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राजनीति: सोने की बढ़ती चमक

कोविड-19 के बीच लड़खड़ाती वैश्विक अर्थव्यवस्था में कोरोना की दूसरी लहर की आशंका से और गिरावट की चिंता, अमेरिका में ब्याज दर का शून्य पर पहुंचना, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव और अन्य वैश्विक राजनीतिक तनाव जैसे कारणों से लोग भविष्य की सुरक्षा के लिए सोने की खरीदी को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं।

जयंतीलाल भंडारी
इन दिनों जब वैश्विक बाजार में सोने के दाम आसमान पर हैं, तब भारत में भी सोने से संबंधित दो परिदृश्य उभरते दिखाई दे रहे हैं। एक तो यह कि देश में भी सोने के दाम लगातार बढ़ रहे हैं और नित नए रेकार्ड बना रहे हैं। दूसरा यह कि देश में महंगे होते सोने की वजह से इसका आयात घट रहा है और बड़ी संख्या में लोग सोना खरीदने की जगह गोल्ड बांड की खरीद में निवेश करना बेहतर मान रहे हैं।

गौरतलब है कि जहां एक ओर वैश्विक बाजार में तीन अगस्त को सोने की कीमतें करीब 1975 डॉलर प्रति औंस से अधिक की रिकॉर्ड ऊंचाई पर पहुंच गईं, वहीं भारतीय बाजार में सोना करीब पचपन हजार रुपए (प्रति दस ग्राम) से भी ऊपर निकल गया। यदि हम सोने की लगातार बढ़ती कीमतों को देखें, तो पाते हैं कि जनवरी 2018 में प्रति दस ग्राम सोने की कीमत करीब तीस हजार रुपए थी। जनवरी 2019 में यह करीब 32,500 रुपए हो गई। फिर यह जनवरी 2020 में करीब 39,100 रुपए पर जा पहुंची और अब अगस्त में पचपन हजार रुपए को पार कर गई है। आने वाले दिनों में इसमें और बढ़ोतरी से इनकार नहीं किया जा सकता।

सवाल है कि आखिर सोना इतना महंगा हो क्यों रहा है? इस समय दुनिया में आसमान छूती हुई सोने की कीमतों के कई कारण हैं। कोविड-19 के बीच लड़खड़ाती वैश्विक अर्थव्यवस्था में कोरोना की दूसरी लहर की आशंका से और गिरावट की चिंता, अमेरिका में ब्याज दर का शून्य पर पहुंचना, अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव और अन्य वैश्विक राजनीतिक तनाव जैसे प्रमुख कारणों से लोग भविष्य की सुरक्षा के लिए सोने की खरीदी को सर्वोच्च प्राथमिकता दे रहे हैं। कोरोना संकट से होने वाले आर्थिक नुकसान से निपटने के लिए विभिन्न देशों ने आर्थिक पैकेजों का एलान किया है। इससे भी विभिन्न देशों की मुद्राओं में गिरावट आई है और डॉलर की तुलना में सोने का महत्त्व बढ़ गया है। यही कारण है कि दुनिया के संस्थागत निवेशक सोने की बड़े पैमाने पर खरीदी करते हुए दिखाई दे रहे हैं।

वर्ल्ड गोल्ड काउंसिल के आंकड़ों के अनुसार इस साल अप्रैल से जून के बीच भारत में सोने की मांग 63.7 टन रही। इससे पहले 2009 में अमेरिका के लीमन संकट के वक्त भी भारत में सोने की मांग चालीस टन रह गई थी। तब से पिछले ग्यारह वर्षों के दौरान किसी एक तिमाही में भारत में सोने की मांग में इतनी कमी नहीं देखी गई थी। अप्रैल से जून 2020 की तिमाही में भारत में मात्र 11.6 टन सोने का आयात हुआ। कोविड-19 के कारण अप्रैल से जून के दौरान देश में पूर्णबंदी के दौरान खुदरा आभूषण दुकानें बंद रहीं, जिससे सोने की खरीदारी बहुत गिर गईं। गौरतलब है, भारत दुनिया का दूसरा सबसे बड़ा स्वर्ण उपभोक्ता देश है और भारत अपनी सोने का अधिकांश मांग की पूर्ति आयात के जरिए करता है। देश के आयात बिल में सोने के आयात का प्रमुख स्थान है। वित्त वर्ष 2018-19 में सोने का आयात करीब तैंतीस अरब डॉलर मूल्य का रहा था, जबकि पिछले वित्त वर्ष 2019-20 में यह करीब इकतीस अरब डॉलर मूल्य का रहा। चालू वित्त वर्ष 2020-21 में सोने के आयात में और बड़ी कमी दिखाई दे रही है, इससे देश के व्यापार घाटे को कम करने में और अधिक मदद मिलेगी।

दुनिया के साथ-साथ भारत में भी सोने के दाम ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंच गए हैं। लेकिन भारत में सोने की अधिक कीमत हो जाने और लोगों की क्रयशक्तिघटने के कारण नए सोने की मांग अधिक नहीं बढ़ी है। स्वर्ण विशेषज्ञों के मुताबिक कोविड-19 के कारण इस वर्ष नए सोने की मांग करीब तीस प्रतिशत घटने की संभावना है। स्थिति यह है कि बड़ी संख्या में लोग सराफा बाजार में अपनी जरूरत के मुताबिक अपने पास संचित पुराने सोने को नए डिजाइन और नए आकार-प्रकार में बदलते हुए नजर आ रहे हैं। साथ ही, बड़ी संख्या में लोग सोने की बढ़ती कीमतों का फायदा लेते हुए अपने पुराने सोने को बेच रहे हैं। स्वर्ण विशेषज्ञों का मानना है कि इस वर्ष कोरोना महामारी के बीच देश में सोने की मांग तेजी से घट कर चार सौ पचास टन से भी कम हो सकती है।

सोने के दाम नई ऊंचाई पर पहुंचने से बड़ी संख्या में लोग सोना गिरवी रख कर कर्ज भी ले रहे हैं। इससे स्वर्ण ऋणदाता कंपनियों की कमाई बढ़ गई है और शेयर बाजार में ऐसी बड़ी कंपनियों के शेयरों की कीमत ऊंचाई पर पहुंच गई है। इस समय जब बहुत से बैंक और गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियां यानी एनबीएफसी कोरोना महामारी की वजह से मुश्किलों का सामना कर रही हैं, तब ऐसे में सोने पर ऋण देने वाली एनबीएफसी मजबूत स्थिति में पहुंच गई हैं।
भारत में पिछले एक दशक में सोने का प्रतिफल अन्य सभी निवेशों से अधिक रहा है। सोना निवेशकों के लिए भरोसेमंद बना हुआ है। स्वर्ण विशेषज्ञों के मुताबिक वित्त वर्ष 2017 में सोने के निवेशकों को लगभग छह प्रतिशत का लाभ मिला था। फिर यह बढ़ कर 2018 में करीब नौ प्रतिशत और 2019 में पच्चीस प्रतिशत तक पहुंच गया है। इस साल जनवरी से जून के बीच सोने में निवेशकों का लाभ बढ़ कर लगभग तीस प्रतिशत रहा है। अभी जिस तेजी से सोना चढ़ रहा है, उसे देखते हुए तो इस साल सोने में निवेश पर प्रतिफल साठ से सत्तर फीसद से भी ज्यादा रह सकता है।

भारत में सोना खरीदने के लिए प्रोत्साहित करने वाले कई कारण हैं। भारत में पारिवारिक, व्यावसायिक, परंपरागत और धार्मिक कारणों से सोना खरीदने का चलन रहा है। इसे बचत और सामाजिक सुरक्षा का भी बड़ा आधार माना जाता रहा है। शादी-ब्याह, विशेष पारिवारिक आयोजनों और त्योहारों के समय सोने के आभूषण पहनना भारतीय संस्कृति का अंग भी है। धार्मिक आस्था की वजह से बड़ी संख्या में लोग मंदिरों में सोना चढ़ाते हैं। निश्चित रूप से बचत के लिए भौतिक सोने की खरीदी अनुत्पादक निवेश है। ऐसे में जो लोग बचत को निवेश करने के लिए सोना खरीदते हैं, वे स्वर्ण बांड के विकल्प की ओर प्रवृत्त हो रहे हैं।

बचत को सोने में निवेश करने वालों के लिए गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंडों के अलावा सॉवरेन गोल्ड बांड भी लाभप्रद हैं। इन विकल्पों ने बचत को सोने में निवेश का उद्देश्य रखने वाले निवेशकों के लिए भौतिक रूप में सोना खरीदने की जरूरत काफी हद तक खत्म कर दी है और ये स्वर्ण बांड अपनी आकर्षक विशेषताओं के कारण ऐसे निवेश उत्पाद बन गए हैं, जिनमें भौतिक सोने के साथ पैदा होने वाला भावनात्मक जुड़ाव आड़े नहीं आता है।

दरअसल, सॉवरेन गोल्ड बांड अर्थव्यवस्था के लिए भी फायदेमंद साबित हो रहे हैं। इससे देश को सोने के आयात पर खर्च किए जाने वाली विदेशी मुद्रा की बचत होती है। हालांकि गोल्ड बांड की शुरुआत नवंबर 2015 में हुई है, लेकिन इसके तहत निवेश लगातार तेजी से बढ़ता जा रहा है और स्थिति यह है कि कोरोना महामारी संकट के बीच निवेशक जोखिम वाली संपत्तियों में निवेश घटा कर सुरक्षित निवेश के रूप में स्वर्ण बांड और गोल्ड एक्सचेंज ट्रेडेड फंड (ईटीएफ) की तरफ तेजी से आकर्षित हुए हैं। यही कारण है कि इस साल जनवरी से जून के बीच छह महीनों में गोल्ड ईटीएफ में साढ़े तीन हजार करोड़ रुपए से अधिक का निवेश आया है।

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