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बैंकों की गिरती सेहत

आज देश के बैंकों का एनपीए अरबों-खरबों में है और वे अपने बड़े बकाएदारों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं

Author नई दिल्ली | April 11, 2016 12:14 AM
रिजर्व बैंक ऑफ इंडिया

बैंक मजबूत अर्थव्यवस्था की सबसे महत्त्वपूर्ण धुरी माने जाते हैं। भारत में सार्वजनिक क्षेत्र के वाणिज्यिक बैंकों की बैलेंस शीट भले ही ठीक हो, लेकिन बैंक खातों को सिलसिलेवार देखें तो सवा अरब के देश में केवल तीस रईसों के ऊपर नब्बे हजार करोड़ रुपए से अधिक का ऋण है। विशेष रूप से बैंकों की गैर-निष्पादित संपत्तियों (नॉन परफॉर्मिंग एसेट्स- एनपीए) में वृद्धि और घटते मुनाफे के कारण, बैंकों की हालत खस्ता हो चुकी है। सवाल है कि बैंकों की ऐसी दशा के लिए जिम्मेवार कौन है।

कभी वित्तीय बाजार को अपने इशारे पर नचाने वाले बैंक, आज बीमा और म्युचुअल फंड जैसी कंपनियों से कर्ज के मोहताज है। बैंकों के एनपीए की अधिकांश राशि 2897 डिफाल्टरों के पास बकाया है। आज हमारे सरकारी बैंकों का 14.1 प्रतिशत ‘स्ट्रेस लोन’ (ऐसा कर्ज जो संकट में हो) की श्रेणी में है जबकि निजी बैकों का मात्र 4.6 प्रतिशत कर्ज संकट में है। देश के नामी-गिरामी लोग बैंकों से अरबों का ऋण लेकर घी पीते गए और अब बैंकों को कर्ज नहीं लौटा रहे। बैंकों की मिलीभगत से फंसे ऋण (एनपीए) के नियमों की आड़ में, अब तक आए नतीजे दिखा रहे हैं कि छह सरकारी बैंकों के एनपीए मार्केट कैपिटलाइजेशन यानी बाजार में उनकी कीमत से भी ज्यादा हो गया है। यही वजह रही है कि बैंकों के शेयरों में भारी गिरावट आई है।

वह कर्ज ही क्या जो सूद समेत न लौटे? लेकिन ब्याज तो ब्याज, उद्योग जगत के बड़े कर्जदार बैंकों का मूलधन भी नहीं लौटा रहे हैं। इस गणित से सभी भली-भांति परिचित हैं कि बैंक और साहूकार की कमाई कर्ज पर मिलने वाले सूद से होती है। यदि ऋणदाता को ब्याज और मूलधन की किस्त दोनों ही चुकाना बंद कर दें तो बैंक के कारोबारी लक्ष्य कैसे पूरे होंगे? नतीजतन, बैंकों से भारी-भरकम कर्ज लेकर उसे जान-बूझ कर न चुकाने वालों की संख्या लगातार बढ़ती गई है। हालात इतने बदतर हो गए हैं कि चालीस सूचीबद्ध बैंकों के 4,43,691 करोड़ रुपए डूबत खातों में दाखिल हो चुके हैं। अगर इसमें सरकारी बैंकों के ऐसे कर्ज भी शामिल कर लिये जाएं जिन्हें भविष्य में एनपीए घोषित किया जा सकता है तो डूबने वाले कर्ज की यह राशि दोगुनी होकर आठ लाख करोड़ के पार जा सकती है।

ऐसी कंपनियों की संख्या करीब ग्यारह सौ है जो वर्षों से किस्त नहीं चुका रही हैं। देश के कॉरपोरेट बैंक-कर्ज चुकाने में भले ही डिफॉल्टर हों, मगर हमारे बैंकों की कर्ज वसूली नीतियां बड़ी ही नरम व उदारवादी हैं। बैंक पात्रता से ज्यादा संबंधों और रसूखों के आधार पर मनमाना कर्ज दे दिया करते हैं। कर्ज को वसूलने के लिए बैंक सख्ती से पेश नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ सावधि जमा व लघु बचतों पर ब्याज दरें घटा कर मध्यम वर्ग को और मायूस किया जा रहा है।

एनपीए का सबसे बड़ा हिस्सा कॉरपोरेट कर्ज का है। वित्तवर्ष 2014-15 में 441 गैर-वित्तीय कंपनियों का कुल कर्ज 28.5 लाख करोड़ रुपए था, जो सभी 654 गैर-वित्तीय कंपनियों के कुल कर्ज का लगभग 98.1 प्रतिशत है। बड़े कर्जधारकों पर बकाया ब्याज कई बार माफ कर बट्टेखाते में डाल दिया जाता है। सरकारी आंकड़े बताते हैं कि 2013-15 के बीच 1.14 लाख करोड़ की रकम बट्टेखाते में डाल दी गई। इन कंपनियों का पूंजी निवेश पर रिटर्न (आरओसीई) वित्तवर्ष 2014-15 में घट कर 7.4 प्रतिशत पर आ गया, जो दशक का न्यूनतम स्तर है। बैंकों के एनपीए को ढंकने के लिए सरकार द्वारा पूंजी मुहैया कराई जा रही है। सरकार ने बजट 2016-17 में बैकों को पूंजी देने के लिए पच्चीस हजार करोड़ रुपए उपलब्ध कराए हैं। सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों में सत्तर हजार करोड़ रुपए डालने की सरकार की योजना है। यह काम मार्च 2019 तक चार वर्ष में होगा। बैंकों के इस घाटे की पूर्ति के लिए सरकार द्वारा आम आदमी पर कर लगा कर पूंजी उपलब्ध कराई जा रही है। निजी बैंकों का राष्ट्रीयकरण करके हम कुएं से तो निकले, लेकिन और गहरी खाई में जा गिरे?

देश के बैकों में जमा पूंजी लगभग अस्सी लाख करोड़ है। इसमें पचहत्तर प्रतिशत राशि छोटे बचतकर्ताओं और आम लोगों की है। जन धन योजना के तहत जो नए खाते खुले हैं, उनसे भी बैकों में करीब पच्चीस हजार करोड़ नगद जमा हुए हैं। कायदे से तो इस जमा पूंजी पर नियंत्रण सरकार का होना चाहिए, जिससे जरूरतमंद किसानों, शिक्षित बेरोजगारों और लघु, मझोले उद्यमियों की पूंजीगत जरूरतें पूरी हो सकें। लेकिन दुर्भाग्य से यह धनराशि बड़े औद्योगिक घरानों के पास चली गई है और वे न उसे केवल दाबे बैठे हैं बल्कि गुलछर्रे उड़ा रहे हैं।
यह विडंबना ही है कि सब कुछ जानते-बूझते हुए भी औद्योगिक घरानों को आसानी से हजारों करोड़ का ऋण मिल जाता है, जबकि छोटे कर्जदारों (किसानों) को बैंक के कई-कई चक्कर लगाने होते हैं। बैंकों के बढ़ते एनपीए की मूल वजह राजनीतिकों-उद्योगपतियों-बैंक अधिकारियों का गठजोड़ है, जिसके चलते उद्योगपतियों को आसान शर्तों पर कर्ज दे दिया जाता है, जिसे वे चुकाने में आनाकानी करते हैं। जब्ती, कुर्की, नीलामी जैसे नियम-कानूनों का चाबुक गरीब-वंचित किसानों पर ही बरसता है, धनवानों पर नहीं।

आज देश के बैंकों का एनपीए अरबों-खरबों में है और वे अपने बड़े बकाएदारों का कुछ नहीं बिगाड़ पा रहे हैं; बल्कि उन्हें दुबारा-तिबारा ऋण दिया जाता रहा है। वहीं किसानों से गाय-भैंस या खाद-बीज के दस-बीस हजार के कर्ज वसूलने में उन्हें डराने-धमकाने, अपमानित करने में बैंकों को संकोच नहीं होता। पुलिस भी वसूली में उनके एजेंट की भूमिका निभाती है।

कल तक ठोस धरातल पर खड़े अधिकतर बैंक दुर्भाग्य से आज खस्ताहाल हैं। खासतौर पर एनपीए का स्तर बेकाबू हो रहा है, वहीं साइबर अपराध या धोखेबाजी के जो तरीके सामने आ रहे हैं उनमें डेबिट या क्रेडिट कार्ड का क्लोन बना कर आॅनलाइन खरीदारी या एटीएम से निकासी और फर्जी ऋण वितरण जैसे मामले शामिल हैं। बैंक प्रतिनिधि बन कर ग्राहकों का कार्ड सत्यापन, ब्लॉक होने या अन्य प्रकार के भय दिखा कर फोन पर गुप्त जानकारी प्राप्त कर, धोखाधड़ी के मामले आए दिन उजागर होते रहते हैं। ऐसे मामलों पर लगाम कसने और उनके निपटान के लिए रिजर्व बैंक ने केंद्रीय धोखाधड़ी रजिस्टर बनाया। लेकिन तमाम प्रयासों के बावजूद धोखाधड़ी और एनपीए के चलते बैंकों में करोड़ों का गड़बड़झाला बदस्तूर चल रहा है। सरकारी बैंकों की तुलना में निजी बैंकों को अधिक जागरूक माना जाता है, लेकिन पूंजी बाजार में निजी बैंकों की तीस प्रतिशत भागीदारी होने के बावजूद बैंकों में धोखाधड़ी से होने वाले नुकसान में उनकी भागीदारी अधिक है।

बैंकों का कर्ज जान-बूझ कर न चुकाने वाले (विलफुल डिफॉल्टर) कारोबारियों पर अब भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) ने नकेल कसी है। एनपीए बढ़ने की समस्या 2008 से लगातार गहराती गई है। उसी समय से सरकार और नियामक संस्थाओं ने सख्ती बरती होती, तो आज एनपीए बैंकिंग क्षेत्र के लिए इतनी बड़ी चुनौती नहीं बनता। हाल ही में खबर आई कि कई बैंकों ने हजारों करोड़ के ऋण को बट्टेखाते में डाल दिया है। अनुमान है कि देश में ढाई हजार विलफुल डिफॉल्टर्स के पास सरकारी बैंकों का लगभग चौंसठ हजार करोड़ का कर्ज है। सेबी के नए नियम ऐसे बकाएदारों पर ही लागू होंगे। ये विलफुल डिफॉल्टर शेयर या बांड के जरिए लोगों से धन नहीं जुटा सकेंगे, न ही वे किसी सूचीबद्ध कंपनी के बोर्ड में शामिल हो पाएंगे। ये बकाएदार दूसरी सूचीबद्ध कंपनी का नियंत्रण भी अपने हाथों में नहीं ले सकेंगे। उन्हें म्युचुअल फंड या ब्रोकरेज फर्म खोलने की इजाजत भी नहीं होगी।

देश में ऐसे उद्यमियों की भी एक बड़ी संख्या है, जिन्होंने बैंकों से ऋण लेकर उसे पूरी नेकनीयती से अपने कारोबार में लगाया, लेकिन कड़े परिश्रम और तमाम कौशल झोंक देने के बावजूद तय लक्ष्य तक नहीं पहुंच सके। वे वैश्विक मंदी या सरकारों की नीतिगत विफलताओं के शिकार होने के कारण सफल नहीं हो पाए और ऋण चुकाने में असमर्थ रहे। इन्हें ऐसे कर्जखोरों से निश्चय ही अलग श्रेणी में रखा जाना चाहिए जो तमाम तिकड़में भिड़ा कर बैंकों से ऋण लेने में सफल हो जाते हैं और फिर उस रकम को शानो-शौकत, सुरा-सुंदरी, अय्याशी या धनशोधन जैसी गैर-कानूनी आर्थिक गतिविधियों में लगा कर चंपत हो जाते हैं। मसलन किंग कॉरपोरेट के नाम से पहचाने जाने वाले विजय माल्या पर सत्रह बैंकों का नौ हजार करोड़ रुपए बकाया है। अकेले उनकी किंगफिशर कंपनी पर 7800 करोड़ रुपए का कर्ज है। माल्या को जिस दरियादिली से बैंकों ने कर्ज दिया और जिस ढंग से उन्होंने देश छोड़ा, उससे लगता है कि कर्ज के डूबने-डुबाने के खेल में राजनीति, नौकरशाही, कारोबार और बैंक प्रबंधन का पूरा भ्रष्ट गठजोड़ शामिल है। पर्याप्त संपत्ति गिरवी रखे बगैर ही माल्या को कर्ज देना तथा पुराने कर्जों को डूबने से बचाने के लिए फिर नया कर्ज देना, यह एक दुश्चक्र था।

ऋण वसूली के लिए गिरफ्तारी से लेकर कुर्की-जब्ती तक अनेक प्रावधान हैं, लेकिन बड़े बकाएदार उन्हें ठेंगा दिखाने में कामयाब हो रहे हैं। इससे बैंकों की कार्यप्रणाली पर सवालिया निशान लग रहे हैं। एनपीए न सिर्फ बैंकों के लिए बल्कि पूरी अर्थव्यवस्था के लिए घातक है। एनपीए पर काबू पाने के लिए ईमानदार राजनीतिक इच्छाशक्ति की दरकार है।

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