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राजनीति: कृषि सुधार का ऐतिहासिक क्षण

समय की मांग यह थी कि ऐसी प्रणाली लागू की जाए जो खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तैयार की गई हमारी नीतियों का अनुपूरक हो। जब हम कृषि उपज बढ़ाने में सफल रहे, तब भी हम विश्व में पिछड़ गए। किसानों के लिए मूल्य प्राप्ति उपभोक्ताओं द्वारा भुगतान किए गए खुदरा मूल्य का अंश मात्र था। इसी प्रकार गुणवत्ता नियंत्रण और प्रमाणन की कमी थी, जिसके परिणामस्वरूप खाद्य निर्यात बाजारों में भारत का एक छोटा-सा हिस्सा था।

अमिताभ कांत

भारत के इतिहास में 1991 को एक ऐतिहासिक वर्ष के रूप में याद किया जाता है। तब लाइसेंस राज समाप्त कर दिया गया था। भारत ने अंतरराष्ट्रीय व्यापार, निवेश और प्रतिस्पर्धा के लिए अपने बाजार खोल दिए थे। तब से तीस वर्षों में हमने अपनी प्रति व्यक्ति आय में चार गुना वृद्धि की है। यह उल्लेखनीय है कि स्वतंत्रता और 1991 के सुधारों के बीच विषम चालीस वर्षों में प्रति व्यक्ति आय दोगुनी हुई है। प्रति व्यक्ति आय वृद्धि दर में अंतर स्पष्ट है। हालांकि, एक महत्त्वपूर्ण वर्ग को सुधार प्रक्रिया से बाहर रखा गया था।

भारत का कृषि क्षेत्र प्राचीन कृषि उपज विपणन समिति (एपीएमसी) अधिनियमों द्वारा चलाया जाता रहा। वर्ष 2020 को भारत के आर्थिक इतिहास में एक मील के पत्थर के रूप में ठीक उसी तरह याद किया जाएगा, जैसे हम 1991 को आज याद कर रहे हैं।

मौजूदा एपीएमसी अधिनियमों के तहत सभी कृषि उपज उन मंडियों के माध्यम से खरीदी जाती थी, जहां किसान अपनी उपज पहुंचाते थे। प्रारंभ में किसानों के संरक्षण के लिए ये मंडियां स्थानीय एकाधिकार में तब्दील हो गई थीं। अभिसंधि और मूल्य निर्धारण द्वारा नीलामी के माध्यम से पारदर्शी मूल्य प्राप्ति को प्रतिस्थापित किया गया था। अत: किसानों के संरक्षण हेतु नामित किए गए तंत्र ने उन्हें अत्यधिक नुकसान पहुंचाया। कमीशन एजेंट, जिन्हें आढ़तिए के रूप में जाना जाता है, के द्वारा बिक्री-कर लेना आम प्रचलन था और इन बिचौलियों ने उपज के खरीदारों और बेचने वालों के बीच अनौपचारिक ऋण का पर्याप्त प्रभाव बना रखा था।

न्यूनतम समर्थन मूल्य (एमएसपी) बढ़ाना ही एकमात्र समाधान नहीं था। विशेषज्ञों ने बताया है कि सभी किसानों में से केवल छह फीसद को ही एमएसपी पर सार्वजनिक खरीद से लाभ प्राप्त हुआ। हालांकि, इससे अन्यों के लिए यह निष्कर्ष निकला है कि बाकी चौरानवे फीसद किसानों को अपनी उपज खुले बाजार में बेचनी चाहिए। वास्तव में शेष इन किसानों को वह लाभ नहीं मिला।

कृषि क्षेत्र के निकट संग्रहण हेतु अवसंरचना विकसित करने के बहुत कम प्रयास किए गए थे। न तो कोल्ड चेन और न ही खाद्य प्रसंस्करण उद्योग में निवेश के लिए पर्याप्त प्रोत्साहन दिए गए थे, क्योंकि इस नीति ने किसानों की उपज और सौदेबाजी की क्षमता को अप्रत्याशित रूप से हतोत्साहित किया था। इसलिए शेष किसानों को खुले बाजार तक पहुंचने का लाभ बमुश्किल प्राप्त हुआ। इसका परिणाम यह हुआ कि हम अपने खाद्य उत्पादन के दस फीसद से भी कम का प्रसंस्करण कर सके और उपज की बर्बादी होने से लगभग नब्बे हजार करोड़ रुपए साल का नुकसान होता रहा।

समय की मांग यह थी कि ऐसी प्रणाली लागू की जाए जो खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए तैयार की गई हमारी नीतियों का अनुपूरक हो। जब हम कृषि उपज बढ़ाने में सफल रहे, तब भी हम विश्व में पिछड़ गए। किसानों के लिए मूल्य प्राप्ति उपभोक्ताओं द्वारा भुगतान किए गए खुदरा मूल्य का अंश मात्र था। इसी प्रकार गुणवत्ता नियंत्रण और प्रमाणन की कमी थी, जिसके परिणामस्वरूप खाद्य निर्यात बाजारों में भारत का एक छोटा-सा हिस्सा था।

सरकारी समितियों, कार्य-बलों, रिपोर्टों आदि सभी ने समान सिफारिशें की हैं। सर्वप्रथम, स्थानीय मंडी व्यवस्था को प्रतिस्पर्धा की आवश्यकता थी। किसानों को थोक विक्रेताओं और खुदरा विक्रेताओं को अपनी उपज बेचने के लिए कई विकल्पों की जरूरत थी, जिसे एपीएमसी प्रणाली ने हतोत्साहित किया। दूसरा, अनुबंध खेती को खाद्य प्रसंस्करण उद्योग के साथ संबंधों को बढ़ावा देने के लिए एक सक्षम ढांचे की जरूरत थी। अनुबंधात्मक खेती से किसान भी एक सुनिश्चित आय के साथ निवेश निर्णयों की योजना बना पाएंगे।

तीसरा, जिस नियमितता के साथ आवश्यक वस्तु अधिनियम लागू किया गया था, उसने कोल्ड चेन में निवेश को हतोत्साहित किया। कई प्रयासों के बावजूद राज्य सरकारों के सुधार के प्रयास बदतर या काफी हद तक बनावटी प्रकृति के थे। इसका नतीजा यह हुआ कि बाकी अर्थव्यवस्था के आधुनिकीकरण के बाद भी कृषि तेजी से पिछड़ती जा रही थी।

किसानों का उत्पाद व्यापार एवं वाणिज्य (संवर्धन और सुविधा) बिल, 2020; किसानों के (सशक्तिकरण और संरक्षण) मूल्य आश्वासन पर समझौता और कृषि सेवाएं बिल, 2020 और आवश्यक वस्तुएं (संशोधन) बिल, 2020 इन्हीं मुद्दों को समाधान करता है। किसान प्रसंस्करण योग्य किस्मों को विकसित करने और उन्हें सुनिश्चित कीमतों पर बेचने के लिए खाद्य संसाधक के साथ समझौता कर सकेंगे। किसानों पर प्रतिबंध नहीं लगाया जाएगा कि वे किसे और कहां अपनी उपज बेच सकते हैं।

वे कृषि सेवा प्रदाताओं के साथ भी समझौता कर सकते हैं। इससे ‘खेती एक सेवा’ (फास) को बड़ा प्रोत्साहन मिलेगा। इस क्षेत्र में कई कृषि-तकनीक स्टार्टअप काम करते हैं, जो क्रॉप इंटेलिजेंस के साथ-साथ ग्रेड और उत्पादन की परख करने के लिए कृत्रिम बौद्धिकता जैसी प्रौद्योगिकियों का उपयोग कर रहे हैं।

एक राष्ट्र की विकास प्रक्रिया में कृषि का आधुनिकीकरण अत्यधिक महत्त्व रखता है। जैसे-जैसे कृषि उत्पादकता बढ़ती है, कृषि से अधिशेष श्रम, विनिर्माण और निर्माण जैसी अपेक्षाकृत अधिक उत्पादकता वाले क्षेत्रों में समाहित हो जाता है। हालांकि, भारत का कृषि क्षेत्र कम उत्पादकता के जाल में फंसा रहा। न ही कृषि से बाहर श्रम को आकर्षित करने के लिए विनिर्माण में पर्याप्त नौकरियां सृजित की गई थीं। फिर भी, कोरोना महामारी हमें एक महान अवसर प्रदान करती है।

कृषि में नीतिगत कार्रवाई को विनिर्माण क्षेत्र में की गई पहलों के साथ-साथ देखा जाना चाहिए। उत्पादन से जुड़ी प्रोत्साहन योजनाएं, लोकसभा में तीन श्रम संहिताओं का प्रस्ताव रखना, जो केंद्रीय स्तर पर असंख्य श्रम कानूनों को पुनर्गठित करेगा, व्यापार करने में आसानी और विदेशी निवेश आमंत्रित करने पर जोर देना, इन सभी का उद्देश्य विनिर्माण में रोजगार पैदा करना है।

खाद्य प्रसंस्करण उद्योगों के विकास से ग्रामीण, गैर-कृषि नौकरियां पैदा होती हैं। विपणन में सुधारों को ग्रामीण अवसंरचना विकास के प्रति प्रतिबद्धता से पूरा किया गया है। फार्मगेट अवसंरचना के विकास को सुगम बनाने के लिए एक लाख करोड़ रुपए का कृषि अवसंरचना कोष (एआइएफ) शुरू किया गया है, जिसमें अन्य के साथ-साथ संग्रहण केंद्र और पूर्व प्रसंस्करण सुविधाएं शामिल हैं। किसानों की आय के स्रोतों में विविधता लाने के लिए पशुपालन और मत्स्य पालन क्षेत्र के विकास के लिए धनराशि भी शुरू की गई है।
भारत पहले से ही दूध का सबसे बड़ा उत्पादक है।

अनाज, फल-सब्जियों और मछली का दूसरा सबसे बड़ा उत्पादक है। यह तब है जब हमारी उत्पादकता का स्तर तुलनीय राष्ट्रों से काफी नीचे है। फिर भी, कम मूल्य वर्धन के साथ वैश्विक खाद्य निर्यात बाजारों में भारत की हिस्सेदारी 2.3 फीसद पर है। इसलिए, चूंकि भारत का उत्पादकता स्तर वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के समान हो रहा है, भारत वैश्विक खाद्य आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक महत्त्वपूर्ण कड़ी के रूप में उभर सकता है। ये सुधार यह सुनिश्चित करते हैं कि भविष्य में भारत के लिए एक खाद्य निर्यात महाशक्ति बनने के लिए एक सक्षम वातावरण बनाया जाए।

कृषि में सुधारों को सही रूप से ऐतिहासिक बताया जा रहा है। इन सुधारों को लागू करने के लिए बिचौलियों को हटाने के मकसद से मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति द्वारा समर्थित निर्णायक कार्रवाई की आवश्यकता थी। इन सुधारों से किसानों की बेहतरी के लिए सरकार की प्रतिबद्धता दोहराई गई है। अगला कदम इन सुधारों के लाभों को किसानों के दरवाजे तक पहुंचाना है।
(लेखक नीति आयोग के मुख्य कार्यकारी अधिकारी हैं।)

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