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चीन पर अमेरिका का नया दांव

स्वतंत्र, खुले और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र की परिकल्पना अब चीन के भू-रणनीतिक और भू-आर्थिक प्रतिरोध का पर्याय बन गई है।

ब्रह्मदीप अलूने

चीन को रोकने के लिए अमेरिका की हिंद-प्रशांत आर्थिक ढांचे की नई रणनीति प्रभावकारी तो लगती है, लेकिन इसमें विरोधाभास भी कम नहीं हैं। एशिया के विभिन्न देशों को लामबंद करके और आर्थिक सहयोग को लेकर अमेरिका के प्रमुख सहयोगी आस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया चीन के साथ पहले से ही मिल कर काम कर रहे हैं।

स्वतंत्र, खुले और समृद्ध हिंद-प्रशांत क्षेत्र की परिकल्पना अब चीन के भू-रणनीतिक और भू-आर्थिक प्रतिरोध का पर्याय बन गई है। अंतरराष्ट्रीय राजनीति में सामूहिक सुरक्षा का सैद्धांतिक संबंध सैन्य सहयोग और शस्त्रीकरण पर आधारित रहा है, जहां आक्रमण, आक्रमण का प्रतिकार और अंतरराष्ट्रीय संघर्ष को रोकने की प्रतिबद्धताएं अहम रही हैं। अब चीन के आर्थिक उभार ने रणनीतिक प्रतिद्वंद्विता के प्रचलित सिद्धांतों को पूरी तरह से बदल दिया है। अमेरिका वैश्विक स्तर पर बढ़ते चीन के प्रभाव को नियंत्रित और संतुलित करने के लिए मजबूत आर्थिक और व्यापारिक नीतियों पर आधारित व्यवस्था को तरजीह दे रहा है। इसके केंद्र में हिंद प्रशांत महासागर का क्षेत्र है जो व्यापारिक, आर्थिक, प्राकृतिक और मानव संसाधन की दृष्टि से बेहद प्रभावकारी है।

भौगोलिक तौर पर हिंद महासागर और प्रशांत महासागर के कुछ भागों को मिला कर समुद्र का जो हिस्सा बनता है, उसे हिंद-प्रशांत क्षेत्र के नाम से जाना जाता है। यह व्यापारिक आवागमन का प्रमुख क्षेत्र है। इस मार्ग के बंदरगाह दुनिया के सर्वाधिक व्यस्त बंदरगाहों में शामिल हैं। हिंद-प्रशांत क्षेत्र से लगे अड़तीस देशों में दुनिया की करीब पैंसठ फीसद आबादी रहती है। आसियान की आर्थिक भागीदारियां, असीम खनिज संसाधनों पर चीन की नजर, कई देशों के बंदरगाहों पर कब्जा करने की चीन की सामरिक नीति और क्वाड की रणनीतिक साझेदारी इस क्षेत्र के प्रमुख राजनीतिक और सामरिक प्रतिद्वंद्विता से जुड़े मुद्दे रहे हैं।

इन सबके बीच दुनिया के बाजार में चीनी उत्पादों की आपूर्ति अबाध तरीके से हो रही है। वैश्वीकरण की दीर्घकालीन और प्रभावकारी आर्थिक नीतियों का फायदा उठा कर चीन ने अपनी सामरिक क्षमता का भी अभूतपूर्व विकास कर लिया है। पिछले कुछ वर्षों में चीन ने यूरोप के कई देशों को व्यापारिक और सहायता कूटनीति के जरिए राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभावित किया है। उधर, दक्षिण पूर्वी यूरोप में भी चीन का आर्थिक दबदबा बढ़ता जा रहा है। यह क्षेत्र अमेरिका और यूरोप के लिए सुरक्षा के लिहाज से बेहद महत्त्वपूर्ण है। यहीं बाल्कन प्रायद्वीप स्थित है। चीन नए सिल्क रोड के जरिए इस क्षेत्र के देशों में न केवल अपना रुतबा बढ़ा रहा है, बल्कि कर्ज कूटनीति से उसने कई देशों पर अपना प्रभाव भी जमा लिया है। चीन का यह विस्तारवाद यूरोप की सुरक्षा की एक बड़ी चुनौती बनता जा रहा है।

इसीलिए चीनी विस्तारवाद के खतरों से निपटने के लिए अमेरिका हिंद प्रशांत क्षेत्र में संभावनाएं तलाश रहा है। इस क्षेत्र में चीन को घेर कर वह उसकी आर्थिक और सामरिक क्षमता को कमजोर करना चाहता है। अमेरिका को लगता है कि चीन को नियंत्रित और संतुलित करने के लिए एशिया को कूटनीति के केंद्र में रखना होगा। बराक ओबामा और डोनाल्ड ट्रंप के बाद अब बाइडेन भी इसी नीति पर चल रहे हैं। अमेरिका रणनीतिक भागीदारी के साथ आर्थिक और कारोबारी नीतियों पर भी आगे बढ़ना चाहता है। इसीलिए क्वाड के बाद अब अमेरिका ने हिंद प्रशांत आर्थिक ढांचे (आइपीईएफ) की नींव रख दी है जिसमें व्यापारिक सुविधाओं के साथ आपसी सहयोग को बढ़ाने पर जोर है।

यह देखा गया है कि चीन रणनीतिक रूप से जहां भी मजबूत होता है, अमेरिका के लिए वह चुनौतीपूर्ण समझा जाता है। हिंद प्रशांत आर्थिक ढांचे को भी इसी दृष्टि से देखने की जरूरत है। ओबामा के कार्यकाल में अमेरिका की एशिया केंद्रित नीति में जापान, दक्षिण कोरिया, थाईलैंड, फिलीपींस और आस्ट्रेलिया के सहयोग से चीन को चुनौती देने की प्रारंभिक नीति पर काम शुरू हुआ था। ओबामा ने एशिया में अपने विश्वसनीय सहयोगी देशों के साथ ही उन देशों को भी जोड़ने की नीति पर काम किया जो चीन की विस्तारवादी नीतियों और अवैधानिक दावों से परेशान हैं।

ऐसे देशों में भारत के अलावा इंडोनेशिया, ताइवान, मलेशिया, म्यांमा, ताजिकिस्तान, किर्गिस्तान, कजाकिस्तान, लाओस और वियतनाम भी हैं। इनमें कुछ देश दक्षिण चीन सागर पर चीन के अवैध दावों को चुनौती देना चाहते हैं, तो कुछ देश चीन की भौगोलिक सीमाओं के विस्तार के लिए सैन्य दबाव और अतिक्रमण की घटनाओं से क्षुब्ध हैं। ऐसे में चीन को रोकने के लिए क्वाड का एक मजबूत रणनीतिक साझेदारी के तौर पर विकास तो हुआ, लेकिन इसके परिणाम अभी तक प्रभावकारी नहीं रहे हैं। क्वाड को लेकर चीन का रवैया सख्त रहा है और वह इसे एशियाई नाटो कहता रहा है।

चीन को रोकने के लिए अमेरिका की हिंद प्रशांत आर्थिक ढांचे की नई रणनीति प्रभावकारी तो लगती है, लेकिन इसमें विरोधाभास भी कम नहीं हैं। एशिया के विभिन्न देशों को लामबंद करके आर्थिक सहयोग को लेकर अमेरिका के प्रमुख सहयोगी आस्ट्रेलिया, जापान और दक्षिण कोरिया चीन के साथ पहले से ही मिल कर काम कर रहे हैं। आरसेप भी ऐसा ही आर्थिक सहयोग संगठन है। आसियान देशों के मुक्त व्यापार समझौते ‘रीजनल कांप्रिहेंसिव इकोनोमिक पार्टनरशिप’ (आरसेप) को विश्व का सबसे बड़ा व्यापार समझौता कहा जाता है जो एशियाई देशों के बीच निवेश बढ़ाने, आयात करों में कमी कर और सदस्य देशों की अर्थव्यवस्था को साथ लाने को कृतसंकल्पित होकर लगातार सहयोग पर आधारित व्यवस्था को पुख्ता कर रहा है। आरसेप चीन का पहला बहुपक्षीय मुक्त व्यापार समझौता है जिसमें दक्षिण कोरिया और जापान भी शामिल हैं। हालांकि इन दोनों देशों के साथ चीन के गहरे विवाद भी हैं।

ऐसे में अमेरिका की चुनौतियां कम नहीं हैं। पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा की पहल पर ‘ट्रांस-पैसिफिक पार्टनरशिप’ नाम का आर्थिक गठबंधन चीन का मुकाबला करने के लिए शुरू किया गया था। लेकिन साल 2017 में डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को बेकार बता कर अमेरिका को बाहर निकाल लिया था। इसके बाद जापान के नेतृत्व में इसे सीपीटीपीपी (कांप्रिहेंसिव एंड प्रोग्रेसिव एग्रीमेंट फार ट्रांस पैसेफिक पार्टनरशिप) नाम दिया गया। चीन इस गठजोड़ में चीन शामिल होना चाहता है। व्यापारिक मुद्दों पर अमेरिका और जापान में भी मतभेद सामने आते ही रहे हैं। चीन सीपीटीपीपी के सभी सदस्यों के साथ गहरे व्यापारिक संबंध साझा करता है और कई देशों के साथ उसके मुक्त व्यापार समझौते भी हैं। अधिकांश सदस्य आरसेप के माध्यम से भी चीन से जुड़े हैं।

अब अमेरिका यह विश्वास दिला रहा है कि एशिया के दो कारोबारी गठजोड़-सीपीटीपीपी और आरसेप के उलट आइपीईएफ में शुल्कों की दरें कम होंगी। उसके नेतृत्व में बनने वाले इस आर्थिक ढांचे के तहत अमेरिका आपूर्ति शृंखला की मजबूती और डिजिटल अर्थव्यवस्था पर रणनीतिक सहयोग चाहता है। यह भी दिलचस्प है कि आइपीईएफ में सहयोग के खुलेपन को लेकर अमेरिका ने कोई स्पष्ट योजना नहीं रखी है। जबकि चीन मुक्त हस्त से सहयोग की नीति पर निरंतर काम कर रहा है। आइपीईएफ में कुल तेरह देश हैं जिसमें अमेरिका, आस्ट्रेलिया, ब्रुनेई, भारत, इंडोनेशिया, जापान, दक्षिण कोरिया, मलेशिया, न्यूजीलैंड, फिलीपींस, सिंगापुर, थाईलैंड और वियतनाम शामिल हैं। पर हैरानी की बात यह है कि इसमें से अधिकांश देशों के बाजार पर चीन का दबदबा है। ऐसे में अमेरिका कैसे चीन पर शिकंजा कस पाएगा, यह कम बड़ा सवाल नहीं है।

जाहिर है, चीन को रोकने के लिए दीर्घकालीन आर्थिक और सामरिक रणनीति पर काम करने की जरूरत है। इसके लिए अमेरिका को न केवल अपने मित्र और सहयोगी देशों का भरोसा जीतना होगा, बल्कि समान हितों पर आधारित व्यवस्थाओं के साथ बढ़ना होगा। भारत अपनी सामरिक और भौगोलिक चुनौतियों के चलते न तो रूस का विरोध कर सकता है, न ही जापान अपने आर्थिक हितों को बलि चढ़ा कर चीन से आर्थिक संबंधों को खत्म कर सकता है। वैश्विक व्यवस्थाओं की जटिलता के बीच नाटो और अमेरिका चीन को यूरोप में नहीं रोक पा रहे हैं। ऐसे में एशिया में चीन को कमजोर करना एक दिवास्वप्न ही नजर आता है।

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