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जवाबदेही और सुशासन

जवाबदेही केवल सरकार की नहीं होती, इसमें जनता भी शामिल है।

सुशील कुमार सिंह

जवाबदेही केवल सरकार की नहीं होती, इसमें जनता भी शामिल है। मौजूदा समय में लोकतंत्र में हिस्सेदारी को लेकर जनता को भी कुछ और कदम बढ़ाना चाहिए। वोट फीसद कम बने रहने की स्थिति यह बताती है कि जनता का एक वर्ग अपने ही खिलाफ काम कर रहा है। कौन, किसके प्रति जिम्मेदार है यह कोई यक्ष प्रश्न नहीं है। अगर किसी चीज की कमी है तो अपने दायित्व और जवाबदेही पर खरे उतरने की।

मानव सभ्यता की तरह सुशासन का विकास भी इसके साहित्य, इतिहास और दर्शन में निहित रहा है। गौरतलब है कि मानव, प्रबंध और शासन का मुख्य केंद्र बिंदु है। शासन चलाने वाली सरकारें इन्हीं मानव सभ्यता को ध्यान में रख कर अपनी सुशासनिक गतिविधियों को अंजाम देती हैं। यह इनकी जिम्मेदारी भी है और जवाबदेही भी। भारत जैसे विशाल और विविधतापूर्ण समाज में संसाधनों और सेवाओं का न्यायपूर्ण वितरण सभी की समृद्धि का मूल मंत्र है। गांधी दर्शन से पैदा तमाम विचार यह संदर्भित करते हैं कि सरकार को अपनी भूमिका में कितना बने रहने की आवश्यकता है।

सर्वोदय की कसौटी पर सुशासन का पैमाना कहीं अधिक सारगर्भित है, जहां लोक प्रवर्धित विचारधारा को अवसर मिलता है। वैसे नागरिकों के प्रति जवाबदेही लोकतांत्रिक शासन का बुनियादी सिद्धांत है। जो सरकारें नागरिक की हितधारक होती हैं, वही सुशासन की कसौटी पर खरी और जवाबदेही में अव्वल होती हैं। जीवन जब आर्थिक कठिनाइयों से दो-चार होता है, तब सरकार की जवाबदेही बढ़ जाती है। गौरतलब है कि थोक महंगाई दर बीते एक साल की तुलना में अपने उच्चत्तम स्तर पर है। आंकड़े बताते हैं कि दिसंबर 2020 में थोक महंगाई दर 1.95 फीसद की बढ़त लिए हुई थी, जो दिसंबर 2021 में ऊंची छलांग के साथ 14.23 फीसद पर पहुंच चुकी है। खुदरा महंगाई के मामले में यह फीसद 4.91 है। जाहिर है कि महंगाई का यह स्वरूप सरकार की जवाबदेही और सुशासन दोनों को चुनौती दे रहा है।

वाणिज्य और उद्योग मंत्रालय ने बीते 14 दिसंबर को कहा था कि मुद्रा स्फीति की दर मुख्यत: खनिज तेल, कच्चा तेल, गैस, खाद्य उत्पाद और मूल धातुओं आदि की कीमतें पिछले साल के इसी माह की तुलना में बढ़ी हैं। खाद्य सूचकांक के मामले में भी पिछले महीने की 3.06 फीसद के अनुपात में यह दोगुना से अधिक 6.70 फीसद पर पहुंच गई है। सवाल है कि इसे नियति मान लें या सरकार की नीतियों में खोट।

जवाबदेही का सिद्धांत सभ्यता जितना ही पुराना है। यह एक ऐसा दायित्व है, जिसमें कार्य को अक्षरश: पूरा करना शामिल है। सरकार के समूचे कामकाज के लिए वित्तीय जवाबदेही बेहद महत्त्वपूर्ण है। संसद में पारित होने वाले बजट और उसके खर्च से होने वाले विकास के प्रति सुशासनिक दृष्टिकोण इस जवाबदेही को पूर्ण करता है। देश और नागरिक को क्या चाहिए, इसकी समझ उसी जवाबदेही का हिस्सा है। बेरोजगारी, गरीबी, शिक्षा में कठिनाई, भ्रष्टाचार और विकास में कमी जैसी तमाम समस्याओं का निपटारा समय से न हो तो कठिनाई निरंतर बनी रहती है। हालांकि शिक्षा, चिकित्सा, सुरक्षा, सड़क, बिजली, पानी आदि सुविधाओं में बदलाव आया है, पर जिम्मेदारी का परिप्रेक्ष्य यहां भी रोज चुनौती बना रहता है। समावेशी विकास और सतत विकास तीन दशक से चल रहा है, फिर भी गरीबी और भुखमरी जाने का नाम नहीं ले रही है।

भारत ने ई-शासन को सफलतापूर्वक लागू करने के लिए अनेक महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन केंद्र, राज्य, जिला और स्थानीय शासन के बीच जुड़ाव से संबंधित जटिलताएं अब भी मौजूद हैं। संयुक्त राष्ट्र के सामाजिक और आर्थिक मामलों के विभाग (यूएनडीईएसए) द्वारा 2020 के ई-शासन सर्वेक्षण में भारत को सौवां स्थान दिया है। पड़ताल बताती है कि ई-शासन विकास सूचकांक के मामले में भारत 2018 में 96वें स्थान पर था।

गणना बताती है कि भारत ने 2014 के मुकाबले 2018 में बाईस स्थानों का उछाल लिया, मगर 2020 में यह सौवें स्थान पर चली गई। ई-शासन पारदर्शिता का एक बेहतर उपाय है, साथ ही एक ऐसा उपकरण, जिसमें कार्य संचालन की गति को तीव्रता मिलती है। देश की ढाई लाख पंचायतों में अभी आधी संख्या ई-कनेक्टिविटी से वंचित है। लोकतांत्रिक देश में लोक जुड़ाव और ई-भागीदारी कम होने का मतलब तय जवाबदेही के साथ सामाजिक बदलाव में रुकावट और सुशासन के लिए बड़ी चुनौती है।

भारत में मध्यवर्ग की स्थिति रोज कुआं खोदने और पानी पीने वाली रही है। ऐसे में कोरोना के शिकार लोगों के परिवार की आजीविका आज किस स्थिति में है और इसके प्रति कौन जवाबदेह होगा, इनके लिए शासन ने क्या कदम उठाया, यह अब भी स्पष्ट नहीं है। कोरोना त्रासदी की कड़वी सच्चाई यह है कि स्वास्थ और अर्थव्यवस्था दोनों बेपटरी हुए। एक अनुमान के मुताबिक पूर्णबंदी के कारण कम से कम तेईस करोड़ भारतीय गरीबी रेखा के नीचे पहुंच गए हैं। विश्व असमानता रिपोर्ट भी यह बताती है कि भारत में पचास फीसद आबादी की कमाई इस वर्ष घटी है।

रिपोर्ट का लब्बोलुआब यह भी है कि अंग्रेजों के राज में 1858 से 1947 के बीच भारत में असमानता अधिक थी। उस दौरान दस फीसद लोगों का पचास फीसद आमदनी पर कब्जा था। हालांकि वह दौर औपनिवेशिक सत्ता का था और लोकतंत्र की अहमियत और महत्त्व से अनंत दूरी लिए हुए था। स्वतंत्रता के बाद 15 मार्च, 1950 को प्रथम पंचवर्षीय योजना शुरू हुई और असमानता का आंकड़ा घट कर पैंतीस फीसद पर आ गया।

उदारीकरण का दौर आते-आते स्थितियां कुछ और बदलीं। विनियमन में ढील और उदारीकरण की नीतियों से अमीरों की आय बढ़ी। इसी उदारीकरण से शीर्ष एक फीसद को सबसे अधिक फायदा हुआ। रही बात मध्य और निम्नवर्ग की, तो यहां भी इनकी दशा में सुधार की रफ्तार कहीं अधिक सुस्त रही। जाहिर है, यह सुस्ती गरीबी को बढ़ाती है। विश्व असमानता रिपोर्ट 2022 मद्देनजर ये बातें कहीं गई हैं, जिसमें दुनिया के सौ जाने-माने अर्थशास्त्री अध्ययन करते हैं।

जवाबदेही केवल सरकार की नहीं होती, इसमें जनता भी शामिल है। मौजूदा समय में लोकतंत्र में हिस्सेदारी को लेकर जनता को भी कुछ और कदम बढ़ाना चाहिए। वोट फीसद कम बने रहने की स्थिति यह बताती है कि जनता का एक वर्ग अपने ही खिलाफ काम कर रहा है। कौन, किसके प्रति जिम्मेदार है यह कोई यक्ष प्रश्न नहीं है। उनकी किस बात के लिए जवाबदेही है इससे भी लोग अनजान नहीं हैं। अगर किसी चीज की कमी है तो अपने दायित्व और जवाबदेही पर खरे उतरने की। चुनाव आयोग लोकतंत्र का संरक्षक है और देश में चुनाव एक लोकतांत्रिक महोत्सव है।

वोटर आइडी को आधार से लिंक किए जाने वाले कानून से यह कह सकते हैं कि सरकार चुनाव आयोग के माध्यम से फर्जी मतदान रोकने को लेकर अपनी जवाबदेही पूरी करने का प्रयास कर रही है। गौरतलब है कि चुनाव आयोग की मांग पर यह फैसला किया गया। इसके अलावा भी कई संदर्भ, मसलन अब मतदाता सूची में दर्ज होने के लिए साल में चार तारीखें होंगी। अब तक यह एक जनवरी तय थी। जाहिर है एक जनवरी तक जिसकी उम्र अठारह वर्ष है, वह मतदाता के तौर पर पंजीकृत किया जाता था और जो दो जनवरी को उम्र पूरी करता था, उसे एक साल का इंतजार करना पड़ता था।

सुशासन लोक विकास की कुंजी है। जन भागीदारी के साथ पारदर्शिता, दायित्व और जवाबदेही का अच्छा उदाहरण है। 24 जुलाई, 1991 के उदारीकरण के बाद देश में कई सामाजिक-आर्थिक परिवर्तन हुए और सरकार अपनी जवाबदेही को लेकर चौकन्नी भी हुई। नतीजन, जनता को सामाजिक-आर्थिक न्याय के साथ तमाम अधिकार प्रदान किए गए। सूचना का अधिकार 2005 सरकार की जवाबदेही और सुशासन की दृष्टि से उठाया गया एक बेहतर कदम है। इसी जवाबदेही को देखते हुए सिटीजन चार्टर, खाद्य सुरक्षा अधिनियम, शिक्षा का अधिकार, लोकपाल आयुक्त समेत कई विषय फलक पर आए। फिलहाल मानव सभ्यता और सरकार की जवाबदेही का ताना-बाना एक अनवरत प्रक्रिया है। यह एक-दूसरे के लिए चुनौती नहीं, बल्कि पूरक है।

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