ताज़ा खबर
 

बेफिक्रों को फिक्र में डाल रहा पंजाब

पिछले लोकसभा चुनावों के पहले भाजपा की ओर से बहुत सारे अखबारों में पूरे पृष्ठ का एक विज्ञापन छपा था - ‘मोदी आ रहा है’।

Author February 4, 2017 3:42 AM
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी।

पिछले लोकसभा चुनावों के पहले भाजपा की ओर से बहुत सारे अखबारों में पूरे पृष्ठ का एक विज्ञापन छपा था – ‘मोदी आ रहा है’। सजे-धजे वाहन पर मोदी की ‘दहाड़ती-सी’ तस्वीर की इस भाषा ने बहुत से लोगों को चौंकाया था। भारतीय राजनीति में यह नई भाषा थी, नया चलन था, प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार का बॉलीवुडनुमा विज्ञापन। लेकिन अगर कोई हिंदी सिनेमा वाले नायकत्व की छाप लेकर चले तो फिल्मों की तरह हर शुक्रवार उसे अपना हुलिया, मिजाज और संवाद बदलने पड़ेंगे। नहीं तो, लोग कुछ दिनों बाद तालियां बजाना बंद कर देंगे, सुपरफ्लॉप साबित कर दिए जाने का जोखिम सामने होगा। तो हिंदी सिनेमा के हीरो की तरह लोकप्रिय नरेंद्र मोदी का हाल पंजाब में शायद ऐसा ही हुआ है या हो रहा है!

उत्तर प्रदेश में ‘मोदी आ रहा है’ वाले उम्मीदवार प्रधानमंत्री बनने के ढाई साल बाद जब जलंधर पहुंचते हैं तो उनकी भाषा बदल जाती है। आक्रामक संवाद वाले नायक जनता के सामने अपनी पेशी एक ‘पीड़ित’ की तरह करते हैं। वे कहते हैं कि पिछले तीन महीने में उन्हें ‘बहुत ज्यादा जुल्म झेलना पड़ रहा है’! इस ‘पीड़ित’ वाली परछाई के सामने थी सभास्थल पर खाली पड़ीं कुर्सियां! भाजपा का मीडिया सेल लाख चाह कर भी इन कुर्सियों को टीवी के पर्दे और अखबार के पन्ने पर आने से रोक नहीं पाया।

आखिर पंजाब की फिजां में वह कौन-सी बात है कि मोदी को अपने भाषण में भावुकता का तड़का लगाना पड़ा। याद करें इसके पहले भी नोटबंदी वाले मसले पर वे जनसभाओं में रोते हुए दिख चुके हैं और नोटबंदी की बाबत कह चुके हैं कि ‘अपना क्या… हम तो फकीर हैं, झोला उठा कर चल पड़ेंगे’। और इसी नोटबंदी के ढाई महीने से ज्यादा समय गुजरने के बाद वे जलंधर आते हैं और जनसभा में खाली पड़ीं कुर्सियां उन्हें निराश करती है। ‘झोला उठा कर चल देने’ वाले की बात कहने वाले फकीर जनता से अपनी पीड़ा का मरहम मांगते हैं। वे उस पीड़ित जनता से मरहम मांग रहे थे जो नोटबंदी के लागू होने के बाद इसकी मार की सबसे ज्यादा शिकार हुई।

यानी पंजाब, बेफिक्रों में एक तरह का खौफ पैदा कर रहा है। यश चोपड़ा के पीले सरसों वाले रुमानी खेतों से लेकर माफिया की तस्वीरों वाला अनुराग कश्यप का ‘उड़ता पंजाब’। कभी पांच दरिया वाला, दोआब की मिट्टी वाला यह राज्य लोकलुभावन संस्कृति से लेकर सिनेमा तक में एक मिथ की तरह देखा जाने लगा है। बाजार में फैले पंजाबी खाना और पंजाबी गाना के बरक्स पंजाब के लोगों की जो पीड़ा है, वह मोदी, बादल, अमरिंदर से लेकर केजरीवाल तक को डरा रही है। और यही पीड़ा कैप्टन और केजरीवाल के लिए वोट मांगने का सबब भी है।

आधुनिक पंजाब की कहानी शुरू होती है हरित क्रांति से। खेती की बुनियाद वाले भारत के विकास की बुनियाद यहां की उपजाऊ मिट्टी से ही शुरू की गई थी। लहलहाते पंजाब के साथ एक और जिस कौम का खून-पसीना मिट्टी में मिल रहा था, वे थे बिहारी मजदूर। इन खेतिहर मजदूरों को रोजी-रोटी दी थी पंजाब की मिट्टी ने और इनकी मेहनत ने आर्थिक मोर्चे पर लिखी पंजाब की सफलता। हाल ही में पटना में सिखों के गुरु गोविंद सिंह के 350वें प्रकटोत्सव पर जो बिहार और पंजाब का भाईचारा दिखा, वह एक और पीड़ा में भी साझेदारी कर रहा था। वह पीड़ा थी नोटबंदी की मार। नोटबंदी का सबसे ज्यादा नुकसान कृषि क्षेत्र को झेलना पड़ा और पंजाब के किसान भी इससे अछूते नहीं रहे। इसके साथ ही बिहार से गए खेतिहर मजदूरों और वहां बस चुके किसानों की फसलों पर भी संकट छा गया। किसानों के इसी गुस्से का असर मोदी की जलंधर रैली में दिखा था।

हरित क्रांति के बाद जो अस्मितावादी राजनीति शुरू हुई, उसके असर में पंजाब ने आतंकवाद का भी गहरा घाव झेला है। खेती से लेकर कारखाने तक जो आर्थिक समृद्धि की बुनियाद थे, वे माफिया के चंगुल में फंसते गए। पिछले दो दशकों से नशे के माफिया ने पंजाब के लगभग हर घर को नुकसान पहुंचाया है। मौजूदा सरकार पर इनके संरक्षण के आरोप हैं। खेती, कारखाने से लेकर युवा तक, जिन्होंने पंजाब का एक खाता-पीता नक्शा खींचा था, आज उसका बहुत बड़ा तबका सिसक रहा है, हालात में बदलाव की मांग कर रहा है। और रिसते घावों के सामने कोई नया सपना परोसने, नया जुमला फेंकने से बेहतर था खुद को जख्मी बता कर चुपचाप लौट जाना और नतीजों का इंतजार करना। ऐसे में मतदान और उसके बाद आनेवाले नतीजों का सबको इंतजार है।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ लिंक्डइन पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App