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राजनीति: जहरीली हवा से बढ़ते संकट

यह दुर्भाग्य ही है कि हम अब तक ऐसी ठोस रणनीति बनाने और कदम उठा पाने में नाकाम रहे हैं जो प्रदूषण से मुक्ति दिला सकें। इसीलिए प्रदूषण से निपटने की सरकार की फौरी योजनाओं का कोई सकारात्मक नतीजा सामने नहीं आता। प्रदूषण की समस्या को लेकर लोगों के भीतर जागरूकता की भी भारी कमी है।

प्रदूषण बढ़ने से खतरा की आशंका। फाइल फोटो।

प्रदीप श्रीवास्तव

शहरों की जहरीली होती हवा में अब सांस लेना दूभर हो गया है। प्रदूषित हवा न सिर्फ हमारे स्वास्थ्य पर प्रभाव डाल रही है, बल्कि आने वाली पीढ़ी भी इस गंभीर समस्या से जूझ रही है। हमारे समाज, राजनेताओं और प्रशासनिक अमले की उपेक्षित सोच प्रदूषण की समस्या को दिन-प्रतिदिन और गंभीर बना रही है। हालत यह है कि अभी हाल तक प्रदूषण और मानव समाज पर उससे पड़ने वाले प्रभाव को लेकर सरकारों के पास सटीक आंकड़े तक नहीं हैं। जो अध्ययन या शोध हो भी रहे हैं, वे गैर सरकारी संगठनों के भरोसे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार भारत में वायु प्रदूषण का स्तर सामान्य से काफी ज्यादा है, जो बच्चों को बीमार बना रहा है।

इसमें कोई संदेह नहीं कि प्रदूषण की बढ़ती समस्या के कई कारण हैं। शहरों का बेतरतीब विकास, रोजगार के लिए भीड़ भरे शहरों की ओर तेजी से हो रहे पलायन ने इस समस्या को और बढ़ाया है। गांवों में भले ही शहरों से ज्यादा साफ हवा और पानी हो, लेकिन हवा और पानी से तो जीवन चलने वाला नहीं है। शहरों में भीड़ बढ़ने से बुनियादी सुविधओं पर भार पड़ता है। पानी, बिजली, सड़क आदि बुनियादी जरूरतों पर सरकारों को ज्यादा खर्च करना पड़ता है। शहरों में भीड़ ज्यादा होने से उत्पादन भी ज्यादा होता है और उत्पादन के लिए आवश्यक घटक भी कहीं न कहीं प्रकृति को नुकसान पहुंचाते हैं। उत्पादन के चक्र में श्रम, स्वास्थ्य, समय, प्राकृतिक साधन, कार्य दिवस, क्षरण आदि सभी आते हैं, जिनसे प्राकृतिक संसाधनों को नुकसान पहुंचता है।

पिछले कुछ दशकों में शहरों की ओर बढ़ते पलायन से शहरों का भगौलिक विस्तार भी हुआ है। इस कारण निजी व सार्वजनिक यातायात की व्यवस्था भी विस्तारित होती जा रही है। ज्यादा वाहन होंगे तो ज्यादा प्रदूषण और बीमारियां फैलेंगी। शहरों और महानगरों में वायु प्रदूषण का बड़ा कारण ही उद्योगों, कारखानों और वाहनों से निकलने वाला धुआं है। लेकिन किसे परवाह है? सामाजिक व्यवस्था तात्कालिक फायदों को देखती है। दूरगामी नुकसानों पर निगाह कम ही जाती है। पर प्रदूषण अब ऐसी विकराल समस्या का रूप ले चुकी है जो तात्कालिक और दूरगामी दोनों स्तरों पर रोकथाम की मांग करती है।

गर्भवती महिलाओं पर वायु प्रदूषण के असर को लेकर पिछले दिनों एक अध्ययन प्रकाशित हुआ था। विशेषज्ञों की टीम ने वायु प्रदूषण के जोखिम और थायराइड संबंधी जानकारी एकत्रित करने के लिए 9931 गर्भवती महिलाओं के डेटा का विश्लेषण किया। शोधकर्ताओं ने अलग-अलग मॉडलों का उपयोग करके गर्भावस्था के पहले तीन महीनों के दौरान नाइट्रोजन आॅक्साइड और पार्टिकुलेट मैटर (पीएम) जैसे वायु प्रदूषण का महिलाओं पर पड़ने वाले असर का आकलन किया।

शोधकर्ताओं का कहना है कि गर्भावस्था की पहली तिमाही के दौरान वायु प्रदूषण के संपर्क में आने वाली महिलाओं को सामान्य महिलाओं की तुलना में थायराइड रोग होने की आशंका ज्यादा रहती है। डाक्टरों के अनुसार वायु प्रदूषण स्त्री-हार्मोन (एस्ट्रोजन) को प्रभावित करता है। भ्रूण के मस्तिष्क के विकास में थायरॉयड की भूमिका होती है। शोध में यह भी पता चला कि जो महिलाएं गर्भावस्था के दौरान किसी भी कारण से घर के अंदर या बाहर के प्रदूषण से प्रभावित रहती हैं, तो उनके गर्भ पर काफी असर पड़ता है। पीएम 2.5 के संपर्क में आने वाली महिलाओं में हाइपोथायरोक्सिमिया होने का खतरा इक्कीस फीसद बढ़ जाता है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन के अनुसार क्रॉनिक आॅबस्ट्रेक्टिव पल्मोनरी डिजीज (सीओपीडी) के कारण दुनिया में सबसे ज्यादा मौतें होती हैं। इसे सामान्य तौर पर सीओपीडी कहा जाता है। सीओपीडी का अर्थ है कि फेफड़ों के वायु मार्ग का बाधित हो जाना। यह बीमारी धुएं के कारण होती है। यूरोप व अमेरिका जैसे अमीर देशों में तंबाकू का धुआं सीओपीडी का प्रमुख कारक है। अफ्रीका, लातिन अमेरिका और एशिया आदि गरीब देशों में लकड़ी, उपले, कोयले और फसल के अवशेष को र्इंधन के तौर पर इस्तेमाल करने के कारण सीओपीडी बीमारी जड़ जमाए हुए है।

लंबे समय तक सीओपीडी ठीक नहीं होने पर दमा हो जाता है। ग्लोबल बर्डन आॅफ डिजीज स्टडी के अनुसार 2016 में वैश्विक स्तर पर सीओपीडी के ढाई करोड़ से ज्यादा मामले सामने आए थे। साल 2015 में पूरी दुनिया में सीओपीडी के कारण तीन लाख से ज्यादा मौतें हुई थीं। जागरूकता की कमी, लापरवाही और खराब स्वास्थ्य सेवाओं के कारण सीओपीडी से सबसे ज्यादा मौतें गरीब देशों में होती है। डब्ल्यूएचओ के अनुसार सीओपीडी के कारण नब्बे फीसद मौतें गरीब देशों में होती हैं। भारत में सीओपीडी से पीड़ित होने वालों का आंकड़ा 28.1 लाख था, जो 2016 में पचपन लाख से ऊपर निकल गया।

सामान्य अवस्था में भी प्रदूषण का असर बच्चों पर सबसे ज्यादा होता है। बच्चों के लिए धूल और धुआं दोनों बेहद खतरनाक होते हैं। डीजल से उत्सर्जित होने वाले कण और धुआं के कारण दमे की बीमारी तेजी से फैल रही है। संस्था द इंटरनेशनल सोसाइटी फॉर आॅगुमेंटेटिव एंड अल्ट्रानेटिव कम्युनिकेशन (आइएसएएसी) ने बच्चों में दमा फैलने को लेकर एक शोध प्रकाशित किया था। इस शोध में भारत के कई हिस्सों में खासतौर से स्कूल जाने वाले बच्चों में दमे के प्रभाव को लेकर एक सर्वे किया गया था।

सर्वे में पाया गया कि छह से सात वर्ष आयु वर्ग उम्र वाले कुल 44,088 बच्चों में 2,405 बच्चे दमे से पीड़ित थे, जबकि 947 बच्चे गंभीर दमे से ग्रसित पाए गए। इसी सर्वे के दूसरे हिस्से में तेरह से चौदह वर्ष आयु वाले 48,088 बच्चों के समूह में 2,910 बच्चे दमा पीड़ित निकले, जिसमें 1,365 बच्चों की स्थिति काफी गंभीर पाई गई। जबकि कुल 46.91 फीसदी बच्चों में अस्थमा के लक्षण पाए गए। इस शोध में यह भी सामने आया कि भारी ट्रैफिक के दौरान बच्चों पर प्रदूषण का दुष्प्रभाव ज्यादा पड़ता है, जो सामान्य स्थिति के मुकाबले डेढ़ गुने से ज्यादा रहता है।

तमाम शोधों और मीडिया रिपोर्ट की मानें तो भारत में वायु प्रदूषण बेहद खतरनाक स्तर पर पहुंच गया है। बड़े शहरों के अलावा छोटे शहर भी इसकी जद में आ गए हैं। जहरीली हवा के कारण पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चे सबसे ज्यादा समय पूर्व मौतों के शिकार हो रहे हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट के मुताबिक बाहरी और घर के भीतरी प्रदूषण के कारण पांच वर्ष से कम उम्र के एक लाख से ज्यादा बच्चे समय पूर्व दम तोड़ देते हैं।

यानी हर दिन करीब तीन सौ बच्चे असमय काल के ग्रास बन जाते हैं। इनमें भी आधे से ज्यादा लड़कियां हैं। शिशुओं की मौत का वायु प्रदूषण से गहरा नाता है। इसकी मुख्य वजह यह है कि शिशुओं के फेफड़े सबसे ज्यादा प्रदूषण और हवा जनित दुष्प्रभावों से प्रभावित होते हैं। वैज्ञानिकों का मानना है कि शुरुआती स्तर पर वायु प्रदूषण शिशुओं के दिमाग, तंत्रिका विकास और फेफड़ों की कार्य क्षमता पर काफी बुरा असर डालता है।

लंबे समय तक जहरीली हवा में रहने से बच्चों में कैंसर और मोटापा जैसी समस्याएं भी बढ़ जाती हैं। अध्ययन बताते हैं कि पर्यावरणीय प्रदूषण के कारण बच्चों के व्यवहार पर भी काफी असर पड़ता है। लेकिन, यह दुर्भाग्य ही है कि हम अब तक ऐसी ठोस रणनीति बनाने और कदम उठा पाने में नाकाम रहे हैं जो प्रदूषण से मुक्ति दिला सकें। इसीलिए प्रदूषण से निपटने की सरकार की फौरी योजनाओं का कोई सकारात्मक नतीजा सामने नहीं आता। प्रदूषण की समस्या को लेकर लोगों के भीतर जागरूकता की भी भारी कमी है। बिना जन सहभागिता के ऐसी समस्याओं से निजात पाना संभव नहीं है।

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