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राजनीति: प्रदूषण का दंश

इक्कीसवीं सदी में जिस प्रकार से हम औद्योगिक विकास और भौतिक समृद्धि की ओर बढ़े चले जा रहे हैं, उस सुख-समृद्धि ने पर्यावरण संतुलन को भारी नुकसान पहुंचाया है। यह खतरे की घंटी है। इसीलिए अब यह अत्यावश्यक हो जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने वातावरण के प्रति जागरूक रहे और जीवन की प्राथमिकताओं में स्वच्छ वातावरण के निर्माण को शीर्ष पर रखे।

प्रदूषण की समस्या से दिल्ली वाले भी परेशान।

दुनियाभर में वायु प्रदूषण के सबसे खराब स्तर वाले शहरों की सालाना सूची में भारत के शहर एक बार फिर शीर्ष पर हैं। इस सूची के पहले दस शहरों में से छह और पहले तीस शहरों में कुल इक्कीस शहर भारत के हैं। दुनिया के मुकाबले भारत में वायु प्रदूषण किस खतरनाक स्तर पर पहुंच चुका है, यह इस सूची से पता चलता है। दिल्ली से सटा गाजियाबाद शहर दुनिया के सबसे प्रदूषित शहरों में है। वैश्विक वायु गुणवत्ता रिपोर्ट- 2019 का यह आंकड़ा आइक्यूएआईआर के शोधकर्ताओं ने तैयार किया है। हर साल यह रिपोर्ट तैयार होती है। 2018 की रिपोर्ट में शीर्ष तीस प्रदूषित शहरों में भारत के बाईस शहर शामिल थे। वायु प्रदूषण में दक्षिण एशिया के तीस में से सत्ताईस शहर शामिल हैं, जिनमें भारत के अलावा पाकिस्तान और बांग्लादेश के शहर भी हैं।

इसके उलट पड़ोसी देश चीन की राजधानी बेजिंग ने पिछले साल वायु गुणवत्ता में सुधार किया है। बेजिंग दुनिया के दो सौ सबसे प्रदूषित शहरों की सूची से बाहर हो गया है। लेकिन भारत में प्रदूषण नियंत्रण की सरकारी नीतियों और प्रयासों के बावजूद हवा की गुणवत्ता पिछले पांच साल के दौरान काफी ज्यादा बिगड़ी है। जाहिर है, प्रदूषण की समस्या कहीं अधिक गंभीर हो चुकी है और वह केवल दिल्ली तक ही सीमित नहीं रह गई है, बल्कि भारत में बड़े शहरों से इतर छोटे-छोटे शहरों में भी हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है। उसमें घुला जहर लोगों को न सिर्फ धीरे-धीरे बीमार कर रहा है, बल्कि उनकी मौत की वजह भी बन रहा है। वैसे तो आज पूरी दुनिया वायु प्रदूषण का शिकार का शिकार है, लेकिन भारत के लिए यह समस्या विकराल रूप धारण करती जा रही है।

अब समस्या इतनी व्यापक और गंभीर हो चुकी है कि दुनिया के सामूहिक प्रयास के बिना इससे निजात नहीं मिल सकती। आज के समय में हमारे सामने दो बड़ी चुनौतियां हैं। एक- पर्यावरण को स्वच्छ रखने में हम कैसे योगदान दें और दूसरा- खतरनाक स्तर तक पहुंच चुके पर्यावरण प्रदूषण को कैसे कम किया जाए। वायु प्रदूषण सिर्फ नागरिकों के स्वास्थ्य पर ही नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था पर भी नकारात्मक प्रभाव डालता है। भारत में होने वाली मौतों के प्रमुख कारणों में वायु प्रदूषण भी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन के आंकड़ों के मुताबिक जहरीली हवा से हर साल सत्तर लाख लोगों की मौत हो जाती है।

वायु प्रदूषण पर नजर रखने वाले एयर क्वालिटी लाइफ इंडेक्स (एक्यूएलआइ) और शिकागो विश्वविद्यालय स्थित एनर्जी पॉलिसी इंस्टीट्यूट के एक अध्ययन में कहा गया है कि उत्तर भारत में खराब हवा के कारण सामान्य इंसान की जिंदगी औसतन साढ़े सात साल कम हो रही है।

इससे स्पष्ट है कि भारत में बड़े शहरों से इतर अब छोटे-छोटे शहरों में भी हवा सांस लेने लायक नहीं रह गई है। उसमें घुला जहर लोगों को न सिर्फ धीरे-धीरे बीमार कर रहा है, बल्कि उनकी मौत की वजह भी बन रहा है। हवा जहरीली और प्रदूषित होने का मतलब है कि उसमें पार्टिकुलेट मैटर यानी जहरीले कणों के स्तर में वृद्धि होना। हवा में पीएम-2.5 की मात्रा 60 और पीएम-10 की मात्रा 100 होने पर इसे सुरक्षित माना जाता है। लेकिन इससे ज्यादा हो तो वह बेहद नुकसानदायक हो जाती है।
ऐसी गंभीर स्थिति पर काबू पाने के लिए कठोर कदम उठाने की जरूरत है।

प्रदूषण से लड़ने के लिए सरकारों को दीर्घकालीन नीतियां बना कर उन पर सख्ती से अमल करना होगा। लेकिन विकसित और विकासशील देशों में विकास के नाम पर आगे निकलने की होड़ ने पर्यावरण को इतना प्रदूषित कर दिया है कि आज विश्व के समक्ष जलवायु परिवर्तन, बढ़ता तापमान और ओजोन परत के क्षरण की समस्या ने मानव के अस्तित्व के समक्ष संकट खड़ा कर दिया है। प्रदूषण को बढ़ाने में मनुष्य के क्रियाकलाप और उसकी जीवनशैली काफी हद तक जिम्मेवार है।

प्रारंभ में जब प्रौद्योगिकी विकास नहीं हुआ था, तब लोग प्रकृति व पर्यावरण से सामंजस्य बैठा कर रहते थे। लेकिन परंतु तकनीकी विकास और औद्योगीकरण के कारण आधुनिक मनुष्य में आगे बढ़ने की होड़ उत्पन्न हो गई। इस होड़ में मनुष्य को केवल अपना स्वार्थ दिखाई पड़ रहा है। वह यह भूल गया है कि इस पृथ्वी पर उसका वजूद प्रकृति एवं पर्यावरण के कारण ही है। लेकिन इसके बावजूद लोग अपने त्रासदीपूर्ण भविष्य को लेकर पूरी से तरह से बेखबर हैं।

सवाल उठता है कि आखिर हमारी सरकारें कर क्या रही हैं? पानी प्रदूषित, नदियां प्रदूषित, मिट्टी प्रदूषित और हवा प्रदूषित। देश में बढ़ते प्रदूषण का मिजाज इसी तरह से बना रहा तो आने वाले कुछ दशकों में मानव के अस्तित्व को बड़ा खतरा पैदा हो जाएगा। गौर करने वाली बात यह है कि आबादी के लिहाज से सबसे ज्यादा नुकसान भारत का ही होने वाला है, लिहाजा भारत को अपनी जिम्मेदारी बखूबी समझते हुए तत्काल सार्थक और ठोस उपाय करने होंगे। जो थोड़े-बहुत प्रयास हो भी रहे हैं, वे बेअसर साबित हो रहे हैं।

वायु प्रदूषण के खिलाफ हमारी लड़ाई कमजोर होने की एक बड़ी वजह यह है कि इसमें जनता सक्रिय रूप से भागीदार नहीं बन रही है। इसका नतीजा यह होता है कि वायु प्रदूषण रोकने के लिए उठाया गया अच्छे से अच्छा कदम भी नाकाम हो जाता है। प्रदूषण की समस्या का स्थायी इलाज निकालने के लिए भारत कई दूसरे देशों से सबक ले सकता है। दरअसल, कई अन्य देश भी प्रदूषण की समस्या से जूझ रहे हैं। इन देशों में प्रदूषण से निपटने के कई तरीके अपनाए गए हैं, जिनसे उन्हें कुछ सफलता भी हासिल हुई है।

आज वायु प्रदूषण ऐसा गंभीर मुद्दा है जो पूरी दुनिया के लिए चिंता की बात है। इसे आपसी सहमति और ईमानदार प्रयासों के बिना हल नहीं किया जा सकता। वायु प्रदूषण को निश्चित रूप से नियंत्रित किया जा सकता है, लेकिन इसके लिए हम सभी नागरिकों और संगठनों से लेकर निजी कंपनियों और सरकारों तक को एक साथ मिल कर प्रयास करना होगा। भारत में वायु प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए नियम-कानूनों और दिशानिर्देशों की कोई कमी नहीं है।

समस्या यह है कि इन नियम-कानूनों को कहीं भी उतनी सख्ती से लागू नहीं किया गया, जितनी कि जरूरत थी। इस समय भारत विश्व की सबसे तेजी से विकसित होती अर्थव्यवस्था है। पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि हवा में घुलते जहर के लिए कई कारक जिम्मेदार हैं, इसलिए यह समस्या बहुआयामी है। दशकों से किसी भी सरकार या प्रदूषण नियंत्रण एजेंसियों ने बढ़ते प्रदूषण पर अंकुश लगाने की दिशा में कोई ठोस पहल नहीं की। अब नतीजा सामने है। इस समस्या पर अंकुश लगाने के लिए लोगों में जागरूकता फैलाने के साथ ही एक एकीकृत योजना बना कर उसे गंभीरता से लागू करना भी होना चाहिए।

इक्कीसवीं सदी में जिस प्रकार से हम औद्योगिक विकास और भौतिक समृद्धि की ओर बढ़े चले जा रहे हैं, उस सुख-समृद्धि ने पर्यावरण संतुलन को भारी नुकसान पहुंचाया है। यह खतरे की घंटी है। इसीलिए अब यह अत्यावश्यक हो जाता है कि प्रत्येक व्यक्ति अपने वातावरण के प्रति जागरूक रहे और जीवन की प्राथमिकताओं में स्वच्छ वातावरण के निर्माण को शीर्ष पर रखे। लेकिन अफसोस की बात है कि हम चेत नहीं रहे हैं। साल दर साल बीत जाने के बाद भी भारत में वायु प्रदूषण बढ़ता ही जा रहा है। वक्त कुछ करने का है न कि सोचने का।

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