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राजनीति: अर्थव्यवस्था बनाम प्रदूषण

पर्यावरण को हो रहे नुकसान के कारण ही जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ता जा रहा है। इससे वर्षाचक्र गड़बड़ा रहा है। दुनिया की बहुत बड़ी आबादी के सिर पर पीने का पानी और पर्याप्त कृषि उपज का संकट मंडराने लगा है। अगर इसी तरह पर्यावरण तबाह होता रहा तो आगे चल कर एक आर्थिक दुर्घटना को टालना मुश्किल नजर आ रहा है।

Author Updated: January 2, 2021 12:10 AM
crisisप्रदूषण बढ़ने से लोगों को हो रही परेशानी। फाइल फोटो।

सुविज्ञा जैन

वायु प्रदूषण पर चिंताओं का सिलसिला जारी है। देखा जाए तो कुछ ही साल से सिर्फ सर्दियों में ही वायु प्रदूषण की ज्यादा चर्चा होने लगी है। वरना पांच-सात साल पहले तक भारत में लगातार पूरे साल प्रदूषण पर चिंता जताई जा रही थी। सरकारों को पूरे साल याद दिलाया जाता था कि प्रदूषण से जान और माल दोनों का कितना नुकसान होता है। इधर विशेषज्ञ एक बार फिर बताने लगे हैं कि प्रदूषण के कारण हर साल न सिर्फ सत्रह लाख मौतें हो रही हैं, बल्कि अर्थव्यवस्था को देश की जीडीपी का सात फीसद यानी लगभग चौदह लाख करोड़ रुपए का नुकसान भी हो रहा है।

यह रकम वित्तीय घाटे की कमोबेश दुगनी बैठती है। गौर करने की बात है कि दुनिया में विकसित देश जब पर्यावरण से समझौता करते हैं तो यही कहते हैं कि हमें अर्थव्यवस्था को पहले देखना है, बाकी बाद में। अब जब अपने देश में वायु प्रदूषण से देश को हर साल चौदह लाख करोड़ रुपए के नुकसान का आंकड़ा निकल कर आ रहा हो तो क्या इसका एक मतलब यह नहीं है कि प्रदूषण से जान-माल का दोहरा नुकसान हो रहा है। अगर वित्तीय घाटा बढ़ना इतनी बड़ी चिंता की बात है तो प्रदूषण के कारण आर्थिक हानि की चिंता दुगनी बड़ी मानी जानी चाहिए।

कई शोध सर्वेक्षणों का निष्कर्ष है कि वायु प्रदूषण के कारण होने वाली बीमारियों के इलाज के लिए कामगारों के छुट्टी पर जाने से हर साल पचास करोड़ श्रम दिवसों का नुकसान हो जाता है। वायु प्रदूषण से होने वाली तरह-तरह की बीमारियों के इलाज पर औसतन एक हजार नौ सौ रुपए प्रति व्यक्ति अलग से खर्च हो जाते हैं। यह आंकड़ा 2019-20 वित्तीय वर्ष का है। जबकि 2015 में यह खर्च एक हजार आठ रुपए प्रति व्यक्ति आंका गया था। अंदाजा लगाया जा सकता है कि पांच साल के अंतराल में वायु प्रदूषण ने नागरिकों के कंधों पर स्वास्थ्य खर्च का कितना बोझ बढ़ा दिया है। क्या इस बात पर हैरत नहीं जताई जानी चहिए कि देश का सालाना स्वास्थ्य बजट सिर्फ उनहत्तर हजार करोड़ का है, लेकिन सिर्फ वायु प्रदूषण से होने वाला नुकसान चौदह लाख करोड़ है।

कहते हैं कि प्रदूषण के कारण मौतों और बीमारियों की त्रासदी से निपटने में इसी कारण दिक्कत है क्योंकि स्वास्थ्य क्षेत्र पर ज्यादा खर्च करने की गुंजाईश नहीं निकलती। लेकिन जब प्रदूषण से सीधे-सीधे अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान होने की बात बताई जा रही हो तो क्या हिसाब नहीं लगाया जाना चाहिए कि प्रदूषण को रोकने या कम करने का कितना खर्चा बैठेगा और उससे अर्थव्यवस्था को होने वाला नुकसान कितनी मात्रा में रोका जा सकता है? बेशक प्रदूषण की चिंता करने से प्रदूषणकारी औद्योगिक गतिविधियों पर लगाम लगानी पड़ती है। अर्थशास्त्री तर्क देने लगते हैं कि पहले आर्थिक विकास कर लिया जाए और फिर जो पैसा पैदा हो उससे प्रदूषण की समस्या से निपट लिया जाएगा।

नफे-नुकसान के आंकड़ों पर तफसील से बहस होनी चाहिए। बहुत संभव है कि यह पता चले कि पर्यावरण की कीमत पर पैदा होने वाली पूंजी आर्थिक विकास का छलावा है। प्रदूषण से होने वाले नुकसान की मात्रा बताई जाएगी तो बहुत संभव है कि यह सिद्ध हो जाए कि पर्यावरण से समझौता करके होने वाले औद्योगिक विकास से देश का आर्थिक विकास नहीं, बल्कि आर्थिक हृास हो रहा है। कम से कम वायु प्रदूषण से हर साल चौदह लाख करोड़ के नुकसान का आंकड़ा तो यही साबित कर रहा है। यहां बात भविष्य के मद्देनजर भी की जानी चाहिए।

आज का आर्थिक विकास अगर भविष्य की संभावनाओं को खत्म करता हो तो उसे खुद में एक हादसा कहा जाएगा। आज के अर्थशास्त्री सतत विकास की बात यों ही नहीं करते। वे आर्थिक विकास और सतत विकास का फर्क साफ-साफ समझा रहे हैं। बहरहाल, भविष्य को अगर वर्तमान में खाया जा रहा हो तो उस पर चिंता जताई ही जानी चाहिए।

दुनिया की वैज्ञानिक बिरादरी ने सिद्ध कर दिया है कि पर्यावरण को हो रहे नुकसान के कारण ही जलवायु परिवर्तन का खतरा बढ़ता जा रहा है। इससे वर्षाचक्र गड़बड़ा रहा है। दुनिया की बहुत बड़ी आबादी के सिर पर पीने का पानी और पर्याप्त कृषि उपज का संकट मंडराने लगा है। अगर इसी तरह पर्यावरण तबाह होता रहा तो आगे चल कर एक आर्थिक दुर्घटना को टालना मुश्किल नजर आ रहा है। इसीलिए भविष्य के ऐसे नुकसान से बचने के लिए एक ही उपाय नजर आता है और वह यह कि पर्यावरण को ताक पर रख कर जो अंधाधुंध औद्योगिक विकास हुआ जा रहा है, उस पर अभी से लगाम लगे। अच्छी बात यह है कि दुनिया के कई उन देशों के उदाहरण हमारे सामने हैं जिन्होंने वक्त रहते पर्यावरण संरक्षण को अपनी पहली प्राथमिकता में शामिल किया। इन देशों में चीन भी है। उसका जिक्र इसलिए जरूरी है क्योंकि पर्यावरण के मामले में कुछ साल पहले बेजिंग की हालत भी दिल्ली जैसी हुई थी। तब वहां सबसे पहले अंधाधुंध औद्योगिक विकास को रोकना पड़ा था।

बाकायदा एक राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता कार्रवाई योजना बनाई गई। बेजिंग के आसपास कोयले से चलने वाले सारे बिजलीघर बंद करवा दिए गए थे। सड़कों पर बढ़ती निजी वाहनों की भीड़ को कम करने के लिए सार्वजनिक यातायात व्यवस्था पर ताबड़तोड़ सरकारी निवेश किया गया। उद्योग जगत को इस तरह के प्रोत्साहन पैकेज दिए गए, जिससे वे पर्यावरण अनुकूल कारखाने लगाने के लिए प्रोत्साहित हों और साथ ही नियम तोड़ने वालों पर भारी जुर्माने लगाए गए।
उधर फ्रांस की राजधानी पेरिस में कई ऐतिहासिक और केंद्रीय स्थानों पर वाहन ले जाने पर पूरी तरह पाबंदी लगाई गई। निजी वाहनों के लिए सम-विषम का तरीका वहां कभी कभार नहीं, बल्कि नियमित रूप से प्रयोग में लाया जाता है।

गौरतलब है कि प्रदूषण बढ़ने के अंदेशे वाले त्योहारों के दौरान यातायात के सरकारी साधनों को मुफ्त कर दिया जाता है। डेनमार्क की राजधानी कोपेनहेगन को 2025 तक कार्बन मुक्त बना देने का एलान कर दिया गया है। कोपेनहेगन के बारे में कहा जाता है कि वहां साइकिलों की संख्या उनकी आबादी से ज्यादा है। सरकारी यातायात की सुविधा बढ़ाने के पीछे का कारण भी वायु प्रदूषण से बचना रहा है। जर्मनी के फ्राईबर्ग शहर में तो सरकार ने अपने नागरिकों के लिए बाइकवेज और ट्रामवेज बनवाए हैं।

जर्मनी के कुछ और अनुभव गौरतलब हैं। जैसे- फ्राईबर्ग में टोकन पद्धति का इस्तेमाल। वहां जिस व्यक्ति के पास डीजल या पेट्रोल का वाहन नहीं होता, उसे सस्ते मकान और सस्ती सरकारी यातायात सुविधा दी जाती है। वहां के पर्यावरण विशेषज्ञ और पर्यावरण कार्यकर्ता अपनी सरकार को समझाने में कामयाब रहे कि इन उपायों में उसका जो खर्च होगा, उससे वह घाटे में नहीं, बल्कि मुनाफे में रहेगी, क्योंकि पर्यावरण को पहुंचने वाला नुकसान आर्थिक विकास के फायदों से कहीं ज्यादा बैठ रहा है।

इसी तरह नीदरलैंड में भी 2025 तक डीजल-पेट्रोल के वाहन पूरी तौर पर खत्म करने की योजना है। आने वाले दिनों में नीदरलैंड में सिर्फ हाइड्रोजन और बिजली से चलने वाले वाहन ही खरीदे जा सकेंगे। फिनलैंड, स्विटजरलैंड, ब्राजील जैसे कई देशों ने जन यातायात को बेहतर बनाने का काम अपनी प्राथमिकता में रखा है और इसमें भारी निवेश किया है तो उसके पीछे मुख्य मकसद प्रदूषण से बचाव का ही है।

लगभग सभी उदाहरणों में सबसे गौरतलब नुक्ता यही है कि जिन देशों ने भी पर्यावरण के मामले में बड़ी मंजिलें हासिल की हैं, वे आर्थिक विकास से समझौता करने के बाद ही हासिल कर पाई हैं। हम भी अभी अपनी आर्थिक मजबूरियों का तर्क देकर भले ही इस बात को न मानें, लेकिन देर-सबेर हमें दूसरे देशों के सबक लेने के लिए मजबूर होना ही पड़ेगा।

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