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राजनीतिः पानी का यक्ष प्रश्न

केवल प्रकृति है, जो पानी पैदा कर सकती है, और इसलिए बहुत जरूरी है कि हम पानी के महत्त्व को समझें और उसका संरक्षण करें। जब हमें पानी के संरक्षण की अहमियत का अहसास हो जाएगा, हमें यह भी समझ आ जाएगी कि परंपरागत जलस्रोतों की उपेक्षा कर कोई भी समाज पानी के संरक्षण के अपने दायित्व को कभी नहीं निभा सकेगा।

Author April 28, 2016 2:24 AM
(Fle Photo)

पिछले दिनों देश के विभिन्न भागों से ऐसे बहुत-से समाचार आए हैं जो पेयजल संकट की गंभीरता को दर्शाते हैं। केंद्रीय मंत्री रामविलास पासवान ने दिल्ली जल बोर्ड के एक कार्यक्रम में इस बात पर चिंता जताई कि दिल्ली के अधिकांश हिस्सों में पानी पीने लायक नहीं बचा। महाराष्ट्र के लातूर में जल संकट के कारण पानी की आपूर्ति करने वाले टैंकरों के आसपास परस्पर संघर्ष को रोकने के लिए वहां के कलेक्टर को धारा 144 लगानी पड़ी। नांदेड़ में पानी की कमी के कारण अस्पताल प्रशासन मरीजों के जरूरी आॅपरेशन तक टाल रहा है। चंडीगढ़ में प्रशासन ने यह फैसला लिया है कि कोई व्यक्ति सुबह कार धोता हुआ पाया गया तो उस पर दो हजार रुपए का जुर्माना लगाया जाएगा।

मध्यप्रदेश के टीकमगढ़ में एक नहर की रखवाली के लिए बंदूकधारी सुरक्षाकर्मियों को तैनात किया गया है। डिंडौरी के आसपास लोग अपनी जरूरत का पानी पाने के लिए जान जोखिम में डाल कर उन गहरे कुओं में उतर रहे हैं जिनकी तलछट में थोड़ा-सा पानी शेष है और शिमला में पर्यटकों को एक बालटी पानी पाने के लिए सौ रुपए का भुगतान करना पड़ रहा है। यह तो पानी की कमी से जूझ रहे लोगों की परेशानियों का एक आईना भर है। लेकिन यदि गरमी के मौसम की शुरुआत में ही यह हाल है तो आने वाले दिन कितने तकलीफदेह हो सकते हैं, इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है।

दुनिया का दो तिहाई से ज्यादा हिस्सा पानी है, फिर भी कुछ चिंतकों में यह आशंका है कि अगले महायुद्ध का कारण पानी भी हो सकता है। प्रथम दृष्टया यह बात कुछ आश्चर्यजनक लग सकती है, लेकिन हम जानते हैं कि दुनिया में मौजूद कुल पानी का तीन प्रतिशत ही मनुष्यों के लिए उपयोगी है। हमारे पूर्वज इस सत्य को पहचानते थे और इसीलिए रहीम जैसे कवि ने हमें सीख दी थी-‘रहीमन पानी राखिए, बिन पानी सब सून/ पानी गए न ऊबरै, मोती-मानुष-चून।’ श्रीकृष्ण ने कहा था कि वाणी और पानी, दोनों का दुरूपयोग करने वाले सभ्यता, समय और समाज के शत्रु होते हैं। लेकिन श्रीकृष्ण को पूजने वाले हम लोगों ने ही पानी के दुरूपयोग को न केवल अपनी आदत बना लिया है, बल्कि पानी के परंपरागत स्रोतों को भी उपेक्षा के अंधेरे में धकेल कर असमय दम तोड़ने पर विवश कर दिया है।

स्थिति को समझने के लिए राजस्थान के उस कोटा नगर की कहानी को लिया जा सकता है, जिसे सदासलिला कही जाने वाली चंबल का वरदान प्राप्त है। सदासलिला अर्थात ऐसी नदी जिसमें साल के बारह महीनों पानी का प्रवाह कायम रहे। चंबल को पिछले दिनों केंद्र सरकार द्वारा जारी एक सर्वेक्षण रिपोर्ट में देश की सर्वाधिक प्रदूषित नदियों में एक माना गया है। कई स्थानों पर चंबल के पानी में मौजूद जहरीले तत्त्वों की मात्रा इतनी पाई गई है कि उस पानी का उपयोग स्वस्थ व्यक्ति के लिए नुकसानदेहहो सकता है। लेकिन चंबल के प्रदूषण से भी अधिक एक और तथ्य है, जो बताता है कि तथाकथित विकास की अंधी दौड़ में बने रहने के लिए हमने भविष्य की जरूरतों को किस तरह अनदेखा किया है।

कोटा शहर हाड़ौती के उस पठार के सबसे निचले स्थल पर बसा है, जिस पठार को भौगोलिक दृष्टि से प्रसिद्ध गोंडवाना पठार का ही एक हिस्सा माना जाता है। एक स्वतंत्र रियासत के रूप में मान्यता मिलने से पहले कोटा राजस्थान की एक अन्य रियासत बूंदी का ही शासित प्रदेश था। पठार के ऊपरी हिस्से में बरसने वाला पानी गुरुत्वाकर्षण के सहज प्रभाव के कारण तेजी से नीचे की ओर दौड़ता था। हालांकि चौदहवीं सदी तक कोटा शहर की बसावट बहुत घनी नहीं थी लेकिन पठार के ऊपरी हिस्से से बह कर आने वाले पानी द्वारा निचले पठार पर बसी बस्तियों को नुकसान पहुंचाने की संभावनाएं तो रहती ही थीं। ऐसे में 1346 में बूंदी के राजकुमार धीरदेह ने पूरे पठार पर कुल तेरह विशाल तालाब बनवाए। ये तालाब न केवल वर्षा ऋतु में पठार पर गिरने वाले पानी का संग्रहण कर निचली बस्तियों को नुकसान से बचाने का काम करते थे, बल्कि आसपास के गांवों में बसे लोगों को उनकी जरूरत का पानी मुहैया भी कराते थे।

इन तालाबों का एक बड़ा योगदान यह भी होता था कि ये धरती की प्यास के समीकरणों को साध कर भूमिगत जलस्तर को बनाए रखते थे। लेकिन पहले औद्योगीकरण और फिर कोचिंग की प्रतिष्ठा के कारण जब रिहायशी इमारतों की जरूरत बढ़ी तो राजकुमार धीरदेह द्वारा बनवाए गए अधिकांश तालाबों को मनमाने तरीके से पाट कर कॉलोनियां या भव्य बाजार खड़े कर दिये गए। अब हालत यह है कि चंबल के किनारे बसा होने के बावजूद कोटा और उसके आसपास का भूमिगत जलस्तर तेजी से गिर रहा है। जब तालाबों तक को पाट कर मकान बना दिए गए हों, तो प्राचीन कुंडों और कुओं का क्या हाल हुआ होगा, इसका अनुमान आसानी से लगाया जा सकता है। और यह सब उस समाज में हो रहा है, जहां आज भी शुभ प्रसंगों पर कुआं पूजन की रस्म बहुत धूमधाम से मनाई जाती है।

पानी के बिना जीवन कैसा होता है, यह उन भूभागों के निवासियों से पूछिए, जहां अपनी जरूरत भर का पानी जुटाने के लिए लोगों को कड़ा श्रम करना होता है। देश के जो हिस्से परंपरागत रूप से जल संकट का सामना करते रहे हैं, उन हिस्सों में पानी की एक एक बूंद को बचा कर रखने या सहेजने के लिए जो चेतना पाई जाती है, हमें उस चेतना को अपने स्वभाव का अंग बनाना होगा। हमारे परंपरागत जलस्रोत आज भी प्रासंगिक बने हुए हैं। उन इलाकों में आज भी कुओं, कुंडों, तालाबों, जोहड़ों और टांकों का अस्तित्व समाज को जरूरत भर का पानी उपलब्ध कराने का आश्वासन देता है। जिन इलाकों में जलसंकट नहीं है वहां भी हमारे परंपरागत जलस्रोत वर्षा के जल को सहेज कर भूमिगत जल-स्तर को कायम रखने में मदद करते हैं। शायद यही कारण है कि प्राचीन काल में तालाब, कुएं, कुंड, बावड़ी, जोहड़ या टांके बनवाना बहुत पुण्यदायी कार्य माना जाता था। पुण्य वही तो होता है, जो हमारे जीवन को अयाचित और अनपेक्षित संकटों से बचाता है।

परंपरागत जलस्रोतों के प्रति हमारी बेरुखी हमें किस-किस तरह के संकट की ओर धकेल सकती है, इसका हम उन संकटों से गुजरे बिना अनुमान भी नहीं लगा सकते। चंडीगढ़ में सुबह कार धोए जाने पर जुर्माने का प्रावधान या टीकमगढ़ में एक नहर की हथियारबंद रखवाली तो उन संकटों की ओर इशारा भर करते हैं, जो संकट सामान्य जीवन को और दूभर कर सकते हैं। क्या आप विश्वास करेंगे इस तथ्य पर कि बुंदेलखंड में ही कई गांव ऐसे हैं जहां लड़कों की शादी इसलिए नहीं हो पा रही है क्योंकि गांव में उपलब्ध जलस्रोत कुछ बरस पहले सूख गए और गांव की महिलाओं को जरूरत भर का पानी जुटाने के लिए तीन किलोमीटर दूर जाना पड़ता है। कोई भी पिता अपनी संतति को ऐसे संघर्षों के चक्रव्यूह में नहीं धकेलना चाहता, जिनके समाधान की संभावना भी दूर-दूर तक दृष्टिगोचर नहीं होती।

उत्तर प्रदेश के मेरठ, सहारनपुर, बागपत, मुजफ्फरनगर, शामली और गाजियाबाद जिलों में प्रदूषित भूजल के उपयोग के कारण लोगों के मारे जाने की खबरें आई हैं। बागपत जिले में हिंडन और कृष्णा नदी के किनारे बसी बस्तियों में हैंडपंप और भूजल के अस्सी नमूने लिये गए जिनमें से सतहत्तर नमूनों में प्रदूषण की मात्रा खतरनाक पाई गई है। मध्यप्रदेश के छतरपुर में लोग शाम होते ही घर छोड़ देते हैं और कई किलोमीटर का सफर तय करके एक पहाड़ से गिरने वाली जलधार से बूंद-बूंद पानी इकट्ठा कर सुबह घर लौटते हैं। जल संकट स्थायी विस्थापन का और खाद्य संकट का भी रूप ले सकता है।

तेलंगाना के कुछ हिस्सों में चार सौ फुट गहरी खुदाई के बाद भी पानी इतना ही आता है कि आधा घंटा मोटर चलाने के बाद आधी बालटी पानी भर सकें। जिन शहरों में जल की उपलब्धता का स्तर अभी भयावह नहीं हुआ है, वहां भी पानी के दुरुपयोग और अपव्यय पर समय रहते रोक नहीं लगाई गई तो संकट की छाया को कितने दिन टाला जा सकेगा यह सवाल महत्त्वपूर्ण हो गया है। ऐसे में जबकि आबादी का एक बड़ा हिस्सा जरूरत भर पानी जुटाने के लिए कठिन श्रम कर रहा है, हम यदि विलासिता पर ही पानी खर्च कर देंगे तो समय हमारे अपराध को कभी भी अनदेखा नहीं करेगा।

पानी का रासायनिक सूत्र भले ही हमें पता हो, लेकिन दुनिया की किसी भी प्रयोगशाला में हाइड्रोजन के दो अणु और आॅक्सीजन के एक अणु की परस्पर क्रिया से पानी का उत्पादन संभव नहीं हो सका है। केवल प्रकृति है, जो पानी पैदा कर सकती है, और इसलिए बहुत जरूरी है कि हम पानी के महत्त्व को समझें और उसका संरक्षण करें। यह धरती की सबसे मूल्यवान धरोहर है। जब हमें पानी के संरक्षण की अहमियत का अहसास हो जाएगा, हमें यह बात भी समझ में आ जाएगी कि परंपरागत जलस्रोतों की उपेक्षा कर कोई भी समाज पानी के संरक्षण के अपने दायित्व को कभी नहीं निभा सकेगा।

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