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राजनीतिः शरणार्थी संकट और सवाल

आज दक्षिण एशिया में शरणार्थी संकट बढ़ता जा रहा है। ऐसे में यदि भारत ने रोहिंग्या का साथ दिया तो किसी न किसी रूप में उस पर तमिलों, मधेसियों, चकमा लोगों को भी सुरक्षा देने का दबाव पड़ेगा। ऐसे में भारत के राष्ट्रीय हित प्रभावित होंगे। इन सब बातों को ध्यान में रख कर ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संधि,1951 पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत अपनी आंतरिक सुरक्षा के प्रति सजग है।

Author Published on: August 6, 2019 2:07 AM
अमेरिका ने रोहिंग्या शरणार्थियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप में म्यांमा के सैन्य बलों के कमांडर इन चीफ जनरल मिन आंग हलाइंग पर प्रतिबंध लगा दिया है। (Photo- Reuters)

विवेक ओझा

रूसो का कहना था कि इंसान स्वतंत्र रूप से पैदा हुआ है लेकिन हर जगह वह जंजीरों में जकड़ा हुआ है। शरणार्थी संकट, मानव तस्करी, नशीले पदार्थों की तस्करी आदि अमानवीय गतिविधियां ऐसी ही जंजीरें हैं। हाल में अमेरिका ने रोहिंग्या शरणार्थियों के मानवाधिकारों के उल्लंघन के आरोप में म्यांमा के सैन्य बलों के कमांडर इन चीफ जनरल मिन आंग हलाइंग पर प्रतिबंध लगा दिया है। इसके साथ ही दो और वरिष्ठ कमांडरों और उनके परिवार के सदस्यों के अमेरिका आने पर प्रतिबंध लगाया गया है। अमेरिका का कहना है कि इन फौजी अफसरों ने नियम-कानूनों और मानवाधिकारों को ताक पर रख कर रोहिंग्या शरणार्थियों को मौत के घाट उतरवाया है। अमेरिका ने इस बात पर भी नाराजगी जताई कि म्यांमा सरकार ने रोहिंग्या मुसलमानों के साथ अत्याचार करने वालों के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की, बल्कि ऐसे लोगों को बचाने का ही काम किया है।

हाल में धार्मिक स्वतंत्रता पर अंतरराष्ट्रीय मंत्रिस्तरीय सम्मेलन का आयोजन अमेरिका द्वारा किया गया। इस सम्मेलन के पहले ही दिन अमेरिका ने घोषणा की कि वह म्यांमा के सैन्य कमांडरों पर प्रतिबंध लगा रहा है। गौरतलब है कि इस सम्मेलन में रोहिंग्या प्रतिनिधियों ने भी हिस्सा लिया था। इस घोषणा के साथ ही अमेरिका की सरकार पहली सरकार बन गई है जिसने सार्वजनिक स्तर पर म्यांमा सेना के अधिकारियों पर प्रतिबंध लगा दिया है। रोहिंग्या मुख्य रूप से एक मुसलिम समुदाय के लोग हैं जो अधिकतर पश्चिमी म्यांमा के रखाइन प्रांत में रहते हैं। इस प्रांत की राजधानी सितवे है जहां भारत ने विशेष आर्थिक क्षेत्र बना रखा है। रोहिंग्या वहां पर आमतौर पर बोली जाने वाली बर्मीज भाषा की जगह बंगाली भाषा की एक बोली बोलते हैं। हालांकि ये रोहिंग्या म्यांमा में सदियों से रह रहे हैं लेकिन म्यांमा का मानना है कि ये वे लोग हैं जो म्यांमा में वहां के उपनिवेशीय शासन के दौरान आए थे। इसलिए म्यांमा सरकार ने रोहिंग्या समुदाय को अभी तक पूर्ण नागरिकता का दर्जा नहीं दिया है। बर्मा का नागरिकता कानून कहता है कि एक नृजातीय अल्पसंख्यक समुदाय के रूप में एक रोहिंग्या म्यांमा की नागरिकता पाने योग्य तभी होगा जब महिला या पुरुष रोहिंग्या इस बात का सबूत दे कि उसके पूर्वजों ने म्यांमा में वर्ष 1823 के पहले निवास किया था, अन्यथा उन्हें निवासी विदेशी या फिर सहवर्ती नागरिक (एसोसिएट सिटीजन) माना जाएगा, भले उनके अभिभावक में से कोई एक म्यांमा के नागरिक हों। चूंकि रोहिंग्या मुसलमानों को नागरिकता का दर्जा नहीं मिला है, इसलिए उन्हें वहां बुनियादी सुविधाओं से वंचित रखा गया है। वे म्यांमा की प्रशासनिक सेवा के भी अंग नहीं बन सकते, वे भाषायी शोषण के शिकार हैं। एमनेस्टी इंटरनेशनल ने इसी साल जून में अपनी रिपोर्ट में बताया है कि म्यांमा के सैनिक रोहिंग्या महिलाओं के साथ बलात्कार कर रहे हैं और सैन्य बलों ने वरिष्ठ नागरिकों और बच्चों तक को नहीं बख्शा है। रखाइन प्रांत में उनके आवाजाही पर भी पाबंदियां लगा दी गई हैं।

आज रोहिंग्या मुद्दे पर म्यांमा, बांग्लादेश और भारत आमने-सामने क्यों हैं, इसे जानने के लिए रोहिंग्या समुदाय के इतिहास पर गौर करना होगा। आठवीं शताब्दी में रोहिंग्या एक स्वतंत्र साम्राज्य अराकान में रहते थे, जिसे आज रखाइन कहा जाता है। नौवीं से चौदहवीं शताब्दी के बीच रोहिंग्या समुदाय अरब व्यापारियों के जरिए इस्लाम के संपर्क में आया और अराकान और बंगाल के बीच मजबूत संबंध विकसित हुए। सन 1784 में बर्मा (आधुनिक म्यांमा) के राजा ने स्वतंत्र अराकान पर कब्जा कर लिया और हजारों शरणार्थी (जिन्हें आज रोहिंग्या कहा जाता है) बंगाल भाग गए। 1790 में हिरम कॉक्स नामक ब्रिटिश राजनयिक को इन शरणार्थियों की मदद के लिए भेजा जिसने बांग्लादेश में कॉक्स बाजार शहर का निर्माण किया। आज भी वहां खासी तादाद में रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं। कालांतर में ब्रिटेन ने बर्मा पर कब्जा कर लिया और उसे म्यांमा के रूप में ब्रिटिश भारत का प्रांत बनाया। बर्मा से श्रमिकों ने ब्रिटिश भारत के कई भागों में काम-धंधे की तलाश में पलायन किया और इस तरह रोहिंग्या भारत से भी जुड़ गए। 1942 में जापान ने बर्मा पर हमला किया और वहां से अंग्रेजों को निकाल दिया। जैसे ही अंग्रेजों ने जवाबी कार्रवाई की, बर्मा के राष्ट्रवादियों ने मुसलिम समुदायों पर हमले शुरू कर दिए। नतीजा यह हुआ कि 1948 में बर्मा की नई सरकार और रोहिंग्या लोगों के बीच तनाव बढ़ गया। बहुत से रोहिंग्या चाहते थे कि अराकान मुसलिम बहुमत वाले पाकिस्तान में मिल जाए। इस पर बर्मा सरकार ने रोहिंग्या लोगों को देश निकाला दे दिया और सिविल सैनिक के रूप में नियुक्त रोहिंग्या बर्खास्त कर दिए गए। पचास के दशक में रोहिंग्या समुदाय ने मुजाहिद नाम वाले सशस्त्र समूह के जरिए बर्मा सरकार का प्रतिकार करना शुरू किया। 1962 में अंतत: जनरल नी विन सत्ता में आए और रोहिंग्या लोगों के खिलाफ कठोर नीति अपनाई गई। 1977 में बर्मा की सैन्य सरकार- जुंटा ने रोहिंग्या की आबादी और क्षेत्रों का पता लगाने के लिए कई बड़े अभियान छेड़े और दो लाख रोहिंग्या लोगों को बांग्लादेश भागना पड़ा।

साल 1989 में बर्मा का नाम बदल कर म्यांमा कर दिया। 1991 में ढाई लाख रोहिंग्या लोगों को म्यांमा छोड़ कर भागना पड़ा । बाद में बांग्लादेश के साथ एक प्रत्यावर्तन समझौते के जरिए 1992 से 1997 के बीच दो लाख से ज्यादा रोहिंग्या रखाईन क्षेत्र में पहुंचे। यहां आने के बाद इनका रखाईन के बौद्धों से संघर्ष शुरू हो गया। चूंकि ये मुसलमान थे और बौद्धों के अधिकारों के सामने मुसीबत के रूप में थे। सन 2012 में दोनों समुदायों के बीच खूनी संघर्ष में सौ लोग मारे गए, जिसमें अधिकांश रोहिंग्या थे। इस घठना के बाद हजारों रोहिंग्या फिर बांग्लादेश भागे। वर्ष 2016 में रोहिंग्या मुसलिम समूह हाराकाह अल यकीन ने म्यांमा में बॉर्डर गार्ड पोस्ट्स पर हमला कर नौ सैनिकों को मार दिया। इसके बाद म्यांमा की सेना ने दमन शुरू किया और फिर हजारों रोहिंग्या बांग्लादेश की शरण में पहुंचे।

भारत के गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार भारत में लगभग चालीस हजार रोहिंग्या शरणार्थी रहते हैं। ये बांग्लादेश से भारत पहुंचे हैं। भारत सभी रोहिंग्या शरणार्थियों को अवैध प्रवासी मानता है और इन्हें इनके मूल देश वापस भेजने के लिए प्रभावी प्रत्यावर्तन समझौते की तलाश में है। आज दक्षिण एशिया में शरणार्थी संकट बढ़ता जा रहा है। ऐसे में यदि भारत ने रोहिंग्या का साथ दिया तो किसी न किसी रूप में उस पर तमिलों, मधेसियों, चकमा लोगों को भी सुरक्षा देने का दबाव पड़ेगा। ऐसे में भारत के राष्ट्रीय हित प्रभावित होंगे। इन सब बातों को ध्यान में रख कर ही भारत ने संयुक्त राष्ट्र शरणार्थी संधि,1951 पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। भारत अपनी आंतरिक सुरक्षा के प्रति सजग है। भारत ने असम में भारी तादाद में बांग्लादेश से आए चमका शरणार्थियों और उनसे पैदा होने वाली चुनौतियों को काफी झेला है। रोहिंग्या के संदर्भ में सुरक्षा संबंध का एक अलग और बड़ा आयाम है। इस संकट में तीन राष्ट्रों के हित प्रभावित हैं और द्विपक्षीय संबंधों में तनाव न उभरने देने के लिए यह जरूरी है कि भारत रोहिंग्या के प्रत्यावर्तन पर ठोस कदम उठाए। सवाल है कि रोहिंग्या कब तक परदेश में रहेंगे। भारत सरकार ने अगले पांच वर्षों में ढाई करोड़ डॉलर के निवेश की प्रतिबद्धता के साथ हाल ही में म्यांमा में रोहिंग्या लोगों के लिए ढाई सौ घर भी दिए हैं। भारत इस समस्या का समाधान इसी प्रकार के तरीकों से करना चाहता है।

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