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राजनीतिः सेहत पर तंबाकू का कहर

तंबाकू का सेवन असमय मौत की दूसरी सबसे बड़ी वजह और बीमारियों को न्योता देने के मामले में चौथी बड़ी वजह है। यही नहीं, दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों में तीस प्रतिशत लोगों की मौत तंबाकू उत्पादों के सेवन से होती है। अगर सरकारें सिगरेट कंपनियों के खिलाफ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएं और कठोर कदम उठाएं तो विश्व 2040 तक तंबाकू और उससे उत्पन्न होने वाली भयानक बीमारियों से मुक्त हो सकता है।

Author July 3, 2018 03:50 am
देश में नशाखोरी किस कदर बढ़ी है यह इसी से समझा जा सकता है कि पिछले वर्षों में मादकपदार्थों की तस्करी के करीब चालीस हजार मामले दर्ज हुए हैं और इनमें से सबसे अधिक मामले पंजाब के हैं।

एक कल्याणकारी राज्य की जिम्मेदारी होती है कि वह अपने नागरिकों के शारीरिक व मानसिक स्वास्थ्य की फिक्र करे। लेकिन यह तभी संभव है जब राज्य नशाखोरी पर लगाम कसेगा। यह तथ्य है कि देश के लोगों के बिगड़ते स्वास्थ्य के लिए शराब और तंबाकू उत्पाद ही सबसे ज्यादा जिम्मेवार हैं और इनके सेवन से देश में हर वर्ष लाखों लोगों की असामयिक मौत हो रही है। जबकि 2006 में सर्वोच्च न्यायालय कह चुका है कि केंद्र व राज्य सरकारें संविधान के 47वें अनुच्छेद पर अमल करें यानी शराब की खपत घटाएं। लेकिन सरकारों का रवैया ठीक इसके उलट है। वे शराब पर पाबंदी लगाने के बजाय उसे बढ़ावा दे रही हैं। अच्छी बात यह है कि बिहार सरकार ने शराब की बिक्री पर पूर्णत: प्रतिबंध लगा रखा है।

पिछले साल जन-स्वास्थ्य और नीति विशेषज्ञों के एक अंतरराष्ट्रीय संगठन ने विश्वप्रसिद्ध स्वास्थ्य पत्रिका ‘लांसेट’ को पत्र लिख कर अपील की है कि पूरे विश्व में तंबाकू की बिक्री पर 2040 तक रोक लगनी चाहिए, अन्यथा इस सदी में एक अरब लोग धूम्रपान और अन्य तंबाकू उत्पादों की भेंट चढ़ जाएंगे। विश्व स्वास्थ्य संगठन का भी कहना है कि तंबाकू के सेवन से प्रतिवर्ष साठ लाख लोगों की मौत हो रही है और तंबाकू सेवन कर रहे लोगों को तरह-तरह की बीमारियों का सामना करना पड़ रहा है। एसोचैम के सर्वेक्षण से भी उद्घाटित हो चुका है कि महानगरों में युवा कामकाजी महिलाओं में धूम्रपान की लत तेजी से बढ़ती जा रही है। एसोचैम का यह सर्वे देश के दस शहरों (अमदाबाद, बेंगलुरु, चेन्नई, दिल्ली-एनसीआर, हैदराबाद, जयपुर, कोलकाता, मुंबई, पुणे और लखनऊ) की 22 से 30 वर्ष के आयुवर्ग की तकरीबन दो हजार महिलाओं से बातचीत पर आधारित है।

इस सर्वे के मुताबिक युवा महिलाओं ने स्वीकार किया है कि वे कामकाज के भारी बोझ के तनाव को दूर करने के लिए अथवा मित्र-संबंधियों के आग्रह पर धूम्रपान करती हैं। विशेषज्ञों की मानें तो तंबाकू का सेवन असमय मौत की दूसरी सबसे बड़ी वजह और बीमारियों को उत्पन करने के मामले में चौथी बड़ी वजह है। यही नहीं, दुनिया में कैंसर से होने वाली मौतों में तीस प्रतिशत लोगों की मौत तंबाकू उत्पादों के सेवन से होती है। हालांकि स्वास्थ्य विशेषज्ञों को उम्मीद है कि अगर विभिन्न देशों की सरकारें सिगरेट कंपनियों के खिलाफ राजनीतिक इच्छाशक्ति दिखाएं और कठोर कदम उठाएं तो विश्व 2040 तक तंबाकू और उससे उत्पन होने वाली भयानक बीमारियों से मुक्त हो सकता है। आकलैंड विश्वविद्यालय के विशेषज्ञ रॉबर्ट बिगलेहोल के मुताबिक सार्थक पहल के जरिए तीन दशक से भी कम समय में तंबाकू को लोगों के दिलोदिमाग से बाहर किया जा सकता है। लेकिन इसके लिए सभी देशों, संयुक्त राष्ट्र और विश्व स्वास्थ्य संगठन जैसी अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं को एक मंच पर आना होगा।

लोगों को अपनी कमाई का एक बड़ा हिस्सा तंबाकू सेवन से उत्पन्न बीमारियों से निपटने में खर्च करना पड़ रहा है। स्वास्थ्य व परिवार कल्याण मंत्रालय तथा विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट को मानें तो वर्ष 2011 में केवल तंबाकूजनित बीमारियों के इलाज पर देश के सकल घरेलू उत्पाद का 1.16 फीसद यानी एक लाख पांच हजार करोड़ रुपए खर्च हुआ। गौर करें तो यह धनराशि केंद्र तथा राज्य सरकारों द्वारा स्वास्थ्य के क्षेत्र में 2011-12 में जितना खर्च किया गया था उससे तकरीबन बारह फीसद अधिक है। देश की जीडीपी का यह हिस्सा जो तंबाकूजनित बीमारियों के इलाज पर खर्च हो रहा है अगर उसे गरीबी और कुपोषण मिटाने पर खर्च किया जाए तो उससे काफी सकारात्मक परिणाम मिलेंगे। लेकिन विडंबना यह है कि इस दिशा में कोई ठोस पहल नहीं हो रही है।

देश में नशाखोरी किस कदर बढ़ी है यह इसी से समझा जा सकता है कि पिछले वर्षों में मादकपदार्थों की तस्करी के करीब चालीस हजार मामले दर्ज हुए हैं और इनमें से सबसे अधिक मामले पंजाब के हैं। पिछले वर्ष भारतीय चिकित्सा अनुसंधान परिषद के एक सर्वेक्षण से खुलासा हुआ कि कम उम्र के बच्चे धूम्रपान की ओर तेजी से आकर्षित हो रहे हैं और यह उनके स्वास्थ्य के लिए बेहद खतरनाक है। रिपोर्ट में कहा गया है कि सत्तर फीसद छात्र पंद्रह साल से कम उम्र में ही नशीले उत्पादों मसलन पान मसाला, सिगरेट, बीड़ी और खैनी का सेवन शुरूकर देते हैं। अभी गत वर्ष ही स्वीडिश नेशनल हेल्थ एंड वेल्फेयर बोर्ड और ब्लूमबर्ग फिलांथ्रोपिज के शोध ने बताया कि धूम्रपान से हर वर्ष छह लाख से अधिक लोग मरते हैं जिनमें दो लाख से अधिक बच्चे व युवा होते हैं।

लांसेट की एक रिपोर्ट बताती है कि धूम्रपान न करने वाले चालीस फीसद बच्चों और तीस फीसद से अधिक महिलाओं-पुरुषों पर ‘सेकेंड धूम्रपान’ का घातक प्रभाव पड़ता है। वे शीघ्र ही दमा और फेफड़े के कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के शिकार बन जाते हैं। याद होगा, गत वर्ष विश्व स्वास्थ्य संगठन के ‘तंबाकू मुक्त पहल’ (टुबैको-फ्री इनिशिएटिव) के प्रोग्रामर डॉ एनेट ने धूम्रपान को लेकर गहरी चिंता जताते हुए कहा था कि अगर लोगों को इस बुरी लत से दूर नहीं रखा गया तो इसके गंभीर परिणाम भुगतने होंगे। यह किसी से छिपा नहीं है कि गांवों और शहरों में हर जगह तंबाकू उत्पाद उपलब्ध हैं और युवा वर्ग उनका आसानी से सेवन कर रहा है। अगर इनकी बिक्री पर रोक लगती है तो निश्चित ही इस जहर का दुष्प्रभाव युवाओं की रगों में नहीं दौड़ेगा।

बेहतर होगा कि सरकार इस पर विचार करे कि नौजवानों को इस जहर से कैसे दूर रखा जाए और उन्हें किस तरह स्वास्थ्य के प्रति सचेत किया जाए। निश्चित रूप से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी बार-बार नौजवानों को नशाखोरी के विरुद्ध सचेत कर रहे हैं। लेकिन आवश्यक यह भी है कि नशाखोरी के विरुद्ध कड़े कानून बनाए जाएं। यह सही है कि सार्वजनिक स्थानों पर धूम्रपान रोकने के लिए कानून और कठोर अर्थदंड का प्रावधान किया गया है। लेकिन सच्चाई यह भी है कि कानून के बावजूद युवाओं में जहर घोलती यह बुरी लत फैलती ही जा रही है। कानून के बावजूद बस स्टैंड, रेलवे स्टेशन, अस्पताल और अन्य सार्वजनिक स्थलों पर विशेष रूप से युवाओं को धूम्रपान करते देखा जा सकता है। यह स्थिति इसलिए बनी हुई है कि कानून का कठोरता से पालन नहीं हो रहा है।

उचित होगा कि धूम्रपान के खिलाफ न सिर्फ कड़े कानून बनाए जाएं बल्कि उनका सही ढंग से क्रियान्वयन भी हो। बेहतर होगा कि उनकी बिक्री पर ही रोक लगा दी जाए या अत्यधिक सीमित कर दी जाए। लोगों को धूम्रपान से दूर रखने के लिए यह भी आवश्यक है कि उससे उत्पन्न होने वाली खतरनाक बीमारियों से अवगत कराया जाए। इसके लिए सरकार और स्वयंसेवी संस्थाओं, सभी को आगे आना होगा। इस दिशा में स्कूल महती भूमिका निभा सकते हैं। इसलिए कि स्कूलों में होने वाली सांस्कृतिक गतिविधियां और खेलकूद बाल-मन पर सकारात्मक असर डालते हैं। इन गतिविधियों के सहारे बच्चों में नैतिक संस्कार विकसित किए जा सकते हैं।

पहले स्कूली पाठ्यक्रमों में नैतिक शिक्षा अनिवार्य होती थी। शिक्षक बच्चों को आदर्श व प्रेरणादायक किस्से-कहानियों के माध्यम से सामाजिक-राष्ट्रीय सरोकारों से जोड़ते थे। धूम्रपान के खतरनाक प्रभावों को रेखांकित कर उनसे दूर रहने की शिक्षा देते थे। लेकिन अब स्कूली पाठ्यक्रमों से नैतिक शिक्षा गायब है। उचित होगा कि तंबाकू उत्पादों के पैकेटों पर पचासी फीसद सचित्र चेतावनी छापने के नियम का कड़ाई से पालन कराया जाए और साथ ही तंबाकू उत्पादों की बिक्री बंद करने की दिशा में ठोस प्रयास हो।

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