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राजनीतिः रस्म अदायगी बनाम चुनौती

पर्यावरण संरक्षण की बातें अकसर बड़े गोल-मटोल ढंग से होती हैं, मानो उपदेश देने से ही समस्या दूर हो जाएगी। सच तो यह है कि पर्यावरण का बिगाड़ करने वाली नीतियों और निहित स्वार्थों से जब तक हम नहीं टकराएंगे, पर्यावरण संरक्षण की बात करना बेमानी होगा। इस चुनौती को स्वीकार करना ही होगा, वरना पर्यावरण संरक्षण का तकाजा शब्दों की जुगाली और कुछ दिखावटी कार्यक्रमों तक सीमित होकर रह जाएगा।

दुनिया के सबसे अधिक चौदह प्रदूषित शहर भारत के हैं। हमारे शहरों का वातावरण तेजी से प्रदूषित होता जा रहा है। इससे बीमारियां बढ़ रही हैं।

विश्व पर्यावरण दिवस की शुरुआत 1972 में 5 जून से 16 जून तक संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा आयोजित विश्व पर्यावरण सम्मेलन से हुई। 5 जून 1973 को पहला विश्व पर्यावरण दिवस मनाया गया था। इस अभियान की शुरुआत दुनिया भर के लोगों के बीच पर्यावरणीय मुद्दों के बारे में जागरूकता लाने के साथ ही पर्यावरण के लिए सकारात्मक कदम उठाने के लिए की गई। अब पर्यावरण और भी बड़ा मसला है जिसके बारे में सभी को सजगहोना चाहिए। पिछले दिनों प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने रेडियो पर अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम के 44वें संस्करण में विश्व पर्यावरण दिवस के बारे में बताते हुए कहा कि इस बार विश्व पर्यावरण सम्मेलन का आयोजन भारत में हो रहा है।

हमें प्रकृति में हो रहे नकारात्मक बदलाव को रोकने की जिम्मेदारी लेनी है। इस आयोजन के माध्यम से भारत का मकसद दुनिया को यह संदेश देना है कि पर्यावरण दिवस पर पेड़ लगाने जैसे सांकेतिक काम करने के बजाय इसे प्रदूषण फैलाने वाली लोगों की सामान्य आदतों में बदलाव से जोड़ कर एक बड़ा जन आंदोलन बनाना है। इस दौरान प्रधानमंत्री ने जनता से प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करने का अनुरोध भी किया। उन्होंने कहा कि जब भीषण गर्मी होती है, बाढ़ आती है, बारिश नहीं थमती है, असहनीय ठंड पड़ती है तो हर कोई विशेषज्ञ बन करग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन की बातें करता है, लेकिन बातें करने से बात बनती है क्या? प्रकृति के प्रति संवेदनशील होना, प्रकृति की रक्षा करना, यह हमारा सहज स्वभाव होना चाहिए, हमारे संस्कारों में होना चाहिए।

इस बार विश्व पर्यावरण दिवस की थीम है प्लास्टिक प्रदूषण को हराना (बीट प्लास्टिक पॉल्यूशन)। इस थीम के भाव को, इसके महत्त्व को समझते हुए हम सबको यह सुनिश्चित करना चाहिए कि हम घटिया पॉलीथीन व प्लास्टिक का इस्तेमाल नहीं करेंगे। हम प्लास्टिक प्रदूषण को कम करने का प्रयास करेंगे, क्योंकि इससे हमारी प्रकृति पर, वन्य जीवन पर और हमारे स्वास्थ्य पर नकारात्मक असर पड़ता है। हमें प्रकृति के साथ सद्भाव के साथ जुड़ कर रहना है। इस पर्यावरण दिवस पर हम सब इस बारे में सोचें कि हम अपनी धरती को स्वच्छ और हरित बनाने के लिए क्या कर सकते हैं? किस तरह इस दिशा में आगे बढ़ सकते हैं? क्या नया कर सकते हैं?

अब समय आ गया है कि हम पौधारोपण पर ध्यान केंद्रित करें। सिर्फ पौधारोपण करने से कुछ नहीं होगा जब तक हम यह सुनिश्चित नहीं कर लेते कि हम उस पौधे के पेड़ बनने तक उसकी देखभाल करेंगे। विश्व पर्यावरण दिवस मनाने का मुख्य उद्देश्य पर्यावरण संरक्षण के दूसरे तरीकों सहित बाढ़ से बचाने, सौर-स्रोतों के माध्यम से ऊर्जा उत्पादन, नए जल निकासी तंत्र का विकास करना, जंगल प्रबंधन पर ध्यान देना, ग्रीनहाउस गैसों का प्रभाव घटाना, पेड़ लगाना व बायो-र्इंधन के उत्पादन को प्रोत्साहित करना है। इस सम्मेलन का उद्देश्य सभी देशों के लोगों को एक साथ लाकर जलवायु परिवर्तन से मुकाबला करना और जंगलों के प्रबंध को सुधारना है। पृथ्वी को बचाने के लिए आयोजित इस उत्सव में सभी आयु वर्ग के लोगों को सक्रियता से शामिल करना होगा। तेजी से बढ़ते शहरीकरण व पेड़ों की लगातार कटाई के कारण पर्यावरण संतुलन तेजी से बिगड़ता गया है। इस पर रोक लगानी होगी।

आज दुनिया में पर्यावरण को सबसे ज्यादा नुकसान प्लास्टिक पहुंचा रहा है। प्लास्टिक से बनी पॉलीथीन की थैलियों को खाने से प्रतिवर्ष लाखों पशु मौत के मुंह में समा जाते हैं। पहले लोग पॉलीथीन की थैलियों का प्रयोग नहीं करते थे। लोग बाजार से सामान खरीदने जाते तो घर से कपड़े या जूट से बना थैला साथ लेकर जाते थे। दुकानों पर भी पॉलीथीन की थैली के स्थान पर कागज से बने थैलों, ठोंगों में सामान डाल कर दिया जाता था। ग्रामीण घरों में महिलाओं द्वारा अमूमन घर के रद्दी कागजों को एकत्रित कर उनकी लुगदी से दैनिक उपयोग में काम आने वाले बर्तन बनाए जाते थे। घर में कागज से बनाए गए बर्तनों में दैनिक उपयोग का सामान रखा जाता था, जिनसे पर्यावरण को कोई नुकसान नहीं होता था।

पुराने समय में पर्यावरण को सुरक्षित रखने के लिए पेड़ लगाने पर सबसे अधिक जोर रहता था। पेड़ों की रक्षा के लिए बड़े-बुजुर्ग बच्चों को उनसे संबंधित किस्से-कहानियां सुनाया करते थे। पेड़ों को देवताओं के समान दर्जा दिया जाता था ताकि उन्हें कटने से बचाया जा सके। बड़-पीपल जैसे छायादार पेड़ों को काटने से रोकने के लिए उनकी देवताओं के रूप में पूजा की जाती रही है। इसी कारण आज भी लोग बड़ व पीपल का पेड़ नहीं काटते हैं। तुलसी का पौधा पर्यावरण के लिए सबसे अधिक उपयोगी माना गया है, इसलिए तुलसी का पौधा मंदिरों व घर-घर में लगाया जाता है। पहले के समय में गांवों में कुआं बनाते समय कुएं के पास एक छायादार पेड़ देवता के नाम पर लगाया जाता था जिसे काटना वर्जित था। उसका उद्देश्य था कि गर्मी में उस कुएं पर पानी पीने आने वाला राहगीर कुछ देर पेड़ की शीतल छाया में विश्राम कर सके। पहले लोगों ने पर्यावरण को बचाने के लिए नदी को मां का दर्जा दिया तो तालाब, कुआं, बावड़ी, जोहड़ को धार्मिक रीति-रिवाजों से जोड़ कर विभिन्न शुभ कार्यों में उनकी पूजा करने लगे। ऐसा करने का मकसद एक ही था कि लोग धार्मिक मान्यता के चलते उनमें गंदगी डाल कर उन्हें प्रदूषित न करें।

बंगाल में तो आज भी दैनिक उपयोग में प्लास्टिक के बजाय मिट्टी से बने बर्तनों का अधिक उपयोग होता है। इससे पर्यावरण भी नहीं बिगड़ता, साथ ही, मिट्टी के बर्तन बनाने से लोगों को स्थानीय स्तर पर रोजगार भी मिलता है। मिट्टी से बने बर्तनों को उपयोग के बाद मिट्टी में डाल देने से वे कुछ समय में पुन: मिट्टी बन जाते हैं। जबकि प्लास्टिक से बना सामान जल्दी नष्ट नहीं होता है, जिससे उत्पन्न प्रदूषण का खमियाजा पशु, पक्षी, मनुष्य सहित पूरी पृथ्वी को उठाना पड़ता है। प्रत्येक वर्ष पूरी दुनिया में 500 अरब प्लास्टिक बैगों का उपयोग किया जाता है। हर वर्ष कम से कम 800 टन प्लास्टिक महासागरों में पहुंचता है, जो प्रति मिनट एक कूड़े से भरे ट्रक के बराबर है। हमारे द्वारा उत्पन्न किए गए कुल कचरे में दस प्रतिशत योगदान प्लास्टिक के कचरे का होता है।

दुनिया के सबसे अधिक चौदह प्रदूषित शहर भारत के हैं। हमारे शहरों का वातावरण तेजी से प्रदूषित होता जा रहा है। इससे बीमारियां बढ़ रही हैं। हमें इस सिलसिले को रोकना होगा, साथ ही उनके प्रदूषण को कम से कम करने के प्रयास करने होंगे। हमें विश्व पर्यावरण दिवस पर आमजन को भागीदार बना कर उन्हें इस बात का अहसास कराना होगा कि बिगड़ते पर्यावरण का खमियाजा हमें व हमारी आने वाली पीढ़ियों को भुगतना पड़ेगा। पर्यावरण संरक्षण की बातें अकसर बड़े गोल-मटोल ढंग से होती हैं, मानो उपदेश देने से ही समस्या दूर हो जाएगी। सच तो यह है कि पर्यावरण का बिगाड़ करने वाली नीतियों और निहित स्वार्थों से जब तक हम नहीं टकराएंगे, पर्यावरण संरक्षण की बात करना बेमानी होगा। इस चुनौती को स्वीकार करना ही होगा, वरना पर्यावरण संरक्षण का तकाजा शब्दों की जुगाली और कुछ दिखावटी कार्यक्रमों तक सीमित होकर रह जाएगा। एक नए संकल्प के साथ यह दिवस उत्सव मनाया जाए, तभी इसे मनाना सार्थक होगा।

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