्किल यह है कि लोढा समिति की सिफारिशों को किस तरह लागू किया जाए। इस स्थिति में उसके अध्यक्ष शशांक मनोहर के इस्तीफे ने बीसीसीआइ की मुश्किलों को और बढ़ा दिया है। बीसीसीआइ दुनिया का सबसे अमीर क्रिकेट संगठन जरूर है, पर कुछ साल पहले आइपीएल में हुई स्पॉट फिक्सिंग की सुप्रीम कोर्ट द्वारा जांच कराने के बाद लोढा समिति की सिफारिशें लागू करने के लिए बन रहे दबाव के कारण बीसीसीआइ का अध्यक्ष पद भी कांटों भरा ताज हो गया है। शशांक मनोहर आइसीसी के पहले स्वतंत्र चेयरमैन बनने की दौड़ में सबसे आगे हैं, इसलिए शायद उन्होंने बीसीसीआइ से निजात पाने में ही अपनी भलाई समझी है। पर उनका यह कदम बीसीसीआइ की मुश्किलों में और इजाफा कर गया है।

शशांक की छवि ईमानदार और मजबूत प्रशासक की है और उनके बीसीसीआइ अध्यक्ष पद के पहले कार्यकाल को अच्छा माना जाता रहा है, इसलिए 20 सितंबर, 2015 को जब तत्कालीन बोर्ड अध्यक्ष जगमोहन डालमिया का निधन हुआ, तो सभी ने उन्हें अध्यक्ष बनने के लिए मनाया। उन्होंने अपने सात माह के कार्यकाल में कई सुधार करके बीसीसीआइ की साख को फिर से बनाने का प्रयास जरूर किया है। लेकिन अब भी लोढा समिति की कई ऐसी सिफारिश हैं, जिनके लागू करते ही बीसीसीआइ का नक्शा एकदम से बदल सकता है। पर फिर भी बीसीसीआइ अध्यक्ष पद ऐसा है, जिसे हर कोई ललचाई नजरों से देखता है। जिस तरह लॉर्ड्स क्रिकेट मैदान पर हर क्रिकेटर शतक जमाना चाहता है, विंबलडन में हर टेनिस खिलाड़ी खिताब जीतना चाहता है। इसी तरह देश का हर क्रिकेट प्रशासक बीसीसीआइ का अध्यक्ष बनना चाहता है।

शशांक मनोहर के इस्तीफा देने से बीसीसीआइ की राजनीति में एक बार फिर से गरमी आ गई है। देश में काम करने वाला हर क्रिकेट धड़ा अपने आदमी को बीसीसीआइ अध्यक्ष की कुर्सी पर बैठाने के लिए उतावला नजर आ रहा है। पूर्व अध्यक्ष एन श्रीनिवासन गुट अपने व्यक्ति को अध्यक्ष बनाना चाहता है, तो शरद पवार की खुद अध्यक्ष बनने की इच्छा रही है। लेकिन बोर्ड पर लोढा समिति की सिफारिशों की भी तलवार लटक रही है। इन सिफारिशों में सत्तर साल से ज्यादा उम्र के व्यक्ति को पदाधिकारी नहीं बनाने की सिफारिश भी शामिल है। इस स्थिति में शरद पवार शायद ही अध्यक्ष पद की दौड़ में शामिल हों। पर वह अपने किसी व्यक्ति को इस कुर्सी तक पहुंचाने का प्रयास जरूर करेंगे। पवार के अलावा एन श्रीनिवासन, निरंजन शाह, जी. गंगा राजू और फारूख अब्दुल्ला जैसे सत्तर साल से ज्यादा उम्र वालों की भी पतंग कटी नजर आ रही है।

मौजूदा हालात में यह माना जा रहा है कि बीसीसीआइ के मौजूदा सचिव अनुराग ठाकुर, आइपीएल चेयरमैन राजीव शुक्ल, बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष सौरव गांगुली और महाराष्ट्र क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष अजय शिर्के को अध्यक्ष पद का दावेदार माना जा रहा है। अनुराग ठाकुर के पक्ष में जाने वाली प्रमुख बात उनका सत्तारूढ़ भारतीय जनता पार्टी का सांसद होना है, इसलिए उन्हें सरकार से प्रभावित मत आसानी से मिल सकते हैं। इसके अलावा वे सचिव पद का चुनाव शरद पवार के समर्थन से जीते थे, इसलिए पवार का समर्थन उन्हें इस बार भी मिल सकता है। इस चुनाव में अरुण जेटली का समर्थन बहुत महत्त्वपूर्ण है। अगर कहा जाए कि उनके समर्थन के बिना किसी का भी अध्यक्ष बनना संभव नहीं है, कुछ भी गलत नहीं है। अनुराग और जेटली एक ही दल से होने की वजह से उनके बीच जुगलबंदी बन सकती है। इसके अलावा राजीव शुक्ला को भी जेटली का समर्थन हासिल रहा है और इसी कारण वे कांग्रेस सरकार न होने पर भी आइपीएल के चेयरमैन पद पर विराजमान हैं।

अनुराग ठाकुर की राह में कम अनुभव रोड़ा बन सकता है। इसके अलावा उनके अध्यक्ष बनने पर सचिव पद भी खाली हो जाएगा। अगर इन वजहों से अनुराग अध्यक्ष नहीं बन पाते हैं, तो राजीव शुक्ला की भी लाटरी खुल सकती है। लेकिन अभी शरद पवार ने अपने पत्ते नहीं खोले हैं। वे अगर श्रीनिवासन गुट के साथ मिल कर अजय शिर्के पर अपना वरदहस्त रख देते हैं तो फिर उनके अध्यक्ष बनने की राह प्रशस्त हो सकती है। सौरव गांगुली ऐसे दावेदार हैं, जब बाकी लोगों पर सहमति नहीं बन रही हो, तो उनके नाम पर सहमति बन सकती है।

पर सौरव गांगुली के अध्यक्ष बनने की राह में सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि बीसीसीआइ के संविधान के मुताबिक चुनाव लड़ने वाले को कम से कम दो साधारण सभा बैठक में भाग लेने का अनुभव होना जरूरी है। लेकिन सौरव बंगाल क्रिकेट एसोसिएशन के अध्यक्ष बनने के बाद से एक ही एजीएम में भाग ले सके हैं। यह सही है कि कई बार सहमति बनाने के लिए कुछ नियमों को दरकिनार भी कर दिया जाता है या कोई राह निकाल ली जाती है। जैसे बारी-बारी से क्षेत्रों से अध्यक्ष चुनने का नियम इसी उद्देश्य से बनाया गया था कि सभी क्षेत्रों को अध्यक्ष देने का मौका मिल सके। लेकिन माधवराव सिंधिया जिस साल अध्यक्ष बने उस समय दूसरे क्षेत्र की बारी थी, इसलिए यह कह कर उनकी राह निकाल ली गई कि जिस क्षेत्र की बारी है, उसके दो प्रतिनिधि अगर किसी उम्मीदवार का समर्थन कर दें तो वह चुनाव लड़ सकता है। इसी तरह दो एजीएम वाले नियम की भी जरूरत पड़ने पर काट निकल आएगी।

यह भी माना जा रहा है कि अनुराग ठाकुर अगर अध्यक्ष बनते हैं तो सौरव गांगुली को सचिव बनाया जा सकता है। इससे क्रिकेटरों को ज्यादा साझीदार बनाने की सिफारिश भी लागू होती नजर आएगी। बीसीसीआइ अध्यक्ष पद के चुनाव के लिए पहले वर्किंग कमेटी शशांक मनोहर का इस्तीफा स्वीकार करने के बाद चुनाव के लिए विशेष साधारण सभा बुलाएगी। इसमें अध्यक्ष बनने के दावेदारों को तीस में से सोलह मत पाना जरूरी होगा। पर इस चुनाव में वही लड़ सकता है, जिसने कम से कम दो साधारण सभा बैठक में भाग लिया हो और बोर्ड का पदाधिकारी रह चुका हो। इसके अलावा अध्यक्ष बनाने की बारी पूर्व क्षेत्र की है, तो उम्मीदार बनने वाले को पूर्व क्षेत्र की कम से कम एक इकाई द्वारा नामांकन करना जरूरी होगा। यह डालमिया के अध्यक्ष बनने वाला कार्यकाल ही चल रहा है, इसलिए यह सितंबर, 2017 तक ही चलेगा।

आइपीएल में स्पॉट फिक्सिंग मामले के बाद बीसीसीआइ के कामकाज में पारदर्शिता और सुधार लाने की जरूरत महसूस की जा रही थी। शशांक मनोहर को लाया भी इसी उद्देश्य से गया था। मनोहर ने कुछ सुधार किए भी। इनमें हितों के टकराव वाले मामलों को देखने के लिए हाईकोर्ट के एक पूर्व जज को न्याय मित्र बनाया गया, पच्चीस लाख रुपए से ज्यादा के खर्च को बीसीसीआइ की वेबसाइट पर डालना शुरू किया गया और क्रिकेट मामलों को देखने के लिए बीसीसीआइ में पहली बार राहुल जौहरी की सीइओ के तौर पर नियुक्ति हुई।

पर लोढा समिति की सिफारिशों को लागू करने के लिए सुप्रीम कोर्ट द्वारा लगातार दवाब बनाने और कई सिफारिशों को लागू करना खासा मुश्किल होने की वजह से शशांक मनोहर की असली अग्नि परीक्षा अब होनी थी, इसलिए उनके इस्तीफे को डूबते जहाज से कैप्टन के कूदने के तौर पर देखा जा रहा है। असल में कुछ सिफारिशें ऐसी हैं, जिन्हें लागू करना बीसीसीआइ व्यावहारिक नहीं मानता है। इन सिफारिशों में एक राज्य एक मत, सरकारी अधिकारियों को पद नहीं देने, राजनेताओं को अलग रखने और एक व्यक्ति एक पद प्रमुख हैं।

एक राज्य एक मत को लागू करने का मतलब कई एसोसिएशनों का प्रभाव एकदम से खत्म हो जाना है। इसमें मुंबई, विदर्भ, सौराष्ट्र, बड़ौदा एसोसिएशनों को शामिल किया जा सकता है। सही मायनों में देखें तो यह सभी एसोसिएशन बीसीसीआइ के संचालन में अहम भूमिका निभाती रही हैं। इसलिए इनके मताधिकार को खत्म करना आसान फैसला नहीं होगा। इसी तरह एक व्यक्ति एक पद को लागू करना भी कतई आसान नहीं है। आमतौर पर राज्य एसोसिएशनों में दबदबा बनाने के बाद ही कोई पदाधिकारी बीसीसीआइ में स्थान पाता है।

पर वह बीसीसीआइ में रहते हुए राज्य एसोसिएशन से हट जाएगा तो उसके विरोधी राज्य एसोसिएशन में लौटने के सभी रास्ते बंद कर सकते हैं। शशांक मनोहर भी ऐसी ही एक एसोसिएशन से ताल्लुक रखते हैं, जो महाराष्ट्र का हिस्सा है। वे अच्छी तरह जानते हैं कि लोढा समिति की सिफारिशों को लागू करने से बचना संभव नहीं है, इसलिए जब उनकी एसोसिएशन विदर्भ का मत देने का अधिकार खत्म हो जाएगा, तब उनकी क्या अहमियत रह जाएगी। इस सच ने भी इस्तीफे में कुछ न कुछ भूमिका तो निभाई होगी।

शशांक मनोहर अध्यक्ष पद छोड़ने के संकेत अपने करीबियों को पिछले कुछ माह से देते रहे थे। उन्होंने यह पद आइसीसी का स्वतंत्र चेयरमैन बनने की खातिर छोड़ा है। असल में इस पद संबंधी नियम में साफ कहा गया है कि इस पद का प्रत्याशी किसी बोर्ड का सदस्य नहीं हो सकेगा और कोई स्वतंत्र व्यक्ति ही चुनाव लड़ सकता है। यह पद पाने के लिए शशांक को तेरह में से दस का पूरा समर्थन हासिल है और चयन पक्का होने पर ही उन्होंने बीसीसीआइ का अध्यक्ष पद छोड़ा है। यह जरूर है कि बीसीसीआइ ने जरूरत के वक्त एक नायाब प्रशासक अपने से दूर कर लिया है, पर आइसीसी को इसका फायदा जरूर मिलेगा।

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