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राजनीति: एड्स से मुक्ति की चुनौती

पिछले कई वर्षों से एड्स और एचआइवी को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन विडंबना ही है कि बहुत से लोग इसे आज भी छुआछूत से फैलने वाला संक्रामक रोग मानते हैं। इस संबंध में यह जान लेना बेहद जरूरी है कि इस संक्रमण के शिकार व्यक्ति के साथ हाथ मिलाने, उसके साथ भोजन करने, स्नान करने या उसके पसीने के संपर्क में आने से यह रोग नहीं फैलता।

Author Updated: December 1, 2020 8:42 AM
Deathएड्स का सांकेतिक फोटो।

योगेश कुमार गोयल

एड्स को लेकर अभी तक स्थापित तथ्य यही है कि एचआइवी (ह्यूमन इम्यूनो डेफिसिएंसी विषाणु) के एक बार शरीर में प्रवेश कर जाने के बाद इसे किसी भी तरीके से बाहर निकालना असंभव है और यही विषाणु धीरे-धीरे एड्स नाम की बीमारी में परिवर्तित हो जाता है। हालांकि एड्स अपने आप में कोई बीमारी नहीं है, बल्कि एचआइवी के संक्रमण के बाद जब रोगी व्यक्ति छोटी-छोटी बीमारियों से लड़ने की शारीरिक क्षमता खोने लगता है और शारीरिक शक्ति क्षीण पड़ जाती है, तब जो भयावह स्थिति पनपती है, वही एड्स है। एचआइवी संक्रमण को एड्स की स्थिति तक पहुंचने में दस से बारह साल और कभी-कभी तो इससे भी ज्यादा समय लग सकता है।

इस बीमारी की भयावहता का अंदाज इसी से लगाया जा सकता है कि इसकी वजह से दुनियाभर में हर साल लाखों लोग मर जाते हैं। हालांकि एड्स के खात्मे के लिए दुनियाभर में निरंतर प्रयास जारी हैं, किंतु अभी तक किसी ऐसे स्थायी इलाज की खोज नहीं हो सकी है, जिससे एड्स के पूर्णरूप से सफल इलाज का दावा किया जा सके। यही कारण है कि एड्स और एचआइवी के बारे में हर व्यक्ति को पर्याप्त जानकारी होना अनिवार्य माना जाता है, क्योंकि अभी तक केवल जन-जागरूकता के जरिए ही इस बीमारी से बचा और बचाया जा सकता है।

ऐसे में हर साल एक दिसंबर को मनाए जाने वाले विश्व एड्स दिवस के महत्त्व को आसानी से समझा जा सकता है। इसका मकसद ‘एड्स’ बीमारी के प्रति जागरूकता बढ़ाना है। इस दिवस को मनाने की कल्पना पहली बार अगस्त, 1987 में थॉमस नेट्टर और जेम्स डब्ल्यू बन्न ने की थी। ये दोनों विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) और स्विट्जरलैंड के ‘एड्स ग्लोबल कार्यक्रम’ के लिए सार्वजनिक सूचना अधिकारी थे, जिन्होंने ‘एड्स दिवस’ का अपना विचार ‘एड्स ग्लोबल कार्यक्रम’ के निदेशक डा. जॉननाथन मन्न के साथ साझा किया था। डॉ मन्न द्वारा दोनों के इस विचार को स्वीकृति दिए जाने के बाद एक दिसंबर 1988 से हर साल इस दिन ‘विश्व एड्स दिवस’ मनाए जाने का फैसला हुआ।

सन् 2007 के बाद से विश्व एड्स दिवस को अमेरिका के ‘वाइट हाउस’ द्वारा लाल रंग के एड्स रिबन का एक प्रतिष्ठित प्रतीक देकर शुरू किया गया। एचआइवी-एड्स पर ‘यूएन एड्स’ के नाम से जाना जाने वाला संयुक्त राष्ट्र कार्यक्रम सन् 1996 में शुरू हुआ और उसके बाद ही दुनियाभर में इसे बढ़ावा देना शुरू किया गया। एक दिन के बजाय साल भर एड्स कार्यक्रमों पर ध्यान केंद्रित करने के लिए इस कार्यक्रम की शुरुआत बेहतर संचार, बीमारी की रोकथाम और रोग के प्रति जागरूकता पैदा करने उद्देश्य से की गई।

सन् 1981 में अमेरिका में लॉस एंजिलिस के अस्पतालों में न्यूमोसिस्टिस न्यूमोनिया, कपोसी साकोर्मा और चमड़ी रोग जैसी असाधारण बीमारी का इलाज करा रहे पांच समलैंगिक युवकों में एड्स के लक्षण पहली बार मिले थे। उसके बाद ही यह बीमारी दुनिया भर में फैलती गई। भारत में एड्स का पहला रोगी 1986 में तमिलनाडु के वेल्लूर में मिला था। इसके बाद देश में एचआइवी के मामलों में लगातार होती वृद्धि के मद्देनजर एचआइवी और एड्स की रोकथाम व नियंत्रण संबंधी नीतियां तैयार करने और उनका कार्यान्वयन करने के लिए भारत सरकार ने सन् 1992 में राष्ट्रीय एड्स नियंत्रण संगठन की स्थापना की थी।

यूनीसेफ की एक रिपोर्ट के अनुसार दुनियाभर में एड्स पीड़ित सर्वाधिक संख्या किशोरों की है, जिनमें से दस लाख से भी अधिक किशोर दुनिया के छह देशों दक्षिण अफ्रीका, नाइजीरिया, केन्या, मोजांबिक, तंजानिया और भारत में हैं। विभिन्न अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं के अनुमान के अनुसार भारत में अब तक एड्स के कारण डेढ़ लाख से अधिक बच्चे अनाथ हो चुके हैं और लाखों बच्चे एचआइवी के शिकार हैं। बहुत से देशों में तो एचआइवी ही शिशु मृत्यु का एकमात्र कारण बन चुका है।

अब तक के अध्ययन बताते हैं कि अस्सी फीसद से ज्यादा मामलों में एचआइवी संक्रमण असुरक्षित यौन संबंधों के कारण होता है। इसके अलावा 7.6 फीसद मामलों में एचआइवी संक्रमित रक्त ग्रहण करने से, 5.5 फीसद मामलों में संक्रमित सुई अथवा सीरिंज से, 5.2 फीसद मामलों में संक्रमित मां से बच्चे में और 0.7 फीसद मामलों में अन्य कारणों से एचआइवी संक्रमण होता है। मां से शिशु को होने वाले संक्रमण के मामलों में दस से तीस फीसद मामलों में शिशुओं में ये विषाणु तब प्रवेश करते हैं, जब शिशु गर्भ में होता है, जबकि चालीस से साठ फीसद मामलों में विषाणु प्रसव के दौरान शिशु में प्रवेश करते हैं और करीब तीस फीसद मामलों में शिशुओं में ये विषाणु मां के दूध के द्वारा प्रवेश करते हैं।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की ‘नॉलेज इन पावर’ नामक एक रिपोर्ट के अनुसार भारत में करीब इक्कीस लाख एचआइवी संक्रमित मरीज हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट में यह खुलासा भी हुआ कि भारत में उनयासी फीसद मरीजों को ही अपने एचआइवी संक्रमित होने की जानकारी है, जबकि शेष इक्कीस फीसद एचआइवी संक्रमितों को इस बारे में पता ही नहीं है। जिन उनयासी फीसद मरीजों को अपने संक्रमण की जानकारी है, उनमें से भी केवल छप्पन फीसद का इलाज ही एंटी-रिट्रोवायरल थैरेपी से हो रहा है, जबकि बाकी मरीजों का कोई इलाज नहीं हो रहा। ऐसे में इस खतरनाक बीमारी के प्रसार का खतरा बरकरार है।

हालांकि अब ऐसा नहीं है कि एचआइवी संक्रमित हो जाने का अर्थ निश्चित मौत ही है, क्योंकि इस संक्रमण को खत्म करने का पूर्ण इलाज भले ही अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन इसे निष्क्रिय करने के लिए एंटी-रिट्रोवायरल थैरेपी का सहारा लिया जाता है, जिससे एचआइवी मरीज सामान्य जिंदगी जी सकता है। इस प्रक्रिया में हर बारह महीने में एक बार मरीज को अपनी जांच करानी होती है।

‘ग्लोबल हैल्थ’ के विशेषज्ञों के अनुसार इस उपचार को लेने वाले मरीजों की संख्या में वृद्धि हो रही है और अब एड्स के विषाणु से मरने वालों की संख्या में प्रतिवर्ष कमी आ रही है। हालांकि यह रफ्तार अभी धीमी है और अभी भी दुनिया में एचआइवी से संक्रमित होने वालों की संख्या अठारह लाख सालाना से अधिक है। अमेरिका के सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के मुताबिक वर्तमान में अमेरिका में ही लगभग ग्यारह लाख लोग एड्स और एचआइवी से पीड़ित हैं।

पिछले कई वर्षों से एड्स और एचआइवी को लेकर लोगों में जागरूकता पैदा करने के प्रयास किए जा रहे हैं, लेकिन विडंबना ही है कि बहुत से लोग इसे आज भी छुआछूत से फैलने वाला संक्रामक रोग मानते हैं। इस संबंध में यह जान लेना बेहद जरूरी है कि इस संक्रमण के शिकार व्यक्ति के साथ हाथ मिलाने, उसके साथ भोजन करने, स्नान करने या उसके पसीने के संपर्क में आने से यह रोग नहीं फैलता।

इसलिए एड्स के प्रति जागरूकता पैदा किए जाने की आवश्यकता तो है ही, समाज में ऐसे मरीजों के प्रति हमदर्दी और प्यार का भाव होना और ऐसे रोगियों का हौसला बढ़ाने की जरूरत भी है। बहुत से मामलों में आज भी जब यह देखा जाता है कि एचआइवी संक्रमित मरीज न केवल अपने आस-पड़ोस के लोगों, बल्कि अपने ही परिजनों के भेदभाव का भी शिकार होते हैं तो चिंता पैदा होती है। इसलिए इस बीमारी का कारगर इलाज खोजे जाने के प्रयासों के साथ-साथ ऐसे मरीजों के प्रति समाज और परिजनों की सोच को बदलने के लिए अपेक्षित कदम उठाए जाने की भी सख्त जरूरत है।

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