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राजनीति: गरीब होती बुजुर्ग आबादी

सरकारी क्षेत्र में काम करने वालों के पास भले ही दशकों से सामाजिक सुरक्षा का कवच बना हुआ है, लेकिन निजी क्षेत्र में यह कवच बहुत ही पतला है। निजी क्षेत्र में भी सिर्फ संगठित निजी क्षेत्र में सामाजिक सुरक्षा का थोड़ा-सा इंतजाम है। लेकिन भारी-भरकम असंगठित क्षेत्र में यह व्यवस्था लगभग शून्य ही है। छोटे से संगठित निजी क्षेत्र में पेंशन के नाम पर जो रकम मिलती है, उससे तो महीने भर क्या हफ्ते भर का भी गुजारा भी संभव नहीं है।

आर्थिक परेशानी का सामना करने को मजबूर बुजुर्ग। फाइल फोटो।

सुविज्ञा जैन

वरिष्ठ नागरिक, नौकरियों से रिटायर हुए लोग या उम्र के कारण अब आगे और काम नहीं कर पाने वाले लोग यानी देश की बुजुर्ग आबादी आज जिस हाल में है, उसे संतोषजनक कतई नहीं कहा सकता। खासतौर से बात जब आर्थिक सुरक्षा की आती है तो मामला गंभीर चिंता पैदा करता है। देश में बुजुर्गों की हालत पर विश्वसनीय शोध अध्ययन उपलब्ध नहीं है। ऐसे में यदा-कदा मीडिया में आने वाली रिपोर्ट या आलेखों के आधार पर ही एक सामान्य-सा अनुभव यह बनता है कि बुजुर्ग आबादी के संकट गहराते जा रहे हैं।

वैसे लोकतांत्रिक व्यवस्था वाली सरकारें समय-समय पर बुजुर्गों के कल्याण की चर्चा करती रही हैं। भारत में पिछले दो दशकों में सरकारों की तरफ से बुजुर्गों की सामाजिक-आर्थिक सुरक्षा पर ध्यान देने का जो जिक्र मिलता है, उनमें 1999 की नेशनल पॉलिसी आॅन ओल्डर पर्सन्स, 2004 की नेशनल पेंशन स्कीम और 2007 में बना मेंटेनेंस एंड वेलफेयर आॅफ पेरेंट्स एंड सीनियर सिटीजंस एक्ट प्रमुख कवायदें हैं। इस समय भी एक नया मसविदा तैयार करने की कवायद चल रही है, जिसका नाम है- ड्राफ्ट नेशनल पॉलिसी फॉर सीनियर सिटीजंस। लेकिन बुजुर्गों के लिए नई नीति की बात ऐसे समय में हो रही है जब सरकारी खजाना भारी मुश्किल के दौर में है। लिहाजा यह अंदाजा लगा पाना मुश्किल नहीं है कि बुजुर्गों के कल्याण के लिए सरकारी तौर पर इस बार भी कितना कुछ सोचा जा पाएगा।

अगर नई नीति के मसविदे की प्रकिया चालू है तो हमें यह जरूर याद रखना चहिए कि सरकारी क्षेत्र में काम करने वालों के पास भले ही दशकों से सामाजिक सुरक्षा का कवच बना हुआ है, लेकिन निजी क्षेत्र में यह कवच बहुत ही पतला है। निजी क्षेत्र में भी सिर्फ संगठित निजी क्षेत्र में ही सामाजिक सुरक्षा का थोड़ा-सा इंतजाम है। लेकिन भारी-भरकम असंगठित क्षेत्र में यह व्यवस्था लगभग शून्य ही है। छोटे से संगठित निजी क्षेत्र में पेंशन के नाम पर जो रकम मिलती है, उससे तो महीने भर क्या हफ्तेभर का भी गुजारा भी संभव नहीं है। जबकि इस पेंशन के बनने मे आधा योगदान कर्मचारी का भी होता है। वे सेवा काल में अपनी तनख्वाह का एक हिस्सा कटवा कर इस पेंशन कोष में जमा करते हैं।

हैरत की बात तो यह है कि वे अपनी पुख्ता सामाजिक सुरक्षा के लिए यदि वेतन से ज्यादा रकम कटवा कर ज्यादा योगदान करना भी चाहें तो नियम इसकी इजाजत नहीं देते। ऐसे में पर्याप्त पेंशन के बारे में ज्यादा चर्चा होने नहीं दी जाती। वैसे एक हकीकत यह भी है कि छोटे से संगठित निजी क्षेत्र के कामगारों के लिए मानवोचित पेंशन की बात सिरे चढ़ भी जाए तो भी देश के बुजुर्गों की पूरी तस्वीर पर कोई खास फर्क पड़ेगा नहीं। ऐसा इसलिए कि अभी देश का लगभग सारा काम-धाम असंगठित क्षेत्र ही करता आ रहा है।

एक मोटा अनुमान है कि देश के कुल कार्यबल में असंगठित क्षेत्र की हिस्सेदारी तिरानवे फीसद है। सरकारी पेंशन और गैरसरकारी पेंशन वालों की तादाद तो बहुत ही मामूली है। इस सिलसिले में एक बार देश में पेंशन प्रणाली के दायरे में आने वालों की संख्या पर भी नजर डाल लेनी चाहिए। मौजूदा हालात यह है कि एक सौ तीस करोड़ से ज्यादा आबादी वाले देश में लेखे में लेने लायक कोई एक सार्वभौमिक पेंशन प्रणाली नहीं है।

यही कारण है कि दुनिया के सैंतीस देशों के बीच जब वैश्विक स्तर पर पेंशन प्रणाली का आकलन किया गया तो भारत का स्थान बत्तीसवां निकला। देश में कार्ययोग्य कुल आबादी में सिर्फ साढ़े सात फीसद नागरिक ही मौजूदा पेंशन योजना के दायरे में हैं। यह आंकड़ा बताता है कि भविष्य में बुजुर्गों के सामने सामाजिक सुरक्षा का कितना बड़ा संकट खड़ा है।

वरिष्ठ नागरिकों के बारे में अब तक सरकारों ने जो कुछ भी किया है, उस पर भी नजर डाल लेनी चाहिए। मसलन 1999 में वरिष्ठ नागरिकों के कल्याण के लिए राष्ट्रीय नीति एनपीओपी बनी थी। उसके बाद 2004 में जब नेशनल पेंशन सिस्टम (एनपीएस) वजूद में आया तो एक बड़ा बदलाव यह दिखा कि इसे कर्मचारी केंद्रित बना दिया गया। यानी कर्मचारी जब तक काम पर है, तब तक वह अपने रिटायर होने के बाद के गुजारे के लिए अपनी तरफ से भी पैसा देकर भविष्य का इंतजाम कर सके। लेकिन इस प्रणाली में अंसगिठत क्षेत्र के कामगारों के लिए कोई उल्लेखनीय प्रावधान दिखाई नहीं दिया। अब जब नया मसविदा बन रहा है तो असंगठित क्षेत्र के उस तबके पर सबसे पहले ध्यान दिया जाना चाहिए।

बेशक बुजुर्गों के लिए बीच-बीच में ऐसी योजनाओं का भी ऐलान होता रहा जिससे असंगठित निजी क्षेत्र के कामगार अपने कामधंधों के दिनों में अपनी आमदनी का एक हिस्सा खुद ही बचा कर रखने की आदत डाल सकें। सार्वजनिक भविष्य निधि यानी पीपीएफ योजना इसी मकसद से लाई गई थी। इसमें जमा रकम पर ब्याज दर अन्य बचत योजनाओं के मुकाबले थोड़ी ज्यादा रखी गई थी। लेकिन यह इतनी आकर्षक कभी नहीं बन पाई कि लोकप्रिय हो जाती। आयकर में थोड़ी-सी छूट के आकर्षण में बचत जरूर की जाती रही और इसीलिए इसका लाभ खाते-पीते लोगों ने ही ज्यादा उठाया। लेकिन बुढ़ापे के लिए पैसा बचा कर रखने का मकसद इससे जुड़ नहीं पाया।

कुछ समय पहले सरकार एक योजना लाई गई थी कि असंगठित क्षेत्र का कोई भी कामगार या कोई भी नागरिक हर महीने एक निश्चित रकम अपने भविष्य के लिए जमा करे, उतनी ही रकम सरकार भी मिला देगी। और फिर जब वह साठ साल का हो जाएगा तो उसे पेंशन मिला करेगी। लेकिन इस योजना में क्योंकि सरकार को भी आधे पैसे मिलाने थे, सो पेंशन की दर सिर्फ तीन हजार रुपए महीना ही रखी गई।

रुपए की मौजूदा हैसियत के लिहाज से यह रकम जब आज ही इतनी छोटी दिखाई देती है तो बीस से अड़तीस साल बाद इसका मूल्य क्या रह जाएगा, इसका अंदाजा लगाया जा सकता है। ऐसे में यह योजना कैसे लोकप्रिय हो पाती, यह सोचने वाली बात है। इस योजना की मौजूदा हालत यह हैं कि इतना वक्त गुजरने के बाद भी पचास लाख लोगों ने भी इसमें पंजीयन नहीं करवाया। हां, यह जरूर है कि इस योजना में सरकार के पास नागरिकों के अंशदान की रकम आ रही है और सरकार पर पेंशन देने की जिम्मेदारी बीस साल बाद आएगी। इस लंबे अंतराल में देश में सामाजिक, राजनीतिक, आर्थिक और वैधानिक परिस्थितियां क्या बनेंगी, अभी से उनका अनुमान लगा पाना मुश्किल है।

बुजुर्गों पर बात का एक पहलू यह भी है कि मसला सिर्फ भविष्य में बुजुर्ग होने वालों का ही नहीं है, बल्कि जो वरिष्ठ नागरिक हो चुके हैं या सेवानिवृत्त हो चुके हैं, उनकी संख्या भी तेजी से बढ़ी है। आज दिन तक साठ साल से ज्यादा उम्र के नागरिकों का अनुमान लगाएं तो यह संख्या लगभग तेरह करोड़ बैठती है। अगर अभी आठ फीसद बुजुर्गों को सुरक्षा के दायरे में मान कर चलें तो सीधे-सीधे ग्यारह करोड़ नब्बे लाख बुजुर्गों के पास इस समय सम्मानजनक या मानवोचित जीवन-यापन का सुरक्षा कवच नहीं है।

बुजुर्गों के बारे में अगर कोई नई नीति बनाने पर सोच विचार हो रहा है तो सबसे पहले यह जरूर सोच लिया जाना चाहिए कि संयुक्त राष्ट्र जनसंख्या कोष के एक अनुमान के मुताबिक 2025 तक भारत में बुजुर्गों की संख्या बढ़ कर करीब सोलह करोड़ होने वाली है। सन 2025 दूर नहीं है। कुल मिला कर अगर कोई नीति बन रही है तो उसके पहले एक सवाल तैयार हो गया है कि जिन लोगों ने अपनी पूरी जिंदगी परिवार और कार्यस्थलों पर काम करते गुजार दी हो, आखिर उन बुजुर्गों को समाज, उनके नियोक्ता और सरकार कितना वापस लौटाने को तैयार है।

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