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घर से दूर रहने को मजबूर

28 सितंबर, 2015 के बाद अखलाक के घरवालों ने गांव छोड़ दिया है। 17 अक्तूबर, 2015 को अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के दौरे पर आखिरी बार वे लोग अपनी जन्मभूमि बिसाहड़ा गांव गए थे।

(File Photo)

28 सितंबर, 2015 के बाद अखलाक के घरवालों ने गांव छोड़ दिया है। 17 अक्तूबर, 2015 को अल्पसंख्यक आयोग के अध्यक्ष के दौरे पर आखिरी बार वे लोग अपनी जन्मभूमि बिसाहड़ा गांव गए थे। गांव में उनके मकान लावारिस हालत में पड़े हैं। हादसे में गंभीर रूप से घायल हुआ दानिश अपने भाई सरताज के साथ दिल्ली के सुब्रतो पार्क इलाके में रह रहा है। सरताज भारतीय वायुसेना के एअरक्राफ्ट यार्ड में नौकरी करते हैं। दानिश की अम्मी इकरामन और बहन शाहिस्ता भी दिल्ली में रह रही हैं। मां असगरी बेगम (82) दादरी में उनके पास रहती हैं। ये जानकारियां अखलाक के भाई जान मोहम्मद ने दीं जो फिलहाल दादरी कस्बे में रह रहे हैं।

जान मोहम्मद बताते हैं कि उनकी मां का मन बिसाहड़ा जाने के लिए छटपटाता है, लेकिन 28 सितंबर 2015 की रात का खौफनाक मंजर जेहन में आते ही घबरा जाती हैं। सरकारी नौकरी की वजह से सरताज को मीडिया से बात करने की मनाही है। जबकि दिल्ली में रहने वाले अन्य परिजन भी इस मुद्दे पर बात करने को तैयार नहीं हैं। जान मोहम्मद ने बताया कि 28 सितंबर 2015 की रात उनकी मां असगरी बेगम, भाई अखलाक (50), पत्नी इकरामन, बेटी शाइस्ता और बेटा दानिश (22) घर पर थे। रात में करीब 40-50 लोग भीड़ की शक्ल में वहां पहुंचे और एकाएक अखलाक के साथ मारपीट शुरू कर दी। शोर सुनकर असगरी बेगम, दानिश और इकरामन बाहर निकले। भीड़ ने उन्हें भी नहीं बक्शा। असगरी बेगम ने खुद को बाथरूम में बंद कर जान बचाई। जबकि भीड़ ने इकरामन और शाइस्ता के साथ बदतमीजी करने की कोशिश की। दोनों ने रसोई में बंद कर खुद को बचाया। भीड़ ने अखलाक के अलावा दानिश की भी जमकर पिटाई की। पीटते हुए घर से करीब 150 मीटर दूर पर अखलाक को मरा हुआ छोड़कर हमलावर भागे। दानिश भी पिटाई से बेहोश हो गया था, उसे भी मरा समझकर हमलावर चले गए थे। वारदात के काफी देर बाद पहुंची पुलिस अखलाक और दानिश को अस्पताल लाई। अखलाक की मौत हो चुकी थी, जबकि दानिश मरणासन्न था। कई आॅपरेशनों के बाद उसकी जान बच पाई।

जान मोहम्मद का आरोप है कि वारदात रात करीब 10:30 बजे हुई थी। जबकि 1 बजे पुलिस घर से करीब 150 मीटर दूर पड़े मांस के टुकड़ों को इकट्ठा कर दादरी के पशु चिकित्सालय ले गई। दादरी पशु चिकित्सालय ने जांच के बाद इसे बकरे का मांस बताया था। 30 दिसंबर 2015 को भेजे गए नमूने के बकरे का होने की पुष्टि मथुरा फोरेंसिक प्रयोगशाला ने भी की थी, जिसकी जानकारी उन्हें तत्कालीन जिलाधिकारी एनपी सिंह ने दी थी। अलबत्ता उनके मांगने पर भी इस रिपोर्ट की छाया प्रति उपलब्ध नहीं कराई थी। घटना के करीब 9 महीने बाद एक रिपोर्ट में नमूने को गाय या गाय के वंश का मीट होने का बताया गया था।

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