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राजनीति: चुनौती बनते विषाणु

बीते सात दशकों में प्रत्येक दशक में नई बीमारियों की संख्या तीन गुना बढ़ी है। हालांकि चिकित्सा विज्ञानी लगातार रोगाणुओं की पहचान कर उन्हें काबू में लेने के उपाय खोज रहे हैं। इस क्रम में पांच हजार प्रकार के विषाणु, तीन लाख तरह के जीवाणु और एक सौ तरह के फंगसों की पहचान की गई है। इसके अलावा कई तरह के परजीवी व कीटाणु भी होते हैं, जो मनुष्य पर हमला कर उसे बीमार कर देते हैं।

coronavirus disease , covid19कोरोना के चलते दुनियाभर में 5 लाख से ज्यादा लोगों की जान चली गई है। (रायटर्स इमेज)

चीन के बुहान शहर से कोरोना विषाणु के वैश्विक विस्फोट के बाद एक बार फिर से जीवाणु-विषाणुओं को जानने और उन पर नियंत्रण के उपाय तेज हुए हैं। कोरोना चीन के बुहान इंस्टीट्यूट आफ वायरोलॉजी में कृत्रिम तरीके से निर्मित विषाणु है या फिर प्राकृतिक, इसकी पड़ताल में भी दुनिया के वैज्ञानिक जुटे हैं। दरअसल, छियासठ साल पहले विश्व स्वास्थ्य संगठन ने भविष्यवाणी की थी कि कुछ सालों के भीतर रोगाणुओं से मनुष्यों में फैलने वाले संक्रमण और महामारियों पर नियंत्रण पा लिया जाएगा।

ऐसा इसलिए कहा गया था, क्योंकि अब तक पोलियो, चेचक, मियादी बुखार और क्षय रोग से मुक्ति के रूप में दवा या टीकों की खोज हो चुकी थी। चिकित्सा विज्ञान के चमत्कार ने यह उम्मीद जगा दी थी कि जल्दी ही रोगाणुओं को पूरी तरह काबू में लेने में कामयाबी मिल जाएगी। लेकिन यह उम्मीद दूर की कौड़ी साबित हुई। बीसवीं सदी के नौवें दशक में एड्स और हेपेटाइटिस-बी और इक्कीसवीं के पहले ही दशक से जीवाणु व विषाणुजनित संक्रमणों से एक के बाद बीमारियां उत्पन्न होने के साथ फैलने लगीं।

पश्चिम अफ्रीका में इबोला, दक्षिण अमेरिका में जीका, मध्य-पूर्व से मीडिल ईस्ट रेस्प्रेरियेट्री सिंड्रोम (एमईआरएस) और चीन से सार्स, मर्स, निपाह, बर्ड फ्लू, कोरोना इत्यादि विषाणुओं ने निकल कर भयानक व जानलेवा बीमारियां फैलाईं।

बीते सात दशकों में प्रत्येक दशक में नई बीमारियों की संख्या तीन गुना बढ़ी है। हालांकि चिकित्सा विज्ञानी लगातार रोगाणुओं की पहचान कर उन्हें काबू में लेने के उपाय खोज रहे हैं। इस क्रम में पांच हजार प्रकार के विषाणु, तीन लाख तरह के जीवाणु, एक सौ तरह के फंगसों की पहचान की गई है। इसके अलावा कई तरह के परजीवी व कीटाणु भी होते हैं, जो मनुष्य पर हमला कर उसे बीमार कर देते हैं।

जिस तरह से आज आबादी को नियंत्रित करने के अनेक उपायों के बाद भी आबादी बढ़ती चली जा रही है, उसी तरह सूक्ष्म-जीव व कीटाणु चार करोड़ गुना तेजी से विकसित हो रहे हैं। ‘ग्लोबल वाइरोम प्रोजेक्ट’ के अंतर्गत मानव-आबादी में फैलने की क्षमता रखने वाले करीब पांच लाख रोगाणुओं की पहचान का काम चल रहा है। इस कार्यक्रम पर दो सौ अरब रुपए खर्च किए जा रहे हैं।

जन्म लेते नए रोगाणुओं को पहचानने के लिए कार्यक्रम प्रोडिक्ट-2009 में आरंभ किया गया था। अंतरराष्ट्रीय विकास के लिए अमेरिकी एजेंसी यूएसएड की आर्थिक मदद से चलने वाले प्रोडिक्ट ने मनुष्य और जानवरों में प्रवास करने वाले एक हजार विषाणु खोज लिए हैं।

इस कार्यक्रम के सामने आने से साफ हुआ है कि वैज्ञानिक जितनी भी नई संक्रामक बीमारियों के बारे में जानते हैं, वे मवेशियों या वन्य-प्राणियों से फैली हैं और इन्हें रोकना संभव है, इसीलिए प्रोडिक्ट जैसे शोध कार्यक्रम चलाए गए हैं। लेकिन अब अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ऐसे वैश्विक कार्यक्रमों को आर्थिक मदद देना बंद कर दिया है। अमेरिका ने स्वास्थ्य और मानव सेवा से जुड़े इस मद में नौ सौ सत्तर अरब रुपए की कटौती की है। धन की कमी के चलते नई संक्रामक बीमारियों को पैदा करने वाले नए रोगाणुओं की पहचान प्रभावित होगी।

हालांकि दुनिया की दवा निर्माता कंपनियों के पास धन की कमी नहीं है। लेकिन नए रोगाणुओं की नई दवा या टीका बनाने की खोजें बेहद खर्चीली, अनिश्चितता से भरी और लंबी अवधि तक चलने वाली होती हैं। इसलिए दवा कंपनियों को इन अनुसंधानों में कोई रुचि नहीं होती।

बीसवीं सदी का मध्य और उत्तरार्द्ध काल इस नाते स्वर्ण युग था, जब चेचक, पोलियो, टिटनेस, रेबिज, एड्स, हैपीटाइटिस, बर्ड फ्लू जैसे रोगों को पहचान कर इन पर नियंत्रण की दवा या टीके बना लिए गए। हालांकि अभी एड्स, बर्ड फ्लू और कोविड-19 के टीके नहीं बने हैं। हालांकि 1990 के बाद से बीमारियों के तकनीकी परीक्षण के उपकरण तो बड़ी संख्या में बना लिए गए हैं, किंतु इस दौरान नई दवाएं नहीं बनी हैं।

दुनियाभर में दवाओं का बाजार साठ खरब रुपए से भी ज्यादा का है। पर इसमें टीकों की भागीदारी केवल तीन फीसद है। किसी एक विषाणु को समाप्त करने के लिए एक टीका बनाने में लगभग साठ अरब रुपए खर्च आता है। इसका कई वर्ष तक चूहे, खरगोश, बंदर और फिर मनुष्य पर परीक्षण करना होता है। इसलिए दवा कंपनियां विषाणु का टीका बनाने की प्रक्रिया में हाथ नहीं डालतीं। विकसित देशों के समूह ही इन कार्यक्रमों में धन खर्च कर सकते हैं। शायद इसीलिए बिल-मेंलिडा गेट्स फाउंडेशन के ग्लोबल हेल्थ डिवीजन के अध्यक्ष डॉ ट्रेवल मुंडेला ने कहा था कि ‘महामारियों को खत्म करने के लिए वेक्सीन बनाने के लिए कंपनियों को न तो प्रोत्साहन मिल रहा है और न ही प्रेरित किया जा रहा है।’

इसीलिए कोविड-19 का टीका बनाने के दावे तो कई देश कर रहे हैं, लेकिन इनमें सच्चाई कितनी है, इसमें संदेह है। इसीलिए भारत की स्वास्थ्य से जुड़ी शीर्ष संस्था ‘काउंसिल आफ साइंटिफिक एंड इंडस्ट्रियल रिसर्च (सीएसआइआर)‘ के महानिदेशक डॉक्टर शेखर पांडे ने कहा है कि ‘यह एक गलतफहमी है कि कोविड-19 का इलाज केवल वैक्सीन से ही संभव है। इसके उपचार में दवा भी मददगार हो सकती है।’

इक्कीसवीं सदी में नए विषाणु तो लगातार सामने आ रहे हैं, लेकिन कोविड-19 ऐसा विषाणु है, जिसने अस्तित्व में आने के दो माह के भीतर ही पूरे संसार को भीषण महामारी में बदल दिया। हालांकि रोगाणु विशेषज्ञ यह चिंता इबोला विषाणु के प्रकोप के समय ही जता चुके थे।

इस प्रकोप का विषाणु वैज्ञानिकों को आश्चर्य इसलिए नहीं हुआ, क्योंकि इसका पता 1976 में ही चल गया था, फिर भी उससे सुरक्षा की दवा या टीका नहीं बन पाया था। इसलिए वैज्ञानिकों ने इबोला से सबक लेते हुए 2014 में ही चेतावनी दे दी थी कि भविष्य में विषाणुजनित कोई ऐसी महामारी फैल सकती है, जिससे उपचार का हमारे पास कोई उपाय नहीं होगा। करीब छह साल पहले कहे गए इस कथन ने कोरोना-प्रकोप ने चरितार्थ कर दिया है।
कोरोना के तेज गति से विश्वव्यापी हो जाने के कारणों में आधुनिक, औद्योगिक और प्रौद्योगिकी विकास है।

चिकित्सा विज्ञान से जुड़ा विकास भी इसके फैलने में मददगार हो रहा है। दरअसल सड़कें, रेल, जल व हवाई मार्गों के विस्तार व आसान उपलब्धता ने अपने-अपने देश के कोरोना संक्रमितों को स्वदेश लाने की जल्दबाजी में इसे प्रत्येक देश में पहुंचा दिया। फिर स्थानीय वाहनों ने इसे शहरों, गांवों और कस्बों में पहुंचा दिया। रोगाणुओं को मनुष्य से मनुष्य में पहुंचाने का काम इंजेक्शन और रक्त बैंकों की सुइयां भी करती हैं। एड्स फैलने का तो इन सुइयों को ही मुख्य कारक माना गया है।

अंग प्रत्यारोपण निसंदेह चिकित्सा विज्ञान की एक बड़ी उपलब्धि है, लेकिन विषाणुजनित बीमारियां फैलाने का काम यह उपचार पद्धति भी कर रही हैं। किडनी प्रत्यारोपण के लिए भारत में एशिया और अफ्रीका से रोगी आते हैं। किराए की कोख का कारोबार भी वायरसों को वैश्विक स्तर पर फैलाने में मददगार साबित हो रहा है। वन्य-प्राणियों व मवेशियों का क्लोनिंग तकनीक से उत्सर्जन भी कई बीमारियों के विषाणु मनुष्य में संक्रमित कर रहे हैं।

कोरोना के सिलसिले में तो यह धारणा लगभग स्थापित हो चुकी है कि यह चमगादड़ या पेंगोलिन के खाने से मनुष्य में आया। चीन में क्लोनिंग के जरिए सबसे ज्यादा जीव निर्मित किए जाते हैं। इन जीवों का कारोबार भी चीन में खूब फल-फूल रहा है। दुनिया में जीएम बीजों के जरिए फसलें पैदा करने का जो सिलसिला चल पड़ा है, वह भी रोगाणुओं से उत्पन्न होने वाली बीमारियों-महामारियों का कारण बन रहा है। साफ है, हमें जीवन को सुरक्षित बनाए रखने की दृश्टि से प्रकृति के साथ सह-अस्तित्व बनाए रखते हुए रहना होगा।

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