संकट में बचपन

भारत में बाल श्रम निषेध के लिए अनेक कानून बनाए गए हैं। 1948 के कारखाना अधिनियम से लेकर दर्जनों प्रावधान हैं। बावजूद इसके बाल श्रमिकों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। जाहिर है, कानून बेअसर साबित हो रहे हैं। इनकी अनुपालना में लापरवाही बरती जा रही है। सरकारें इस मामले में बेपरवाह हैं।

child labor
सांकेतिक फोटो।

नृपेंद्र अभिषेक नृप

महामारी के दौरान दुनिया में एक और संकट गहराया है। यह संकट बाल मजदूरों को लेकर है। चिंताजनक की बात यह है कि इस डेढ़ साल में दुनिया में बाल श्रमिकों की तादाद बढ़ गई है। हाल में संयुक्त राष्ट्र बाल विकास कोष (यूनिसेफ) ने अपनी रिपोर्ट में बताया कि वर्ष 2016 में दुनियाभर में करीब साढ़े नौ करोड़ बाल मजदूर थे। यह संख्या अब बढ़ कर सोलह करोड़ तक जा पहुंची है। चार साल में बाल श्रमिकों की तादाद में यह वृद्धि डेढ़ गुने से भी अधिक है। इतना ही नहीं, अब बड़ा खतरा यह भी है कि अगले साल के अंत तक महामारी के कारण एक करोड़ से ज्यादा और बच्चे बाल श्रम में झोंक दिए जाएंगे। अगर पर्याप्त सामाजिक सुरक्षा का दायरा नहीं बढ़ाया गया तो इस आंकड़े को बढ़ने से कोई नहीं रोक नहीं पाएगा।

यूनिसेफ के अनुमान के मुताबिक बाल श्रमिकों के मामले में भारत की स्थिति और भयावह होने की आशंका है। छह से चौदह साल के बच्चे अपने परिवार की मदद के लिए स्कूल छोड़ कर खेती और घरेलू कामों में लग चुके हैं। ऐसे बच्चों में ज्यादातर ग्रामीण और आदिवासी इलाकों के ही हैं। एक अनुमान के मुताबिक भारत में बाल मजदूरों की तादाद डेढ़ से दो करोड़ के बीच है, जिसमें आधे से ज्यादा बच्चे ग्रामीण इलाकों में कृषि और खेतिहर मजदूरी में लगे हैं। लेकिन अब महामारी ने हालात और बिगाड़ दिए हैं। करोड़ों परिवार गरीबी की मार झेल रहे हैं। आर्थिक असुरक्षा, सामाजिक सुरक्षा के अभाव और घरेलू आय में कमी के कारण गरीब परिवारों के बच्चों को मजबूरी में काम करना पड़ रहा है। बाल श्रम का अभिप्राय ऐसे कार्य से है जिसमें कार्य करने वाला व्यक्ति कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा के अंदर होता है। बाल श्रम बच्चों को उन मूलभूत अधिकारों और आवश्यकताओं से वंचित करता है जिस पर उनका नैसर्गिक अधिकार होता है। साथ ही बाल श्रम भौतिक, मानसिक, सामाजिक और नैतिक विकास को भी बाधित करता है।

बाल श्रम विश्व में अब एक ऐसी स्थायी समस्या बन चुका है। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर इसे लेकर वर्ष 1924 में पहल तब हुई, जब जिनेवा घोषणापत्र में बच्चों के अधिकारों को मान्यता देते हुए पांच सूत्री कार्यक्रम की घोषणा की गई थी। इसके चलते बाल श्रम को प्रतिबंधित किया गया, साथ ही बच्चों के लिए कुछ विशिष्ट अधिकारों को स्वीकृति दी गई थी। बाल मजदूरी और शोषण के अनेक कारण हैं जिनमें गरीबी, सामाजिक मापदंड, वयस्कोंं और किशोरों के लिए अच्छेष कार्य करने के अवसरों की कमी, प्रवास जैसे कारक शामिल हैं।

ये सब वजहें भेदभाव से पैदा होने वाली सामाजिक असमानताओं के परिणाम हैं। बाल मजदूरी बच्चोंक से स्कूनल जाने का अधिकार छीन लेती है और वे पीढ़ी दर पीढ़ी गरीबी के चक्रव्यूह से बाहर नहीं निकल पाते हैं। जाहिर है, बच्चों की शिक्षा में बाल मजदूरी शिक्षा में बहुत बड़ा अवरोध है। बाल तस्कारी भी बाल मजदूरी से अलग नहीं है जिसमें हमेशा ही बच्चोंल का शोषण होता है। ऐसे बच्चोंम को शारीरिक, मानसिक, यौन और भावनात्म क सभी प्रकार के उत्पीाड़नों से गुजरना पड़ता है। बच्चोें को वेश्योवृति की ओर धकेल दिया जाता है। कम और बिना पैसे के मजदूरी कराना, घरों में नौकर या भिखारी बनाने पर मजबूर करना बाल श्रम के ही उदाहरण हैं। दुनिया के कई देशों में तो बच्चों के हाथों में हथियार भी थमा दिए जाते हैं। बाल तस्कोरी बच्चों के लिए हिंसा, यौन उत्पीाड़न और एचआइवी संक्रमण का खतरा पैदा करती है। कुल मिलाकर दुनियाभर में बच्चों पर संकट कहीं ज्यादा व्यापक और गंभीर है।

सवाल है कि बाल श्रम कैसे खत्म हो? जो कुप्रथा सदियों से चली आ रही है, उसे खत्म करना कोई आसान नहीं है। फिर दुनिया भर में तमाम कानून हैं जो बाल श्रम को प्रतिबंधित करते हैं, जिनके तहत बाल मजदूरी अपराध है। पर समस्या यह है कि इतने कानूनों के बावजूद यह संकट गहराता जा रहा है। इसका मूल कारण सरकारों के साथ समाज में बच्चों की उपेक्षा भी है। इसलिए बच्चों का बचपन बचाने की पहली जिम्मेदारी तो समाज और सरकार की ही है। भारत में बाल श्रम निषेध के लिए अनेक कानून बनाए गए हैं। 1948 के कारखाना अधिनियम से लेकर दर्जनों प्रावधान हैं। बावजूद इसके बाल श्रमिकों की संख्या में निरंतर वृद्धि हो रही है। जाहिर है, कानून बेअसर साबित हो रहे हैं।

इनकी अनुपालना में लापरवाही बरती जा रही है। सरकारें इस मामले में बेपरवाह हैं। कुल श्रम शक्ति का पांच फीसद बाल श्रम ही है। हैरानी की बात तो यह है कि भारत ने अभी तक संयुक्त राष्ट्र बाल अधिकार समझौते की धारा-32 पर सहमति नहीं दी है, जिसमें बाल मजदूरी को जड़ से खत्म करने की बाध्यता शामिल है। वर्ष 1992 में संयुक्त राष्ट्र में भारत ने कहा था कि अपनी आर्थिक व्यवस्था को देखते हुए इस दिशा में रुक-रुक कर कदम उठाएंगे, क्योंकि इसे एकदम नहीं रोका जा सकता। लेकिन तीन दशक बाद भी हमारा देश में बाल मजदूरी बढ़ रही है तो इसकी जिम्मेदार अब तो सरकारी नीतियां ही हैं। इतना ही नहीं, बाल श्रम कानून के संशोधन में भी थोड़ी नरमी देखने को मिल रही हैं।

बाल श्रम रोकने के लिए ठोस कदम उठाने की जरूरत है। इसमें हम लोकतंत्र की सबसे छोटी इकाई पंचायत की भूमिका को बढ़ा सकते हैं। चूंकि भारत में लगभग अस्सी फीसद बाल श्रम ग्रामीण क्षेत्रों में होता है, इसलिए बाल श्रम में कमी लाने और धीरे-धीरे इसे खत्म करने की जिम्मेदारी पंचायतों पर डाली जानी चाहिए। पंचायतें इसमें प्रमुख भूमिका निभा सकती हैं। इसके लिए पंचायतों को बाल श्रम के दुष्परिणामों के बारे में जागरूकता पैदा करनी होगी। ऐसा माहौल तैयार करना होगा जहां बच्चों को काम न करना पड़े और वे स्कूलों में दाखिला लें। इसका भी आकलन करते रहना होगा कि बच्चों को स्कूलों में पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध हैं या नहीं। पंचायतों को भी यह अधिकार दिए जाने की जरूरत है कि वे बाल श्रम करवाने पर जुमार्ना लगा सकें और उसके विरुद्ध कानूनी कार्रवाई शुरू कर सकें। गांवों में बालबाड़ी और आंगनबाड़ियों को भी इसके लिए सक्रिय रखने की जरूरत है। बाल श्रम को रोकने में इनकी भी भूमिका भी कारगर हो सकती है।

कोरोना काल में गरीबी बढ़ी है। ऐसे में बच्चों को भी रोजगार से लगाना ज्यादातर परिवारों की मजबूरी बन गई है। लेकिन सरकारों और समाज के स्तर पर प्रयास करके इसे रोका भी जा सकता है। जब तक समाज मुखर नहीं होगा, बाल मजदूरी जैसी समस्या से निपटना आसान नहीं होगा। शहरों, महानगरों तो घरेलू कामकाज के लिए लोग दिनभर के लिए काम के लिए घरों में कम उम्र के बच्चों को रखना पसंद करते हैं क्योंकि ये मजबूरी के मारे होते हैं और बिना किसी हक की मांग के काम करने को तैयार हो जाते हैं। ऐसे में यह सामाजिक बुराई शहरों में ज्यादा बढ़ रही है।

इसे समाज ही खत्म कर सकता है। अब बाल श्रम के मसले पर सवाल और समाधान के बीच असंतुलन की गहरी होती खाई को पाटने की जरूरत है। कोरोनाकाल में अनाथ हुए बच्चों का आंकड़ा भयभीत करने वाला है। इस डेढ़ साल में करीब तीन लाख बच्चे अनाथ हो गए हैं जिनके अभिभावकों में से किसी एक या दोनों की महामारी से मौत हो गई। पंडित जवाहरलाल नेहरू कहते थे कि बच्चे देश का भविष्य होते हैं, इसलिए उनके प्रति हर नागरिक को जागरूक होना चाहिए ताकि एक सुंदर और सुदृढ़ देश का निर्माण हो सके।

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