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राजनीतिः यह जिम्मेदारी सामूहिक है

लड़कियों की तरह लड़कों को भी सीख देकर, उनकी हदों का एहसास करा कर उन्हें बेलगाम होने से रोका जा सकता है। वे कब, क्या करते हैं, किससे मिलते हैं, उनके मित्र-परिचित कौन हैं, इसकी पूरी जानकारी परिवार वालों को होनी चाहिए। ये कदम जब उनमें सुधार लाएंगे तो स्वाभाविक रूप से समाज में भी बदलाव आएगा और बलात्कार, छेड़खानी जैसे जघन्य अपराध भी कम होने लगेंगे।

नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार देश भर में महिलाओं के खिलाफ अपराध में लगातार बढ़ोतरी हो रही है

संगीता सहाय

हाथरस की घटना ने एक बार फिर निर्भया कांड की याद दिला दी है। निर्भया मामले में बलात्कारियों का वकील अंत तक उन भयानक अपराधियों को बचाने का जुगत लगाता रहा, फांसी की तारीखों को आगे बढ़वाता रहा। पर अंतत: उसकी हार हुई। अंतिम सुनवाई के बाद मीडिया के सामने कुटिल हंसी के साथ उसमें से एक अपराधी ने कहा था कि ‘वह लड़की अगर इतनी ही अच्छी थी तो रात के साढ़े बारह बजे बाहर क्या कर रही थी?…’ इस तरह वह महिलाओं के प्रति अपनी कुत्सित मानसिकता का परिचय दे रहा था। हमारे समाज के एक बड़े तबके की भी यही सोच है, जिसके तहत वह औरतों को अपनी इस्तेमाल की वस्तु और गुलाम समझ कर उसकी हदों को अपनी इच्छानुसार तय करना चाहता है, उनके साथ मनमानी करना चाहता है। यही सोच हाथरस, बारां, टोंक, मुजफ्फरपुर, लखनऊ सहित देश के हर हिस्से में रोज होते बलात्कार और तमाम प्रकार के यौनिक अपराध की वजह भी है।

निर्भया कांड के बाद महिलाओं के प्रति आपराधिक कृत्यों के रोकने के लिए गठित जस्टिस वर्मा समिति ने वर्ष 2013 में अपनी रिपोर्ट दी थी। रिपोर्ट के मद्देनजर सरकार ने बलात्कार, छेड़छाड, कार्यस्थल पर होने वाले लैंगिक अपराध सहित तमाम यौनिक अपराधों पर सख्त कानून बना कर इस संदर्भ में अपनी प्रतिबद्धता सिद्ध करने की कोशिश की थी। विभिन्न मामलों में फांसी से लेकर आजीवन कारावास तक के कठोर प्रावधान किए गए। इन संदर्भों में लोगों की समझ और जागरूकता भी पहले के मुकाबले बढ़ी है। तभी अब पहले की तुलना में कई गुना ऐसे मामले कानून की चौखट तक पहुंचने लगे हैं। साथ ही अनावश्यक शर्म और हया की दीवारें भी कमजोर होने लगी हैं।

यह मानी हुई बात है कि हर बेहतर प्रयास को कमोबेश सफलता मिलती ही है। पर क्या इससे ऐसे जघन्य अपराध कम हुए हैं? लड़कियों को समानता पूर्वक सुरक्षित तरीके से जिंदगी जीने को आजादी मिल सकी है? कदम-कदम पर लैंगिक भेदभाव के जाल से लड़की मुक्त हो पाई है? क्या ये सख्त प्रावधान और लोगों की बढ़ी जागरूकता लगभग हर मिनट गलियों, चौक-चौराहों, सड़कों और यहां तक कि घरों में होने वाले बलात्कार और छेड़खानी के अपराधों में कमी ला पाए? अपने अनकिए अपराध का दंड और दंश झेलती, तिल-तिल कर मरती औरतों का दर्द क्या यह कानून कुछ कम सका? प्रश्न अनगिनत हैं, और दुखद स्थिति यह है कि ज्यादातर का उत्तर नहीं में है। आज भी बलात्कार, छेड़खानी और ऐसे अन्य अपराधों के अधिकांश मामले झूठे सम्मान, कानूनी समझ की कमी, रसूखदारों का असर, गरीबी, सामाजिक बनावट, औरत की दोयम स्थिति आदि के कारण दबे रह जाते हैं। जो चंद मामले कानून की चौखट तक पहुंचते भी हैं, उनमें से ज्यादातर आधे रास्ते में ही दम तोड़ देते हैं।

नेशनल क्राइम ब्यूरो के अनुसार देश भर में महिलाओं के खिलाफ अपराध में लगातार बढ़ोतरी हो रही है। आंकड़ों के अनुसार 2018 की तुलना में 2019 में महिलाओं के खिलाफ होने वाले अपराधों में सात फीसद से ज्यादा की बढ़ोतरी हुई है। 2019 में प्रति एक लाख की आबादी पर दर्ज महिलाओं के खिलाफ अपराधों की दर 62.4 फीसद रही, जबकि 2018 में 58.8 फीसद थी। ऐसे अपराधों में हत्या, बलात्कार, दहेज हत्या, आत्महत्या के लिए उकसाना, एसिड हमले, महिलाओं के खिलाफ क्रूरता और अपहरण आदि शामिल हैं। गौरतलब है कि ये वे आंकड़े हैं जो पुलिस डायरी में दर्ज होते हैं। जबकि बलात्कार के ऐसे लाखों अपराध हैं, जिनकी आवाज कानून की चौखट तक पहुंच ही नहीं पाती, या पहुंचती भी है तो रसूखदारों की दबिश और पैसे के खेल में दबा दी जाती है। अनगिनत ऐसे भी मामले होते हैं, जो परिवार के कथित सम्मान और असम्मान की भेंट चढ़ जाते हैं। साथ ही बलात्कार के अलावा उपरोक्त वर्णित अन्य अपराधों के सैकड़ों मामले भी देश भर में हर रोज होते हैं।

विचारणीय मुद्दा है कि क्या सब कुछ ऐसे ही चलता रहेगा या बदलाव का कोई रास्ता है। भारतीय समाज पितृसत्तात्मक है। प्रत्यक्ष और परोक्ष दोनों रूपों में हमारी व्यवस्था पुरुष द्वारा और पुरुष के लिए काम करती है। एक लड़के को बचपन से ही लैंगिक श्रेष्ठता का पाठ पढ़ाया जाता है। खेल में, बात-व्यवहार में, कामकाज से लेकर तमाम गतिविधियों के माध्यम से वह अपने पौरुष की शक्ति और श्रेष्टता का पाठ पढ़ता हुआ उम्र की सीढ़ियां चढ़ता है। अक्सर उसे उसके गलत आचरण पर भी तारीफें मिलती हैं।

दूसरी तरफ लड़कियों को उनकी बढ़ती उम्र के साथ तमाम नसीहतें दी जाती हैं। उन्हें उनकी कमजोर सामाजिक स्थिति का भान कराया जाता है। घर की देहरी से बंधे रहने की सीख दी जाती है और घरेलू क्रियाकलापों में पारंगत किया जाता है। ऐसे में स्वाभाविक है कि दोहरी व्यवस्था और दोयम सोच वाला समाज असंतुलित ही होगा। ऐसी असंतुलित सामाजिक व्यवस्था में पला-बढ़ा पुरुष अगर कोई गलत काम करता है, तो दोषी सिर्फ वही कैसे हो सकता है? उसके किसी अपराध के लिए उसके साथ-साथ उस पूरी व्यवस्था को दोषी क्यों नहीं मानना चाहिए, जिसने उसे ऐसा बनने के लिए खाद-पानी दिया। आवश्यकता इस बात की है कि बदलाव और सुधार कानूनों के साथ-साथ सामाजिक बनावट में भी हो। स्त्री को दोयम घोषित करने वाली परंपराओं और कुरीतियों पर रोक लगे। बेटे-बेटी दोनों की परवरिश समतापूर्ण तरीके से होनी चाहिए। नियम-कायदे, कहीं आने-जाने के समय की पाबंदियां, कामकाज की बातें दोनों पर समान रूप से लागू होनी चाहिए। लड़कियों की तरह लड़कों को भी सीख देकर, उनकी हदों का एहसास करा कर उन्हें बेलगाम होने से रोका जा सकता है। वे कब, क्या करते हैं, किससे मिलते हैं, उनके मित्र-परिचित कौन हैं, इसकी पूरी जानकारी परिवार वालों को होनी चाहिए। ये कदम जब उनमें सुधार लाएंगे तो स्वाभाविक रूप से समाज में भी बदलाव आएगा और बलात्कार, छेड़खानी जैसे जघन्य अपराध भी कम होने लगेंगे।

साथ ही जरूरत इस बात की भी है कि सरकारें बढ़ते बाजार की हदों को तय करें। व्यवसाय आवश्यक है, पर उसकी बढ़ती सीमाओं और पैसे की अनंत भूख ने हमारे समाज और संस्कृति की जड़ों को खोखला कर दिया है। उसके सही और गलत की सीमाएं सिर्फ पैसे से तय होने लगी हैं। कहा जा सकता है कि पूरी व्यवस्था को वह अपनी अंगुलियों पर नचा रहा है। चमक, रंगीनियां, सब कुछ पा लेने की होड़, दूसरे को पछाड़ कर आगे निकलने की जानलेवा दौड़ आदि ने हमारे मूल्यों को हमसे छीन लिया है। मोबाइल कंपनियों की आपसी व्यावसायिक प्रतिद्वंदिता ने इसे हर हाथ के लिए सुलभ बना दिया। जिस व्यक्ति को दो शब्द लिखने नहीं आता वह भी धड़ल्ले से मोबाइल और नेट चला रहा है। खासकर युवाओं को आकृष्ट करने के लिए उनके सामने अभद्र और कुत्सित भावनाओं को भड़काने वाली चीजें परोसी जा रही हैं। बेलगाम पोर्न का बाजार इस भयावह दावानल में घी का काम कर रहा है। नग्नता कब लोगों के मनोरंजन की वस्तु हो गई, पता ही नहीं चला। फेसबुक, वाट्सऐप, यूट्यूब जैसे माध्यम लोगों को भड़काने और भटकाने में लगे हैं। इसी में उनके व्यावसायिक फायदे छिपे हैं। समाज कहां जा रहा है, इससे किसी को कोई मतलब नहीं है। स्थिति बर्बादी के हद तक बिगड़ती जा रही है।

इन जटिल मुद्दों का हल तलाशने की जिम्मेवारी हमारी पारिवारिक, सामाजिक व्यवस्था और सरकार सबकी सम्मिलित रूप से है। आवश्यक है कि सभी इस बेलगाम दौर पर रोक लगाने के लिए अपने-अपने हिस्से का काम करें।

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