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राजनीति: उम्र के नए दायरों की चुनौती

अब इस आयु-वर्ग के युवाओं का सारा ध्यान अपने कैरियर-रोजगार पर है, इसलिए वे शादी और बच्चे पैदा करने जैसे जीवन के बेहद अहम फैसले में देरी कर रहे हैं। सिर्फ पुरुष नहीं, महिलाएं भी अब शादी से पहले अच्छे कैरियर को अहमियत देने लगी हैं। इसलिए उनके जीवन में दूसरी किशोरावस्था उम्र का तीसवां बसंत आने के साथ ही खत्म होती है।

Author March 20, 2018 3:34 AM
प्रतीकात्मक तस्वीर।

परंपराओं में पूरी दुनिया का समाज सदियों तक एक ढर्रे पर चलता रहा है, जिसमें बचपन, जवानी और बुढ़ापे जैसी अवस्थाएं और उनसे जुड़े कार्य-व्यवहार तकरीबन एक जैसे रहे हैं। लेकिन बीते कुछ दशकों में ये कायदे अभूतपूर्व ढंग से बदल गए हैं। इनका असर अब भारत जैसे देशों में भी दिखने लगा है। अभी तक ऐसा ज्यादा बड़ा बदलाव शादी की बढ़ती उम्र के रूप में दिखता रहा है, जहां रोजगार को प्राथमिकता देने वाले युवा तीस या इससे ज्यादा की उम्र में शादी करने लगे हैं। लेकिन अब एक नया अध्ययन सामने आया है जिसमें जीवन के तीन अहम पड़ावों (बचपन, जवानी, बुढ़ापे) में दो और नए पड़ाव जुड़ गए हैं। विश्व बैंक से जुड़ी एक सलाहकार कंपनी- बैन एंड कंपनी- ने आबादी घनत्व, स्वचालितीकरण और असमानता जैसे अहम पहलुओं की पारस्परिकता के मुद्दे पर अमेरिका में जो अध्ययन किया, उसका नतीजा यह है कि अब इंसान की उम्र में दो नए पड़ाव और जुड़ गए हैं। इनमें एक पड़ाव को ‘दूसरी किशोरावस्था’ (सेकेंड एडोलसेंस) और एक दूसरे को पूर्व-सेवानिवृत्ति (प्री-रिटायरमेंट) पड़ाव कहा गया है। वैसे तो भारतीय शास्त्रों में मनुष्य के जीवन की चार अवस्थाएं बताई गई हैं- ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ और संन्यास। सौ साल की उम्र मानते हुए इन्हें चार आश्रम की संज्ञा देते हुए स्पष्ट किया गया है कि पहले पच्चीस साल व्यक्ति ब्रह्मचारी का जीवन जीता है, अगले पच्चीस साल गृहस्थ, उससे अगले पच्चीस साल वानप्रस्थ और अंतिम पच्चीस साल संन्यस्त भाव से गुजारता है। लेकिन शेष विश्व में सामान्य मनुष्य के जीवन के तीन ही पड़ाव माने गए हैं, जिनमें बचपन स्कूल-कॉलेज में शिक्षा के लिए जाते हुए, जवानी और प्रौढ़ावस्था दफ्तर या कार्यस्थल पर और अगला पड़ाव रिटायरमेंट के पैसे से जीवन जीते हुए बीतता है। बदलती परिस्थितियों में कामकाज और जिम्मेदारियों के स्वरूप में भी परिवर्तन आ रहा है, इसलिए दो नई अवस्थाओं को जीवन में जोड़ना जरूरी लग रहा है।

इक्कीसवीं सदी की जरूरतों के मद्देनजर ‘दूसरी किशोरावस्था’ उम्र का वह दौर है जहां व्यक्ति पढ़ाई करते और योग्यता बढ़ाते हुए वयस्कता प्राप्त करता है और कमाई करने लग जाता है। मोटे तौर पर उम्र का यह दौर अठारह से उन्नीस साल के बीच है। कहा जा सकता है कि चूंकि अध्ययन अमेरिकी स्थितियों के मुताबिक किया गया है, इसलिए भारत पर यह लागू नहीं हो सकता है। लेकिन आश्चर्यजनक रूप में हमारे देश में ये सारी स्थितियां अब स्पष्ट दिख रही हैं। असल में अब इस आयु-वर्ग के युवाओं का सारा ध्यान अपने कैरियर-रोजगार पर है, इसलिए वे शादी और बच्चे पैदा करने जैसे जीवन के बेहद अहम फैसले में देरी कर रहे हैं। सिर्फ पुरुष नहीं, महिलाएं भी अब शादी से पहले अच्छे कैरियर को अहमियत देने लगी हैं। इसलिए उनके जीवन में दूसरी किशोरावस्था उम्र का तीसवां बसंत आने के साथ ही खत्म होती है। यह भी उल्लेखनीय है कि इस दूसरी किशोरावस्था में व्यक्ति शादी, नौकरी और घर खरीदने जैसे अहम फैसले नहीं करता है। नौकरी से जुड़ा तथ्य यह है कि इस दौर में युवा कमाई तो करने लगते हैं, लेकिन अच्छी नौकरी के लिए अपनी योग्यता बढ़ाना उनकी प्राथमिकता होती है। साथ ही, इस दौर में उनकी बचत इतनी नहीं होती कि अपने लिए अलग घर खरीद सकें, इसलिए इस उम्र तक मां-बाप के साथ रहना ही उचित समझते हैं। उम्र में पूर्व-सेवानिवृत्ति (प्री-रिटायरमेंट) वाले नए दायरे का जुड़ना काफी दिलचस्प है। उम्र का यह दौर पचपन से चौहत्तर साल के बीच माना गया है, जिसमें व्यक्ति नौकरी या कामकाज और अपनी पारिवारिक जिम्मेदारियों से मुक्त होने की प्रक्रिया में होता है। अध्ययन कहता है कि उम्र के इस दायरे में पहुंचे लोग खुद को बूढ़ा नहीं मानते और संन्यास नहीं लेते, बल्कि इस दौर का लुत्फ उठाना चाहते हैं। इस दौर में उनकी आय और खर्च, दोनों ही ज्यादा होते हैं। रोचक बात यह है कि अब नौकरियों में इस आयु-वर्ग के लोगों का प्रतिशत तेजी से बढ़ रहा है। निष्कर्ष यह है कि अब खुद को बूढ़ा मान कर घर बैठे और अपनी मृत्यु की प्रतीक्षा करने वाली उम्र पचहत्तर साल बाद की मानी जाती है। चूंकि चिकित्सा विज्ञान की तरक्की की मदद से कई बीमारियों का इलाज संभव होने लगा है, इसलिए बुढ़ापे को लंबे समय तक रोके रखना या कुछ और वर्ष तक टाल देना आसान हो गया है। हालांकि इस मामले में भारत की स्थितियां अभी अमेरिका जैसे विकसित मुल्कों जैसी नहीं हैं।

अभी भी हमारे गांव-कस्बों में पचास से ज्यादा उम्र के लोग खुद को वृद्ध मानते हुए कामकाज और सामाजिक जिम्मेदारियों से मुक्त हो जाना चाहते हैं। लेकिन शहरों में यह तस्वीर बदल रही है। अब देश के ज्यादातर पर्यटक स्थलों पर इस आयु-वर्ग के लोगों की बढ़ती भीड़ यह साबित करने लगी है कि चार आश्रमों वाली भारतीय परंपरा में भी बदलाव की जरूरत है। हालांकि प्रचलित सामाजिक परंपराओं, धारणाओं और नियमों को देखें, तो यह कहना मुश्किल है कि उम्र के नए दायरों का कोई सबक समाज या सरकार ले पाएगी। सरकारी नियमों में शादी-ब्याह, नौकरी और सेवानिवृत्ति जैसे उम्र से जुड़े कायदे अरसे से जस के तस ही हैं। इनमें कोई परिवर्तन ला पाना काफी मुश्किल होगा। जैसे सरकारी नियमों में सेवानिवृत्ति की उम्र साठ से बढ़ा कर पैंसठ या सत्तर साल करना भी लगभग नामुमकिन ही है। इसी तरह नौकरियों में भर्ती की मौजूदा आयु सीमा को बदलना सरकार के लिए आसान नहीं है। ऐसी स्थिति में बंधी-बंधाई धारणाओं और सरकारी कायदों से उम्र के इन नए दायरों की टकराहट लंबे समय तक बनी रह सकती है। हालांकि हमारा समाज इन बदलावों को सहज रूप से स्वीकार रहा है। युवाओं का शादी को तीस के पार तक टालना और ठीकठाक नौकरी मिलने तक मां-बाप पर आश्रित रहना इसका एक प्रमुख लक्षण है। इसी तरह प्रौढ़ावस्था के बाद घूमने-फिरने और अपने शौक व मनोरंजन के लिए समय निकालने की विकसित होती परंपरा से साफ है कि समाज के स्तर पर इन बदलावों को कमोबेश अपना लिया गया है। समस्या शहरों से बाहर ग्रामीण-कस्बाई समाजों में और सरकारी नियम-कानूनों को लेकर है जहां ये परिवर्तन शायद अभी कई और दशक तक कोई असर न डालें। इसलिए सबसे ज्यादा जरूरत यह है कि सरकारों के स्तर पर उम्र के नए पड़ावों को पहचाना जाए और उसके अनुरूप नीतियों में तब्दीली की जाए।

इस परिवर्तन का सबसे ज्यादा जरूरी पहलू यह है कि कामकाज की उम्र तेजी से बढ़ रही है। पर विडंबना यह है कि जिस उम्र में अभी व्यक्ति अपना श्रेष्ठतम योगदान देने को तैयार होता है, उस उम्र में उसे नौकरी या पेशे से बाहर करने का नियम बना लिया गया है। सिर्फ सरकारी नौकरियों में नहीं, निजी क्षेत्र की नौकरियों में भी पचपन साल से अधिक आयु के लोगों के बारे में यह मान लिया जाता है कि वे युवाओं के बराबर श्रम नहीं कर सकते और कंपनी को उनका बेहतर योगदान नहीं मिल पाता है। जबकि नई सच्चाई यह है कि पचपन के बाद व्यक्ति अपनी योग्यता और अनुभव के आधार पर सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन करने की स्थिति में होता है। हो सकता है कि कामकाज और नौकरियों का मौजूदा ढांचा ही आगे चल कर ध्वस्त हो जाए। एक अनुमान यह है कि निकट भविष्य में ऐसी अर्थव्यवस्थाएं बनने जा रही हैं जिनमें व्यक्ति के योगदान को महत्त्व मिलेगा, इस बात को नहीं कि उसकी उम्र क्या है, वह दफ्तर के बजाय घर से काम कर रहा है और वह किस वक्त काम कर रहा है। ऐसी स्थितियों में रोजगार बनाम आरक्षण जैसे सवाल भी बेमानी हो जाएंगे। तब उम्र के नए दायरों का असली फायदा भी नजर आने लगेगा। लेकिन जब तक ऐसा हो नहीं जाता, उम्र के नए पड़ावों से सामंजस्य बिठाने का काम हमारे समाज को ही करना होगा।

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