ताज़ा खबर
 

अवधेश कुमार का लेख : किसे कितना उड़ने की आजादी

यहां प्रश्न सेंसर बोर्ड की भूमिका पर भी है। वह अगर केवल प्रमाण-पत्र जारी करने वाली संस्था है, तो उसके साथ सेंसर शब्द क्यों लगा है?

Author नई दिल्ली | June 16, 2016 3:17 AM
फिल्म में शाहिद कपूर, आलिया भट्ट, करीना कपूर खान और दिलजीत दोसांझ हैं।

मुंबई उच्च न्यायालय ने फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ के संदर्भ में सेंसर बोर्ड आॅफ फिल्म सर्टिफिकेशन के लिए जैसी टिप्पणियां की थीं, उनसे आभास हो गया था कि वह ऐसा ही फैसला देगा। इसलिए उसके फैसले पर किसी को आश्चर्य नहीं हुआ होगा। हालांकि फैसला आने के पहले ही सेंसर बोर्ड ने तेरह अंशों को काटने और थोड़े परिवर्तन के साथ फिल्म को ए सर्टिफिकेट देकर पास कर दिया। हो सकता है, न्यायालय की टिप्पणियों का उस पर असर पड़ा हो। न्यायालय ने अपनी टिप्पणियों से सेंसर बोर्ड को पूरी तरह कठघरे में खड़ा कर दिया था। हालांकि उच्च न्यायालय ने उसे भी स्वीकार नहीं किया और केवल एक अंश काटने के साथ उसे सभी के लिए पास करने का आदेश दे दिया।

न्यायालय तो न्यायालय है। वह जो भी फैसला दे, उसे या तो हमें चुपचाप स्वीकार करना है या उसके विरुद्ध अपील करनी है। सेंसर बोर्ड के विरुद्ध मुंबई की फिल्मी दुनिया का एक बड़ा वर्ग इस तरह उबला हुआ है, मानो आपातकालीन सेंसर काल आ गया हो! मानो सेंसर बोर्ड ने ऐसी अनहोनी कर दी हो कि उससे सृजन करने वालों की सृजनात्मकता को आघात पहुंचा हो, अभिव्यक्ति की मान्य स्वतंत्रता पर चोट पहुंची हो। तर्क तो यही था कि इस तरह किसी फिल्म से करीब नवासी अंशों को काटने और उसके नाम तक में बदलाव करने का निर्देश देना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर हमला ही है। न्यायालय ने यह कहते हुए कि दर्शक फिल्म के बारे में फैसला करेंगे, प्रकारांतर से इस आलोचना पर मुहर लगा दी है।

इस फैसले के बावजूद फिल्म जगत का एक बड़ा वर्ग इस तरह सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष पहलाज निहलानी पर बिनबिनाया हुआ है कि उनकी चले तो आज ही उन्हें कुर्सी से उतार फेंकें। वही पहलाज निहलानी, जो पहले अनेक लोगों के प्रिय थे, आज एकाएक अप्रिय हो गए हैं। फिल्म को पास करने के बावजूद उनके प्रति गुस्सा कम नहीं हुआ है। कुछ लोग उनको सेंसर बोर्ड से ही हटाने की मांग कर रहे हैं।

न्यायालय का अपना फैसला है, उसका सम्मान करते हुए उस पर कोई टिप्पणी नहीं की जानी चाहिए। न्यायालय की टिप्पणियों पर पहलाज निहलानी की प्रतिक्रिया है कि सेंसर बोर्ड कुछ नियमों से चलता है और हमने जो निर्देश दिए वे नियमों के तहत ही थे। सेंसर बोर्ड के नियमों को पढ़ें तो आपको पता चल जाएगा कि इसे अगर लागू कर दिया जाए तो हमारी अनेक फिल्में डिब्बे में बंद रह जाएंगी। ये नियम आज के बनाए हुए नहीं हैं, पहले के हैं। यह बात अलग है कि सेंसर बोर्ड में बैठने वाला व्यक्ति अपने विवेक, सोच और दृष्टिकोण के अनुसार फिल्मों को सर्टिफिकेट देता रहा है। कभी-कभी जब विवाद बढ़ गए, तो नियमों की पुस्तिका निकाल कर उसे खंगालने का काम हुआ है।

अनुराग कश्यप ने अपनी फिल्म को जैसा उन्होंने बनाया, उसी तरह चलाने के लिए वकीलों की फौज न्यायालय में खड़ी कर दी, जिसका सामना करना वैसे भी सेंसर बोर्ड के लिए आसान नहीं था। वर्तमान केंद्र सरकार वैसे भी ऐसे मामलों में सकुचाहट और हिचकिचाहट का शिकार रहती है कि उसे प्रगतिकामी या फिर अपनी विचारधारा के लिए अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर अंकुश लगाने वाला करार न दे दिया जाए। पर सेंसर बोर्ड है, तो उसकी कुछ भूमिका तो होगी।

क्या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता किसी काल में संपूर्ण रही है या हो सकती है? हमारे संविधान ने भी उस पर मर्यादाओं के कुछ बंधन लगाए हैं। कला और रचना के नाम पर कुछ भी करना अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के तहत नहीं आ सकता। हर कला समय और समाज के सापेक्ष ही हो सकती है। जब आप सापेक्षता से आबद्ध होते हैं तो आपको अपने दायित्व का भी अहसास होता है। लेकिन फिल्म सिर्फ कला नहीं है, यह सिर्फ सृजन नहीं है, यह शुद्ध व्यवसाय भी है। अगर कहें कि यह कला और सृजन का शुद्ध व्यवसाय है, तो गलत नहीं होगा। जाहिर है, फिल्मकारों की टोली को तो ‘उड़ता पंजाब’ के साथ खड़ा होना ही था।

सामान्यतया फिल्मों में पंजाब की जो तस्वीर हमारे सामने आती है वह मौज-मस्ती में झूमते, गाते, हंसते एक खुशहाल प्रदेश की है। यह पंजाब की हकीकत नहीं है। किसानों की आत्महत्याएं वहां भी होती हैं। गरीबी, तंगहाली, बेरोजगारी और अपराध वहां भी विद्यमान हैं। अभी करीब बीस वर्ष से पंजाब में राजनीतिक स्थिरता और शांति आई है। उसके पहले बीस वर्ष हिंसा, अशांति और कमजोर सरकारों का दौर रहा। इन बीस वर्षों में एक ओर अगर राजनीतिक स्थिरता है, तो दूसरी ओर पंजाब नशे के कारोबार का देश का सबसे बड़ा केंद्र भी बन गया है। छोटे-छोटे बच्चे नशे के शिकार हो रहे हैं, परिवार के परिवार नशे के कारण बर्बाद हो रहे हैं। आप पंजाब के नशा मुक्ति केंद्र में जाएं तो वहां दस-पंद्रह साल के बच्चों का उपचार होता देख दंग रह जाएंगे।

नशे के व्यापारियों का एक बड़ा तंत्र वहां खड़ा हो गया है, जिनके तार सीमा पार से भी जुड़े हैं। तमाम घेरेबंदी के बावजूद अफगानिस्तान से चलता हुआ हेरोइन पाकिस्तान के रास्ते वहां पहुंच रहा है। इसमें राजनीति, प्रशासन, पूंजीशाह से लेकर सामान्य लोग तक संलिप्त हैं। आपको मनुष्य के जीवन को बरर्बाद करने वाला हर प्रकार का नशा पंजाब में मिल जाएगा।
इस पर कोई समस्या को वास्तविक रूप से समझ कर फिल्म बनाए, उसके कारणों की ईमानदारी से पड़ताल करे और उससे बचने का रास्ता बताए तो उसका स्वागत होना चाहिए। ऐसी फिल्मों की आवश्यकता भी है। ‘उड़ता पंजाब’ के बारे में दावा किया गया है कि उसमें ऐसा किया गया है।

गौरतलब है कि न्यायालय ने इसकी व्याख्या नहीं की है कि इसमें जो कुछ दिखाया गया है वही पंजाब का सच है। उसने तो फिल्म को फिल्म के तौर पर ही लिया है, जिसमें कल्पना के आधार पर तैयार कहानी और उसके अनुसार संवाद और दृश्य हैं। न्यायालय ने यही कहा है कि क्रिएटिव लोगों को, यानी रचनाकर्मियों को रचना की छूट कायम रहनी चाहिए। यानी उनका वास्तविकता से वास्ता हो सकता है और नहीं भी। फिल्म बनाएं तो उसमें नाटकीयता और मनोरंजन के अन्य साधन तो रहेंगे ही। इसलिए न्यायालय के फैसले को आधार बना कर यह कहना गलत होगा कि फिल्म ‘उड़ता पंजाब’ को वहां की वास्तविकता के ईमानदार चित्रण का कोई प्रमाण-पत्र मिल गया है।

इसके आधार पर यह भी नहीं कहा जा सकता कि जो आरोप अनुराग कश्यप पर लगे कि किसी विशेष राजनीतिक दल को सहयोग करने की दृष्टि से यह फिल्म बनाई गई है, उसे न्यायालय ने खारिज कर दिया। यह प्रश्न न्यायालय के सामने था ही नहीं और इस पर न्यायालय ने कुछ कहा ही नहीं है। रचनाधर्मिता की आजादी सबके लिए है, तो वह राजनीतिक दलों के लिए भी है। इसका उत्तर यही है कि अगर ‘उड़ता पंजाब’ किसी एक राजनीतिक दल की वकालत करता है और दूसरे को विफल और नशाखोरी को बढ़ाने वाला साबित करता है तो उसके समांतर दूसरे राजनीतिक दल भी अपनी फिल्म बना लें।

न्यायालय ने फिल्म के नाम से पंजाब शब्द हटाने पर सहमति व्यक्त नहीं की, लिहाजा उसका यही नाम रहेगा। यहां एक उदाहरण कुछ वर्ष पहले आई फिल्म ‘शूल’ का दिया जा सकता है। यह बिहार की भ्रष्ट और अपराधी राजनीति और एक ईमानदार पुलिस अधिकारी के टकराव की कहानी थी। इसे फिल्मकार ‘बिहार का शूल’ भी नाम दे सकते थे। पर यह नाम दिए बिना उन्होंने फिल्म बना दी और लोगों की समझ में आ गई। ऐसा ही फिल्म ‘गंगाजल’ में भी हुआ। ऐसे आपको अनेक उदाहरण मिल जाएंगे जहां किसी राज्य या क्षेत्र का नाम दिए बगैर बेहतर कहानी, कसे हुए संवादों और दृश्यों से लोगों को सच समझ में आ गए। नाम देकर पूरे राज्य को दोषी बताए बगैर भी अपनी बात कही जा सकती है। न्यायालय के फैसले के विरुद्ध कोई आवाज न उठाएं, लेकिन इसे सभी पसंद नहीं करेंगे।

यहां प्रश्न सेंसर बोर्ड की भूमिका पर भी है। वह अगर केवल प्रमाण-पत्र जारी करने वाली संस्था है, तो उसके साथ सेंसर शब्द क्यों लगा है? केवल फिल्म प्रमाणन बोर्ड रहेगा तब भी वह कुछ नियमों के तहत ही प्रमाण-पत्र देगा। उसमें अगर उसकी नजर में कोई दृश्य, संवाद, कहानी के कुछ अंश या फिल्म का नाम आपत्तिजनक और अवांछित या समाज के लिए हानिकारक लगेगा तो उसे हटाने के लिए कहेगा। उस पर कभी एक राय नहीं हो सकती। ‘उड़ता पंजाब’ में भी गंदी गालियों के कई संवाद हैं, जिन्हें सेंसर बोर्ड हटाना चाहता था। कोई ट्रक चालक क्या गालियों में ही बात करता है! गाली बकने वाले चालक हैं, तो सभ्य भाषा में बात करने वाले भी हैं। गालियां सच होते हुए भी क्या सृजनात्मकता के नाम पर उनके सार्वजनिक प्रदर्शन की छूट दी जानी चाहिए? यह ऐसा प्रश्न है, जिस पर गंभीरता से विचार करने की आवश्यकता है।

समाज में ऐसा बहुत कुछ होता है, जिसे हम सार्वजनिक रूप से कला के नाम पर प्रदर्शन की इजाजत नहीं दे सकते। हाल के वर्षों की फिल्मों में वैसे अनेक मर्यादाएं टूटी हैं और फिल्मकार उसके अभ्यस्त हो गए हैं। उनमें अगर कोई भी थोड़ा अंकुश का कदम उठाता है, तो लगता है कि यह तो सृजन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कुठाराघात है। फिर बयानबाजी, प्रेस सम्मेलन, न्यायालय में मामला आरंभ हो जाता है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App