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अरुणा शानबाग: स्त्री-सुरक्षा, कानून और समाज

अरुणा शानबाग का मूर्च्छित शरीर बयालीस साल तक समाज के सामने एक ऐसा न्यायिक तकाजा बन कर जिंदा रहा जिसके मुकाबले कानून हमेशा कमजोर लगा। हालांकि तकनीकी रूप से अब भी संभव है कि शानबाग के हमलावर पर दुबारा मुकदमा चले ताकि उसे कहीं बड़ी सजा दी जा सके। बेशक, बयालीस वर्ष पहले उसे हत्या के प्रयास में सजा मिल चुकी है; अब उस हमले में लगी चोटों से अरुणा की मृत्यु हो जाने पर दोषी पर हत्या के आरोप में नया मुकदमा चलाया जाना भी विधिक मानदंडों के प्रतिकूल नहीं होगा।

Author June 5, 2015 10:00 PM
हापुड़ के गांव में मजूरी कर जिंदगी काट रहा है सोहनलाल वाल्मीकि। (फोटो: गजेंद्र यादव)

अरुणा शानबाग का मूर्च्छित शरीर बयालीस साल तक समाज के सामने एक ऐसा न्यायिक तकाजा बन कर जिंदा रहा जिसके मुकाबले कानून हमेशा कमजोर लगा। हालांकि तकनीकी रूप से अब भी संभव है कि शानबाग के हमलावर पर दुबारा मुकदमा चले ताकि उसे कहीं बड़ी सजा दी जा सके। बेशक, बयालीस वर्ष पहले उसे हत्या के प्रयास में सजा मिल चुकी है; अब उस हमले में लगी चोटों से अरुणा की मृत्यु हो जाने पर दोषी पर हत्या के आरोप में नया मुकदमा चलाया जाना भी विधिक मानदंडों के प्रतिकूल नहीं होगा।

हो सकता है ऐसा किए जाने पर गंभीर यौनिक हमलों में कठोरतम सजा की मांग करने वालों को संतोष पहुंचे। तब भी तार्किक कसौटी पर जो सवाल अनुत्तरित रह जाएगा वह यह कि क्या अपराध-सजा का समीकरण गुरुतर किए जाने से दशकों मूर्च्छा में रही पीड़ित के प्रति न्याय का उत्तरदायित्व पूरा हो सकेगा? इस जांच-पड़ताल की दरकार भी रहेगी कि घनीभूत सामाजिक पीड़ा के ऐसे अमानवीय प्रकरणों की रोकथाम के लिए सजा से इतर विकल्प हैं भी?

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नर्स अरुणा शानबाग नवंबर 1973 में अपने कार्यस्थल, मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में ड्यूटी के दौरान एक यौनिक हिंसा के बर्बर हमले की शिकार हुई थी। वह दौर था जब यौनिक अपराध का विधि-शास्त्र पुरुषवादी सामाजिकता से संदर्भित हो रहा था। कानून की दुनिया में बलात्कार को मुख्यत: वासना से चालित जघन्य कृत्य माने जाने का चलन था, जबकि समाज की पैनी छानबीन के सामने पीड़ित स्त्री को ही मुंह छिपाना पड़ता था।

घटना के समय अरुणा की शादी तय हो चुकी थी और उसे ‘बदनामी’ से बचाने के नाम पर मेडिकल रिपोर्ट में अप्राकृतिक मैथुन का तथ्य छिपा लिया गया। लिहाजा, अदालत में इस घिनौने कृत्य को यौनिक अपराध की मंशा से हत्या के प्रयास के रूप में ही प्रस्तुत किया जा सका। इससे दोषी को तब के संबंधित कानून के अनुसार अधिकतम सात वर्ष की ही सजा हुई, अन्यथा बेहद गंभीर यौन दुराचार के अपराध में उसे अधिकतम दस वर्ष की सजा मिली होती।

तब से मुंबई में समंदर ने असंख्य ज्वार-भाटा देख लिए हैं। स्त्री-विरुद्ध हिंसा को परखने के विधिक मानदंडों में ही नहीं, सामाजिक नजरिए में भी काफी बदलाव आया है। आज तमाम हल्कों में माना जाता है कि लैंगिक मुद्दों को ढंकना गलत है। उन्हें सार्वजनिक करने से यौनिक हिंसा के अवसरों को सीमित करने की रणनीति पर बेहतर काम किया जा सकता है। इस क्रम में राष्ट्रीय महिला आयोग की स्थापना जनवरी 1992 में हुई और उसी वर्ष बाद में सारे भारतीय समाज को उद्वेलित करने वाला बहुचर्चित भंवरी देवी सामूहिक बलात्कार कांड प्रकाश में आया।

1997 में जाकर इस कांड की पृष्ठभूमि में विशाखा मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने कार्यस्थल पर बढ़ती यौनिक हिंसा को लेकर बाध्यकारी निर्देश जारी किए।

दिसंबर 2012 के निर्भया कांड की राष्ट्रीय शर्म के बाद 2013 में इन निर्देशों को एक कठोर अधिनियम का दर्जा भी मिल गया। इस तरह कार्यस्थल पर यौनिक हिंसा को अलग श्रेणी का अपराध मानने पर मुहर लगी और तद्नुसार सजाएं और प्रक्रियाएं भी कसी गर्इं। ऐसे अपराधों पर मीडिया का ध्यान भी बढ़ता गया है, जो स्वागतयोग्य है।

वहीं दूसरी ओर कार्यस्थल को सुरक्षित बनाने में स्वयं रोजगारदाता की जवाबदेही के अभाव में रोकथाम के उपायों का संस्थागत स्वरूप प्रभावी भूमिका नहीं निभा पा रहा। दरअसल, यौनिक हिंसा की घटनाएं अब भी मुख्यत: पीड़ित और अपराधी के बीच का मामला ही बनी हुई हैं।

यह निर्विवाद रूप से कहा जा सकता है कि शानबाग प्रकरण की बहु-आयामी विरासत मजबूत की जानी चाहिए। वे जिस अस्पताल में काम करती थीं वहां के स्टाफ ने इतने लंबे अरसे तक उनकी बेलाग देखभाल की मिसाल कायम की। जाहिर है, ऐसे मरीज की संभाल कर पाना घर वालों के बस का नहीं रह जाता। लंबे समय तक कोमा में बने रहने के मामले सामने आते ही रहते हैं। क्या उनके लंबे, लगभग अंतहीन, और खर्चीले उपचार का सामाजिक-प्रशासनिक दायित्व तय करने वाला एक उचित कानून नहीं बनना चाहिए?

एक और संबंधित पहलू भी है, जो परिणति की बाट जोह रहा है। सर्वोच्च न्यायालय ने 2011 में इस मामले में इच्छा-मृत्यु की मांग को लेकर दायर की गई पिंकी विरानी की याचिका को खारिज करते हुए भी निष्क्रिय इच्छा-मृत्यु के सवाल को खारिज नहीं किया था। स्वाभाविक है कि शानबाग की त्रासद मृत्यु की परिस्थितियों के संदर्भ में इस विषय पर एक व्यापक कानून बनाने की बहस चली है।

समाज के लिए शानबाग प्रकरण की एक और कहीं अधिक गहरी और व्यापक विरासत भी चिह्नित होनी चाहिए कि यौन हिंसा से निपटने की गुत्थी को लैंगिक उत्पीड़न के व्यापक दायरे में समझना और सुलझाना ही फलदायी होगा। यह तथ्य भी शिद््दत से सामने लाना होगा कि कार्यस्थल पर लैंगिक समता (इक्विटी) के उपायों से वहां यौनिक हिंसा के प्रकरण काफी हद तक रोके जा सकते हैं।

यानी यौनिक हिंसा के प्रश्न को कार्यकारी स्त्री के नजरिए से हल करने की जरूरत है, और ऐसा करने के प्रयास में आज के अपेक्षया लिंग-संवेदी कार्यस्थल निश्चित ही घर या समुदाय के मुकाबले बेहतर मंच साबित हो सकते हैं। कार्यस्थल को महज यौनिक उत्पीड़न के विरुद्ध कानून के दायरे में लाना काफी नहीं, जरूरी है कि उसे घर/समुदाय के लैंगिक शोषण का विस्तार बनने से बचाया जाए। कार्यस्थल पर यौनिक उत्पीड़न के विरुद्ध कानून एक अधूरा कदम है और इसलिए अप्रभावी भी। इसे पूरा करने के लिए कार्यस्थल पर लैंगिक उत्पीड़न की रोकथाम का व्यापक कानून लाना होगा। अनुकूल माहौल के निर्माण में स्वाभाविक रूप से रोजगारदाता की जवाबदेही सर्वाधिक होगी।

कहते हैं घटना के बाद समझदार होना कहीं आसान होता है। लेकिन शानबाग प्रकरण निष्फल नहीं जाना चाहिए। ऐसा कोई प्रावधान भारतीय कानूनों में है ही नहीं कि एक यौन अपराधी, कितना भी जघन्य यौन अपराधी, सजा काटने के बाद कानून की नजरों से ओझल न हो। न उस पर यह पाबंदी है कि वह आगे अपने व्यवहार को नियमित मनोवैज्ञानिक परामर्श से संचालित करे।

वह अपने नए ठिकाने, कार्यस्थल आदि पर सभी संबंधित को अपने ट्रैक रिकॉर्ड से सूचित रखने के लिए भी बाध्य नहीं है। दूसरे शब्दों में एक आदी यौन अपराधी को स्वत: निगरानी और स्व-नियंत्रण की कवायद में लाने की प्रणाली ही नदारद है। लिहाजा, उसे गुमनामी के अंधेरों में स्वयं को खोकर बिना किसी चेतावनी के नए शिकार करने की सुविधा रहती है। कोई नहीं जानता कि शानबाग के हमलावर का किंग एडवर्ड मेमोरियल अस्पताल में आने से पहले का ट्रैक रिकॉर्ड क्या था और सजा काट कर जेल से छूटने के बाद क्या रहा होगा।

कानून की गिरफ्त में आए एक हिंसक यौन-अपराधी के बरक्स सैकड़ों की संख्या में ऐसे छिछोरे यौन अपराध होते हैं जोसार्वजनिक नहीं हो पाते। करनाल के एक पुलिस स्कूल के विद्यार्थियों में मनोवैज्ञानिक विमर्श के दौरान छिछोरी यौन हरकतों के कई मामले प्रकाश में आए। इस बीच प्रमुख दोषी अध्यापक इस्तीफा देकर स्कूल छोड़ चुका था। पता चला कि वह चंडीगढ़ के एक स्कूल में पढ़ाने लगा है।

उन्हें बताने के बाद भी वह महीनों उस स्कूल में लगा रहा, जब तक कि उसके ऐसे ही कारनामे वहां भी सामने नहीं आ गए। अभिभावक ऐसे मामलों की विषम कानूनी प्रक्रियाओं में उलझना नहीं चाहते और दुष्कर्मी को हद से हद ठिकाना बदलना पड़ता है।

पिछले वर्ष करनाल डीपीएस स्कूल के प्रिंसिपल को अध्यापिकाओं से यौन दुर्व्यवहार की शिकायतों के चलते प्रबंधकों ने इस्तीफा देने को कहा। ज्यादा दिन नहीं बीते और वह महज सत्तर किलोमीटर दूर अंबाला के एक और स्कूल में पुन: प्रिंसिपल के पद पर आसीन हुआ मिला। इस दौरान उस पर किसी किस्म की बाह्य निगरानी तो बहुत दूर की बात, उसके लिए आत्म-मंथन की मनोवैज्ञानिक खुराक लेने की बाध्यता भी नहीं रखी गई। जाहिर है, उसके नए प्रबंधकों को इस घटनाक्रम का भान भी न रहा होगा। इन बयालीस सालों में क्या सचमुच कुछ बदला है शानबाग!

कार्यस्थल के इंफ्रास्ट्रक्चर और कार्यविधि-प्रोटोकॉल पर भी एक स्त्री कर्मी के नजरिए से शायद ही सोचा जाता है, हालांकि यौन दुर्व्यवहार के तमाम अवसर इन्हीं के बीच से निकलते हैं।

कार्यस्थल पर इन आयामों को स्त्री के नजरिए से नियोजित करने का मतलब होगा कि परिवार और समुदाय में लादी गई लैंगिक अस्मिता की लतरानियों से स्त्री को कार्यस्थल पर मुक्त रखा जा सकेगा और यह उसके सुरक्षित और शालीन अस्तित्व की बड़ी गारंटी भी होगी। मत भूलिए कि अरुणा शानबाग को अस्पताल के सुनसान तल-घर में घेरा गया था और वह भी एक ऐसे व्यक्ति के द्वारा जिसे वहां होना ही नहीं चाहिए था।

उस अस्पताल प्रबंधन की जिम्मेदारी में यह शामिल था कि उनके तमाम कर्मी लिंग-संवेदी हों। आज तक भी नहीं है; उनके ही नहीं, अन्य अस्पतालों के ही नहीं, बिरला ही कोई प्रबंधन होगा जिसके ध्यान में अपने कर्मियों को समय-समय पर प्रशिक्षण के माध्यम से लिंग-संवेदी प्रमाणित कराना शामिल हो।

कौन नहीं जानता कि परिवारों और समुदायों में स्त्रियां लैंगिक रूप से कमजोर बनाई जाती हैं। स्वाभाविक है कि इस असमानता के समीकरण से नत्थी हुए ही उनका कार्यस्थल पर पदार्पण होता है। महज यह तथ्य कि कार्य के एवज में स्त्रियां भी पुरुषों के सदृश वेतन पा रही हैं, उन्हें लैंगिक रूप से पुरुषों के समान नहीं कर देता। ऐसे में उन्हें कार्यस्थल पर पुरुष समानता के मानदंडों से हांकने का मतलब असमान के शोषण को उकसावा देना होगा।

लिहाजा, स्त्रियां एक ऐसे समता (इक्विटी) मूलक कार्यस्थल की हकदार हैं, जो उनकी सुरक्षा और शालीनता की गारंटी देने में समर्थ हो। इसके लिए कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से सुरक्षा के वर्तमान एक-आयामी कानून के स्थान पर लैंगिक उत्पीड़न से सुरक्षा के बहु-आयामी कानून की दरकार है, जिसके कार्यान्वयन की जवाबदेही मुख्यत: रोजगारदाता पर आयद करनी होगी। शायद तब हम यह आशा कर सकें कि हमने अरुणा शानबाग की विरासत को निभाने की दिशा में एक सार्थक कदम उठाया है।

विकास नारायण राय

 

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