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राजनीतिः मुश्किल डगर पर शहरी महिलाएं

पूरी दुनिया में स्त्री का जीवन बदलावों से गुजरता है। उनका पहला जीवन मायके से जुड़ा होता है, विवाह के बाद का जीवन ससुराल से। ऐसे में उनके लिए जीवन की शर्तें और कसौटियां बदल जाती हैं। लेकिन इसमें खासतौर से हमारे देश में हो रहे तेज शहरीकरण ने अलग किस्म के पैमाने स्त्रियों के लिए बना दिए हैं। इन बदलते कायदों का अहसास स्त्रियों को है और वे भरसक इसके लिए खुद को तैयार भी कर रही हैं।

Author May 28, 2018 5:23 AM
अन्य विकासशील देशों की तरह भारत में भी महिलाएं बड़ी तादाद में कामकाजी हुई हैं और घर से बाहर उनकी मौजूदगी बढ़ी है।

शहर सपने जगाते हैं। सिर्फ रोजगार नहीं, सड़क, बिजली, पानी जैसी सहूलियतों और रहन-सहन की चमक-दमक भरी जीवनशैली के बल पर भी शहर अरसे से गांव-कस्बे के लोगों को अपनी ओर खींचते रहे हैं। यह चलन बना रहेगा, क्योंकि गांव-देहात के चौतरफा पिछड़ेपन से निजात पाने का सबसे अच्छा तरीका यही है कि किसी शहर की राह पकड़ ली जाए। पर इस शहरी जीवन की कीमत हर शख्स किसी न किसी रूप में चुकाता है। लेकिन महिलाओं को यह कीमत कुछ ज्यादा ही चुकानी पड़ती है। खासतौर से वे उस खुशी से महरूम हो जाती हैं जो उन्हें गांव-कस्बों में आसान जिंदगी के साथ मिलती रही। सपने जगाने वाले शहर अगर महिलाओं की खुशी छीन रहे हैं तो इसे लेकर हमारे समाजशास्त्रियों और योजनाकारों को सचेत हो जाना चाहिए, क्योंकि स्वस्थ-खुशहाल महिलाओं के बिना स्वस्थ शहरी समाज की कल्पना नहीं की जा सकती।

महिलाओं में शहरी जीवन को लेकर कितनी तसल्ली है, इसे लेकर हाल में एक सर्वेक्षण किया गया। इसमें दिल्ली, मुंबई, बंगलुरू और कोलकाता की बारह सौ महिलाओं को शामिल किया गया था। सर्वेक्षण में घरेलू और कामकाजी महिलाओं से पूछा गया था कि क्या विकसित शहरों की जिंदगी उन्हें किसी तरह की खुशी देती है। इस सवाल पर ज्यादातर महिलाओं ने नकारात्मक जवाब दिया। सत्तर फीसद महिलाओं ने कहा कि शहर उन्हें खुश रखने में नाकाम हो गए हैं। शहरी जीवन से इस नाखुशी और नाउम्मीदी का एक कारण यह है कि शहरी महिलाओं से घर और दफ्तर, दोनों मोर्चों पर उनसे बेहद ऊंची अपेक्षाएं पालने के बावजूद सफलता का श्रेय महिलाओं को नहीं दिया जाता। अक्सर कहा जाता है कि यह तो उनसे न्यूनतम अपेक्षित है, इसके बिना शहरी जीवन से तालमेल बिठाना मुमकिन नहीं है। बच्चों को स्कूल बस तक छोड़ना, पति के लिए नाश्ते-लंच की व्यवस्था करना, राशन लाना, बैंक-बिजली के बिल आदि काम निपटाना- अब ऐसे कई सारे काम शहरी महिलाओं के जिम्मे आ पड़े हैं और एकल परिवारों में प्राय: इनमें कोई बाहरी मदद उन्हें नहीं मिलती है। महिलाओं की तकलीफ उस वक्त बढ़ जाती है, जब उन्हें ये काम कामयाबी से निपटाने के बाद भी कोई सराहना नहीं मिलती। इसके बदले न तो वे कोई आय पाती हैं और न ही शाबासी। शहरी महिलाओं ने अपनी नाखुशी की दूसरी वजह यह बताई कि उनसे बेहद ऊंची या अव्यावहारिक उम्मीदें लगाई जाती हैं और जब वे इसमें नाकाम होती हैं तो इसके लिए उन्हें कोसा जाता है। जैसे इंटरनेट से कई सारे काम निपटाना या अंग्रेजी बोलचाल में प्रवीण होना। गांव-कस्बों से ब्याह कर शहरों में आई महिलाओं का वास्ता जब ऐसी चीजों से पड़ता है, जिससे उनका पहले कभी कोई सरोकार नहीं रहा, तो अक्सर वे विफल होती हैं और इसके लिए खुद को कोसती हैं।

सर्वेक्षण के आधार पर बनाए गए ‘मॉम्स हैप्पीनेस इंडेक्स’ में महिलाओं की खाना पकाने की योग्यताओं-अपेक्षाओं, बच्चों की पढ़ाई-लिखाई-परीक्षा में योगदान, घर-दफ्तर में अनुशासन कायम रखने की उनकी काबिलियत और कंप्यूटर-इंटरनेट इस्तेमाल की समझ जैसी चीजों की परख को शामिल किया गया था। तिहत्तर फीसद शहरी महिलाओं ने माना कि वे एक बेहतरीन मां नहीं हैं। इस आकलन का पैमाना उनकी खुद के बारे में राय के अलावा बच्चों और पति की राय के आधार पर बनाया गया था। जाहिर है, शहरी माताएं अपने जीवन से संतुष्ट नहीं दिख रही हैं, भले ही शहर के नाम पर वे तमाम चमक-दमक से घिरी हैं, उन्हें गांवों के मुकाबले शहरों में काफी सुविधाएं हासिल हैं। इसके बाद भी वे अगर खुश नहीं हैं तो स्पष्ट है कि शहरी जीवन के दबाव ने उनकी खुशियों पर ग्रहण लगा दिया है।

असल में समस्या एक ही जिंदगी में दोहरी-तिहरी जिंदगियां जीने और उसमें खुद को कामयाब बनाने की कोशिशों से उठ खड़ी हुई है। वैसे तो पूरी दुनिया में ही एक स्त्री का जीवन ऐसे बदलावों से गुजरता है। उनका पहला जीवन मायके से जुड़ा होता है, विवाह के बाद का जीवन ससुराल से। ऐसे में उनके लिए जीवन की शर्तें और कसौटियां बदल जाती हैं। लेकिन इसमें खासतौर से हमारे देश में हो रहे तेज शहरीकरण ने एक अलग किस्म के पैमाने स्त्रियों के लिए बना दिए हैं। इन बदलते कायदों का अहसास स्त्रियों को है और वे भरसक इसके लिए खुद को तैयार भी कर रही हैं। आज के ग्रामीण और कस्बाई जीवन को करीब से देखा जाए, तो पता चलेगा कि कैसे वहां की किशोरियां अपनी पढ़ाई-लिखाई, कोचिंग-ट्रेनिंग पर ध्यान लगा रही हैं। जिंदगी को बेहतर करने का उनका सपना उन्हें गांव-कस्बों से निकाल कर दूर शहरों में भेज रहा है ताकि वे उम्दा रोजगार पा सकें। हमारे देश की महिलाएं अभी बदलाव के इस संक्रमण काल से गुजर रही हैं जिसमें उन्हें शहरी जीवन से तालमेल बिठाने के बारे में काफी कुछ सीखना है। लेकिन बदलाव की इस कड़ी में शहरी समाज उनसे ज्यादा अपेक्षाएं लगा बैठा है। इस क्रम में वह उन्हें कोई सराहना देने की बजाय दुत्कारने पर आमादा है, जिससे महिलाएं उपेक्षित महसूस कर रही हैं। ऐसी स्थिति में जब उन्हें घर और दफ्तर, दोनों मोर्चों पर उलाहने और ताने मिलते हैं तो जीवन में असंतुष्टि बढ़ती चली जाती है और सुविधापूर्ण शहरी जीवन भी कष्टकर लगने लगता है।

विश्व बैंक द्वारा जारी रिपोर्ट ‘महिला, कारोबार और कानून 2015’ में भारतीय कामकाजी स्त्रियों के संदर्भ में बताया गया था कि आज भले ही महिलाओं को पुरुषों के बराबर अधिकार हासिल होने का दावा किया जा रहा हो, पर सच्चाई यह है कि उन्हें हर मामले में पति का आदेश मानना पड़ता है, वे अपनी छोटी-छोटी जरूरतों की पूर्ति के लिए पति के पैसे और आदेश की मोहताज हैं। महिलाओं को शहरों में एक तरह के सांस्कृतिक शून्य का भी सामना करना पड़ता है। भारत के शहरों में परंपरागत संस्कृति के ढांचे टूट रहे हैं और आधुनिक शहरी शिष्टाचार सिर्फ महिलाओं के मामले में नहीं, किसी भी मामले में आमतौर पर नदारद है। इस वजह से ज्यादातर शहर महिलाओं के नजरिये से आक्रामक और असुरक्षित बन गए हैं।

अन्य विकासशील देशों की तरह भारत में भी महिलाएं बड़ी तादाद में कामकाजी हुई हैं और घर से बाहर उनकी मौजूदगी बढ़ी है। ऐसे में, पुरुष प्रधान समाज में एक सांस्कृतिक बदलाव हो रहा है, जिसके लिए बहुत से पुरुष तैयार नहीं हैं और यह महिलाओं के प्रति उनके व्यवहार में आक्रामकता के रूप में प्रकट होता है। शहरों में बड़े पैमाने पर लोग आकर बस रहे हैं, जिससे शहरों की संरचना अस्थिर हो रही है। एक मायने में शहर जड़ों से उखड़े हुए ऐसे लोगों की शरणस्थली बनते जा रहे हैं, जो शहरी संस्कृति में अपनी जगह नहीं बना पा रहे हैं। इस तरह एक मायने में भारतीय शहर संस्कृतियों के टकराव की जगह बन गए हैं, जहां घोर सामंती संस्कृति से लेकर अत्याधुनिक पश्चिमी संस्कृति तक एक साथ मौजूद हैं। इन संस्कृतियों के बीच टकराव आक्रामक और कभी-कभी हिंसक रूप भी धारण कर लेता है।

शहरी महिलाओं को लेकर पैदा हो रही इन सामाजिक-सांस्कृतिक समस्याओं का हल सुधार के प्रयासों और आंदोलनों में है। लेकिन विडंबना है कि आजादी के आंदोलन के दौरान या आजादी के बाद के शुरुआती दशकों में जिस तरह कई सामाजिक-सांस्कृतिक सुधारों के आंदोलन चले, वैसे बाद में नहीं चले। इसकी वजह से कई आर्थिक-राजनीतिक बदलावों के सांस्कृतिक नतीजे बहुत सकारात्मक नहीं रहे। शहरों में महिलाओं के सम्मान और सुरक्षा का सवाल भी इसी तरह के सांस्कृतिक शून्य की ओर इशारा करता है।

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