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शख्सियत: आरके नारायण

मालगुडी की कहानी आरके नारायण की दिलचस्प कहानियों की पुस्तक है। इसे देश ही नहीं, विदेश में भी काफी सराहा गया।

1933 में शादी के बाद आरके नारायण ने मद्रास के अखबार ‘द जस्टिस’ के लिए रिर्पोटिंग की।

आरके नारायण का पूरा नाम रासीपुरम कृष्णस्वामी अय्यर नारायणस्वामी था। उनकी गिनती अंग्रेजी साहित्य के प्रतिष्ठित लेखकों में होती है। उन्हें सबसे ज्यादा दक्षिण भारत के शहर मालगुडी की काल्पनिक रचनाओं के लिए जाना जाता है।

बचपन और साहित्य में रुचि

आरके नारायण का जन्म मद्रास में हुआ। वे आठ भाई-बहनों में दूसरे नंबर पर थे। उनके पिता अध्यापक थे। पिता की नौकरी में तबादलों की वजह से उनका बचपन नानी पार्वती के पास बीता। उनकी स्कूली शिक्षा मद्रास के विभिन्न स्कूलों में हुई।

पिता के मैसूर तबादले के बाद वे अपने परिवार के साथ यहीं आ गए। 1926 में उन्होंने महाराजा कॉलेज ऑफ मैसूर में दाखिला लिया। साहित्य में मास्टर डिग्री करने के साथ ही उनकी रुचि साहित्य में बढ़ी। हालांकि थोड़े समय के लिए उन्होंने अध्यापक के रूप में कार्य भी किया, पर उसे छोड़ कर पूरी तरह लेखन में लग गए। वे घर पर रह कर उपन्यास लिखने लगे। करिअर के अपरंपरागत विकल्प के चुनाव के बावजूद उन्हें परिवार का खूब साथ मिला और इसकी बदौलत 1930 में नारायण ने अपना पहला उपन्यास, ‘स्वामी एंड फ्रेंड्स’ लिखा, जिसे प्रकाशकों ने छापने से इंकार कर दिया। यह उपन्यास 1935 में प्रकाशित हुआ।

रिपोर्टर से उपन्यासकार

1933 में शादी के बाद आरके नारायण ने मद्रास के अखबार ‘द जस्टिस’ के लिए रिर्पोटिंग की। 1937 में नारायण का अगला उपन्यास ‘द बैचलर ऑफ आर्ट्स’ और 1938 में ‘ड डार्क रूम’ आया। 1939 में पत्नी की मृत्यु ने उन्हें तोड़ दिया और वे लंबे समय तक अवसाद में रहे। इसके बाद उन्होंने अपने अगले उपन्यास ‘द इंग्लिश टीचर’ की रचना की।

उनकी लघु कहानियों का पहला संग्रह, ‘मालगुडी डेज’, नवंबर 1942 में प्रकाशित हुआ था। इसके बाद नारायण ने ‘इंडियन थॉट पब्लिकेशन’ नाम से खुद की प्रकाशन कंपनी शुरू की, जिसे आज भी उनके परिवार के सदस्यों द्वारा चलाया जा रहा है। 1947 में नारायण ने जेमिनी स्टूडियो की फिल्म ‘मिस मालिनी’ के लिए पटकथा लिखी। 1956 में उन्होंने ‘द गाइड’ लिखा था। इसे उनका श्रेष्ठतम उपन्यास माना जाता है।

मालगुडी की लोकप्रियता

मालगुडी की कहानी आरके नारायण की दिलचस्प कहानियों की पुस्तक है। इसे देश ही नहीं, विदेश में भी काफी सराहा गया। कन्नड़ अभिनेता और निर्देशक शंकर नाग ने इस पर 1986 में एक टीवी धारावाहिक ‘मालगुडी डेज’ का निर्देशन किया था, जो दूरदर्शन चैनल पर दिखाया जाता था। यह धारावाहिक अपने समय में बेहद लोकप्रिय रहा।

पुरस्कार और सम्मान

उन्हें कई पुरस्कारों से नवाजा गया। 1958 में उनके उपन्यास ‘द गाइड’ के लिए साहित्य अकादेमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। जब इस पुस्तक पर फिल्म बनी, तब उन्हें सर्वश्रेष्ठ कहानी के लिए फिल्मफेयर पुरस्कार मिला। 1964 में उन्हें पद्म भूषण और 1980 में एसी बेनसन मेडल पुरस्कार से नवाजा गया। 1982 में उन्हें अमेरिकन एकेडमी ऑफ आर्ट्स एंड लेटर्स का मानद सदस्य चुना गया।

उन्हें कई बार साहित्य के नोबेल पुरस्कार के लिए भी नामांकित किया गया था। दिल्ली विश्वविद्यालय, मैसूर विश्वविद्यालय सहित दूसरे विश्वविद्यालयों से उन्हें डॉक्टरेट की उपाधि प्राप्त थी। 1989 में उन्हें राज्यसभा के लिए नामित किया गया था। अपने कार्यकाल के दौरान उन्होंने शिक्षा व्यवस्था को बेहतर करने की कोशिश की। 2001 में, उन्हें भारत के दूसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्म विभूषण से सम्मानित किया गया था।

निधन : 2001 में चौरानबे साल की उम्र में उनका निधन हो गया।

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