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राजनीतिः ढलान की ओर जाती शिक्षा

केंद्रीय व राज्य विश्वविद्यालयों और आइआइटी, एनआइटी, आइआइएम जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में शिक्षकों की भारी कमी है। यह समस्या उच्च शिक्षा के विकास और शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के मार्ग में बाधा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार देश भर में पांच सौ चौवन सरकारी और दो सौ छियानवे निजी विश्वविद्यालय हैं। केंद्र सरकार के एक सौ सत्तर और राज्य सरकारों के तीन सौ चौरासी विश्वविद्यालय हैं। परंतु दूसरे समृद्ध देशों की तुलना में इन शिक्षण संस्थानों की सुविधा बहुत ही साधारण है।

Author May 31, 2018 04:45 am
भारत के लगभग हर बड़े शहर में आजकल विविधतापूर्ण विषयों के महाविद्यालय और विश्वविद्यालय छा रहे हैं। औसतन हर युवा अपनी पुरानी पीढ़ी से अधिक बेहतर विकल्पों के साथ पढ़-लिख रहा है।

शास्त्री कोसलेंद्र दास

भारत के लगभग हर बड़े शहर में आजकल विविधतापूर्ण विषयों के महाविद्यालय और विश्वविद्यालय छा रहे हैं। औसतन हर युवा अपनी पुरानी पीढ़ी से अधिक बेहतर विकल्पों के साथ पढ़-लिख रहा है। पूरे देश में युवा उच्च शिक्षा के लिए आतुर हैं। इंजीनियरिंग, आइटी, पत्रकारिता, मेडिकल और कला व मानविकी के छात्रों की पूरे देश में भरमार है। देहात से लेकर शहरों तक छात्रों में उच्च शिक्षित होने का उत्साह और उमंग एक महासागर की तरह है। पर प्रश्न है कि क्या इस ओर किसी सरकार या संगठन का ध्यान है? इसका जवाब ‘हां’ और ‘ना’ में नहीं हो सकता। मौजूदा दौर में सरकारों का ध्यान सिर्फ खानापूर्ति में लगा है, जबकि राजनीतिक संगठन क्षुद्र स्वार्थों को पूरा करने के लिए उच्च शिक्षा केंद्रों से जुड़े हैं।

क्या यह शर्म की बात नहीं है कि जो छात्र थोड़ा भी योग्य है, वह यहां से पलायन कर अच्छी नौकरी की तलाश में विदेश चला जाता है। हमारी प्रतिभा खुद हमारे ही काम नहीं आ रही। ऐसे में सवाल उठना स्वाभाविक है कि कैसी तो हमारी सरकारें हैं और कैसे उनके खोखले दावे हम देख रहे हैं? एक ओर भारतीय युवा-ऊर्जा की यह दशा हो रही है, दूसरी ओर हमारे कर्णधार ‘भाषण’ में व्यस्त हैं! क्या यह भारत के भविष्य के लिए ठीक संदेश है? इधर, विश्वविद्यालय शिक्षकों और कर्मचारियों की कमी से जूझ रहे हैं, उधर राजनेता जाति और धर्म के वोट गिनने में लगे हैं! आरक्षण का नासूर असमानता की खाई को लगातार बढ़ा रहा है। ऐसे में क्या यह जरूरी नहीं है कि नागरिक समानता के धरातल पर आरक्षणमुक्त विश्वविद्यालय स्थापित हो ताकि छात्रों की पढ़ने में रुचि जगे।

राष्ट्र निर्माण के अनेक महत्त्वपूर्ण कार्य शिक्षण केंद्रों से संचालित हुए हैं। पर पिछले कुछ वर्षों से यह शिकायत आम है कि शिक्षा क्षेत्र की आशाओं और उपलब्धियों में भारी व्यवधान आया है। खासकर उच्च शिक्षा के हालात गिर रहे हैं। बौद्धिक स्तर लगभग गिर रहा है। दूसरी ओर विद्यार्थियों की अप्रत्याशित बढ़ती संख्या चिंता का विषय है। इससे निपटने के सुझाव हैं, पर वे व्यवहार में सफल होते नहीं दिखते। सरकारें इस समस्या को पाटने के लिए विश्वविद्यालय तो खोल रही हैं, पर उनमें से अधिकांश शिक्षण संस्थान राजनीति के गढ़ बनते जा रहे हैं। निस्संदेह देश में उच्च शिक्षा का व्यापक विस्तार हुआ है। फिर भी जनसंख्या की मांग को देखते हुए यह विस्तार मामूली है। साठ के दशक में उच्च शिक्षा में पढ़ने वाले छात्रों की संख्या मात्र एक लाख उन्नीस हजार थी, जो 1970 में यह संख्या बढ़ कर सात लाख साठ हजार हो गई। अब यह संख्या पैंतीस करोड़ के पार है, जिसमें लड़कियों की भागीदारी सैंतालीस प्रतिशत के करीब है। परंतु यह सत्य है कि विश्वविद्यालयों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ी है, लेकिन उस अनुपात में शिक्षा-सुविधाओं की वृद्धि नहीं हुई है। इन शिक्षा सुविधाओं के लिए आजादी के बाद उच्च शिक्षा के हालात का जायजा लेने के लिए अगस्त, 1949 में बने राधाकृष्णन आयोग को विश्वास था कि विश्वविद्यालय राष्ट्र की आकांक्षा और आशा के अनुरूप अपने को ढाल लेंगे। लेकिन राधाकृष्णन आयोग की यह उम्मीद पूरी होना अभी बाकी है।

थोड़े दिन पहले मानव संसाधन विकास मंत्रालय की स्थायी समिति ने राज्यसभा में पेश रिपोर्ट में कहा है कि केंद्रीय व राज्य विश्वविद्यालयों और आइआइटी, एनआइटी, आइआइएम जैसी प्रतिष्ठित संस्थाओं में शिक्षकों की भारी कमी है। यह समस्या उच्च शिक्षा के विकास और शिक्षा की गुणवत्ता बनाए रखने के मार्ग में बाधा है। विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के अनुसार देश भर में पांच सौ चौवन सरकारी और दो सौ छियानवे निजी विश्वविद्यालय हैं। केंद्र सरकार के एक सौ सत्तर और राज्य सरकारों के तीन सौ चौरासी विश्वविद्यालय हैं। परंतु दूसरे समृद्ध देशों की तुलना में इन शिक्षण संस्थानों की सुविधा बहुत ही साधारण है। एक ओर शिक्षा केंद्रों में विद्यार्थियों की संख्या बढ़ रही है, दूसरी ओर बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं। समिति ने जानकारी दी है कि देश के चालीस केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों के स्वीकृत दो हजार चार सौ सत्रह पदों में एक हजार दो सौ बासठ पद खाली पड़े हैं। समिति ने चिंता जताई है कि उच्च शिक्षा की स्थिति गंभीर है और निकट भविष्य में इसमें सुधार की कोई संभावना नहीं है। पर्याप्त और योग्य शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित करना गुणवत्तापूर्ण शिक्षण के लिए जरूरी है। समिति ने सरकार को सभी विश्वविद्यालयों में प्रोफेसरों की सेवानिवृत्ति आयु पैंसठ वर्ष किए जाने और वेतन संरचना में सुधार करने के सुझाव दिए हैं। भर्ती प्रक्रिया को पद रिक्त होने से पहले ही प्रारंभ करने को कहा है।
शताब्दियों से हम बराबर अभिमान करते आ रहे हैं कि भारत एक सभ्य देश है, जिसने दुनिया भर को ज्ञान और विज्ञान बांटा। हमारे पुरखों ने रामायण में शिक्षा के श्रेष्ठ परिणाम के उच्चादर्शों का प्रतिपादन किया। तंत्र शास्त्र के विद्वान सर जॉन उड्रफ अक्सर यही सवाल करते थे, ‘क्या भारत सभ्य है?’ अपनी सोच-समझ के आधार पर उन्होंने तय किया कि भारत की सभ्यता के मूल में उसकी सुव्यवस्थित शिक्षा पद्धति है। यह शिक्षा व्यवस्था मानव को उज्ज्वल दर्शन देती है, साथ ही व्यक्ति की रुचि के आधार पर उसे गुणवत्तापूर्ण जीवन प्रदान करती है।

विश्वविद्यालय ज्ञान साधना के मंदिर हैं। हालांकि अब यह धारणा शिथिल हो रही है कि विश्वविद्यालय की शिक्षा का एकमात्र उद्देश्य सिर्फ ज्ञान-चर्चा है। उन्हें उत्कृष्ट बनाने के लिए दो बातों पर ध्यान देना जरूरी है- पहला शोध और दूसरा प्रकाशन। उनमें शैक्षणिक संकाय की स्थिति, छात्रों की संख्या, प्रोफेसरों की छवि और अंतरराष्ट्रीय पाठ्यक्रम की व्यवस्था पर ध्यान देना जरूरी है। शैक्षणिक गतिविधियां, छात्रों में बहस की क्षमता में बढ़ोतरी और स्तरीय शोध की रुचि उत्पन्न करने से ये संस्थाएं अंतरराष्ट्रीय छवि बना सकती हैं। केंद्र व राज्यों को चाहिए कि वे विश्वविद्यालयों में छात्रों से लिए जाने वाले शुल्क पर अनुदान दें और गुणात्मकता बनाए रखने के लिए वहां निरंतर निगरानी करें।

विश्वविद्यालयों के विकास के लिए चार बातें महत्त्वपूर्ण हैं। पहली यह कि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की चयन प्रक्रिया को सुधारा जाए। राजनीतिक प्रभाव से विश्वविद्यालयों में घुसे प्राध्यापकों को चिह्नित कर उन्हें बाहर का रास्ता दिखाना जरूरी है। इन दिनों यह सुझाव भी जोर पकड़ रहा है कि विश्वविद्यालय को जिन विषयों के शिक्षकों की आवश्यकता हो, वह उसकी सूचना विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को दे। आयोग निर्धारित समय में देशव्यापी परीक्षा आयोजित कर योग्य शिक्षकों की नियुक्ति विश्वविद्यालयों में करवाए। इससे विश्वविद्यालयों में हो रही शिक्षक भर्ती में भ्रष्टाचार पर लगाम लगेगी और योग्य शिक्षकों का चयन होगा। इसके अलावा कुलपति पद की गरिमा बनाए रखने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। कुलपति के लिए प्रोफेसर पद के दस वर्ष के न्यूनतम अनुभव को विश्वविद्यालयों में कड़ाई से लागू होना चाहिए। प्राध्यापकों के ‘एकेडमिक कार्ड’ बनें, जिसमें साल भर में उनके द्वारा किए कार्यों की जानकारी विश्वविद्यालय की वेबसाइट पर हो। दूसरी बात है शोध की गुणवत्ता को बरकरार रखा जाए। पीएचडी करने के नियमों को कठोर बनाया जाए, जिससे शोधार्थी नकल करने से बचे। तीसरी बात है कि विश्वविद्यालय के शोध छात्रों को नियमित रूप से छात्रवृत्ति मिले। इससे शोधार्थी को आर्थिक चिंता न सताए।

महात्मा कबीर और रैदास के देश में यह विश्वास कौन नहीं करेगा कि गरीबी और अभाव की दुनिया में भी उत्कृष्ट ज्ञान संभव है। प्रतिभा कहीं भी हो सकती है। आर्थिक साधनों की कमी का रोना हमेशा नहीं रोया जा सकता। साधनों की कमी बाधक तत्त्व जरूर है, फिर भी वह किसी प्रतिभा को आगे बढ़ने से नहीं रोक सकती। प्रतिभा झोंपड़ियों से लेकर महलों तक सर्वत्र है। ऐसे में विश्वविद्यालयों का प्रमुख कर्तव्य प्रतिभाओं को खोजना और उन्हें प्रोत्साहन देना होना चाहिए। उन प्रतिभाओं के मार्ग में जो बाधाएं हैं, उन्हें दूर करने का संकल्प होना चाहिए।

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