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राजनीति: लाभ के रिश्तों की रणनीतियां

भारत अमेरिका में इस्पात और एल्यूमीनियम उत्पादों पर लगाए जाने वाले ऊंचे आयात शुल्क में छूट, पूर्व में दिए जा रहे सामान्यीकृत तरजीही प्रणाली (जीएसपी) के तहत निर्यात लाभ की बहाली और भारत के कृषि, वाहन और इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए अमेरिका के बाजारों में अधिक पहुंच संबंधी रियायतों की मांग कर रहा है। वहीं अमेरिका चाहता है कि भारत में उसके कृषि और विनिर्मित उत्पादों के लिए बाजारों को और अधिक खोला जाए।

Author Updated: November 30, 2020 5:02 AM
Newly elected presidentअमेरिकी राष्‍ट्रपति जो बाइडेन भारत से बेहतर संबंध के पक्ष में। फाइल फोटो।

जयंतीलाल भंडारी

अमेरिका के नव निर्वाचित राष्ट्रपति जो बाइडेन ने भारत के संदर्भ में काफी सकारात्मक रुख दिखाया है। बाइडेन ने कहा कि वे भारत के साथ कोरोना, वैश्विक अर्थव्यवस्था और हिंद प्रशांत क्षेत्र को सुरक्षित बनाए रखने जैसे मुद्दों पर काम करेंगे। अर्थ विशेषज्ञों के मुताबिक नए राष्ट्रपति कारोबार को लेकर भारत के साथ व्यापक और सकारात्मक रुख अपनाएंगे और इससे भारत-अमेरिकी कारोबार संबंधों को रफ्तार मिलेगी। उल्लेखनीय है कि प्रतिभाओं की कमी का सामना कर रहे अमेरिका के लिए इस वक्त बड़ी चुनौती कोविड-19 की चुनौतियों के बीच उद्योग-कारोबार को गति देने की है।

इसके लिए अमेरिका के समक्ष भारतीय प्रतिभाओं के सहयोग से रोजगार के नए मौके निर्मित करने के बड़े अवसर हैं। इतना ही नहीं, बाइडेन ईरान को लेकर भी रुख नरम कर सकते हैं। इसका मतलब है कि भारत फिर से ईरान से तेल खरीदना शुरू कर पाएगा। यह भारत के लिए बड़ी आर्थिक अनुकूलता होगी। बाइडेन के आने से विश्व व्यापार समझौते (डब्ल्यूटीओ) जैसे बहुराष्ट्रीय संस्थानों को भी नया जीवन मिलेगा, जिससे भारत को लंबित व्यापार विवादों को निपटाने में मदद मिलेगी और वैश्विक कोराबार बढ़ाने में फायदा मिलेगा।

कोविड-19 के बदले हुए आर्थिक विश्व में अमेरिका और भारत दोनों एक दूसरे की आर्थिक जरूरत बन गए हैं। भारत एक मजबूत आर्थिक ताकत और बड़े बाजार के रूप में उभरा है और अमेरिका एक ऐसा बाजार खोज रहा है, जो उसके लोगों को रोजगार दिला सके। अमेरिका भारत के लिए निवेश और तकनीक का महत्त्वपूर्ण स्रोत होने के साथ ही प्रमुख कारोबारी साझेदार भी है। भारत वैश्विक निवेश के केंद्र के रूप में भी उभरा है। अमेरिका के साथ भारत का सबसे ज्यादा द्विपक्षीय कारोबार है। वाणिज्य मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक 2019- 20 में भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार 88.75 अरब डालर का रहा, जबकि 2018- 19 में यह 87.96 अरब डालर रहा था।

अब यह स्पष्टतौर पर नजर आ रहा है कि कोविड-19 के दौर में अमेरिका के लिए अन्य देशों की तुलना में भारत के साथ आर्थिक एवं कारोबारी लाभ ज्यादा हैं। भारत न केवल विनिर्माण क्षेत्र में तेजी से आगे बढ?े की संभावनाएं रखता है, बल्कि विनिर्माण क्षेत्र में दुनिया का नया केंद्र भी बन सकता है। भारत में निवेश के लिए कई क्षेत्र खुले हैं।

इस समय भारतीय बाजार में नवाचार, कारोबार सुधार, उत्पादन और सेवा क्षेत्र में सुधार की जो उभरती प्रवृत्ति दिख रही है, वह अमेरिका के लिए काफी लाभप्रद है। भारत के पास बुनियादी ढांचे और अन्य विकास परियोजनाओं के लिए घरेलू वित्तीय संसाधनों की भारी कमी है। ऐसे में नए वित्तीय स्रोतों के मद्देनजर भारत में अमेरिका से विदेशी प्रत्यक्ष निवेश (एफडीआइ) का आना स्वागत योग्य है। खासतौर से डिजिटल इंडिया, मेक इन इंडिया जैसी महत्त्वाकांक्षी योजनाओं के लिए आने वाले वक्त में भारत को अरबों डॉलर के निवेश की दरकार है।

बाइडेन के सत्ता में आने से भारत के सूचना प्रौद्योगिकी (आइटी) क्षेत्र के बढ़ने की काफी संभावनाएं हैं। डेमोक्रेटिक पार्टी के घोषणा पत्र में एच-1बी नीति को जारी रखने की बात कही गई थी। इससे भारतीय कर्मचारियों को वीजा नियमों के स्तर पर राहत मिल सकती है। चूंकि भारत की आइटी सेवाएं सस्ती और गुणवत्तापूर्ण हैं और ये अमेरिका के विकास में अहम भूमिका निभा रही हैं।

इसलिए अमेरिका के नए राष्ट्रपति देश की अर्थव्यवस्था को बढ़ाने के लिए भारत की सूचना प्रौद्योगिकी सेवाओं का अधिक उपयोग लेना चाहेंगे। कोरोना महामारी के बीच अमेरिका में घर से काम करने (वर्क फ्रॉम होम) की प्रवृत्ति को व्यापक तौर पर स्वीकार्यता मिली और इससे आउटसोर्सिंग को बढ़ावा मिला। नैसकॉम के अनुसार, आइटी कंपनियों के अधिकांश कर्मचारियों ने पूर्णबंदी के दौरान घर से काम किया गया है। आपदा के बीच समय पर सेवा की आपूर्ति से कई अमेरिकी इकाइयों का भारत की आइटी कंपनियों पर भरोसा बढ़ा है।

इसके अलावा घर से काम और स्थानीय तौर पर नियुक्तियों पर जोर दिए जाने से भारत की प्रमुख आइटी कंपनियों का कार्बन उत्सर्जन घटना भारत के लिए लाभप्रद हो गया है। अभी स्थिति यह है कि अमेरिकी कंपनियां किसी आइटी सेवा के लिए कंपनी का चयन करते समय कार्बन उत्सर्जन प्रदर्शन को लेकर संभावित विक्रेताओं से जानकारियां मांग रही हैं। कोविड-19 के पूर्व तक भारत की आइटी कंपनियों द्वारा व्यावसायिक यात्राओं और आवाजाही के तहत बड़ी मात्रा में कार्बन उत्सर्जन किया जाता रहा है।

लेकिन कोविड-19 ने आइटी कंपनियों को घर से कार्य का मॉडल अपनाने के लिए बाध्य किया। साथ ही, अमेरिका जैसे बाजारों में बढ़ती वीजा सख्ती की वजह से भी आइटी कंपनियों को स्थानीय तौर पर कर्मचारियों को नियुक्त करना पड़ रहा है। इससे भारतीय आइटी कंपनियों की यात्रा और दैनिक आवाजाही घटी है और कार्बन उत्सर्जन में भी कमी आई है।

बाइडेन के आने के बाद अमेरिका में वीजा नियमों में उदारता आएगी। लेकिन यदि यह उदारता नहीं भी आई तो अमेरिकी से भारत में आइटी आउटसोर्स बढ़ने की संभावना रहेगी। इस समय अमेरिका में जिस तरह अमेरिकी नागरिकों को रोजगार देना पहली प्राथमिकता बनती जा रही है, उससे भी भारतीय आइटी सेवाप्रदाता कंपनियां काफी काम भारत में आउटसोर्स करने की रणनीति पर चल रही हैं।

इस साल अक्तूबर में अमेरिका के श्रम मंत्रालय ने एच-1बी, एच-1बी1, ई-3 और आइ-140 वीजा के लिए न्यूनतम वेतन में इजाफा कर दिया है। इस कारण विदेशी कर्मचारियों को नियुक्ति देने के लिए अमेरिकी कंपनियों को ज्यादा धनराशि खर्च करनी पड़ेगी। साथ ही, उसने वीजा आवेदकों के लिए भी दायरा सीमित कर दिया है।

इन बदलावों का प्रमुख उद्देश्य यह है कि मौजूदा वेतन ढांचा कुछ ऐसा बने कि अमेरिकी कामगारों द्वारा अर्जित किया जाने वाला वास्तविक वेतन उसी काम में लगे विदेशी कामगारों से कम नहीं हो। ऐसे नए बदलाव के पीछे प्रमुख वजह यह है कि नियोक्ता कम वेतन पर विदेशी कर्मचारियों को नियुक्त करने के लिए प्रेरित नहीं होंगे। ऐसे में बाइडेन के आने के बाद भी अमेरिका में कार्यरत भारतीय आइटी सेवाप्रदाता कंपनियां अमेरिका में स्थानीय नियुक्तियां बढ़ाने और अधिक से अधिक काम भारत भेजने पर ध्यान केंद्रित करने की रणनीति पर चलेंगी।

पिछले दिनों भारत ने दुनिया के सबसे बड़े व्यापार समझौते रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनॉमिक पार्टनरशिप (आरसेप) में शामिल न होते हुए अमेरिका के साथ मुक्त व्यापार समझौते (एफटीए) के रास्ते पर चलने की रणनीति अपनाई है। भारत और अमेरिका एक सीमित व्यापार समझौते को लेकर बातचीत कर रहे हैं, ताकि दोनों के बीच आर्थिक रिश्तों को और बढ़ावा मिल सके।

भारत अपने उद्योग-कारोबार के लिए जहां अमेरिका में बेहतर अवसर चाहता है, वहीं अमेरिका भी अपने कारोबार के लिए भारत में अच्छे मौके चाहता है। नए एफटीए के तहत भारत अमेरिका में इस्पात और एल्यूमीनियम उत्पादों पर लगाए जाने वाले ऊंचे आयात शुल्क में छूट, पूर्व में दिए जा रहे सामान्यीकृत तरजीही प्रणाली (जीएसपी) के तहत निर्यात लाभ की बहाली और भारत के कृषि, वाहन और इंजीनियरिंग उत्पादों के लिए अमेरिका के बाजारों में अधिक पहुंच संबंधी रियायतों की मांग कर रहा है।

वहीं अमेरिका चाहता है कि भारत में उसके कृषि और विनिर्मित उत्पादों के लिए बाजारों को और अधिक खोला जाए। भारत में अमेरिका के डेयरी उत्पादों, चिकित्सा उपकरणों जैसे उत्पादों को बेहतर बाजार पहुंच मिले। साथ ही, भारत में सूचना और संचार प्रौद्योगिकी उत्पादों के आयात पर शुल्क कम किया जाए। अमेरिका में नए प्रशासन के काम संभालने के बाद भारत और अमेरिका के बीच कारोबार बढ़ने और भारत के आइटी उद्योग के लिए नई संभावनाएं बनेंगी।

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