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राजनीतिः विकल्पहीनता का भ्रम

प्रधानमंत्री मोदी की सफलता लोगों के साथ उनके जुड़ाव की वजह से है, इस वजह से नहीं कि उन्हें चुनौती देने वाला कोई नहीं है।

प्रधानमंत्री मोदी के आलोचक – वे खुद को मोदी से नफरत करने वाला भी कहलाना पसंद करते हैं – एक बात पर उनकी धारावाहिकता बनी हुई है।

अनुपम खेर

मैं पिछले पांच महीनों से भारत में हूं, खूब लिख रहा हूं- कोविड पर एक किताब तैयार होने वाली है- रोचक फिल्म परियोजनाओं पर काम कर रहा हूं, खुद के साथ और कभी-कभार अपनी मां के साथ सार्थक समय बिता रहा हूं (किरण जी चंडीगढ़ में हैं)। मैं विभिन्न विषयों पर चिंतन भी कर रहा हूं। यह सर्वविदित है कि मैं अपने देश से संबंधित मामलों के बारे में भावुक और मुखर हूं। कई विषयों के बीच जिस पर मेरा ध्यान गया है, वह है प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की बारंबार राजनीतिक सफलता।

क्या यह नियति है? या कड़ी मेहनत? या फिर यह एक आसान विपक्ष के सामने होने के चलते है? मेरे विचार और अनुसंधान मुझे अलग तर्क तक ले जाते हैं। मैं अपने विचारों को साझा करने के क्रम में उन बिंदुओं को छूता चलूंगा।
प्रधानमंत्री मोदी के आलोचक – वे खुद को मोदी से नफरत करने वाला भी कहलाना पसंद करते हैं – एक बात पर उनकी धारावाहिकता बनी हुई है। उन्होंने उनके बारे में दास्तान बुन रखे हैं, उनका वर्णन करने में सभी प्रकार के विशेषणों का इस्तेमाल करते हैं। सात अक्तूबर 2001 को, जब मोदी पहली बार गुजरात के मुख्यमंत्री बने थे, तब अहम राय थी -एक साल के भीतर वे इतिहास हो जाएंगे। जल्द ही यह राय गलत साबित हुई। मुख्यमंत्री के रूप में मोदी को एक क्षेत्रीय नेता के रूप में चित्रित किया गया-मजबूत क्षत्रप- जिसका अपने गृह राज्य के बाहर कोई प्रभाव नहीं। 2013 की सर्दियों और 2014 के वसंत में यह बात चरम पर थी कि ‘मोदी चुने जाने लायक नहीं हैं’। जाहिराना तौर पर बाद की गर्मियों में इस तरह के अभियान की परियोजना चलाने वाले गलत साबित हुए। 2014 के बाद के समय में ऐसे लोग खुद को और एक दूसरे को समझाते रहे कि मोदी महज एक कार्यकाल की परिघटना हैं। अब वे पूछते हैं, क्या कोई सरकार दोबारा इतने बड़े जनादेश के साथ लौटी है।

23 मई 2018 को बंगलुरू में शपथ ग्रहण समारोह कई आंखों का आकर्षण-बिंदु बन गया। एक मंच पर भारत के राजनीतिक इंद्रधनुष के सभी सिरे, हाथ में हाथ डाले अक्षरश: एक साथ विद्यमान दिखे। उन्होंने शपथ ली कि यह महागठबंधन मोदी का अंत सुनिश्चित करेगा। ठीक एक साल बाद 23 मई 2019 को नरेंद्र मोदी और भी ज्यादा सीटें लेकर सरकार में वापस लौटे। (एक बात और, कर्नाटक में सरकार लंबे समय तक नहीं चली, कुछ महीनों बाद अपने विरोधाभासों के कारण लड़खड़ा गई।)

मई 2019 के बाद आलोचकों, निंदकों और तथाकथित मोदी नफरतियों ने भ्रम की एक और गोली लेनी शुरू कर दी- विकल्पहीनता की गोली। अब वे तर्क देते हैं ‘मोदी जीतते हैं, क्योंकि कोई विकल्प नहीं है’, ‘मोदी का आज सबसे अच्छा दोस्त विपक्ष है’, ‘केवल मोदी ही मोदी को हरा सकते हैं’।

दुर्भाग्यवश, नरेंद्र मोदी का कद जितना बढ़ रहा है, उनके आलोचकों का भ्रम उतना ही बढ़ रहा है। लोकतंत्र कभी एक ध्रुवीय नहीं हो सकता। कोई कितना भी छोटा हो जाए, हमेशा दो या अधिक ध्रुव बने रहेंगे। यह तथ्य है कि मतदान मशीन (ईवीएम) में कई उम्मीदवारों की सूची होती है, जो अलग-अलग प्रतीकों का प्रतिनिधित्व करते हैं, इससे पता चलता है कि लोकतंत्र में विकल्पों की कभी कमी नहीं रहती।

मोदी विरोधियों ने दर्जनों विकल्प तैयार कर रखे हैं। अति वामपंथियों, जिहादियों, असफल वंशवादियों, अराजकतत्वों, अलगाववादियों, यहां तक कि कई वैसे लोग भी जो पहले आरएसएस और भाजपा में काम कर चुके हैं, हर किसी ने अपनी दुकान खोल रखी है। 2013 और 2018 में मोदी की अपनी पार्टी में भी ‘विकल्प’ देखने को मिले। इसलिए, अगर कोई मोदी विरोधी आपको यह बता रहा है कि मोदी सफल हो रहे हैं क्योंकि मोदी का कोई विकल्प नहीं है, तो वह स्पष्ट रूप से झूठ बोल रहा है और भ्रमित है।

सच तो यह है, सभी विकल्पों को देखा गया, खड़ा किया गया और समर्थन दिया गया, लेकिन कोई मतदाताओं के साथ जुड़ नहीं सका। मतदाताओं ने मोदी में बार-बार विश्वास जताया है, जिन्हें वे फैसला लेने वाले, भरोसेमंद और समर्पित नेता के रूप में देखते हैं। मोदी का हर विकल्प फेल हो गया है क्योंकि उनमें से कोई भी उनकी तरह सेवा नहीं कर सकता। पिछले छह साल में उन्होंने भारत के इतिहास में सबसे बड़ा गरीबी उन्मूलन अभियान चलाया है। जनधन योजना में 40 करोड़ नागरिकों को न केवल बैंक खाते मिले, बल्कि राज्य से उचित सहायता प्राप्त करने का लीक प्रूफ तरीका भी मिला। आयुष्मान भारत, पीएम-किसान, अटल पेंशन योजना, पीएम फसल बीमा योजना और ऐसी कई और सामाजिक सुरक्षा योजनाओं ने सबसे गरीब भारतीयों को सुरक्षा कवच दिया और उन्हें गरीबी के खड्ड में गिरने से रोका। स्वच्छ भारत योजना के तहत दस करोड़ शौचालय बनाए गए और उज्ज्वला योजना के तहत आठ करोड़ घरों को धुएं के कष्ट से निजात दिलाया गया। पिछले साल ही दो करोड़ घरों में पाइप से पेयजल कनेक्शन दिए गए हैं- भारत के हर घर को 2024 तक पेयजल का कनेक्शन दे दिया जाएगा। मोदी के मातहत, सत्ता के गलियारों में अब बड़े भ्रष्टाचार की बदबू नहीं आती। रक्षा सौदों से अब कुछ चुनिंदा खानदानों की धन की हवस नहीं मिटाई जा रही, बल्कि उनके जरिए राष्ट्र की सशस्त्र सेनाओं को मजबूत किया जा रहा है।

वही मोदी जो एक बार महज मुख्यमंत्री के रूप में देखे जा रहे थे और इस लिहाज से विदेश नीति का संचालन करने में असमर्थ माने जाते थे, उन्होंने बता दिया है कि ‘इंडिया फर्स्ट’ विदेश नीति कैसी होनी चाहिए।

मोदी के तथाकथित विकल्पों में से किसने अपनी उपयोगिता साबित की है? वे कश्मीर में बाढ़ पीड़ितों के साथ दिवाली मनाने से लेकर सीमा पर सैनिकों के साथ दिखते हैं, बुजुर्ग आदिवासी महिला या एक सफाई कर्मचारी का पैर छू लेते हैं; वे झाड़ू लगाते दिख जाते हैं और लाल किले से मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में भी बोलते हैं। इन कार्यों को देख भारत खुद को मोदी से जोड़ता है। वह 130 करोड़ भारतीयों की अंतर्निहित शक्तियों की सराहना करते हैं। किस दूसरे नेता ने खिलाड़ियों, कलाकारों, सांस्कृतिक प्रतीकों और युवाओं को कोई छू लेने वाला पत्र या भावनात्मक ट्वीट लिखने के बारे में सोचा? उन्होंने लोगों के अच्छे या बुरे- हर समय में लाखों घरों के बीच परिवार के एक सदस्य के रूप में जगह बनाई है।
क्या ऐसे नेतृत्व का कोई विकल्प है? मुझे जानकर प्रसन्नता होगी।

मेरे पिता अक्सर मुझे सिखाते थे- अगर आप सच बोल रहे हैं तो आपको उसे याद नहीं रखना पड़ता। आज नरेंद्र मोदी पिछले सभी प्रधानमंत्रियों की तुलना में सबसे लंबे समय तक सेवा देने वाले देश के प्रशासनिक मुखिया बन गए हैं। बतौर मुख्यमंत्री और प्रधानमंत्री-दोनों मिलाकर उनके कार्यकाल के 19 साल हो चुके हैं। पिछले किसी प्रधानमंत्री ने दोनों पदों को मिलाकर लगातार इतनी लंबी अवधि तक काम नहीं किया। इस तरह की राजनीतिक सफलता और अपार स्नेह इसलिए उनके खाते में नहीं आए, क्योंकि उनका ‘कोई विकल्प नहीं रहा’। ऐसा इसलिए हुआ है क्योंकि मोदी ने अपने काम में खुद को डुबो लिया है। राजनीतिक बारूदी सुरंगों और उछाले जा रहे कीचड़ का जवाब उन्होंने अधिक से अधिक विकास कार्यों से दिया है। कोई आश्चर्य नहीं कि एक ओर जहां मोदी नए भारत के लिए अपना दृष्टिकोण लागू कर रहे हैं। दूसरी ओर, उनके नफरती उनके विकल्प को लेकर दो दशक पूर्व के भ्रम में उलझे हुए हैं।

-लेखक अभिनेता और फिल्म एंड टेलीविजन इंस्टीट्यूट ऑफ इंडिया के पूर्व अध्यक्ष हैं।

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