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जीका की चुनौती और स्वास्थ्य तंत्र

मच्छरों से फैलने वाले जानलेवा जीका वायरस से भारत महफूज नहीं है। इसे लेकर पिछले साल आशंका जताई गई थी।

ज़ीका वायरस फैलाने वाले मच्छर ( File Photo -REUTERS/Juan Carlos Ulate)

मच्छरों से फैलने वाले जानलेवा जीका वायरस से भारत महफूज नहीं है। इसे लेकर पिछले साल आशंका जताई गई थी। सिंगापुर में तेरह भारतीयों में इस वायरस की पुष्टि हुई थी और तब कहा गया था कि वहां से इस वायरस के भारत पहुंचने में ज्यादा देर नहीं है। इस साल जनवरी-फरवरी में अमदाबाद के तीन लोगों के जीका वायरस से प्रभावित होने की बात सामने आई थी। नेशनल इंस्टीट्यूट आॅफ वायरलोलॉजी, पुणे ने इसकी पुष्टि की और विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भी अब इसे सही माना है। मगर इसकी कोई सूचना जारी नहीं की गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन पिछले साल ही जीका को ग्लोबल हेल्थ इमरजेंसी घोषित कर चुका है, पर अब जो सूचनाएं-आशंकाएं सामने आई हैं, उनसे सवाल उठा है कि हमारा देश जीका की चुनौती से आखिर कैसे निपटेगा, क्योंकि यह मच्छरों के प्रकोप से पहले ही त्रस्त है और फिर हमारा स्वास्थ्य ढांचा और सूचना तंत्र विकसित देशों के मुकाबले काफी लचर है।

हालांकि जीका वायरस का ज्यादा असर ब्राजील और दक्षिण अमेरिका समेत बीस देशों में है। भारत उनसे काफी दूर है, पर तेजी से फैल रहे इस वायरस के मामले में हम खुद को सुरक्षित नहीं मान सकते। संक्रामक बीमारियां अब काफी तेजी से ग्लोबल हो रही हैं। पिछले साल अमेरिका के टेक्सास शहर तक में जीका के संक्रमण का मामला सामने आ चुका है। वहां वायरस एक इंसान से दूसरे में यौन संपर्क के जरिए फैला था। यानी जरूरी नहीं कि यह मच्छरों के काटने से ही फैले। अब यह इंसानों में ही एक-दूसरे से फैल सकता है। जीका के असर से नवजात शिशुओं का दिमाग विकसित नहीं हो पाता। यह वायरस फैलाने वाला मच्छर भी उसी एडीज प्रजाति का होता है, जो भारत में मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया, जापानी इनसेफेलाइटिस और फाइलेरिया जैसे रोगों के लिए जिम्मेदार है। जीका वायरस का संवाहक मच्छर देश में पहले से मौजूद हो, तो इसकी संभावना अधिक है कि भारत में इसका चौतरफा प्रसार हो। मच्छर ही नहीं, यहां का गरम मौसम भी इसके लिए जमीन तैयार करता है।

पिछले कुछ समय से दुनिया एक से बढ़ कर एक संक्रामक बीमारियों की चपेट में आ रही है। कभी स्वाइन फ्लू का शोर उठता है, तो कभी इबोला वायरस के जानलेवा हमले की खबर आती है। सवाल है कि आखिर ऐसा क्यों हो रहा है? क्यों नई-नई संक्रामक बीमारियां सामने आ रही हैं? क्या यह दुनिया के कमजोर स्वास्थ्य तंत्र का नतीजा है या फिर इसमें बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की कोई साजिश है? कहीं ऐसा तो नहीं कि वे नई बीमारियों का हंगामा खड़ा करके अपनी दवाओं और विकसित किए गए टीकों की बिक्री बढ़ाने का यत्न करती हैं। एक सवाल यह भी है कि मेडिकल साइंस की इतनी तरक्की के बावजूद वायरस इतने संहारक क्यों हो रहे हैं? वैज्ञानिकों का इस बारे में कहना है कि ज्यादातर स्वास्थ्य विशेषज्ञों ने माइक्रोब्स (रोगाणुओं) के जीवन चक्र को समझने की कोशिश नहीं की या संक्रमणों की कार्यप्रणाली को नहीं जाना। नतीजतन, हम न सिर्फ संक्रमण की शृंखला तोड़ने में नाकाम हुए, बल्कि कुछ मामलों में इसे और मजबूत बनाया है।

बर्ड फ्लू, स्वाइन फ्लू, इबोला, मलेरिया, डेंगू, जीका और एचआइवी-एड्स से होने वाली मौतों में बीते तीन-चार दशक में कई गुना बढ़ोतरी हो चुकी है। कहा जा रहा है कि 1973 के बाद से दुनिया को विषाणुजनित तीस नई बीमारियों ने मानव समुदाय को घेर लिया है। धरती पर फैले सबसे घातक रोगाणुओं ने एंटीबायोटिक और अन्य दवाओं के खिलाफ जबर्दस्त जंग छेड़ रखी है और बीमारियों के ऐसे उत्परिवर्तित वायरस (रोगाणु) आ गए हैं, जिन पर नियंत्रण नहीं हो पा रहा है। जीका, फ्लू और इबोला जैसे वायरसों से जुड़ी यह एक बड़ी समस्या है कि इनके वायरस म्यूटेशन (यानी उत्परिवर्तन) का रुख अपना रहे हैं। यानी मौका पड़ने पर वायरस अपना स्वरूप बदल लेते हैं, जिससे उनके प्रतिरोध के लिए बनी दवाइयां और टीके कारगर नहीं रह पाते हैं। ताजा स्थिति यह है कि जीका के चलते 2015 से अब तक दुनिया में 3530 माइक्रोसिफेली-ग्रस्त बच्चों का जन्म हो चुका है। साफ है कि वायरस की चुनौतियां बढ़ रही हैं और इनसे जंग में हमारे इंतजाम सवालों के घेरे में हैं।

कुछ अरसा पहले ‘साइंस’ पत्रिका में एक वैज्ञानिक ने लिखा था कि बैक्टीरिया आदमी से भी ज्यादा चालाक है। वायरसों ने एंटीबायोटिक्स से समायोजन करना (एडजस्ट करना) सीख लिया है। कुछ बैक्टीरिया ने एंटीबायोटिक को नष्ट करने की क्षमता रखने वाले एंजाइम तक बनाना सीख लिया है। ऐसी भीषण बीमारियों का सामना करने वाले कारगर टीके भी अभी मुकम्मल तौर पर विकसित नहीं हो पाए हैं। जीका वायरस सबसे पहले 1947 में युगांडा में प्रकट हुआ था। 2015 में लैटिन अमेरिकी देश, खासकर ब्राजील में इसका तेजी से प्रसार हुआ। दुनिया के खुलते बाजार और देशों के परस्पर सहयोग में इजाफे का एक नतीजा यह निकला है कि जीका, स्वाइन फ्लू और पोलियो के अलावा एचआइवी, सार्स, मैड काऊ (बोवाइन स्पांजीफॉर्म एनसिफैलोपैथी), इबोला, मारबर्ग विषाणु और श्वास तंत्र को प्रभावित करने वाले संक्रामक रोगों के फैलने की गति बढ़ गई है। एक वजह यह भी है कि आज अगर कोई संक्रमण एक देश में फूटता है, तो हवाई यातायात के कारण उसे दुनिया की किसी भी हिस्से में पहुंचने के लिए आठ से पच्चीस घंटे चाहिए। ऐसे में अगर किसी संक्रमित व्यक्ति को हवाई अड्डे पर ही न रोक लिया जाए, तो वह किसी भी पूरे देश को संक्रमित करने की ताकत रखता है। लंदन स्कूल आॅफ हाइजीन ऐंड ट्रॉपिकल मेडिसिन में जीका पर शोध कर रहे आॅलिवर ब्रैडी के अनुसार भारत, इंडोनेशिया और नाइजीरिया जैसे देशों में जीका का खतरा ज्यादा है, क्योंकि इनमें पांच हजार यात्री हर महीने जीका प्रभावित इलाकों से आते-जाते हैं। ऐसे में मच्छर से फैलने वाले रोगों- मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया आदि से बुरी तरह आक्रांत रहने वाले भारत में जीका के प्रवेश की आशंका चिंता की बात है।

आज बाजार ऐसी बीमारियों के दोहन के लिए तैयार रहता है। इसलिए यह आशंका स्वाभाविक है कि जीका, इबोला और स्वाइन फ्लू के चौतरफा शोर के पीछे कहीं बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों का हाथ तो नहीं। अनेक बार साबित हुआ है कि बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों का असली उद्देश्य अरबों-खरबों रुपए की ऐसी फालतू दवाएं गरीब और विकासशील देशों को बेचना होता है। एड्स को महामारी बता कर ये कंपनियां भारत समेत दुनिया के कई गरीब मुल्कों में अरबों का व्यापार कर रही हैं, पर कहीं ऐसी घटनाएं सामने नहीं आई हैं जब एक साथ कई एड्स रोगियों की मृत्यु हुई हो। एड्स के मुकाबले कई गुना ज्यादा कहर तो ओड़ीशा-बिहार और पूर्वी उत्तर प्रदेश में इंसेफलाइटिस जैसी बीमारी का है, पर चूंकि उनके इलाज में एड्स, बर्ड फ्लू या सार्स जैसे खौफ का तत्त्व नहीं है और चूंकि ये बीमारियां ऐसे गरीबों की हैं जो ज्यादा खर्च नहीं कर सकते, लिहाजा इन्हें महामारी ही नहीं माना जाता। जब से देश-दुनिया में सामुदायिक के स्थान पर व्यक्ति केंद्रित इलाज की परंपरा कायम हुई है, उसने बीमारियों के सस्ते उपचार की व्यवस्था को लील लिया है। उसकी जगह किसी न किसी बहाने गरीब का खून चूसने वाली मशीनरी ने ले ली है। हैरानी नहीं कि इस वक्त दुनिया में जो तंत्र जीका वायरस को महामारी के रूप में पेश कर रहा है, उसका असल उद्देश्य बीमारी को रोकने के बजाय बेशुमार कमाई करना हो। बीमारी के साथ-साथ खौफ के संक्रमण की रोकथाम का उपाय भी करना चाहिए।

 

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