ताज़ा खबर
 

राजनीतिः और भी अहम है जीवन की परीक्षा

अभिभावकों की अति महत्त्वाकांक्षी प्रवृत्ति के कारण आज बच्चों से उनका बचपन छिनता जा रहा है। जबकि उम्र के हर पड़ाव की अपनी महत्ता है। हर अभिभावक अपने बच्चे को सर्वोच्च अंक हासिल करता हुआ देखना चाहता है। डॉक्टर, इंजीनियर और आइएएस, आइपीएस बनाने की चाह में बच्चों की रुचि, क्षमता, स्वाभाविकता और सर्जनात्मकता की अनदेखी की जा रही है। बच्चों के मनोभावों को समझने वाला कोई नहीं है।

Author May 29, 2018 03:48 am
बच्चों के साथ बड़ों को भी समझना चाहिए कि सफलता की राह में असफलता एक बाधा नहीं, एक सबक की तरह है।

देवेंद्र जोशी

विद्यालयी परीक्षा से बढ़ कर है जीवन की परीक्षा। स्कूली परीक्षाओं में मिलने वाली सफलता-असफलता व्यक्ति को जीवन में आने वाली कठिनाइयों के लिए तैयार करती है। परिणाम परीक्षा का हो या प्रतिस्पर्धा का, उसमें हमेशा एक संदेश छिपा होता है, जिसे समझने की आवश्यकता है। सफलता उत्साह बढ़ाती है तो असफलता अवसाद या तनाव का कारण बनती है। कभी-कभी यह अवसाद युवाओं और छात्रों की आत्महत्या का कारण भी बन जाता है। कभी परीक्षा में सफलता तो कभी अच्छे अंकों को लेकर हमारे युवा हताश हो जाते हैं। उपभोक्तावाद ने एक दूसरे की समस्या को समझने की जीवनशैली ही समाप्त कर दी है। हर व्यक्ति हर जगह सिर्फ सफलता चाहता है, जो कि प्रकृति और जीवन की द्वंद्वात्मकता के खिलाफ है। सफलता-असफलता, जीत-हार, स्वीकृति-अस्वीकृति में से केवल सफलता, जीत या स्वीकृति का वरण करना जीवन को एकपक्षीय बनाना होगा। जिस बचपन को कभी हम अल्हड़, मस्तमौला, बेफिक्र मानते थे वह आज कहीं खो गया है। युवाओं की आत्महत्याओं के अनेक कारणों में एक प्रमुख कारण सामाजिक अलगाव और अस्वीकृति का भाव है। आज किसी भी काम के लिए ‘नहीं’ सुनना बर्दाश्त नहीं है। ऐसे में असहिष्णुता और हिंसा में तो बढ़ोतरी होगी ही।

राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के अनुसार 2013 में भारत में दस से चौदह वर्ष के 3594 बच्चों ने आत्महत्या की और 2014 में चौदह से कम उम्र के 1700 बच्चों ने तथा 14 से 18 वर्ष आयु के 9230 बच्चों ने आत्महत्या की। इसके लिए निराशा, अस्वीकृति, विफलता, अमानवीय /अपमानजनक व्यवहार, उपेक्षा को महत्त्वपूर्ण कारण माना गया। जबकि इस आयु में आत्महत्या की कोई खास वजह भी नजर नहीं आती है। न नौकरी की चिंता, न असुरक्षा का भाव, फिर यह पीढ़ी अपने को आत्महत्या की तरफ क्यों धकेल रही है? इसके लिए समूचा परिवेश ही जिम्मेवार है, जिसके पास समावेशी विकास का कोई प्रारूप ही नहीं है। आज हम एक ऐसे समाज की ओर बढ़ रहे हैं जहां स्मार्ट टेक्नोलॉजी पर तो ध्यान दिया जा रहा है लेकिन बच्चों की स्मार्टनेस को नजरअंदाज किया जा रहा है। यह जरूरी है कि बच्चों को अपनी उम्र के हिसाब से बढ़ने दिया जाए।

सफलता-असफलता से बढ़ कर है उसके लिए किया गया संघर्ष। किसी एक परीक्षा की सफलता न तो जीवन में सफलता की गारंटी देती है और न ही असफलता के साथ सबकुछ खत्म हो जाता है। सफलता-असफलता जीवन यात्रा के पड़ाव मात्र हैं, मंजिल नहीं। गीता कहती है कि जीवन की सार्थकता कर्म करने में है, परिणाम चाहे जो हो। इसीलिए फल अर्थात परिणाम को ‘मा फलेषु कदाचन’ कह कर उस पर ध्यान न देने की बात कही गई है। जिंदगी हर कदम एक नई जंग है। एक परीक्षा खत्म होती नहीं, उसके पहले दूसरी परीक्षा शुरू हो जाती है। जीवन में भी नित नई चुनौतियां हैं। ऐसे में किसी एक सफलता-असफलता या जय-पराजय पर ठहर कर रुकना या खुशी अथवा गम में डूब जाना जीवन की नियति नहीं है। जीवन बिना रुके बिना ठहरे चलने का नाम है ।

व्यक्ति की सफलता का मूल्यांकन करते समय हम अकसर यह भुला बैठते हैं कि सफलता पाने की कोशिश में वह कितनी बार असफल रहा। जबकि सच तो यह है कि असफलता का सामना किए बिना किसी के लिए भी सफलता को प्राप्त कर पाना संभव नहीं है। ऐसे अनेक उदाहरण मौजूद हैं जिनमें असफलता के बाद व्यक्ति ने सफलता प्राप्त की। तभी तो असफलता को सफलता की सीढ़ी कहा गया है। यह आप पर निर्भर करता है कि आप उसे कैसे लेते हैं। हर असफलता आपको कुछ सिखाती है। असफलता की राह में मिलने वाली सीख को समझ कर जो आगे बढ़ जाता है वही सफल हो पाता है। सफलता के लिए लक्ष्य और योजना जितनी जरूरी है उतनी ही जरूरी है असफलता का सामना करने की ताकत। जिस दिन आप तय करते हैं कि आपको सफलता पाना है, उसी दिन आपको असफलता का सामना करने के लिए खुद को तैयार कर लेना चाहिए। क्योंकि असफलता ही वह कसौटी है जिस पर आपको परखा जाता है कि आप सफलता के योग्य हैं अथवा नहीं।

यदि आप में दृढ़ इच्छाशक्ति और असफलता का सामना कर आगे बढ़ने की सामर्थ्य है तो आपको सफल होने से कोई रोक नहीं सकता। अंग्रेजी की एक कहावत ‘स्ट्रगल ऐंड शाइन’ से हमेशा मुश्किल में प्रेरणा लेते रहना चाहिए। कोई जरूरी नहीं कि हर बार व्यक्ति को सफलता या जीत ही मिले। जीवन में मिलने वाली अप्रत्याशित विफलता व चुनौतियों के बीच बिना विचलित हुए संघर्ष-पथ पर डटे रहने वाले को ही सफलता के वरण का अधिकार है। विज्ञान भी कहता है कि जब कोई अणु टूट कर पुन: अपनी पूर्व अवस्था में आता है तो पहले से अधिक मजबूत होता है। इसी तरह हम किसी परेशानी या चुनौती का सामना करने के बाद पहले से अधिक मजबूत हो जाते हैं।

अभिभावकों की अति महत्त्वाकांक्षी प्रवृत्ति के कारण आज बच्चों से उनका बचपन छिनता जा रहा है। जबकि उम्र के हर पड़ाव की अपनी महत्ता है। हर अभिभावक अपने बच्चे को सर्वोच्च अंक हासिल करता हुआ देखना चाहता है। डॉक्टर, इंजीनियर और आइएएस, आइपीएस बनाने की चाह में बच्चों की रुचि, क्षमता, स्वाभाविकता और सर्जनात्मकता की अनदेखी की जा रही है। बच्चों के मनोभावों को समझने वाला कोई नहीं है। उनसे मां-बाप की हां में हां मिलाने वाले एक रोबोट बालक की अपेक्षा की जा रही है। यही सब बच्चों में अवसाद का कारण है। सरकार, समाज, परिवार, पड़ोस और स्कूल का दायित्व है कि बच्चों के आसपास सामूहिकता और भावनात्मकता का परिवेश बनाया जाए। उनकी बेचैनी और असंतुष्टि दूर की जाए। आज के प्रतिस्पर्धात्मक समाज में बच्चे समय से पहले वयस्क होते जा रहे हैं। यह युग ऐसा है जिसमें स्वयं की आवश्यकता की पूर्ति में दूसरों को समाहित करने की प्रवृत्ति विलुप्त होती जा रही है। आवश्यकता इस बात की है कि बच्चों की मासूमियत और भावुकता को हर हाल में बनाए रखा जाए। उन्हें इस तरह तैयार किया जाए कि वे सफलता-असफलता को समान रूप से स्वीकार कर सकें। उनसे उनकी क्षमता और योग्यता से अधिक की अपेक्षा न की जाए। उनमें निर्णय लेने की क्षमता का विकास किया जाए।

बच्चों के साथ बड़ों को भी समझना चाहिए कि सफलता की राह में असफलता एक बाधा नहीं, एक सबक की तरह है। असफलता हमें सिर्फ यह बताती है कि सफलता पाने के प्रयास में कुछ गलती या कमी रह गई है जिसे सुधारे जाने की आवश्यकता है। जब भी कोई व्यक्ति जीवन में असफलता का सामना करता है तो उसके सामने दो रास्ते होते हैं। पहला यह कि वह जीवन में मिलने वाली अप्रत्याशित विफलता से निराश हो जाए और अपने भाग्य को कोसने लगे। दूसरा यह कि वह जीवन में मिलने वाली असफलता को स्वीकार करे और उससे सीख ले। तय आपको करना है कि आप असफल होने के बाद कौन-सा रास्ता अपनाते हैं। जीवन में असफलता मिलने पर उससे घबराने के बजाय उसका डट कर सामना करें और सोचें कि गलती कहां हुई? ऐसा क्या कारण रहा कि असफलता मिली। जब कारण मालूम पड़ जाए तो एक अच्छी योजना के साथ उसे दूर करने में जुट जाएं। कारण जानने के बाद उससे यह सीख ग्रहण करें कि जिन कारणों से असफलता मिली अब उन्हें कभी दोबारा जीवन में नहीं आने देंगे।

Hindi News से जुड़े अपडेट और व्‍यूज लगातार हासिल करने के लिए हमारे साथ फेसबुक पेज और ट्विटर हैंडल के साथ गूगल प्लस पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News App