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राजनीतिः दफ्न होते पर्यावरण

जिन सुदूर व दुर्गम क्षेत्रों में इंसान नहीं पहुंच सकता, वहां एक नन्ही-सी चिड़िया अपनी चोंच में कुछ दाने दबाए पहुंच जाती है और धरती पर बिखेर कर उसे हरे-भरे पेड़ों से सजा देती है। उसी का नतीजा है जो हम प्रकृति में हरियाली देख प्रफुल्लित होते हैं। विडंबना यह है कि जाने-अनजाने आज हम पक्षियों के सबसे बड़े दुश्मन बन बैठे हैं।

Author Updated: February 22, 2016 2:58 AM
प्रतीकात्मत तस्वीर

देश में पक्षियों पर संकट कम नहीं हो पा रहा है। हालात इतने बदतर हैं कि विदेश से भारत पहुंचने वाले पक्षी भी अपने वतन नहीं लौट पाते हैं। पर्यावरण-रक्षा में अहम भूमिका अदा करने वाले पक्षियों के संरक्षण को लेकर न ही केंद्र सरकार चिंतित है और न ही राज्यों की सरकारें कोई रुचि दिखा रही हैं। लिहाजा, पर्यावरण को जीवंत बनाए रखने में मददगार पक्षियों की एक सौ पचहत्तर प्रजातियां ऐसी हैं जो विलुप्त होने के कगार पर हैं।
यों तो विश्व में पक्षियों की 1 हजार 50 प्रजातियां पाई जाती हैं। जबकि अकेले भारत में तेरह सौ सौ प्रजातियां उपलब्ध हैं। भारत में तो कुल इक्कीस सौ उप-प्रजातियां देखने को मिलती हैं। यहां सबसे खास बात यह है कि अकेले उत्तराखंड में 693 प्रजातियां पाई जाती हैं। इसकी मूल वजह यह है कि यहां 64.81 फीसद क्षेत्र वनाच्छादित है। विश्व के अठारह सर्वाधिक जैव विविधता वाले क्षेत्रों में पूर्वी हिमालय भी शामिल है। बिहार में तीस से ज्यादा पक्षी-प्रजातियां हैं जिनमें पांच फीसद प्रवासी पक्षी शामिल हैं। उत्तर प्रदेश, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर और पूर्वाेत्तर के प्रदेशों में भी पच्चीस से तीस प्रजातियां पाई जाती हैं।
राजस्थान के भरतपुर स्थित केवलादेव राष्ट्रीय उद्यान है, जहां पक्षियों की सबसे ज्यादा, करीब चालीस प्रजातियां पाई जाती हैं। वैसे पूरे भारत में कुल साठ राष्ट्रीय उद्यान व अभयारण्य हैं जिनमें मात्र चार अभयारण्य ऐसे हैं जो पक्षियों के नाम पर हैं। यहां यह बताना उचित होगा कि देश के पूरे भूभाग का महज पांच फीसद कुल उद्यान व अभयारण्य हैं।
अलग राज्य बनने के बाद से, यानी बीते पंद्रह सालों में मात्र एक नया अभयारण्य (नैना देवी हिमालयी पक्षी संरक्षण) उत्तराखंड में बना है। केवल दो अनुसंधान केंद्र हैं, जिनमें एक भारतीय वन्यजीव संस्थान (उत्तराखंड), व दूसरा, कोयम्बटूर स्थित सलीम अली सेंटर ऐंड नेचर कंजरवेशन है। महाराष्ट्र में एक निजी अनुसंधान केंद्र (बांबे नेचुरल हिस्ट्री सोसायटी) है जिसको केंद्रीय अनुदान भी मिलता है।
दरअसल, जिस तरह से पक्षियों के संरक्षण को लेकर देश में काम होना चाहिए उस तरह से नहीं हो पाया है। विदेशों में ब्रिटेन व कैलिफोर्निया में पक्षियों के संरक्षण तथा अनुसंधान पर काफी कार्य किए जा रहे हैं। ब्रिटेन की सरकार ने तो पक्षियों के संरक्षण को लेकर डार्विन निधि का भी गठन किया है।
देश के हरियाणा स्थित पिंजोर, पश्चिम बंगाल के बाक्शा व गुवाहाटी में गिद्धों के संरक्षण की थोड़ी-बहुत कवायद जरूर शुरू की गई है। लेकिन न ही केंद्र और न ही राज्य सरकारों के पास पक्षियों के संरक्षण की कोई ठोस योजना है।
वर्ष 1995 में केंद्रीय वन व पर्यावरण मंत्रालय ने पक्षियों के संरक्षण के लिए वैज्ञानिकों की एक समिति का गठन किया था। उस समिति ने अपनी रिपोर्ट में नए अभयारण्य बनाने व नए अनुसंधान केंद्र खोलने की सिफारिश की। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि उक्त रिपोर्ट को भी नौकरशाही ने ठंडे बस्ते में डाल दिया।
पक्षी वैज्ञानिक इस बात को स्वीकार करते हैं कि पक्षी नहीं होते तो जंगल भी नहीं होते। क्योंकि जिन सुदूर व दुर्गम क्षेत्रों में इंसान नहीं पहुंच सकता वहां एक नन्ही-सी चिड़िया अपनी चोंच में कुछ दाने दबाए पहुंच जाती है और धरती पर बिखेर कर उसे हरे-भरे पेड़ों से सजा देती है। उसी का नतीजा है जो हम प्रकृति में चारों तरफ फैली हरियाली देख प्रफुल्लित होते हैं। लेकिन विडंबना यह है कि आज जाने-अनजाने हम पक्षियों के सबसे बड़े दुश्मन बन बैठे हैं।
असल में बदलते वक्त के साथ बढ़ते प्रदूषण, पेड़ों की अंधाधुंध कटाई, अवैध खनन, खेती का रकबा घटने, नाभिकीय विकिरण, अवैज्ञानिक ढंग से किए जा रहे निर्माण-कार्य, पक्षियों की बढ़ती तस्करी व शिकार ने देश के पर्यावरण की सूरत ही बदल दी है। दिनोंदिन बिगड़ते हालात पर वैज्ञानिक भी खासे चिंतित हैं। पक्षियों के संरक्षण व वंश-वृद्धि के लिए कोई कारगर योजना अब तक नहीं बन पाई। जहां हिमालयी मोर की संख्या का घनत्व पंद्रह साल पहले 35 प्रति वर्ग किलोमीटर था, अब घटकर 2 प्रति वर्ग किलोमीटर रह गया है।
वैज्ञानिकों की मानें तो बांधों के निर्माण के समय की जा रही ब्लास्टिंग भी पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही है। खासकर जल-स्रोत सूख रहे हैं। साथ ही, नाभिकीय विकिरण और कल-कारखानों से निकलने वाली जहरीली गैसों का असर भी मैदानी व पर्वतीय क्षेत्रों के वातावरण पर पड़ रहा है। खासकर पर्वतीय क्षेत्रों में तो पंद्रह हजार से सत्रह हजार फुट की ऊंचाई पर विचरण करने वाले पक्षी इन कृत्यों से सर्वाधिक प्रभावित हुए हैं। नतीजा यह है कि पर्वतीय क्षेत्रों में पाए जाने वाले वाले हिम गरुड़, कौवा, मैना, तोता, बटेर, कठफोड़वा, मोर, उल्लू, सोन चिरैया, गुलाबी सिर वाले बत्तख, साइबेरियन सारस, सामान्य सारस, जइंस कोर्सर, जंगली उल्लू, वाइट बिल्ड हिरण, सफेद सिर वाले बत्तख, बंगाल फ्लोरिकन, भस्मी गिद्ध, सफेद गिद्ध और लंबी चोंच वाले गिद्ध विलुप्तप्राय हैं। वैज्ञानिकों के मुताबिक, पर्वतीय क्षेत्रों में हाल फिलहाल तक गौरैया जरूर देखी गई है। पहाड़ी तीतर व चोंच से पूंछ तक 195 सेंटीमीटर वाला जटायु भी अब दुर्लभ हो गया है। कई राज्यों में तो साइबेरियन व लद््दाख से आने वाले पक्षियों की संख्या में भी चार फीसद की गिरावट आई है।
पक्षियों के संरक्षण में जुटी अंतरराष्ट्रीय संस्था बर्ड लाइफ इंटरनेशनल के वैज्ञानिकों के मुताबिक वनों की अंधाधुंध कटाई व निषेध क्षेत्रों में लोगों की आवाजाही बढ़ने से एकांत में घोंसला बना कर रहने वाले पक्षियों के सामने आवास की समस्या खड़ी हो गई है। इतना ही नहीं, प्रतिबंधित क्षेत्रों में गाड़ियों के इस्तेमाल किए जा रहे अनलेडेड पेट्रोल से जहां कीट-पतंगों की संख्या घटी है। इससे पक्षियों के सामने भोजन का संकट पैदा हो गया है। वहीं मोबाइल टावरों की तरंगों से जहां पक्षियों का दिशा ज्ञान कम हो रहा है, वहीं उनकी प्रजनन क्षमता भी प्रभावित हो रही है। कृषिभूमि के सफाए से तीन से पैंतीस फीसद तक पक्षी प्रभावित हुए हैं।
गौरैया की आबादी में आठ फीसद तक कमी आई है। ब्रिटेन की रॉयल सोसायटी आॅफ प्रोटेक्शन आॅफ बडर््स ने तो देश की गौरैया को ‘रेड लिस्ट’ में डाल दिया है। आंध्र प्रदेश विश्वविद्यालय के एक अध्ययन के मुताबिक शहरी व ग्रामीण दोनों ही क्षेत्रों में गौरैया की संख्या सात फीसद कम हो चुकी है। अध्ययन में इस बात का भी जिक्र है कि आगामी दस सालों में बारह फीसद पक्षी प्रजातियां खत्म हो सकती हैं। विश्व भर में तोतों की तीन सौ तीस प्रजातियां हैं। आने वाले पांच सालों में एक तिहाई प्रजातियों के खत्म होने का खतरा बना हुआ है, जिसमें तोते की सर्वाधिक प्रजातियों के विलुप्त होने का खतरा भारत में है।
लद््दाख, चीन, जापान, रूस, साइबेरिया, अफगानिस्तान, ईरान, बलूचिस्तान, मंगोलिया, पश्चिम जर्मनी, हंगरी व भूटान से आकाश के रास्ते अपने मुल्क आने वाले पक्षियों पर ज्यादा खतरा मंडरा रहा है। विदेशों से पोर्टचाई स्पाटबिल, टीलकूट, बहूमणि हंस, लालसर, चाहा क्रेन, आइविस व डक पक्षी विशेष रूप से भारत आते हैं। करीब तीस फीसद प्रवासी प्रजाति के पक्षी भारत आते हैं। इनमें से अधिकतर पक्षियों का शिकार किया जाता है। नतीजतन ये प्रवासी पक्षी पुन: अपने वतन नहीं लौट पाते हैं। हर साल अक्टूबर से मार्च तक आने वाले प्रवासी पक्षियों की संख्या में काफी गिरावट आई है। मूल रूप से स्वादिष्ट मांस वाले पक्षी साइबेरिया, मध्य अफ्रीका व यूरोप जैसे देशों से भारत आते हैं। अफ्रीका से आने वाले सबसे वजनदार पक्षी आस्ट्रिच का शिकार सबसे ज्यादा, जबकि अमेरिका के सबसे ज्यादा हल्के पक्षी हमिंग बर्ड का शिकार सबसे कम होता है। वैसे बीते पांच साल से भारत में इन दोनों प्रजातियों के पक्षियों में काफी कमी देखी गई है।
पक्षी वैज्ञानिकों का कहना है कि नेचुरल पार्कों के रखरखाव पर ध्यान नहीं दिया जा रहा है। हालांकि इस कार्य के लिए प्रतिवर्ष करोड़ों रुपए आबंटित किए जाते हैं लेकिन इस राशि का उचित उपयोग नहीं हो पा रहा है। वैज्ञानिकों का मानना है कि अगर यही सिलसिला बना रहा व पक्षियों की संख्या नहीं बढ़ी तो आगामी पच्चीस सालों में हवा भी विषैली हो जाएगी और इसके परिणाम भी बेहद घातक होंगे।
ऐसे विकास का कोई अर्थ नहीं जिससे मानव जीवन ही संकट में पड़ जाए। पर हो यही रहा है। दरअसल, जरूरत इस बात की है कि पर्यावरण विभाग को पक्षियों की गणना के लिए कार्य-योजना में शामिल किया जाए ताकि पक्षियों का वास्तविक आंकड़ा सामने आ सके। पक्षी संरक्षण के लिए पीपल, बरगद, गूलर, आंवला, हर्र, बहेड़ा जैसे पौधे लगाए जाने की जरूरत है।
प्रतिबंधित दवा ‘डायक्लोफेनाक’ की बिक्री बाजार में धड़ल्ले से हो रही है। इस दवा का इस्तेमाल कर रहे पशु की मौत हो जाती है तो उसका भक्षण करने वाले गिद्ध व कौए जैसे पक्षी भी लीवर तथा किडनी की बीमारी मर जाते हैं। बीते एक साल में गिद्धों की संख्या में नौ फीसद की कमी आई है। वैज्ञानिकों की मानें तो डायक्लोफेनाक का 0.22 मिलीग्राम भी पक्षियों के लिए खतरनाक है।
जाने-माने पक्षी वैज्ञानिक धनंजय मोहन का मानना है कि पक्षियों के संरक्षण के लिए बजट से ज्यादा इच्छाशक्ति होना आवश्यक है। सरकारी व गैर-सरकारी, दोनों स्तरों पर पक्षियों के संरक्षण को लेकर प्रयास होने चाहिए, तभी उन्हें बचाया जा सकता है। पक्षी संरक्षण के मसले को अलग-थलग करके नहीं देखा जाना चाहिए; इसे समूचे पर्यावरण की रक्षा, जैव विविधता की रक्षा तथा मनुष्य के बेहतर पर्यावास से जोड़ कर देखने की जरूरत है।

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