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बैंकिंग क्षेत्र की चुनौतियां

देश के बैंकिंग क्षेत्र के सामने दो तरह की चुनौतियां हैं-आंतरिक और बाहरी।

सांकेतिक फोटो।

सरोज कुमार

फिलहाल बारह सरकारी बैंक छियासी हजार से ज्यादा शाखाओं के जरिए और बाईस निजी बैंक अट्ठाईस हजार से ज्यादा शाखाओं के साथ लगभग अस्सी फीसद लोगों तक सेवाएं पहुंचा रहे हैं। निजी बैंकों के डूबने के भी खतरे हैं। यस बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक की कहानी अधिक पुरानी नहीं है।देश की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाने में बैंक बड़ी भूमिका निभाते हैं। बैंकों का मजबूत होना अर्थव्यवस्था की एक अनिवार्य शर्त है। कुछ सालों से यह शर्त एक अनिवार्य प्रश्न बन कर उभरी है। बैंकिंग क्षेत्र में संकट को लेकर लगातार सवाल उठ रहे हैं और महामारी से उपजे हालात ने इन सवालों को और गंभीर बना दिया है। फिलहाल बड़ा सवाल यही है कि एक संकटग्रस्त बैंकिंग प्रणाली आसन्न चुनौतियों से कैसे निपट पाएगी?

देश के बैंकिंग क्षेत्र के सामने दो तरह की चुनौतियां हैं-आंतरिक और बाहरी। आंतरिक चुनौतियां न हों तो आधुनिक बैंकिंग की बाहरी चुनौतियों से बैंक आसानी से निपट लेंगे। लेकिन आंतरिक चुनौतियां बैंकों को परेशान कर रही हैं, खासतौर से सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों को। बैंकों के सामने बुरे कर्ज यानी गैर निष्पादित परिसंपत्तियों (एनपीए) की चुनौती चट्टान की तरह खड़ी है। भारतीय रिजर्व बैंक (आरबीआइ) के आंकड़े बताते हैं कि 31 मार्च, 2021 तक बैंकों की 8.34 लाख करोड़ रुपए की संपत्ति एनपीए थी। दिसंबर 2021 में आई आरबीआइ की वित्तीय स्थिरता रपट बताती है कि अनुसूचित वाणिज्यिक बैंकों की सकल गैरनिष्पादित परिसंपत्तियों (जीएनपीए) का अनुपात सितंबर 2022 तक बढ़ कर 8.1 फीसद हो जाएगा, जो सितंबर 2021 में 6.9 फीसद था। तनावपूर्ण परिस्थिति में यह 9.5 फीसद तक भी जा सकता है। यह चिंताजनक है।

एनपीए एक ऐसी बीमारी है, जो बैंकों को दीमक की तरह खोखला कर रही है। दिया गया कर्ज तय समय के भीतर ब्याज सहित वापस लौट आए तो बैंक अपनी आर्थिक मजबूती के बल पर प्रौद्योगिकीय अवसंरचना विकास और कौशल विकास जैसी आधुनिक बैंकिंग की हर चुनौतियों से निपट सकते हैं। लेकिन लंबे समय से ऐसा हो नहीं पा रहा है। 2008 की मंदी के दौरान शुरू हुई एनपीए की कहानी बैंकों की बलि लेने तक पहुंच गई है। पहले आठ बैंकों का विलय हुआ, अब निजीकरण की कवायद है। एनपीए के कारण बैंक सरकार की नजर में घाटे का सौदा हैं। आरबीआइ के आंकड़े बताते हैं कि वित्त वर्ष 2008-09 से 2013-14 तक जो सकल एनपीए लगभग पांच लाख करोड़ रुपए था, वह वित्त वर्ष 2014-15 से 2019-20 तक की अवधि के दौरान बढ़ कर 18.28 लाख करोड़ रुपए हो गया। एनपीए में यह उछाल लगभग तीन सौ पैंसठ फीसद बैठता है।

सरकार और आरबीआइ ने इस दौरान एनपीए के समाधान के जो उपाय अपनाए, उनसे बैंकों को लाभ के बजाय नुकसान ही हुआ। रणनीतिक कर्ज पुनर्गठन योजना 2015, इनसाल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड (आइबीसी) 2016, सरकारी बैंकों के विलय और बैड बैंक की स्थापना जैसे उपायों से एनपीए के आंकड़े नीचे जरूर आए, लेकिन बैंकों को इसकी बड़ी कीमत चुकानी पड़ी। बेशक सरकार ने बैंकों के पुनर्पूंजीकरण जैसा कदम भी उठाया, लेकिन एनपीए समाधान प्रक्रिया में हुए पूंजी नुकसान के मुकाबले यह ऊंट के मुंह में जीरा ही था।

वित्त वर्ष 2017-18 में नब्बे हजार करोड़ रुपए, 2018-19 में एक लाख छह हजार करोड़ रुपए, 2019-20 में सत्तर हजार करोड़ रुपए, 2020-21 में बीस हजार करोड़ रुपए और 2021-22 में 20 हजार करोड़ रुपए सरकार ने बैंकों में डाले हैं, जो एनपीए में डूबी राशि से काफी कम है। सरकार की ओर से अपनाए गए उपायों के कारण मार्च 2021 तक एनपीए घट कर 8.34 लाख करोड़ रुपए हो गया। इसमें से 6,16,616 करोड़ रुपए सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों का था। वित्त राज्य मंत्री डा. भागवत कराड की तरफ से दिसंबर 2021 में संसद में दिए गए एक लिखित जवाब के अनुसार, सितंबर 2021 में सरकारी बैंकों की 5,40,442 करोड़ रुपए की रकम एनपीए थी।

यानी मार्च से सितंबर के बीच 76,174 करोड़ रुपए मूल्य के एनपीए का समाधान हुआ। इसमें से कितनी राशि बैंकों में वापस लौटी, या रिकवरी की दर क्या थी, इसकी जानकारी उपलब्ध नहीं है। यहां यह जान लेना जरूरी है कि 2014 में सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों की मात्र 2,24,542 करोड़ रुपए की संपत्ति एनपीए थी। बैंकों की संपत्ति का एनपीए होना बड़ा नुकसान है, लेकिन एनपीए का समाधान भी कुछ खास लाभदायक नहीं रहा है। समाधान के रास्ते मामूली राशि ही बैंकों में लौटती है। वित्त राज्य मंत्री ने दिसंबर 2021 में अपने जवाब में कहा था कि पिछले सात वित्त वर्ष के दौरान सरकारी बैंकों के 5,49,327 करोड़ रुपए एनपीए की रिकवरी हुई। लेकिन रिकवरी की दर उन्होंने नहीं बताई।

एनपीए वसूली दर का अंदाजा आरबीआइ की वित्तीय स्थिरता रपट से लगता है। रपट में कहा गया है कि सितंबर 2019 और सितंबर 2021 के बीच आइबीसी के तहत सुलझाए गए कारपोरेट कर्ज के साठ मामलों में वसूली की औसत दर 24.7 फीसद थी। यानी इसमें बैंकों द्वारा कर्ज में दी गई रकम का 75.3 फीसद हिस्सा डूब गया। अर्थव्यवस्था की भाषा में इस नुकसान का आधुनिक नाम ‘हेयरकट’ है। अब अंदाजा लगाइए कि 5,49,327 करोड़ रुपए की वसूली में ‘हेयरकट’ कितना हुआ होगा! कई मामलों में तो हेयरकट का औसत अस्सी से नब्बे फीसद तक होता है। ऐसे में सौ रुपए खर्च करके दस रुपए कमाने वाला कौन-सा कारोबार चल सकता है।

एनपीए का खेल सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के साथ अधिक है। क्योंकि हर जोखिम में इन्हें ही जूझना होता है। इस खेल में बैंक कंगाल हो रहे हैं और खेल के खिलाड़ी मालामाल। दिक्कत यह कि सरकार अब सुधार के बहाने बैंकों से पीछा छुड़ाने की जुगत में है। वह जनता के जमा पैसों की जवाबदेही से खुद को अलग कर लेना चाहती है। बैंकों के विलय के बाद निजीकरण की बात कुछ ऐसी ही है। निजीकरण सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के सामने एक नई चुनौती है। सरकार सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में अपनी हिस्सेदारी इक्यावन फीसद से घटा कर छब्बीस फीसद करने के लिए संविधान संशोधन चाहती है। नीति आयोग दो बैंकों और एक बीमा कंपनी के निजीकरण की सिफारिश पहले ही कर चुका है। सवाल उठता है यदि बैंकों का प्रबंधन निजी हाथों में गया तो अर्थव्यवस्था की दिशा क्या होगी। जोखिम भरे वातावरण में आर्थिक चुनौतियों से निपटने में जो मदद सरकारी बैंकों ने की है, क्या निजी बैंक वह कर पाएंगे?

यहां एक तर्क यह है कि सभी सरकारी बैंक निजी हाथों में नहीं जाएंगे। लेकिन निजीकरण का कानून बन जाने के बाद यह तर्क कब तक टिका रहेगा? यदि बैंक निजी हो गए तो क्या देश में बैंकिंग सेवा की पहुंच का मौजूदा माडल भी बचा रह पाएगा? फिलहाल बारह सरकारी बैंक छियासी हजार से ज्यादा शाखाओं के जरिए और बाईस निजी बैंक अट्ठाईस हजार से ज्यादा शाखाओं के साथ लगभग अस्सी फीसद लोगों तक सेवाएं पहुंचा रहे हैं। निजी बैंकों के डूबने के भी खतरे हैं। यस बैंक और लक्ष्मी विलास बैंक की कहानी अधिक पुरानी नहीं है। यस बैंक को उबारने भारतीय स्टेट बैंक को ही हाथ लगाना पड़ा था। बैंकों का राष्ट्रीयकरण इन्हीं तमाम चिंताओं के कारण किया गया था। आरबीआइ की 2006 और 2008 के बीच आई एक रपट बताती है कि आजादी के बाद 1947 से 1955 के बीच बैंक तीन सौ इकसठ बार डूबे थे और उनमें जमा जनता की गाढ़ी कमाई भी डूब गई थी।

आज भारतीय बैंकिंग प्रणाली में बारह सार्वजनिक क्षेत्र के बैंक, बाईस निजी बैंक, छियालीस विदेशी बैंक, छप्पन क्षेत्रीय ग्रामीण बैंक, एक हजार चौर सौ पिच्यासी शहरी सहकारी बैंक, और छियानवे हजार ग्रामीण सहकारी बैंकों के अलावा सहकारी क्रेडिट संस्थान काम कर रहे हैं। दो लाख से ज्यादा एटीएम हैं। इसके बावजूद आवश्यकता के अनुरूप कर्ज सुलभ नहीं है। अकेले एमएसएमई क्षेत्र के लिए 25.8 लाख करोड़ रुपए कर्ज की कमी है। आबादी और अर्थव्यवस्था के विस्तार के साथ आगे मांग बढ़ने ही वाली है। बैंकिंग सुधार की दिशा इसी तरफ होनी चाहिए।

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