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ममता सिंह का लेखः हिमालय का बिगड़ता मिजाज

हिमालय की अनदेखी शुरू से ही हो रही है। बार-बार केंद्र पर निर्भर हिमालयी राज्यों का तंत्र हिमालय की गंभीरता और हिमालय से चल सकने वाली स्थायी जीवन शैली और जीविका को भी भुलाते जा रहे हैं। आयातित परियोजनाओं ने हिमालय में अतिक्रमण, प्रदूषण और आपदा की स्थिति पैदा कर दी है जिसके फलस्वरूप हिमालय […]

Author नई दिल्ली | Published on: July 20, 2016 1:07 AM
माउंट एवरेस्ट या माउंट कोमोलांगमा (एवरेस्ट का तिब्बती नाम)। (AP Photo/Tashi Sherpa)

हिमालय की अनदेखी शुरू से ही हो रही है। बार-बार केंद्र पर निर्भर हिमालयी राज्यों का तंत्र हिमालय की गंभीरता और हिमालय से चल सकने वाली स्थायी जीवन शैली और जीविका को भी भुलाते जा रहे हैं। आयातित परियोजनाओं ने हिमालय में अतिक्रमण, प्रदूषण और आपदा की स्थिति पैदा कर दी है जिसके फलस्वरूप हिमालय टूट रहा है।

हिमालय न केवल भारत, बल्कि दक्षिण एशिया के सभी देशों के लिए जल स्रोत है। दरअसल, हिमालय से भारत सहित उन सभी देशों की जलवायु तय होती है जो हिमालय को स्पर्श करते हैं। अगर जलवायु प्रभावित हुई तो इसका सीधा असर कृषि आधारित अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा। लिहाजा, हिमालय में बसे सभी देशों के लिए एक नीति तो बननी ही चाहिए, जो सभी देशों को मान्य हो। इस दिशा में भारत की ओर से पहल की जानी चाहिए। हालांकि भारत में काफी लंबे अरसे से हिमालयन नीति और अलग मंत्रालय की मांग चल रही है, पर अब तक इस दिशा में कोई खास प्रगति नहीं दिखी है। अगर हिमालय की पीड़ा समझने की कोशिश नहीं की गई तो इसका खमियाजा सभी को भुगतना पड़ेगा।

ब्रह्मपुत्र नदी पर चीन द्वारा बांध बनाने की चर्चा लंबे समय से चल रही है। इसके अलावा हिमालय के ठीक नीचे एक सुरंग बनाने की भी योजना चीन की है। करीब तेरह अरब डॉलर की लागत से यह सुरंग चीन के तिब्बत को सीधे काठमांडो से जोड़ने की योजना है। भारी खर्च और जोखिम होने की वजह से चीन सरकार अभी इस पर मंथन कर रही है।

असल में हिमालय आक्सीजन का भंडार है, जो जलवायु को नियंत्रित करने के अलावा यहां से निकलने वाले गदेरों, नदियों और ग्लेशियरों को भी जीवित रखता है। हर साल पचास लाख घन मीटर पानी हिमालय की नदियों से बहता है, जो पूरे देश में पैंतालीस फीसद जलापूर्ति करता है। भारत सरकार और अन्य प्रांतों की सरकारों द्वारा हिमालय संरक्षण पर ध्यान नहीं देने से हिमालय प्रलय की ओर अग्रसर है। हिमालय की पूर्वी और पश्चिमी सीमाओं पर इंडस और ब्रह्मपुत्र नदियों का विस्तार है। करीब ढाई हजार किलोमीटर तक पहाड़ी रेंज, जो कश्मीर से अरुणाचल प्रदेश, पश्चिम से पूर्व तक भारत के प्रहरी के रूप में कार्य करता है।

हिमालय को बचाने की बात तो सभी करते हैं, लेकिन सब कुछ कागजों पर अंकित होकर रह गया है। केंद्रीय मृदा-जल प्रशिक्षण संस्थान की रिपोर्ट के मुताबिक बड़े बांधों के विकास की दौड़ में आज भारत पूरे विश्व में तीसरे स्थान पर है। हिमालय से निकलने वाली नदियों पर बनने वालों बांधों पर अंकुश लगना चाहिए। नदियों का गला दबा कर बिजली बनाने का यह विकास प्राकृतिक असंतुलन का सबसे बड़ा कारण है। इतना ही नहीं, पर्यावरण के लिए काम करने वाली संस्था सेंटर फॉर साइंस ऐंड इनवायरमेंट ने 2013 में उत्तराखंड के केदारनाथ में आई भयंकर त्रासदी के बाद हिमालयी राज्यों में पनबिजली योजनाओं पर भी शिकंजा कसने की बात कही है। हिमालयी राज्यों में बीते एक दशक में तीन गुना बिजली उत्पादन बढ़ा है। देश के कुल भौगोलिक क्षेत्रफल के 16.3 फीसद क्षेत्र में फैले हिमालयी क्षेत्र को समृद्ध वाटर टैंक के रूप में जाना जाता है। इसमें 45.2 फीसद भूभाग में घने जंगल हैं।

हिमालय की अनदेखी शुरू से ही हो रही है। बार-बार केंद्र पर निर्भर हिमालयी राज्यों का तंत्र हिमालय की गंभीरता और हिमालय से चल सकने वाली स्थायी जीवन शैली और जीविका को भी भुलाते जा रहे हैं। स्थिति यहां तक पहुंच चुकी है कि इस क्षेत्र के वन, स्थानीय निवासियों के पारंपरिक अधिकार और प्राकृतिक संसाधनों के संरक्षण और संवर्द्धन के तरीकों की जबर्दस्त अनदेखी हो रही है। आयातित योजनाओं और परियोजनाओं ने हिमालय में अतिक्रमण, प्रदूषण और आपदा की स्थिति पैदा कर दी है, जिसके फलस्वरूप हिमालय टूट रहा है।

अगस्त, 2011 में साइंस जर्नल में छपे एक शोध ‘हिमालय पर बढ़ रहा दबाव’ में लिखा है कि चहुंओर हिमालयी क्षेत्र में हो रही छेड़छाड़ आगामी पचास सालों में हिमालयी राज्यों को तहस-नहस कर सकती है। पर्वतीय राज्यों में जमीन के अंदर सर्वाधिक हलचल रहती है, जिससे भूकंप की आशंका निरंतर बनी रहती है। शिवालिक की पहाड़ियों से लेकर हिमालय तक के क्षेत्रों की जमीन के नीचे कई फाल्ट मौजूद हैं। भारतीय प्लेट तिब्बत से शुरू होने वाली एशियन प्लेट में हर साल पांच सेंटीमीटर समाहित हो रही है, जिसके कारण हिमालय साल में औसतन अठारह से बीस मिलीमीटर ऊंचा हो रहा है। इस तरह यह अपनी सतह से तीन से पांच मीटर ऊपर उठ रहा है। वैसे भी हिमालय को सरकार अकेले सुरक्षित नहीं रख सकती। इसके लिए सामूहिक इच्छाशक्ति और प्रयासों की जरूरत है। विश्व का चौबीस फीसद हिस्सा पहाड़ों से घिरा हुआ है, जिस पर कुल आबादी का बारह फीसद हिस्सा सामाजिक और आर्थिक रूप से निर्भर है। पर्यावरण की दृष्टि से अनुकूल वन क्षेत्र यानी कुल क्षेत्रफल के एक तिहाई भाग पर वनों का होना आवश्यक है। पर भारत में अनेक प्रयासों के बावजूद केवल तेईस फीसद भूभाग पर वनों का विस्तार हो पाया है।

महत्त्वपूर्ण बात यह है कि हिमालय में गोमुख जैसा ग्लेशियर है, जो हर साल तीन मीटर पीछे हट रहा है। कभी बर्फ अधिक तो कभी कम पड़ती है, लेकिन पिघलने की दर उससे दोगुना हो गई है। हिमालय पर बर्फ के तेजी से पिघलने का सिलसिला 1997 से बढ़ा है। जलवायु परिवर्तन इसका एक कारण है। दूसरा वह विकास है, जिसके कारण हिमालय छलनी कर दिया गया है। यूपीए सरकार ने हिमालय इको मिशन बनाया था ताकि हिमालय में भूमि प्रबंधन के साथ ही वन संरक्षण और जल संरक्षण के काम को मजबूती दी जा सके। लेकिन अब इको मिशन कागजों पर ही धरा रहा गया है। वर्तमान में राजग सरकार ने गंगा को बचाने के लिए गंगा की सफाई को लेकर कई योजनाएं बनाई हैं, लेकिन महज योजनाओं से काम नहीं चलने वाला है। गंगा से भी जरूरी है हिमालय को बचाना। हिमालय बचेगा तभी गंगा भी बचेगी। हिमालय के बिना गंगा का अस्तित्व संभव ही नहीं है।

भारत सरकार ने हिल एरिया डेवलपमेंट नाम से एक योजना अवश्य चलाई, लेकिन इसके विकास के मानक आज भी मैदानी हैं, जिसकी वजह से हिमालय का शोषण बढ़ा है। हालांकि नीति आयोग के समक्ष यह बात रखी गई है कि हिमालय के विकास का मॉडल अलग से बने। इस पर नीति आयोग भी सैद्धांतिक रूप से अपनी सहमति प्रदान कर चुका है। सौ करोड़ रुपए का बजट भी स्वीकृत है। हिमालय नीति में आवश्यक यह है कि संपूर्ण हिमालयी क्षेत्रों में सुरंग और बांधों से परहेज किया जाए। वनाधिकार कानून 2006 को प्रभावी रूप से लागू किया जाए। साथ ही, पर्यटन नियंत्रित हो और विकास से जुड़ी हर गतिविधि में जनभागीदारी हो।

हिमालय का वन क्षेत्र स्वास्थ्य और पर्यावरण के मानकों से अब भी अधिक घना है। हिमालय की मिट्टी और पानी पूरे देश में काम आ रहा है। पर उपभोक्तावादी, अविवेकपूर्ण विकासवादी दृष्टि कभी हिमालय में टिकाऊ विकास नहीं कर सकती। अगर समय रहते केंद्र और प्रदेश सरकारों ने हिमालय की चिंता नहीं की तो जलवायु परिवर्तन का संकट और ज्यादा बढ़ेगा। साथ ही, सुरंग बांधों के शृंखलाबद्ध निर्माण से हिमालयी नदियां सूख जाएंगी। परिणाम यह होगा कि हिमालयी राज्यों में पलायन की समस्या बढ़ेगी। जल संरक्षण की स्थानीय विधियों को जो प्रोत्साहन मिलना चाहिए था, वह नहीं मिला। इस कारण हिमालयी क्षेत्रों में होने वाली कुल वर्षा का चार फीसद पानी भी उपयोग में नहीं आ पा रहा है। नेशनल एक्शन प्लान आॅन क्लाइमेट चेंज में हिमालयी ग्लेशियरों पर उत्पन्न संकट का समाधान करने के लिए समुदाय आधारित वन भूमि संरक्षण पर जोर दिया गया है। लेकिन इस दिशा में कोई काम नहीं हो रहा है।

जलवायु परिवर्तन का सबसे बड़ा दुष्प्रभाव हिमालयी क्षेत्र के ग्लेशियरों पर दिखने लगा है। ग्लेशियर पर दरारें बढ़ रही हैं। इससे ग्लेशियर टूटते जा रहे हैं। दरअसल, भूगर्भ की टेक्टोनिक प्लेट जैसे ही अपनी चाल बदलती है, ग्लेशियर पर दबाव आ जाता है। ग्लोबल वार्मिंग की वजह से हिमालय क्षेत्र का तापमान बढ़ा है और इसमें उतार-चढ़ाव अधिक हो गया है।

पिछले साल नेपाल में आए 7.8 रिक्टर स्केल के भूकंप से धरती में कई बदलाव दर्ज किए गए हैं। उस दौरान नेपाल में हिमालय का एक भाग साठ सेंटीमीटर धंस गया। वायुमंडल में कार्बन डाई आक्साइड का मौजूदा स्तर अगले पचास साल तक हिमालय की सेहत बिगाड़ने के लिए काफी है। वैज्ञानिकों का दावा है कि कार्बन उत्सर्जन शून्य भी हो जाए तो हिमालय का तापमान दस साल तक दो डिग्री की दर से बढ़ता रहेगा। उत्सर्जन बढ़ा तो स्थिति और ज्यादा खतरनाक हो सकती है। स्थिति में सुधार इसलिए बेहद जरूरी है कि हिमालय पूरी दुनिया में पैदा होने वाले कार्बन का प्रमुख रेग्यूलेटरी सिस्टम है। कार्बन डाई आक्साइड विश्व के किसी भी कोने में उत्सर्जित हो, उसका प्रभाव पूरे वायुमंडल पर पड़ता है। पूरी दुनिया में पैदा होने वाले कार्बन को कम करने में हिमालय की अहम भूमिका है। वैज्ञानिकों के मुताबिक, अगर कार्बन उत्सर्जन बहुत कम कर दिया जाता है, तो भी कार्बन का मौजूदा स्तर कम होने में कम से कम पंद्रह साल लग जाएंगे। वातावरण में जो कार्बन डाई आक्साइड मौजूद है उसका प्रभाव पड़ेगा। हिमालय क्षेत्र का तापमान बढ़ने से आइस कवर पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा।

इससे बचाव के लिए भी प्रयास करने होंगे। पेड़ अधिक लगाने होंगे। फॉरेस्ट कवर में लगातार बढ़ोतरी भी जरूरी है। नदियों पर बांध न बनें। बांध की वजह से आर्गेनिक कार्बन एक ही जगह पर जमा हो जाता है, जो आक्सीकृत होकर कार्बन डाई आक्साइड में तब्दील हो जाता है। जीओ इंजीनियरिंग के उपकरणों से वायुमंडल से कार्बन को खींचा जा सकता है। फिर इसे मशीनों की से छेद करके भूगर्भ में डाला जा सकता है।

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