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राजनीति: सेहत पर उठते सवाल

सिर्फ अमेरिका ही क्यों, स्वास्थ्य की मद में भारी पैसा खर्च करने वाले फ्रांस, इटली और ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवाओं का हाल भी यही है। इटली में कोरोना के कारण पंद्रह हजार से ज्यादा लोग मर चुके हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के मामले में इटली को दुनिया में दूसरे स्थान पर रखा जाता है। लेकिन देखने को यह मिल रहा है कि यहां भी कोरोना जांच के लिए जरूरी किट, बिस्तर, मास्क, पीपीई की भारी कमी है।

कोरोना वायरस से पीड़ितों की संख्या लगातार बढ़ती जा रही है। (फोटो – इंडियन एक्सप्रेस)

कोरोना महामारी ने पश्चिमी विकसित देशों में स्वास्थ्य सेवाओं की हकीकत को उजागर करके रख दिया है। कोरोना संकट ने साफ बता दिया है कि विकसित देशों की स्वास्थ्य सेवाएं मुनाफे के खेल पर आधारित हैं। इटली, स्पेन, ब्रिटेन सहित कई यूरोपीय देश और अमेरिका तक इस महामारी का मुकाबला कर पाने में इसलिए नाकाम रहे हैं कि जरूरत के हिसाब से अस्पताल तैयार नहीं हो पाए। कोरोना संक्रमितों के इलाज के लिए जरूरी श्वसन यंत्र (वेंटिलेटर), मॉस्क, व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरणों (पीपीई) कम तक पड़ गए हैं। अमेरिका की स्वास्थ्य सेवाओं की तो पूरी तरह से पोल खुल गई है।

विश्वभर में अमेरिकी स्वास्थ्य सेवाओं का तो उदाहण दिया जाता है। अमेरिका दुनिया में एकमात्र देश है जो सबसे ज्यादा पैसा स्वास्थ्य सेवाओं पर खर्च करता है। अगर स्वास्थ्य क्षेत्र पर खर्च की जाने वाली राशि को देखें तो अमेरिका प्रति व्यक्ति दस हजार डालर सालाना खर्च करता है। इसके बावजूद आज पूरे अमेरिका में श्वसन यंत्रों की भारी कमी पड़ गई है। न्यूयार्क में जरूरी श्वसन यंत्र के अभाव के कारण प्रशासन के हाथ-पांव फूल गए हैं। वैसे तो पूरे अमेरिका में श्वसन यंत्रों की कमी है। एक अनुमान के अनुसार आबादी के हिसाब से अमेरिका को दस लाख श्वसन यंत्र चाहिए। लेकिन वहां डेढ़ लाख श्वसन यंत्र ही उपलब्ध हैं। कोरोना की सबसे ज्यादा मार न्यूयार्क पर पड़ी है। यहां जरूरी श्वसन यंत्रों की भारी कमी पड़ गई है। न्यूयार्क में फिलहाल पांच हजार श्वसन यंत्र आपातकालीन स्थिति में चाहिए।

वहां मास्क की भी भारी कमी हो गई है। लोगों को रूमाल से नाक को ढंकने की हिदायत दी गई है। यह वही अमेरिका है जहां स्वास्थ्य सेवाओं पर लगभग तीन सौ लाख करोड़ रुपए सालाना का खर्च किया जाता है। अमेरिका की संघीय सरकार का सालाना स्वास्थ्य बजट (2020-21) तेरह सौ सत्तर अरब डालर का है। 2019-20 में यह बजट बारह सौ चौरासी अरब डालर का था। अमेरिका में जीडीपी का सत्रह फीसद स्वास्थ्य पर खर्च किया जाता है। इसके बावजूद कोरोना संकट से निपटने में अमेरिका के हाथ-पैर फूल गए हैं। यहां कोरोना से अब तक साढ़े तीन लाख से ज्यादा लोग संक्रमित हो गए हैं। मरने वालों का आंकड़ा दस हजार को पार कर गया है। वाइट हाउस के प्रमुख स्वास्थ्य सलाहकार डा. एंथनी फाउसी पहले ही एक लाख से दो लाख चालीस हजार लोगों के मरने का अनुमान व्यक्त कर चुके हैं।

वैसे में अहम सवाल यही है कि आखिर अमेरिकी स्वास्थ्य बजट का पैसा जाता कहां है? दरअसल, अमेरिका में लंबे समय से बेहतर स्वास्थ्य सेवाओं के नाम पर मुनाफे काखेल चल रहा है। यहां स्वास्थ्य सेवाएं काफी महंगी हो गई है। स्वास्थ्य बीमा भी काफी महंगा है। अमेरिकी आबादी के बड़े हिस्से के पास तो स्वास्थ्य बीमा भी नहीं है। इसीलिए ज्यादातर लोग इसी चिंता में डूबे हैं कि अगर वे कोरोना की चपेट में आ गए तो इलाज कैसे करवाएंगे। अमेरिका में स्वास्थ्य बजट का बड़ा हिस्सा मधुमेह और दिल की बीमारियों पर खर्च किया जा रहा है, क्योंकि इन दो बीमारियों से ही बीमा और दवा कंपनियों को खासा मुनाफा होता है। यों अन्य बीमारियों का इलाज भी सस्ता नहीं है। जबकि इलाज पर वास्तविक खर्च काफी कम आता है। वॉल स्ट्रीट जनरल की एक रिपोर्ट के मुताबिक घुटना प्रत्यारोपण पर वास्तविक खर्च जहां से सात से दस हजार डालर आता है, वहीं मरीजों से पचास हजार डालर तक वसूल लिए जाते हैं। कोरोना संक्रमण का इलाज भी अमेरिका में महंगा बताया जा रहा है, इस कारण काफी लोग जरूरी जांच कराने से भी कतरा रहे हैं।

सिर्फ अमेरिका ही क्यों, स्वास्थ्य की मद में भारी पैसा खर्च करने वाले फ्रांस, इटली और ब्रिटेन की स्वास्थ्य सेवाओं का हाल भी यही है। इटली में कोरोना के कारण पंद्रह हजार से ज्यादा लोग मर चुके हैं। स्वास्थ्य सेवाओं की बेहतरी के मामले में इटली को दुनिया में दूसरे स्थान पर रखा जाता है। लेकिन देखने को यह मिल रहा है कि यहां भी कोरोना जांच के लिए जरूरी किट, बिस्तर, मास्क, पीपीई की भारी कमी है। हालांकि इसकी एक वजह यह भी है कि अचानक जिस तरह से कोरोना फैला, उसकी शायद ही किसी ने कल्पना की होगी। इटली अपनी जीडीपी का नौ फीसद स्वास्थ्य पर खर्च करता है। मुसीबत की इस घड़ी में इटली की मदद को क्यूबा जैसा देश आगे आया। क्यूबा ने अपने डॉक्टरों की टीम इटली भेजी।

फ्रांस स्वास्थ्य क्षेत्र पर अपनी जीडीपी का लगभग ग्यारह फीसद स्वास्थ्य खर्च करता है। लेकिन कोरोना संक्रमितों के इलाज के लिए यहां भी जरूरी उपकरण, सामान और दवा नहीं हैं, अस्पतालों में जगह नहीं बची है। ब्रिटेन में भी तीन हजार से ज्यादा लोग कोरोना से मर चुके हैं। फ्रांस, ब्रिटेन और इटली उन मुल्कों में शामिल हैं जो स्वास्थ्य सेवाओं पर प्रति व्यक्ति चार से पांच हजार डालर सालाना खर्च करते हैं।

लेकिन दुख और चिंता की बात यह है कि जब पूरी दुनिया इस गंभीर संकट का सामना कर रही है और रोजाना बड़ी संख्या में लोग मर रहे हैं, ऐसे में भी कोरोना के बहाने मुनाफाखोरी का धंधा जारी है। कोरोना के बहाने कई गुना कीमतों पर जरूरी स्वास्थ्य उपकरण बेचे जा रहे हैं। कई देशों ने जरूरी चीजों की जमाखोरी भी शुरू कर दी है। दूसरी ओर, क्यूबा जैसा देश दूसरे मुल्कों की मदद के लिए आगे भी आया है। क्यूबा ने कई मुल्कों में अपने डॉक्टर, तकनीकी सहयोगी और नर्सों को भेजा है। हालांकि पश्चिमी मीडिया कोरोना संकट के इस दौर में भी क्यूबा की आलोचना से बाज नहीं आ रहा है। पश्चिमी मीडिया का एक तबका अभी भी क्यूबा को खलनायक बताने पर तुला है। क्यूबा को कोरोना संकट के दौरान मौके का फायदा उठाने वाला देश बताया जा रहा है।

कहा जा रहा है कि क्यूबा कोरोना संकट का फायदा उठा कर अपने स्वास्थ्य कर्मचारी कई मुल्कों में भेज पैसे कमा रहा है। क्यूबा ने इटली में अपने डॉक्टर और नर्स भेजे हैं। लेकिन यह प्रचार किया जा रहा है कि क्यूबा ने इटली से कर्ज ले रखा है और वह कर्ज चुकाने में विफल रहा है, इसलिए डॉक्टरों और नर्सों को इटली भेज अवसर को भुनाने की कोशिश में है। क्यूबा कोरोना संकट के दौरान विदेशों में अपने पांच सौ तिरानवे स्वास्थ्य कमर्चारी भेज चुका है। इसमें दो सौ से ज्यादा डॉक्टर और तीन सौ के करीब नर्स हैं।

चीन जो खुद कोरोना की भयानक मार झेल चुका है, दुनिया के बाजार में फिर से उतर चुका है। चीन इस समय जरूरी स्वास्थ्य उपकरणों के उत्पादन का बड़ा केंद्र बन गया है। वह जरूरी स्वास्थ्य उपकरणों को ज्यादा कीमतों पर बेच रहा है। दूसरी ओर, अमेरिका जैसे देश अपने हितों को सर्वोपरि मानते हुए चीन में दूसरे देशों के आर्डर के तहत भेजे जा रहे दस्तानों और मॉस्क को भी महंगी कीमत पर खरीदने की कोशिश कर रहा है। फ्रांस ने आरोप लगाया है कि चीन से उसके यहां भेजे जा रहे मास्क अमेरिका ने तीन गुना ज्यादा पैसे देकर शंघाई एयरपोर्ट पर ही अपने नियंत्रण में कर लिए।

अमेरिका की इस हरकत से फ्रांस खफा है। ऐसी ही शिकायतें कनाडा और ब्राजील ने भी की हैं। इन दोनों मुल्कों ने भी चीन से दस्ताने और मॉस्क खरीद के आर्डर दिए हैं। लेकिन उन्हें अभी तक यह सामान नहीं मिला है। बताया जा रहा है कि अमेरिका के कई मालवाहक विमान चीन में मौजूद हैं, जो दूसरे देशों के लिए भेजे जाने वाले तैयार सामान अमेरिका ले जा रहे हैं। जो हो, कोरोना महामारी ने दुनिया के सर्वाधिक विकसित देशों की असली तस्वीर पेश कर दी है।

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