ताज़ा खबर
 

राजनीतिः समाज और प्रौद्योगिकी

इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रौद्योगिकी पर संपूर्ण निर्भरता या उसके द्वारा नियंत्रित होना सामाजिक जीवन के लिए एक बड़ा खतरा है। प्रौद्योगिकी का उपयोग मनुष्य के कल्याण के लिए किया जाए, तो वह एक वरदान साबित होती है, लेकिन पर जब उसका इस्तेमाल मनुष्य के खिलाफ होने लगे तो समाज विनाश के कगार पर आ जाता है।

Author Updated: October 15, 2020 1:14 AM
प्रौद्योगिकी विकास के प्रभाव परिवार नाम की संस्था में भी व्यापक रूप से देखे जा सकते हैं।

ज्योति सिडाना

सूचना क्रांति के बाद ही प्रौद्योगिकी निर्देशित समाज अस्तित्व में आया। प्रौद्योगिकी ने समाज के प्रत्येक क्षेत्र को व्यापक रूप से प्रभावित किया है। चाहे परिवार, विवाह, रिश्तेदारी जैसे सामाजिक पक्ष हों या फिर शिक्षा, धर्म, राजनीति, व्यवसाय, पेशे, भाषा, सब प्रौद्योगिकी से प्रभावित हुए हैं। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता है कि यदि सामाजिक प्राणी अपने व्यवहार के तरीकों में बदलाव लाते हैं तो सामाजिक संरचना और सामाजिक व्यवस्था में भी बदलाव आना स्वाभाविक है। वैसे भी परिवर्तन प्रकृति का नियम है, लेकिन जब परिवर्तन सकारात्मक दिशा में हो तो देश और समाज खुशहाली व विकास के मार्ग पर अग्रसर होता है और जब परिवर्तन विनाशकारी हो तो समाज के विघटन को रोक पाना मुश्किल होता है। इसलिए प्रौद्योगिकी जनित परिवर्तन को इन दोनों नजरिए से देखने की आवश्यकता है।

मानव समाज का विकास जंगली अवस्था से सभ्यता की ओर और अंधविश्वास के युग से वैज्ञानिक युग की ओर हुआ है। समाज वैज्ञानिकों की मानें तो जैसे-जैसे आबादी बढ़ती गई और लोगों की जरूरतें बढ़ती गर्इं, समाज भी जटिल होते गए। लेकिन इस जटिलता को सबसे ज्यादा तकनीक के विकास और विस्तार ने बढ़ाया। विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास ने मानव के जीवन स्तर, सामाजिक संबंधों, जीवनशैली जैसे सभी पक्षों में गुणात्मक बदलाव पैदा किए। खासतौर से पिछले पचास सालों में तो यह परिवर्तन सबसे तेज हुआ। सूचना क्रांति ने मानव जीवन को पूरी तरह से बदल कर रख दिया।

उदाहरण के लिए धार्मिक गतिविधियां अब पेशेवर रूप ले चुकी हैं। धार्मिक क्रियाओं को संपन्न कराने में व्यापक स्तर पर तकनीक का इस्तेमाल हो रहा है। जैसे, कहीं गए बिना ही दूरदराज के मदिरों के दर्शन कर सकते हैं, प्रसाद मंगवा सकते हैं और भगवान की प्रतिमा से मनचाहा आशीर्वाद ले सकते हैं इत्यादि। मंत्रोच्चार, हवन, पूजा-पाठ, विवाह और यहां तक कि अंतिम संस्कार के लिए भी पंडित की जरूरत नहीं रह गई है, सब कुछ इस प्रौद्योगिकी के माध्यम से संभव है।

प्रौद्योगिकी विकास के प्रभाव परिवार नाम की संस्था में भी व्यापक रूप से देखे जा सकते हैं। अब परिवार का स्वरूप ही बदल गया है। संयुक्त परिवार टूट कर एकल परिवार में बदलते जा रहे हैं। परिवार का चरित्र सामूहिकता के स्थान पर व्यक्तिवादी हो गया है। एक हद तक परिवारों में विघटन का कारण प्रौद्योगिकी विकास भी बना है। अधिकांश समय सोशल मीडिया पर आॅनलाइन रहने के कारण पति-पत्नी में झगड़े, घरेलू हिंसा में वृद्धि और तलाक की घटनाएं बढ़ती जा रही हैं। साथ ही व्यक्तिवाद, अस्थिरता, असुरक्षा, अविश्वास जैसे पक्ष भी उभरे हैं। बच्चों और किशोरों का जीवन भी इससे अछूता नहीं हैं। आज की पीढ़ी अपना अधिकांश समय ऑनलाइन रह कर व्यतीत करना पसंद करती है। ऑनलाइन / मोबाइल खेलों ने ‘जोखिम के बाजार’ को तेजी से विकसित किया। एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में वर्ष 2014 तक मोबाइल खेल का कारोबार दो हजार करोड़ रुपए सालाना का था, जो वर्ष 2018 में बढ़ कर साढ़े चार हजार करोड़ तक पहुंच गया और वर्ष 2023 तक इसके बारह हजार करोड़ तक पहुंच जाने का अनुमान है।

सवाल है कि इस लाभ के कारोबार को कौन बंद करना चाहेगा? इस तरह के आॅनलाइन खेलों ने बच्चों की दुनिया ही बदल डाली है। बच्चो में सहनशीलता, चुनौतियों का सहजता से सामना करने और हार-जीत को समान रूप से स्वीकार करने की प्रवृत्ति खत्म-सी हो चुकी है। है। एक और जो खतरा उभरा है, वह है इस पीढ़ी का ‘खामोश पीढ़ी’ में तब्दील हो जाना। यह डिजिटल पीढ़ी होने एक दूसरे से संवाद करने की बजाय संपर्क और संचार करने के संदेश का प्रयोग अधिक करती है।

प्रौद्योगिकी ने सही और गलत, सत्य और असत्य के बीच के अंतर को मिटा दिया है। प्रौद्योगिकी ने ‘विरोध की संस्कृति’ या आंदोलनों के तौर-तरीकों को भी बदल डाला है। अब किसी मुद्दे का विरोध करना हो तो लोग सोशल मीडिया पर विरोध जताते हैं, ट्रोल करते हैं, गाली-गलौच करते हैं और अपनी नैतिक जिम्मेदारी को पूरा करते है। लेकिन ऐसा करके बदलाव तो हम शायद न ला पाएं, पर प्रौद्योगिकी के बाजार को लाभ जरूर पहुंचाते हैं और इससे भी खतरनाक यह कि लोगों में मिथ्या चेतना या भ्रामक सूचना पैदा कर देते हैं। अधिकांश लोग किसी भी सूचना या संदेश को पढ़े बिना आगे भेजते जाते हैं और मुनाफे का बाजार आसानी से अपने पैर जमाने में सफल हो जाता है। अमेरिकी मनोवैज्ञानिक रॉबर्ट ब्लाउनर ने अपनी पुस्तक ‘एलीनेशन एंड फ्रीडम’ में प्रौद्योगिकी केंद्रित उत्पादन को अलगाव का बड़ा कारण माना है। उन्होंने इसके चार स्वरूप बताए हैं- शक्तिहीनता, अर्थहीनता, एकांत और स्वयं से पृथक्करण। उनका मानना है कि प्रौद्योगिकी ने हर जगह मशीनी दिमाग उत्पन्न कर दिया है और इस कारण मनुष्य की स्वाभाविक प्रवृत्ति समाप्त हो गई।

जैसा कि कहा जाता है- किसी भी चीज की अति बहुत बुरी होती है। प्रौद्योगिकी के संदर्भ में भी यही हुआ। मनुष्य ने इसका इतना ज्यादा उपयोग (या कहें दुरुपयोग) कर लिया कि उसने स्वयं को एक मशीन में तब्दील कर डाला। उसने ऐसे मशीनीकृत मानव का रूप ले लिया जिसके पास न दिल है, न भावनाएं। केवल एक कृत्रिम बुद्धि (आर्टिफीशियल इंटेलिजेंस) है। इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रौद्योगिकीय परिवर्तनों ने मनुष्य-मशीन के बीच अंतर को काफी हद तक समाप्त कर दिया है। मनुष्य मशीन की तरह काम करने के लिए बाध्य है दूसरी तरफ मनुष्य मशीन (रोबोट) में ही भावनाएं तलाश रहा है। कई विकसित देशो में तो होटलों, अस्पतालों, हवाई अड्डों आदि पर रोबोट काम करते देखे जा सकते हैं। मनुष्य का काम मशीन करने लगी और मनुष्य बेरोजगार हो गए। इसलिए ही संभवत: आज ‘पोस्ट-इमोशनल सोसाइटी’ की चर्चा होने लगी है। आज हम देख भी रहे हैं कि व्यक्ति अब लाभ लेने के लिए भावनाओं का इस्तेमाल करने लगे हैं। काम निकलने के बाद वे भावनाएं भी समाप्त हो जाती हैं। दूसरी ओर तकनीकी विकास के इस दौर में हम किसी भी अवसर पर शुभ कामनाएं देने के लिए सभी को एक जैसे संदेश भेजते हैं। सवाल है कि यह कैसे संभव हो सकता है कि सबके लिए हमारे मन में एक जैसी भावनाएं हों?

इसलिए आज मानव समाज सूचना समाज में तब्दील होता जा रहा है, जहां सामाजिक संबंधों के नेटवर्क से ज्यादा सूचनाओं का नेटवर्क महत्त्व रखता है। आधुनिक प्रौद्योगिकी ने सभी प्रकार की सूचनाओं को सार्वजानिक कर दिया है। निगरानीमूलक समाज अस्तित्व में आ गया है। उदाहरण के लिए, घर, दुकान, दफ्तर, मॉल, होटल, रेस्तरां, लिफ्ट, पार्किंग, बहुमंजिला इमारतों में यह लिखा देखा जा सकता है कि ‘आप कैमरे की नजर में हैं’। आखिर ऐसा क्या हुआ जो हमारे जीवन के हर पक्ष को सार्वजानिक करने की होड़ जारी है। एक तरह से हम किसी और की निगरानी और नियंत्रण में जा चुके हैं। समाज को नियंत्रित करने का यह कौनसा तरीका है जो ‘निजता के अधिकार’ का उल्लंघन करने से भी नहीं चूकता?

इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रौद्योगिकी पर संपूर्ण निर्भरता या उसके द्वारा नियंत्रित होना सामाजिक जीवन के लिए एक बड़ा खतरा है। प्रौद्योगिकी का उपयोग मनुष्य के कल्याण के लिए किया जाए, तो वह एक वरदान साबित होती है, लेकिन पर जब उसका इस्तेमाल मनुष्य के खिलाफ होने लगे तो समाज विनाश के कगार पर आ जाता है। परिवार, समाज, राज्य और प्रत्येक औपचारिक-अनौपचारिक संस्थाएं चुनौतों से घिरी नजर आती हैं। यही आज हम देख रहे हैं।

 

 

Hindi News के लिए हमारे साथ फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डइन, टेलीग्राम पर जुड़ें और डाउनलोड करें Hindi News AppOnline game में रुचि है तो यहां क्‍लिक कर सकते हैं।

Next Stories
1 राजनीति: डिजिटल युग की चुनौतियां
2 राजनीति: काकेशस की आग
3 राजनीति: महासागरों पर चीन की नजर
यह पढ़ा क्या?
X