अफगान शरणार्थियों का संकट

मोटा अनुमान यह है कि अब तक तीस लाख अफगान शरणार्थी दुनिया भर के देशों में शरण लिए हुए हैं।

संकट में अफगान शरणार्थी। फाइल फोटो।

संजीव पांडेय

मोटा अनुमान यह है कि अब तक तीस लाख अफगान शरणार्थी दुनिया भर के देशों में शरण लिए हुए हैं। यह संख्या ज्यादा भी हो सकती है। पाकिस्तान पिछले चार दशकों से अफगान शरणार्थियों का बोझ झेल ही रहा है। उसका दावा है कि उसके यहां पंद्रह लाख पंजीकृत अफगान शरणार्थी हैं, जबकि बाकी गैर पंजीकृत।

अफगानिस्तान के हालात गंभीर और अनिश्चितता भरे हैं। तालिबान के कब्जे के बाद बड़ी संख्या में अफगानी दूसरे मुल्कों में शरण ले रहे हैं। पिछले कुछ दिनों से काबुल हवाई अड्डे पर जिस तरह की भीड़ दिख रही है, वह चिंतित करने वाली है। लोगों के लग रहा है कि कैसे भी करके अफगानिस्तान से निकल लेने में ही भलाई है, वरना तालिबान राज में क्या होगा, कोई नहीं जानता।

इसलिए अमेरिका सहित तमाम देश अपने नागरिकों और अपने लिए काम करने वाले अफगानी नागरिकों को सुरक्षित निकालने में जुटे हैं। अमेरिका ने दावा किया है कि वह अब तक साठ हजार लोगों को काबुल से निकाल चुका है। ब्रिटिश रक्षा मंत्रालय ने भी पांच हजार दो सौ अफगान नागरिकों को सुरक्षित निकालने की बात कही है।

अफगानिस्तान के मौजूदा हालात के साथ ही शरणार्थी समस्या भी गहराती जा रही है। इसे लेकर आसपास के मुल्क खासतौर से परेशान हैं। कई देश पहले से अफगान शरणार्थियों का संकट झेल रहे हैं। पिछले कुछ महीनों में लाखों अफगानी नागरिक देश छोड़ दूसरे देशों में शरण ले चुके हैं। अफगानिस्तान का पड़ोसी ईरान अपने तीन राज्यों में शरणार्थियों के लिए जगह दे चुका है। पाकिस्तान में भी बड़ी संख्या में अफगानी पहुंच रहे हैं। लाखों शरणार्थियो का बोझ झेल रहे पाकिस्तान को आने वाले समय में और मुश्किलों का सामना करना पड़ेगा। अफगान शरणार्थियों को लेकर ताजिकिस्तान भी कम चिंतित नहीं है। हालांकि उसने एक लाख अफगान शरणार्थियों को अपने यहां पनाह देने का फैसला किया है।

हालांकि पश्चिमी देशों ने भी अफगान नागरिकों को अपने यहां पनाह देने की सहमति दे दी है, पर सीमित संख्या में। ब्रिटेन ने बीस हजार अफगान शरणार्थियों को शरण देने का फैसला किया है, लेकिन उसकी प्राथमिकता महिलाएं और बच्चे होंगे। कनाडा में बीस हजार अफगानी पहले ही पहुंच चुके हैं। जर्मनी भी दस हजार शरणार्थियों को पनाह देने के लिए तैयार हो गया है। अमेरिका भी उन अफगानियों को अपने मुल्क में जगह दे रहा है, जिन्होंने बीस सालों तक अमेरिका के साथ अफगानिस्तान में काम किया है। लेकिन जिस तरह से अचानक अमेरिकी सेना की वापसी की घोषणा हुई, उसे अफगानी एक विश्वासघात के रूप में देख रहे हैं। जिन अफगानियों ने अमेरिकी सेना के साथ सालों तक काम किया, अमेरिका अभी तक उन्हें भी नहीं निकाल नहीं पाया है। उधर, तालिबान लड़ाकों के पास अमेरिका को सहयोग करने वाले अफगानियों की सूची है। वे घर-घर जाकर उनकी तलाशी ले रहे हैं।

इसलिए अब यह सवाल उठ रहा है कि अमेरिका ने आखिर पिछले बीस सालों में अफगानिस्तान में क्या किया? अरबों-खरबों डालर खर्च किए। लेकिन न तो अफगानिस्तान में शांति आई, न ही तालिबान का सफाया हुआ। बल्कि अमेरिका ने उन अफगानियों को भी संकट में डाल दिया जो पिछले बीस सालों से अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के साथ खड़े होकर तालिबान से लड़ रहे थे। इनकी संख्या सैकड़ों, हजारों में नहीं बल्कि लाखों में है। कुल मिला कर देखा जाए तो अमेरिका ने अफगानिस्तान को उसके हाल पर ही छोड़ दिया है। इस सारे घटनाक्रम से परेशान तो रूस भी है और उसकी चिंता का कारण भी अफगान शरणार्थियों का गहराता संकट है। रूसी राष्ट्रपति व्लादीमिर पुतिन तो अफगान शरणार्थियों के संकट की तरफ इशारा कर भी चुके हैं।

पर पाकिस्तान इस समय भीतर से खुश है। काबुल में उसकी पकड़ मजबूत होती जा रही है। तालिबान सरकार के गठन में भी उसकी भूमिका महत्त्वपूर्ण होगी। इतना सब होते हुए भी पाकिस्तान के माथे पर तनाव साफ देखा जा सकता है। पाकिस्तान को पता है कि अब अफगान शरणार्थियों की सबसे ज्यादा भीड़ पाकिस्तान में ही आएगी। लाखों अफगानी पहले ही पाकिस्तान में पनाह ले चुके हैं। मोटा अनुमान यह है कि अब तक तीस लाख अफगान शरणार्थी दुनिया भर के देशों में शरण लिए हुए हैं। यह संख्या ज्यादा भी हो सकती है। पाकिस्तान पिछले चार दशकों से अफगान शरणार्थियों का बोझ झेल ही रहा है। पाकिस्तान का दावा है कि उसके यहां पंद्रह लाख पंजीकृत अफगान शरणार्थी हैं। जबकि बाकी गैर पंजीकृत हैं।

दरअसल अफगानिस्तान में पश्चिमी सैन्य शक्तियों की मौजूदगी के बाद भी आम अफगानियों का मनोबल कमजोर रहा। वे मुल्क छोड़ कर पाकिस्तान, ईरान व दूसरे देशों में शरण लेते रहे। 2020 में जैसे ही अमेरिका और तालिबान के बीच शांति समझौता हुआ, अफगान नागरिक अपने को ठगा-सा महसूस करने लगे। उन्हें लगा कि डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन ने उनके साथ धोखा किया है और उन्हें फिर से तालिबान के हवाले किया जा रहा है। इसके बाद फिर से ईरान और पाकिस्तान में अफगान शरणार्थियों की बाढ़-सी आ गई। जर्मनी, तुर्की, आस्ट्रिया, फ्रांस और ग्रीस जैसे देश भी इससे प्रभावित हुए। इन देशों में भी बड़ी संख्या में अफगान शरणार्थी पहुंचे। जर्मनी में लगभग पौने दो लाख शरणार्थी पहुंचे। तुर्की में भी लगभग सवा लाख शरणार्थी पहुंचे थे।

पाकिस्तान और ईरान को तालिबान के दूसरे शासन काल में भी शरणार्थियों की समस्या से जूझना पड़ेगा। वहीं शरणार्थियों को पाकिस्तानी शासन का जुल्म झेलना होगा। पाकिस्तान सरकार अफगान शरणार्थियों के साथ बहुत ही बुरा सलूक करती आई है। सब जानते हैं कि साल 2014 में पेशावर में सैनिक स्कूल पर हुए हमले के बाद आम गरीब अफगानियों को पाकिस्तानी सेना और पुलिस ने किस तरह तंग किया था। पाकिस्तान और ईरान में रहने वाले अफगान शरणार्थियों को हर वक्त मानवाधिकारों के उल्लंघन का सामना करना पड़ता है। उन्हें शिक्षा और स्वास्थ्य की बुनियादी सुविधाएं भी नहीं मिलतीं।

कराची में अफगानियों की एक बड़ी झुग्गी बस्ती विकसित हो गई है, जहां लगभग दो लाख अफगान शरणार्थी रह रहे हैं। दक्षिणी कराची में भी पांच लाख अफगान शरणार्थी मौजूद हैं। दरअसल पिछले चार दशकों से कराची शहर में रहने वाले अफगान शरणार्थी अब यहीं के बाशिंदे हो गए हैं। वे अफगानिस्तान लौटने को राजी नहीं हैं, क्योंकि उन्हें पश्चिमी देशों पर भरोसा नहीं रहा। उनका तर्क वाजिब है। वे कहते हैं कि सोवियत सेना के अफगानिस्तान में आक्रमण के बाद उनकी हालात खराब हुई। सोवियत सेना की वापसी के बाद उन्हें उम्मीद थी कि अफगानिस्तान में शांति आएगी। लेकिन यह नहीं हो पाया। पहले अफगान सरदारों और फिर तालिबान ने अफगानिस्तान को तबाह कर दिया। उसके बाद अमेरिका और उसके मित्र देश आए। लेकिन वे भी नाकाम रहे। आज उनकी विफलता का बड़ा सबूत यह है कि तालिबान वापस आ चुका है।

अफगानिस्तान के पड़ोसी देशों पाकिस्तान, ईरान, ताजिकिस्तान, उज्बेकिस्तान और तुर्कमेनिस्तान की माली हालत अच्छी नहीं है। ऐसे में ये देश अफगान शरणार्थियों का बोझ कैसे झेलेंगें, यह बड़ा सवाल है। अफगान शरणार्थियों की भीड़ का सीधा असर इन मुल्कों की अर्थव्यवस्था पर भी पड़ेगा। हालांकि तालिबान ने अब अपने में बदलाव के संकेत तो दिए हैं। पर ये संकेत दिखावे के हैं, या फिर सच में ऐसा है, यह तो समय ही बताएगा। तालिबान के वादे पर उदारवादी अफगानों को भरोसा नहीं है। इसीलिए हजारों अफगानी काबुल हवाईअड्डे पर डटे हैं और अफगानिस्तान छोड़ना चाहते हैं। उन्हें देश में गृह युद्ध छिड़ने की आशंका बढ़ती जा रही है। अफगान तालिबान की कट्टर नीतियों को उदारवादी पश्तून भी स्वीकार नहीं करने वाले। ताजिक, हजारा और उज्बेक जनजातियां किसी भी कीमत पर तालिबान के उस शासन को स्वीकार नहीं करेंगे जो मुल्ला उमर का था। ऐसे में अफगान शरणार्थियों की समस्या का तात्कालिक निदान यही है कि अफगानिस्तान में सरकार बने, राजनीतिक स्थिरता आ और शांति स्थापित हो। वरना अफगान आबादी दर-दर ठोकरें ही खाती रहेगी।

पढें राजनीति समाचार (Politics News). हिंदी समाचार (Hindi News) के लिए डाउनलोड करें Hindi News App. ताजा खबरों (Latest News) के लिए फेसबुक ट्विटर टेलीग्राम पर जुड़ें।

Next Story
भाजपा-कांग्रेस झुके पर सहयोगी अड़े
अपडेट