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बेबाक बोलः पंच परमेश्वर- बागी बयार

खेतों में हरियाली क्रांति और कारखाने का चलता चक्का। पूंजी और पसीने के मेल ने पंजाब की एक खुशहाल जमीन तैयार की जो बाद में यश चोपड़ा के पीले सरसों वाले खेतों के जरिए एक मिथ भी बन गया। लंबे समय तक आतंकवाद और उसके बरक्स खड़ी हुई पहचान की राजनीति के बाद खेतों और […]

Author Published on: February 4, 2017 2:41 AM

खेतों में हरियाली क्रांति और कारखाने का चलता चक्का। पूंजी और पसीने के मेल ने पंजाब की एक खुशहाल जमीन तैयार की जो बाद में यश चोपड़ा के पीले सरसों वाले खेतों के जरिए एक मिथ भी बन गया। लंबे समय तक आतंकवाद और उसके बरक्स खड़ी हुई पहचान की राजनीति के बाद खेतों और
कल-कारखाने वाले इस राज्य से जमीन और नशे के माफिया की सत्ता से गठजोड़ की कहानी सामने आने लगी। फिलहाल तो नोटबंदी की मार झेल चुके और बैंकों के बाहर लंबी कतार में खड़े होकर थक चुके इस राज्य के किसान और मजदूर भी आज मतदान केंद्रों के बाहर कतारबद्ध होंगे। मेहनतकश और प्रयोगधर्मी इस मिट्टी का मिजाज इस बार किधर जाता है इसी की पड़ताल करने की कोशिश करता बेबाक बोल।

बासंती बयार, सरसों के लहलहाते पीले खेतों के बीच भी पंजाब का मौसम बहुत रुमानी नहीं है। बठिंडा में अकाली दल के पितामह बागी बयार को लेकर जितने बेफिक्रे दिखाई देते हैं, वह उनकी जांबाजी ही दिखाती है। कांग्रेस के कप्तान और आप के अगुआ ने इस प्रयोगधर्मी मिट्टी से जो आस जगा रखी है वह भी बेमानी नहीं है।
ठीक दो दशक पहले 1997 में जब पंजाब में प्रकाश सिंह बादल ने अपनी सरकार बनाई तो उस समय नौकरशाही में कांग्रेस के नियुक्त अफसरों का बोलबाला था। उनसे सवाल किया गया कि हर सरकार सत्ता में आने के बाद अफसरों की थोक में बदलियां करती है तो क्या वे भी करेंगे? बादल ने वैसी ही बेफ्रिकी से जवाब दिया जैसा अब देते हैं, ‘क्यों बई? इनका क्या है? आज से ये सब मेरे हो जाएंगे’।
उम्र में नब्बे के आंकड़े से महज कुछ ही महीने दूर बादल की वैसी ही बेफिक्री और बेलौस अंदाज-ए-बयां आज भी कायम है। क्रिकेट से राजनीति में आए नवजोत सिंह सिद्धू चाहे आम आदमी पार्टी के इश्क में गिरफ्तार हो जाएं या कांग्रेस की गलबहियां डालें। बादल की बला से। एक झटके में कहते हैं, ‘छड्डो जी, कुछ नहीं इन्हां दे पल्ले’। पांच वर्ष पहले जब सारे सर्वेक्षण उन्हें सत्ता से बाहर का रास्ता दिखा रहे थे और चुनावी विशेषज्ञ कैप्टन अमरिंदर सिंह की अगुआई में कांग्रेस की सरकार के कयास लगा रहे थे, उस समय बादल ने सत्ता में जोरदार वापसी की और यहीं से अपनी विरासत तय करते हुए सुखबीर सिंह बादल की ताजपोशी भी कर दी।
आज हालात थोड़े अलग हैं। बादल की शायद यह आखिरी बाजी है। उम्र का अगर अंदाज न हो तो उनकी दिनचर्या को देख कोई कह नहीं सकता कि वे 90 की दहलीज पर खड़े हैं। कभी उम्र का सवाल पूछने पर वे हंस कर कहते हैं, ‘भज्ज के दिखावां’। और वे सत्ता के गलियारों में सरपट भाग रहे हैं। इस बात में सिद्धू का ‘भाग, बाबा बादल भाग’ का तंज शुमार नहीं है।
पार्टी और परिवार को बनाने में बादल को 70 साल लगे हैं। महज 20 साल की उम्र में वे सबसे छोटी उम्र के सरपंच और फिर सबसे छोटी उम्र के मुख्यमंत्री बने। आतंकवाद की मार से बुरी तरह त्रस्त रहे प्रदेश में बादल उदारवादी धड़े के अगुआ रहे हैं। कारण साफ है कि वे प्रदेश के 40 फीसद से भी ज्यादा हिंदुओं के भी स्वीकार्य नेता हैं।
इन सालों में जैसे-जैसे अकाली दल में एक के बाद एक बिखराव होते गए, बादल उसके सबसे बड़े धड़े की कमान संभालते रहे। बिखरती ताकत में खुद को शक्तिशाली रखने के लिए बादल ने 1997 में भारतीय जनता पार्टी के साथ अपना जो नाता जोड़ा वह आज भी कायम है। खास बात यह है कि वे भाजपा के हर धड़े को स्वीकार्य हैं। कारण उनकी भद्रता ही है। तीन बार यह गठबंधन पंजाब में अपनी सरकार बना चुका है, लेकिन इस बार हालात कुछ अलग ही हैं। सत्ता बचाए रखने के लिए बादल को इस बार मिल रही चुनौती अभूतपूर्व है। उनके परिवार के एक सदस्य पर पंजाब में नशे का कारोबार चलाने का आरोप है। दिल्ली से मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की सारी चुनावी लड़ाई की बुनियाद यही एकमात्र मुद्दा है। ‘देखना हम सत्ता में आए तो नशे का यह व्यापारी जेल की सलाखों के पीछे होगा। बादल को वैसे ही धूल चटाएंगे जैसे दिल्ली में शीला दीक्षित को हार का मुंह दिखाया’। केजरीवाल की सभाओं में मैदान खचाखच भरे हैं जबकि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की सभा में कुर्सियां खाली रहीं।

मोदी की सभा को मिले उदासीन रवैए से अकाली दल और भाजपा में खलबली है। यह वैसे ही है जैसे अमृतसर में वित्त मंत्री अरुण जेटली का कैप्टन अमरिंदर सिंह के हाथों से हारना। जेटली तो राज्यसभा के रास्ते केंद्र की सत्ता में अहम पद कब्जाने में कामयाब रहे। लेकिन अकाली दल-भाजपा में इस रैली के बाद भविष्य के प्रति अनिश्चितता की सुगबुगाहट शुरू हो गई है। आम आदमी पार्टी खुद पर लगे तमाम आरोपों के बावजूद अपने लिए रास्ता बनाती चली जा रही है। ध्यान रहे, आप को कम करके आंकने वालों के लिए चुनाव परिणाम सबक भी हो सकता है। जब तमाम देश में आप को लोकसभा चुनावों में पटखनी खानी पड़ी, इसी पंजाब ने 13 में से चार सीटों की सौगात दी। यह दीगर है कि इन चार में से तीन सांसद अब आप से छिटक चुके हैं।
आप संयोजक सुच्चा सिंह छोटेपुर बगावत कर अलग हुए तो लगा पार्टी कमजोर पड़ेगी। पर आज हालत यह है कि छोटेपुर की बनाई पार्टी ‘अपना पंजाब पार्टी’ का कोई नामलेवा भी नहीं। आपसी बातचीत में आप के विरोधी इसे ‘मसखरों की महफिल’ कह कर खारिज करते हैं। लेकिन ऐसा करते हुए वे हकीकत से भी मुंह चुराते नजर आते हैं। आप अपनी ईमानदार छवि को सोच कर यहां अपनी राजनीतिक रोटियां सेंकने के लिए तत्पर है। इसी कारण केजरीवाल यहीं अपना डेरा-डंगर डाल कर बैठे हैं।

राज्य में कांग्रेस एक दशक से सत्ता से बाहर है। पार्टी ने फिर से अपना दांव कैप्टन अमरिंदर सिंह पर खेला है जिन्हें जनता पिछले दो चुनावों से नकार रही है। कारण साफ है कि अमृतसर में भाजपा के धुरंधर जेटली को धूल चटा कर अमरिंदर ने अपने को पुनर्प्रतिष्ठित किया है जबकि बाकी नेता बदस्तूर हाशिए पर ही रहे। सिद्धू जब भाजपा से नाउम्मीद होकर आप की गोदी से लुढ़कते हुए कांग्रेसी खेमे में पहुंचे तो पार्टी में यह हड़कंप मच गया कि कहीं वे मुख्यमंत्री पद का दावा तो नहीं ले आए। माना जा रहा है कि इसके बाद पार्टी के प्रचार को धक्का लगा और कैप्टन समर्थक खफा हो बैठे। पंजाब में जैसे जटिल राजनीतिक समीकरण बने हुए हैं, उनमें यह बड़ा जोखिम था। यही वजह है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने अपनी पहली ही सभा में यह भ्रम दूर कर दिया और अमरिंदर को मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर दिया। सिद्धू के दाखिले के बाद एकदम से लड़खड़ाई पार्टी ने फिर संभलने की दिशा में कदम बढ़ा दिए हैं।
आलम यह है कि राज्य इस समय बादल की वरिष्ठता, अमरिंदर की उत्कृष्टता और केजरीवाल की महत्त्वाकांक्षा के बीच अपना रास्ता तलाश रहा है। नशे के कारण राज्य की युवा पीढ़ी दिग्भ्रमित हुई पड़ी है।

राजनीतिक दावों, वादों के बरक्स हर परिवार की अपनी जमीनी हकीकत है। नोटबंदी का पंजाब में बुरा असर दिखा। पंजाब की आर्थिक बुनियाद इसकी खेती है और किसानों को नोटबंदी का सदमा झेलना पड़ा है। मोदी की रैली में खाली कुर्सियों का श्रेय किसान का सरकार से मोहभंग माना जा रहा है। न सिर्फ किसान वरन पंजाब में व्यापारी भी नोटबंदी के असर की जद में आया है। नशे के आरोपों और सत्तानशीन होने के सपने, विपरीत असर को झेलती बादल सरकार के लिए नोटबंदी आखिरी तिनके की तरह है। देखना है कि पार्टी यह भार झेल पाती है या नहीं।
इसी तरह अमरिंदर को मुख्यमंत्री का चेहरा घोषित करने का राहुल गांधी का दांव क्या गुल खिलाता है? क्योंकि यह सच है कि केजरीवाल का सिद्धू के साथ मुख्यमंत्री पद की सौदेबाजी का प्रचार इतना जबरदस्त था कि यह कांग्रेस का तगड़ा नुकसान कर सकता था क्योंकि इस कथित सौदेबाजी पर आप और अकाली एकमत थे। आप की यह सबसे कमजोर रग है कि उसने मुख्यमंत्री के पद के लिए अपने पत्ते नहीं खोले हैं। लेकिन सच यह भी है कि अकाली दल या प्रकाश सिंह-सुखबीर बादल या बादल परिवार और कैप्टन अमरिंदर सिंह या कांग्रेस से भरे पड़े लोगों के लिए आम आदमी पार्टी एक नए प्रयोग की तरह है। और पंजाब के लोगों की प्रयोगधर्मिता तो लोग लोकसभा चुनाव में देख ही चुके हैं। इस बार भी मुकाबला आसान नहीं है।

’मोदी की सभा को मिले उदासीन रवैए से अकाली दल और भाजपा में खलबली है। यह वैसे ही है जैसे अमृतसर में वित्त मंत्री अरुण जेटली का कैप्टन अमरिंदर सिंह के हाथों हारना।
’आम आदमी पार्टी खुद पर लगे तमाम आरोपों के बावजूद अपने लिए रास्ता बनाती चली जा रही है। ध्यान रहे, आप को कम करके आंकने वालों के लिए चुनाव परिणाम सबक भी हो सकता है। जब तमाम देश में आप को लोकसभा चुनावों में पटखनी खानी पड़ी, इसी पंजाब ने 13 में से चार सीटों की सौगात दी। यह दीगर है कि इन चार में से तीन सांसद अब आप से छिटक चुके हैं।
’राज्य में कांग्रेस एक दशक से सत्ता से बाहर है। पार्टी ने फिर से अपना दांव कैप्टन अमरिंदर सिंह पर खेला है जिन्हें जनता पिछले दो चुनावों से नकार रही है। कारण साफ है कि अमृतसर में भाजपा के धुरंधर जेटली को धूल चटा कर अमरिंदर ने अपने को पुनर्प्रतिष्ठित किया है।
’राज्य इस समय बादल की वरिष्ठता, अमरिंदर की उत्कृष्टता और केजरीवाल की महत्त्वाकांक्षा के बीच अपना रास्ता तलाश रहा है।

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