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राजनीतिः निजता की सुरक्षा का सवाल

केरल हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि आखिर वह आरोग्य सेतु को अनिवार्य कैसे कर सकती है। उसने सवाल उठाया है कि अगर कुछ लोगों के पास स्मार्टफोन न हो, तो क्या उन्हें दफ्तर में प्रवेश से रोका जा सकता है? दूसरी बड़ी आपत्ति इस ऐप के जरिए लोगों की निजता में सेंध को लेकर है।

केरल हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि आखिर वह आरोग्य सेतु को अनिवार्य कैसे कर सकती है।

संजय वर्मा

आपदा के वक्त अगर आधुनिक तकनीक से कोई मदद मिल जाए, तो उसे आम लोगों से लेकर सरकारी मशीनरी तक के लिए राहत माना जाता है। इन दिनों आरोग्य सेतु ऐप को ऐसी ही एक बेजोड़ कोशिश के रूप में देखा जा रहा है। सरकार का दावा है कि इस ऐप ने देश भर में साढ़े छह सौ हॉटस्पॉटों के बारे में सरकारी मशीनरी को वक्त रहते सचेत किया। इससे सरकार को तीन सौ उभरते हॉटस्पॉटों की सटीक जानकारी मिली। इससे संबंधित सरकार का एक दावा यह भी है कि फिलहाल इसे देश में दस करोड़ लोग अपने स्मार्टफोन में डाउनलोड कर चुके हैं और यह जान बचाने का एक सटीक जरिया बन गया है। पर आरोग्य सेतु ऐप को लेकर कुछ लोगों को एतराज भी है। खासकर इसे कई मामलों में अनिवार्य करने, इसके जरिए लोगों की निजता में सेंध लगने और खुद आरोग्य ऐप की हैकिंग जैसी चीजें हैं, जिसने इसे संदिग्ध बना दिया है।

आरोग्य सेतु ऐप को लेकर उठी पहली आपत्ति इसे कई सेवाओं में अनिवार्य बनाया जाना है। भारतीय रेलवे घोषणा कर चुका है कि विशेष गाड़ियों में वही लोग यात्रा कर पाएंगे, जिनके स्मार्टफोन में आरोग्य सेतु ऐप होगा। इस अनिवार्यता का एलान करते हुए रेलवे ने साफ किया कि अगर इस ऐप के उपभोक्ता किसी संक्रमित व्यक्ति के निकट संपर्क मेंआते हैं, तो ऐप स्मार्टफोन धारक को सचेत करता है। नागरिक उड्डयन मंत्रालय ने भी घरेलू व्यावसायिक विमानन कंपनियों से कहा है कि यात्रियों के स्मार्टफोन में आरोग्य सेतु ऐप होना चाहिए। साथ ही अगर हवाई अड्डे पर यात्री और वहां काम करने वाले कर्मचारियों के फोन पर मौजूद इस ऐप में हरा संकेत (जिसका अभिप्राय कोरोना संक्रमण का कोई लक्षण मौजूद न होना है) नहीं दिखता, तो ऐसे यात्रियों-कर्मचारियों को हवाई अड्डा टर्मिनल भवन में ही प्रवेश करने की अनुमति नहीं होगी। हालांकि विमानन कंपनियों ने इस निर्देश पर यह कहते हुए ज्यादा सकारात्मक प्रतिक्रिया नहीं दी है कि अगर कोई यात्री स्मार्टफोन लेकर न चलना चाहे, तो ऐसी स्थिति से कंपनियां कैसे निपटेंगी। इसी तरह अगर हर सरकारी दफ्तर में कर्मचारियों के लिए इसे डाउनलोड करना जरूरी कर दिया गया और कुछ कर्मचारी भूलवश अपना फोन कार्यालय लेकर नहीं आए, तो ऐसी स्थिति में क्या होगा।

इन्हीं आशंकाओं के चलते हाल में केरल हाई कोर्ट ने केंद्र सरकार से पूछा है कि आखिर वह आरोग्य सेतु को अनिवार्य कैसे कर सकती है। उसने सवाल उठाया है कि अगर कुछ लोगों के पास स्मार्टफोन न हो, तो क्या उन्हें दफ्तर में प्रवेश से रोका जा सकता है? दूसरी बड़ी आपत्ति इस ऐप के जरिए लोगों की निजता में सेंध को लेकर है। कैसी विडंबना है कि आधुनिक तकनीकों का सहारा लेकर लोगों की पहचान दर्ज करने से लेकर रोगियों की पहचान तक के जितने प्रबंध सरकार कर रही है, उन सभी में कोई न कोई पेच ऐसा है जो आम लोगों की निजी जानकारियों के छीजने के प्रबंध कर देता है। सरकार के तमाम दावों और खुद आधार कार्ड बनाने और जारी करने वाली संस्था- यूनीक आइडेंटिफिकेशन अथॉरिटी ऑफ इंडिया (यूआईएडीआई) के आश्वासनों के बावजूद लोगों के मन में यह संशय आज तक बना हुआ है कि इसके लिए उनकी बायोमैट्रिक्स सूचनाओं (यानी उंगलियों, अंगूठे और पुतलियों की छाप) के अलावा अन्य जानकारियां कहीं गलत हाथों में न पड़ जाएं। अफसोस कि आधार के बेहद पुख्ता सुरक्षा प्रबंधों के बावजूद ऐसी जानकारियां कई मर्तबा सामने आ चुकी हैं, जब कहा गया कि लाखों लोगों की आधार कार्ड की जानकारियां हैकरों के हाथ लग चुकी हैं। 2018 में खुद को फ्रेंच सुरक्षा शोधकर्ता कहने वाले एक हैकर एलियट ने आंध्र प्रदेश की सरकारी वेबसाइट का यूआरएल और बायॉमेट्रिक निशान के स्क्रीनशॉट्स साझा करते हुए दावा किया था कि किस तरह आधार कार्ड स्कैन और बायोमीट्रिक डाटा खुला छोड़ दिया गया है। आधार की जानकारियों के खुलासे का यह पहला मामला नहीं था, लेकिन यूआईएडीआई ने हर बार यह प्रतिदावा किया कि आधार की जानकारियां पूरी तरह सुरक्षित हैं। विचित्र है कि उसी फ्रांसीसी हैकर ने इस बार आरोग्य सेतु ऐप को लेकर सरकार को चुनौती दी है। एलियट ने अपने ट्विटर हैंडल पर दावा किया कि वह यह देख सकता है कि इस वक्त भारत की संसद या प्रधानमंत्री कार्यालय तक में कौन-कौन बीमार है और किसी इलाके में कौन लोग कोरोना से संक्रमित हैं। एलियट के मुताबिक भारत सरकार ने आरोग्य सेतु ऐप को खुला छोड़ दिया है और दुनिया में बैठा कोई भी हैकर उसमें दर्ज सूचनाएं उड़ा सकता है।

इन्हीं समस्याओं के मद्देनजर पिछले दिनों कांग्रेस ने ‘आरोग्य सेतु’ को निजता के अधिकार का उल्लंघन करने वाला ऐप करार दिया था। उसने कहा था कि इस ऐप के जरिए हर व्यक्ति की चौबीस घंटे निगरानी की जाएगी। यह ऐप व्यक्ति के ऊपर एक जासूसी कैमरा लगाने जैसा है। यानी कोई बाहरी शख्स भले आरोग्य सेतु की हैकिंग न कर पाए, लेकिन सरकार तो जीपीएस तकनीक से लैस इस ऐप के जरिए प्रत्येक व्यक्ति की हरेक गतिविधि पर नजर रख सकेगी। साफ है कि जो ऐप यह बता सकता है कि अभी-अभी आप जिस व्यक्ति से मिले हैं और आपके मोहल्ले में जिन दो-चार लोगों ने अभी प्रवेश किया है, वे कोरोना संक्रमित हैं या नहीं, तो जाहिर है कि वह हर शख्स की पल-पल की खबर सरकार को दे सकता है।

कहा जा सकता है कि सरकार को आपकी गतिविधियों की जानकारी मिले, तो इसमें समस्या क्या है। यह तो सरकार का हक है। बेशक। अमेरिका आदि विकसित मुल्कों में किए गए ऐसे ही प्रबंधों को देखें तो सरकार तक जानकारी पहुंचने में शायद ज्यादा दिक्कत नजर न आए, लेकिन दिक्कत दूसरी है। समस्या हमारी निजी जानकारियों तक अवांछित लोगों की पहुंच को लेकर है। दूसरे, निजता से जुड़े वैसे कानूनों का हमारे देश में अभाव है, जैसे अमेरिका या ब्रिटेन में हैं। यानी वहां अगर ऐसे ऐप या निगरानी करने वाले फेस रिक्गनिजेशन जैसे आधुनिक प्रबंध कायम किए हैं, तो इसकी व्यवस्था भी की गई है कि आम लोगों की निजी जानकारियां बेची या गलत हाथों में पड़ीं, तो उसके लिए जिम्मेदार लोगों-संगठनों पर क्या कानूनी कार्यवाही होगी और कितना दंड भुगतना पड़ेगा। इधर ब्रिटेन की राष्ट्रीय स्वास्थ्य सेवा ने एक केंद्रीकृत कॉन्टैक्ट-ट्रेसिंग ऐप को खत्म करने का फैसला किया है, जिससे बटोरी गई सूचनाएं सरकारी सर्वरों से होकर गुजर रही थीं।

आरोग्य सेतु अनिवार्य करने से पहले सरकार निजता सुनिश्चित करने वाले कानूनों का प्रबंध और सूचना की लीकेज रोकने के उपाय करे। आधार कार्ड बनाने की प्रक्रिया वर्ष 2009 से हुई थी और उससे जुड़ी निजता की चिंताओं को दूर करने वाले कानूनों का प्रबंध आज तक नहीं हुआ है, तो बंदी की मौजूदा स्थितियों में ऐसे उपाय तुरत-फुरत बनाना बेहद कठिन लगता है। मगर सरकार दूसरे प्रबंध अवश्य कर सकती है। जैसे वह अमेरिका, ब्रिटेन, यहां तक कि सिंगापुर से ऐसे सबक ले सकती है, जहां ऐसे ऐप बनाते वक्त साइबर सुरक्षा के विशेषज्ञों की राय और सेवाएं ली गर्इं और अगर ऐप में सूचनाओं के लीकेज का कोई रास्ता नजर आया, तो उसे वक्त रहते दूर कर लिया गया। इसी के साथ अगर सरकार अब भी नागरिकों की निजता सुनिश्चित करने वाले उपायों-कानूनों पर तेजी से काम करेगी, तो उम्मीद की जा सकती है कि आधुनिक तकनीकों के सहारे लोगों की आवाजाही, लेनदेन आदि पर निगरानी के उसके इंतजामों को लेकर संदेह थोड़ा कम हो सकेगा।

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