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राजनीति: महिला सुरक्षा और समाज

देश व समाज का अधिक ध्यान राजनीतिक और आर्थिक बदलावों पर केंद्रित रहता है। इसकी तुलना में सामाजिक बदलाव से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। कौन से बदलाव अच्छे हैं और कौन से बुरे, कहां हस्तक्षेप की जरूरत है, कहां नहीं, इस बारे में बहुत कम बहस होती है। इसी का नतीजा है कि भारतीय समाज में कई बुराइयां तेजी से बढ़ती चली गर्इं और समाज चुपचाप देखता रहा।

महिलाओं पर अत्याचार।

भारत डोगरा
महिला विरोधी हिंसा, विशेषकर यौन हिंसा असहनीय हद तक क्रूर रूप में बार-बार सामने आ रही है। यह सिलसिला थमने का नाम नहीं ले रहा है। विभिन्न सरकारें कई कदम उठाने का दावा करती रही हैं, पर उनका अपेक्षित असर नजर नहीं आ रहा है। इस स्थिति में यह विमर्श बहुत जरूरी है कि क्या कमी रह गई है और किस दिशा में आगे बढ़ना बहुत जरूरी है।

पहली जरूरत यह है कि समाज के बढ़ते अपराधीकरण को समग्र रूप से कम किया जाए। एक ओर गिरोहों के रूप में बड़े और छोटे अपराधी बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर प्रतिष्ठा प्राप्त सफेदपोश अपराधियों की तादाद में इजाफा चिंताजनक है। ऐसे लोग विभिन्न क्षेत्रों में बहुत शक्तिशाली हैं। जब तक विभिन्न स्तरों पर अपराधीकरण होता रहेगा और उसे संरक्षण देने की घातक प्रवृत्ति हर स्तर बनी रहेगी, तब तक यौन हिंसा भी खुले व छिपे रूप में इससे जुड़ कर बढ़ती रहेगी। कभी-कभी किसी बड़ी घटना के रूप में सामने आएगी, लेकिन अधिकतर मामलों में यह छिपी रहेगी। और ऐसा तब ज्यादा होगा जब हर तरह से संपन्न लोग इसे अंजाम देंगे, क्योंकि उन्हें किसी का भी खौफ नहीं रहेगा और संरक्षण मिलता रहेगा। अगर समाज का अपराधीकरण तेजी से हो रहा है, जहां राजनीतिक जगत और यहां तक कि आध्यत्मिक जगत सब जगह ऊंचे स्तर पर अपराधी तत्त्व पहुंच रहे हैं, वहां यौन हिंसा को कम करना कठिन ही नहीं, असंभव है। अत: समाज के अपराधीकरण को कम करना एक बड़ी जरूरत है।

महिलाओं के प्रति हिंसा और उत्पीड़न को रोकने के लिए दूसरी बड़ी जरूरत शराब और अन्य तरह के नशों पर लगाम लगाने की है। विश्व में विभिन्न स्तरों पर किए गए अध्ययन बताते हैं कि आश्चर्यजनक हद तक यौन अपराध नशे के कारण होते हैं। दुनिया के विभिन्न देशों के अध्ययनों से यह सच्चाई बार-बार सामने आई है। यदि हम अपने ही देश में हाल के यौन हिंसा के बड़े मामलों पर नजर डालें तो इनमें शराब की भूमिका स्पष्ट नजर आती है। शराब के नशे से भले और बुरे के फर्क को समझने में कमी आती है, अक्सर विवेकहीनता हावी हो जाती है जो गलत कार्यों के लिए प्रेरित करती है। बुरा काम करने में स्वाभाविक रूप से जो रोक मनुष्य के दिल-दिमाग में रहती है, वह रोक नशे के दौरान हटती है। बुरे काम का बाद में क्या असर होगा, उसके शिकार बने व्यक्ति पर क्या असर होगा, यह सब तरह की सोच जो होश-हवास में दिल-दिमाग में आती है, वह नशे के दौरान खत्म हो जाती है। एसा अक्सर देखने में आया है कि हत्या, बलात्कार जैसे जघन्य अपराधों को अंजाम देने से पहले अपराधी शराब पी लेते हैं और इस तरह अपने को अनैतिक कार्य के लिए तैयार करते हैं।

यह स्पष्ट है कि शराब या अन्य नशे से महिला विरोधी हिंसा और विशेषकर अधिक क्रूर किस्म की यौन हिंसा बढ़ती है। जहां यौन हिंसा का माहौल बनाया जाता है, वहां प्राय: शराब व अन्य नशे का सेवन होता है। हालांकि इस तरह के अनेक अध्ययन दुनिया में उपलब्ध हैं, पर हमारे देश में जब यौन हिंसा पर बहस होती है तो प्राय: इस संबंध की अवहेलना होती है। दूसरी ओर अधिकांश सरकारें शराब का तेज प्रसार करने में जुटी हैं। जिन गांवों में पहले शराब उपलब्ध नहीं थी, वहां सरकारों ने तेजी से ठेके खोल दिए हैं। इसका एक असर यह हुआ है कि इन गांवों में महिला-विरोधी हिंसा बढ़ गई है। शराब सरकारों के लिए राजस्व का बड़ा जरिया है।

तीसरी बड़ी जरूरत यह है कि पोर्नोग्राफी यानी अश्लीलता के प्रसार को कम किया जाए। इस विषय पर भी अनेक अध्ययन उपलब्ध हैं कि अश्लील साहित्य और फिल्में, विशेषकर हिंसक अश्लील फिल्मों के प्रसार से यौन अपराध बढ़ते हैं। पर इन अध्ययनों से सही स्थिति सामने आने के बावजूद भारत सहित दुनियाभर में पोर्नोग्राफी का प्रसार तेजी से बढ़ता जा रहा है। यहां तक कि अब तो दूर-दूर के गांवों तक में यह इसका जाल फैल चुका है। कुछ गांवों में इस बारे में पूछताछ करने पर ये तथ्य सामने आए कि समाज में कितनी तेजी से अश्लीलता का असर बढ़ा है और इसके प्रतिकूल परिणाम महिलाओं को झेलने पड़ रहे हैं। यह एक ऐसा बदलाव है जो काफी हद तक चोरी-छिपे आया है और इसके व्यापक असर पर गंभीर सामाजिक विमर्श हुआ ही नहीं है। फिलहाल विभिन्न अध्ययनों के आधार पर इतना तो निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अश्लील फिल्मों, वीडियो और साहित्य के अनियंत्रित प्रसार को कम करना जरूरी है।

चौथी जरूरी बात यह है कि समाज में लैंगिक संवेदनशीलता और नैतिकता बढ़ाने के प्रयास हों और ये प्रयास समाज में व्यापक संवेदनशीलता और नैतिकता का एक महत्त्वपूर्ण पक्ष हों। यदि लैंगिक संवदेनशीलता और नैतिकता के प्रयास अलगाव में किए जाएंगे, तो इनका सीमित असर ही हो सकेगा। पर यदि सार्थक सामाजिक बदलाव की एक व्यापक समझ के अंतर्गत इनका प्रसार होगा तो इनका अधिक मजबूत और दूरगामी असर होगा। इस समय यह प्रयास बहुत कम हैं। इसके अतिरिक्त लैंगिक संवदेनशीलता व नैतिकता के प्रयासों को स्थानीय सामाजिक-सांस्कृतिक स्थिति के अनुरूप बनाना बहुत जरूरी है। ऐसा भी नहीं हो पा रहा है और जो सीमित प्रयास हो रहे हैं, उन पर पश्चिमी असर अधिक है। अत: इस दिशा में अभी बहुत कुछ करना शेष है।

महिला हिंसा रोकने के लिए अधिक व्यापक जरूरत तेज सामाजिक बदलाव की स्थिति को समझने और संभालने पर ध्यान देने की है। इस पर अधिक नियोजित ढंग से कार्य होना चाहिए। हाल के वर्षों में हमारे देश और समाज में आश्चर्यजनक स्तर पर तेजी से अनेक बदलाव आए हैं। पर इन बदलावों को समझने के प्रयास बहुत कम हुए हैं। देश व समाज का अधिक ध्यान राजनीतिक और आर्थिक बदलावों पर केंद्रित रहता है। इसकी तुलना में सामाजिक बदलाव से जुड़े मुद्दों पर अपेक्षाकृत कम ध्यान दिया जाता है। कौन से बदलाव अच्छे हैं और कौन से बुरे, कहां हस्तक्षेप की जरूरत है, कहां नहीं, इस बारे में बहुत कम बहस होती है। इसी का नतीजा है कि भारतीय समाज में कई बुराइयां तेजी से बढ़ती चली गईं और समाज चुपचाप देखता रहा। हालांकि इसका अर्थ यह कतई नहीं है कि परंपरा अच्छी थी और आधुनिकता बुरी है।

परंपरागत समाज में महिलाओं पर जो बिना वजह की रोक-टोक थी, वह बहुत अनुचित थी और उनकी प्रगति में बाधक थी। इस तरह की रोक-टोक को दूर करना चाहिए। खुले माहौल में युवक-युवतियों को मिलना चाहिए, साथ पढ़ना चाहिए, जिम्मेदारियां एक साथ संभालनी चाहिए। सभी तरह के संकीर्ण बंधनों से मुक्त विवाह होने चाहिए। यह सब तो आधुनिकता के सार्थक पक्ष हैं, लेकिन साथ ही अनेक हानिकारक पक्ष भी हैं और उनके प्रति सावधानी अपनाना जरूरी है। परंपरागत समाज की कुछ मर्यादाएं थीं, तो आधुनिक समाज की भी कुछ नई मर्यादाएं बनानी पड़ेंगी, उन्हें प्रतिष्ठित करना होगा। लेकिन हमने इस कार्य की उपेक्षा की है।

यदि इन पांच स्तरों पर निष्ठा और सूझ-बूझ से कार्य किया जाए तो महिला हिंसा और यौन हिंसा में निश्चय ही बहुत कमी आएगी। यदि बड़ा अभियान चला कर शराब के उपभोग को कम किया जाता है तो इससे महिला हिंसा कम करने में तो मदद मिलेगी ही, इसके साथ समाज को जो लाभ प्राप्त होंगे, वे अलग हैं। महिला हिंसा को टिकाऊ तौर पर कम करने वाले अधिकांश कदम ऐसे ही हैं जो अनेक अन्य लाभ भी साथ ही देते हैं।

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